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Blunt Speaking Child Psychology; Social Skills Guidance

Blunt Speaking Child Psychology; Social Skills Guidance
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4 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल

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सवाल- मैं पटना से हूं। मेरी 10 साल की बेटी बहुत होशियार, समझदार है। लेकिन उसकी एक आदत बहुत परेशान करने वाली है। वो जो सोचती है, फट से बोल देती है। अगर उसे किसी की ड्रेस अच्छी नहीं लगी तो सीधे कह देती है, “ये अच्छी नहीं है।” अगर कोई दोस्त गलत खेले तो कह देगी, “तुम्हें खेलना नहीं आता।”

वह बोलने से पहले सोचती नहीं है। दोस्त उसकी बातों का बुरा मान जाते हैं। उसकी कुछ दोस्तियां भी टूट चुकी हैं। ये साफगोई है या मुंहफटपन। मैं कन्फ्यूज हूं। समझ नहीं पा रही, उसे कैसे गाइड करूं। मुझे क्या करना चाहिए?

एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

जवाब- सवाल पूछने के लिए आपका शुक्रिया। सबसे पहले तो मैं आपको आश्वस्त करना चाहूंगी कि ये कोई ‘अवगुण’ नहीं है। ये आपकी बेटी की पर्सनैलिटी का एक ‘रॉ’ यानी कच्चा रूप है।

10 साल की उम्र में बच्चे अपने विचारों को साफ तरीके से रखना सीख रहे होते हैं। उनमें लॉजिकल ब्रेन विकसित हो रहा होता है। लेकिन ‘सोशल इंटेलिजेंस’ (सामाजिक समझ) अभी पूरी तरह मेच्यौर नहीं हुई होती है।

उनमें अभी यह समझ पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती कि सच बोलने का तरीका भी मायने रखता है। साइकोलॉजी में इसे ‘सोशल फिल्टर डेवलपमेंट’ कहा जाता है। यह समझ जन्म से नहीं होती है, बल्कि धीरे-धीरे सीखने वाली चीज है। इसलिए बेटी को कम्युनिकेशन स्किल सिखाना जरूरी है। बच्चे के बिना फिल्टर बोलने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। आइए पहले इसे समझते हैं।

बच्चे बिना फिल्टर के क्यों बोलते हैं?

डेवलपमेंटल साइकोलॉजी के मुताबिक, टीनएज से पहले बच्चे दुनिया को ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ नजरिए से देखते हैं। उनके दिमाग में ‘सही’ और ‘गलत’ दो ही चीजें होती हैं। वह डिप्लोमेसी के महत्व को नहीं समझते हैं। उन्हें लगता है कि अगर कोई चीज बुरी दिख रही है, तो उसे बुरा कहना ही ईमानदारी है। वह ये नहीं समझ पाते कि उनके शब्द किसी के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा सकते हैं। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।

क्या यह चिंता की बात है?

यहां समझने वाली बात ये है कि अगर आपकी बच्ची जानबूझकर किसी को नीचा दिखाने या मजाक उड़ाने के लिए ऐसा करती है, तो यह बिहेवियरल प्रॉब्लम है। लेकिन अगर वह अनजाने में सिर्फ ‘सच’ कह रही है, तो यह केवल सोशल स्किल की कमी है। अच्छी बात यह है कि 10-12 साल की उम्र में इसे बहुत आसानी से सुधारा जा सकता है।

‘मुंहफट’ बच्चे को कैसे गाइड करें?

सबसे पहले यह समझ लें कि आपकी बच्ची की ‘साफगोई‘ ही उसकी असली ताकत है। उसे बदलने की कोशिश करना उसके आत्मविश्वास को चोट पहुंचा सकता है। ऐसे में जरूरत उसे चुप कराने की नहीं, बल्कि उसे बातचीत का तरीका सिखाने की है।

उसे समझाएं कि सच बोलना अच्छी बात है, लेकिन हर सच उसी रूप में और उसी समय बोलना जरूरी नहीं होता है। बोलने से पहले रुकना, सोचना और सामने वाले की भावना को समझना भी उतना ही जरूरी है।

बच्ची को यह सिखाएं कि वह अपनी बात रखते समय लहजा नरम रखे। शब्दों का चुनाव सोच-समझकर करे और सामने वाले के नजरिए को भी समझे। आप रोल-प्ले, कहानियों और रोजमर्रा की छोटी घटनाओं के जरिए उसे यह कला सिखा सकती हैं।

याद रखें, आपका उद्देश्य उसे बदलना नहीं, बल्कि उसकी बेबाकी को थोड़ा संवेदनशील बनाना है। नीचे दिए गए ग्राफिक में कुछ आसान और व्यवहारिक तरीके दिए गए हैं, जिनका ध्यान रखना जरूरी है।

‘सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात’

आपकी बेटी में ईमानदारी है, ये अच्छी बात है। लेकिन उसे ये नहीं पता कि ‘सच’ और ‘कड़वे सच’ के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है।

संस्कृत का एक श्लोक है-

“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।”

इसका अर्थ है, ‘’सच बोलो, मीठा बोलो। लेकिन ऐसा सच न बोलो, जो दिल को आहत करे।’’

बेटी को समझाएं कि सच बोले, लेकिन इसे ऐसे बोले कि सामने वाले का दिल न दुखे। उसे ये बातें उदाहरण के साथ समझाएं। जैसेकि–

  • मान लो आपके पास एक खिलौना है। आपका कोई दोस्त कहे कि खिलौना खराब है तो आपको कैसा लगेगा? बुरा लगेगा न। वैसे ही हमें किसी को ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए, जिससे उसका दिल दुखे।
  • जब क्लास में कोई स्पीच देता है तो टीचर अंत में हमेशा क्या कहती हैं– “वेरी गुड।” वो कभी ऐसे तो नहीं बोलतीं कि ये स्पीच गंदी थी, तुम्हें बोलना नहीं आता। वैसे ही हमें हमेशा दूसरों को इनकरेज करना चाहिए। अगर उन्होंने बहुत अच्छा नहीं बोला, अच्छा नहीं किया, तो भी हमें “वेरी गुड” ही बोलना चाहिए। तभी तो वो आगे और कोशिश करेंगे।
  • मान लो, आपकी दोस्त ने एक ड्रॉइंग बनाई और आपको दिखाकर पूछा- “कैसी है?” तो आप क्या कहोगी? क्या ये कहना चाहिए कि ये पेंटिंग अच्छी नहीं लगी। नहीं न। हम यही कहेंगे, “ये तो बहुत सुंदर है। लेकिन अगर इसमें एक और पेड़ बना लो तो ये और सुंदर हो जाएगी।“ इस तरह हमने सच भी बोला, फीडबैक भी दिया और उसका दिल भी नहीं दुखाया।

‘रुको, सोचो, फिर बोलो’ का फॉर्मूला बताएं

बच्ची को यह बताना जरूरी है कि बोलना एक जिम्मेदारी का काम है। उसे बताएं कि जो शब्द हम एक बार बोल देते हैं, वे कभी वापस नहीं आते। इसलिए प्रतिक्रिया देने से पहले थोड़ा रुकना और सोचना बहुत जरूरी है। उसे कम्युनिकेशन का ‘थिंक’ फॉर्मूला समझाएं। बताएं कि कुछ भी बोलने से पहले खुद से ये 5 सवाल जरूर पूछे-

‘मुंहफट’ बच्चों के साथ पेरेंट्स न करें ये गलतियां

कई बार पेरेंट्स बच्चे को सुधारने के इरादे से ऐसी प्रतिक्रियाएं देते हैं, जो अनजाने में समस्या को और बढ़ा देती है। तुरंत डांटना, सबके सामने टोकना या बार-बार उसकी कमी गिनाना बच्चे को सुधारता नहीं, बल्कि उसे डिफेंसिव बना देता है। ऐसे में बच्चा या तो चुप हो जाता है या और ज्यादा जिद्दी। इसलिए सुधार का तरीका संतुलित होना चाहिए। इसलिए पेरेंट्स को कभी भी ये गलतियां नहीं करनी चाहिए-

  • बच्ची को ‘मुंहफट’ या ‘बदतमीज’ न कहें।
  • सबके सामने उसे टोककर शर्मिंदा न करें।
  • उसकी तुलना दूसरे बच्चों से न करें।
  • उसकी हर बात को गलत ठहराकर चुप न कराएं।
  • गुस्से में आकर उसकी बात न काटें।
  • रिश्तेदारों की बातों में आकर उस पर अनावश्यक सख्ती न करें।
  • उसकी साफगोई को पूरी तरह नकारकर उसे झूठा या बनावटी बनने की सीख न दें।

अंत में यही कहूंगी कि आपकी बेटी को बदलने की नहीं, बस उसके बातचीत के तरीके को थोड़ा रिफाइन करने की जरूरत है। आपका काम उसे चुप कराना नहीं, बल्कि उसे बेहतर कम्युनिकेशन स्किल सिखाना है।

उसे समझाएं कि शब्दों में मरहम लगाने की भी ताकत होती है। जब वह यह जान जाएगी कि सच को खूबसूरत तरीके से कहा जा सकता है, तो उसके दोस्त भी सहज महसूस करेंगे और रिश्तेदार भी उसका सम्मान करेंगे। उसे बस यह भरोसा दिलाएं कि आप उसकी सच्चाई के साथ हैं। सिर्फ उसे पेश करने का तरीका थोड़ा और संवेदनशील और खूबसूरत बनाना है।

……………………….

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याद रखिए, बच्चों को अगर कोई भी चीज सिखानी है तो वह मजेदार होनी चाहिए। बच्चों को जो चीजें मजेदार लगती हैं, उसे वे इंटरेस्ट के साथ पढ़ते व समझते हैं। वहीं दबाव और जबरदस्ती करने से बच्चे उससे दूर भागते हैं। पूरी खबर पढ़िए…

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सवाल- मैं पटना से हूं। मेरी 10 साल की बेटी बहुत होशियार, समझदार है। लेकिन उसकी एक आदत बहुत परेशान करने वाली है। वो जो सोचती है, फट से बोल देती है। अगर उसे किसी की ड्रेस अच्छी नहीं लगी तो सीधे कह देती है, “ये अच्छी नहीं है।” अगर कोई दोस्त गलत खेले तो कह देगी, “तुम्हें खेलना नहीं आता।”

वह बोलने से पहले सोचती नहीं है। दोस्त उसकी बातों का बुरा मान जाते हैं। उसकी कुछ दोस्तियां भी टूट चुकी हैं। ये साफगोई है या मुंहफटपन। मैं कन्फ्यूज हूं। समझ नहीं पा रही, उसे कैसे गाइड करूं। मुझे क्या करना चाहिए?

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जवाब- सवाल पूछने के लिए आपका शुक्रिया। सबसे पहले तो मैं आपको आश्वस्त करना चाहूंगी कि ये कोई ‘अवगुण’ नहीं है। ये आपकी बेटी की पर्सनैलिटी का एक ‘रॉ’ यानी कच्चा रूप है।

10 साल की उम्र में बच्चे अपने विचारों को साफ तरीके से रखना सीख रहे होते हैं। उनमें लॉजिकल ब्रेन विकसित हो रहा होता है। लेकिन ‘सोशल इंटेलिजेंस’ (सामाजिक समझ) अभी पूरी तरह मेच्यौर नहीं हुई होती है।

उनमें अभी यह समझ पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती कि सच बोलने का तरीका भी मायने रखता है। साइकोलॉजी में इसे ‘सोशल फिल्टर डेवलपमेंट’ कहा जाता है। यह समझ जन्म से नहीं होती है, बल्कि धीरे-धीरे सीखने वाली चीज है। इसलिए बेटी को कम्युनिकेशन स्किल सिखाना जरूरी है। बच्चे के बिना फिल्टर बोलने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। आइए पहले इसे समझते हैं।

बच्चे बिना फिल्टर के क्यों बोलते हैं?

डेवलपमेंटल साइकोलॉजी के मुताबिक, टीनएज से पहले बच्चे दुनिया को ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ नजरिए से देखते हैं। उनके दिमाग में ‘सही’ और ‘गलत’ दो ही चीजें होती हैं। वह डिप्लोमेसी के महत्व को नहीं समझते हैं। उन्हें लगता है कि अगर कोई चीज बुरी दिख रही है, तो उसे बुरा कहना ही ईमानदारी है। वह ये नहीं समझ पाते कि उनके शब्द किसी के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा सकते हैं। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।

क्या यह चिंता की बात है?

यहां समझने वाली बात ये है कि अगर आपकी बच्ची जानबूझकर किसी को नीचा दिखाने या मजाक उड़ाने के लिए ऐसा करती है, तो यह बिहेवियरल प्रॉब्लम है। लेकिन अगर वह अनजाने में सिर्फ ‘सच’ कह रही है, तो यह केवल सोशल स्किल की कमी है। अच्छी बात यह है कि 10-12 साल की उम्र में इसे बहुत आसानी से सुधारा जा सकता है।

‘मुंहफट’ बच्चे को कैसे गाइड करें?

सबसे पहले यह समझ लें कि आपकी बच्ची की ‘साफगोई‘ ही उसकी असली ताकत है। उसे बदलने की कोशिश करना उसके आत्मविश्वास को चोट पहुंचा सकता है। ऐसे में जरूरत उसे चुप कराने की नहीं, बल्कि उसे बातचीत का तरीका सिखाने की है।

उसे समझाएं कि सच बोलना अच्छी बात है, लेकिन हर सच उसी रूप में और उसी समय बोलना जरूरी नहीं होता है। बोलने से पहले रुकना, सोचना और सामने वाले की भावना को समझना भी उतना ही जरूरी है।

बच्ची को यह सिखाएं कि वह अपनी बात रखते समय लहजा नरम रखे। शब्दों का चुनाव सोच-समझकर करे और सामने वाले के नजरिए को भी समझे। आप रोल-प्ले, कहानियों और रोजमर्रा की छोटी घटनाओं के जरिए उसे यह कला सिखा सकती हैं।

याद रखें, आपका उद्देश्य उसे बदलना नहीं, बल्कि उसकी बेबाकी को थोड़ा संवेदनशील बनाना है। नीचे दिए गए ग्राफिक में कुछ आसान और व्यवहारिक तरीके दिए गए हैं, जिनका ध्यान रखना जरूरी है।

‘सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात’

आपकी बेटी में ईमानदारी है, ये अच्छी बात है। लेकिन उसे ये नहीं पता कि ‘सच’ और ‘कड़वे सच’ के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है।

संस्कृत का एक श्लोक है-

“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।”

इसका अर्थ है, ‘’सच बोलो, मीठा बोलो। लेकिन ऐसा सच न बोलो, जो दिल को आहत करे।’’

बेटी को समझाएं कि सच बोले, लेकिन इसे ऐसे बोले कि सामने वाले का दिल न दुखे। उसे ये बातें उदाहरण के साथ समझाएं। जैसेकि–

  • मान लो आपके पास एक खिलौना है। आपका कोई दोस्त कहे कि खिलौना खराब है तो आपको कैसा लगेगा? बुरा लगेगा न। वैसे ही हमें किसी को ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए, जिससे उसका दिल दुखे।
  • जब क्लास में कोई स्पीच देता है तो टीचर अंत में हमेशा क्या कहती हैं– “वेरी गुड।” वो कभी ऐसे तो नहीं बोलतीं कि ये स्पीच गंदी थी, तुम्हें बोलना नहीं आता। वैसे ही हमें हमेशा दूसरों को इनकरेज करना चाहिए। अगर उन्होंने बहुत अच्छा नहीं बोला, अच्छा नहीं किया, तो भी हमें “वेरी गुड” ही बोलना चाहिए। तभी तो वो आगे और कोशिश करेंगे।
  • मान लो, आपकी दोस्त ने एक ड्रॉइंग बनाई और आपको दिखाकर पूछा- “कैसी है?” तो आप क्या कहोगी? क्या ये कहना चाहिए कि ये पेंटिंग अच्छी नहीं लगी। नहीं न। हम यही कहेंगे, “ये तो बहुत सुंदर है। लेकिन अगर इसमें एक और पेड़ बना लो तो ये और सुंदर हो जाएगी।“ इस तरह हमने सच भी बोला, फीडबैक भी दिया और उसका दिल भी नहीं दुखाया।

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  • बच्ची को ‘मुंहफट’ या ‘बदतमीज’ न कहें।
  • सबके सामने उसे टोककर शर्मिंदा न करें।
  • उसकी तुलना दूसरे बच्चों से न करें।
  • उसकी हर बात को गलत ठहराकर चुप न कराएं।
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  • रिश्तेदारों की बातों में आकर उस पर अनावश्यक सख्ती न करें।
  • उसकी साफगोई को पूरी तरह नकारकर उसे झूठा या बनावटी बनने की सीख न दें।

अंत में यही कहूंगी कि आपकी बेटी को बदलने की नहीं, बस उसके बातचीत के तरीके को थोड़ा रिफाइन करने की जरूरत है। आपका काम उसे चुप कराना नहीं, बल्कि उसे बेहतर कम्युनिकेशन स्किल सिखाना है।

उसे समझाएं कि शब्दों में मरहम लगाने की भी ताकत होती है। जब वह यह जान जाएगी कि सच को खूबसूरत तरीके से कहा जा सकता है, तो उसके दोस्त भी सहज महसूस करेंगे और रिश्तेदार भी उसका सम्मान करेंगे। उसे बस यह भरोसा दिलाएं कि आप उसकी सच्चाई के साथ हैं। सिर्फ उसे पेश करने का तरीका थोड़ा और संवेदनशील और खूबसूरत बनाना है।

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