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इंदौर EV हादसा, पड़ोसी को आवाज लगाई- बचाओ-बचाओ:जो जिस हालत में था, जल गया; 30 साल पहले राजस्थान से इंदौर आए थे मनोज पुगलिया

इंदौर EV हादसा, पड़ोसी को आवाज लगाई- बचाओ-बचाओ:जो जिस हालत में था, जल गया; 30 साल पहले राजस्थान से इंदौर आए थे मनोज पुगलिया

इंदौर के तिलक नगर क्षेत्र की ग्रेटर बृजेश्वरी कॉलोनी में हुए भीषण अग्निकांड ने एक परिवार की सारी खुशियां छीन लीं। रबर कारोबारी मनोज पुगलिया के घर में लगी आग में 8 लोगों की मौत हो गई। बुधवार शाम को सभी का अंतिम संस्कार किया गया। सबसे ज्यादा दिल को झकझोर देने वाली तस्वीर तब सामने आई, जब हादसे में जान गंवा चुके विजय सेठिया की छोटी बेटी ने अपने ही परिजन को मुखाग्नि दी। इस दौरान वहां मौजूद हर शख्स की आंखें छलक पड़ीं। हादसे से बचकर निकले मनोज पुगलिया के बेटे सौमिल अब भी उस खौफनाक मंजर को याद कर सहम जाते हैं। उन्होंने बताया कि आग लगते ही पूरे घर में तेजी से धुआं भर गया था। चारों तरफ अंधेरा और घुटन थी, कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। ऐसे हालात में बड़े भाई सौरभ ने हिम्मत दिखाते हुए सभी को आवाज देकर जगाया। किसी तरह सौरभ, मां सुनीता, छोटा भाई हर्षित और सौमिल बालकनी तक पहुंचे। वहां से उन्होंने पड़ोसियों को मदद के लिए बचाओ-बचाओ पुकारा। पड़ोसियों ने जालियां तोड़कर सीढ़ी लगाईं, जिसके सहारे चारों किसी तरह बाहर निकल पाए। लेकिन बाहर आने के बाद भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ। उन्होंने अंदर फंसे अपने लोगों को बचाने की कोशिश की, लेकिन आग की लपटें और घना धुआं उन्हें वापस अंदर जाने नहीं दे सका। एक पल में सब कुछ बदल गया…और पीछे रह गईं सिर्फ यादें और अपनों को खोने का दर्द। जब बचाने की कोशिश भी नाकाम हो गई… मनोज के बड़े बेटे सौरभ ने उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए बताया कि जैसे ही इलेक्ट्रिक कार में आग लगी, कुछ ही पलों में मुख्य गेट आग की चपेट में आ गया। बाहर निकलने का रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका था। ऐसे हालात में सौरभ ने हिम्मत दिखाई और किसी तरह अपनी मां और दोनों भाइयों को बाहर निकाल लिया। लेकिन अंदर बाकी लोग फंसे हुए थे… और उन्हें बचाने की उम्मीद अभी बाकी थी। सौरभ दोबारा घर के अंदर गए, लेकिन तब तक पूरा घर घने धुएं से भर चुका था। सांस लेना मुश्किल हो रहा था, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। हालात इतने खराब थे कि अंदर फंसे लोग आवाज तक नहीं लगा पा रहे थे। पत्नी सिमरन, मामा, उनके बच्चे और पिता—सब अंदर ही फंस गए। कोई भाग नहीं सका, कोई मदद के लिए पुकार नहीं सका। जो जहां था, वहीं ठहर गया। सबसे दर्दनाक तस्वीर सिमरन की थी…वह बैठी हुई अवस्था में ही रह गईं, जैसे आखिरी पल तक इंतजार कर रही हों कि कोई उन्हें बचा लेगा। एक बेटे और पति के सामने उसका पूरा परिवार उसकी आंखों के सामने ही छिन गया… और वह कुछ नहीं कर सका। यही बेबसी इस हादसे की सबसे बड़ी त्रासदी बन गई। रेस्क्यू के दौरान सीढ़ियों पर तीन लोगों के शव मिले हादसे की सूचना मिलते ही पुलिस, एफएसएल और एसडीआरएफ की टीमें मौके पर पहुंचीं और राहत-बचाव कार्य शुरू किया। रेस्क्यू के दौरान दूसरी मंजिल की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर तीन लोगों के शव मिले। इससे अंदाजा लगाया गया कि ये लोग जान बचाने के लिए छत की तरफ भाग रहे थे। लेकिन रास्ते में लगा चैनल गेट बंद था, जिससे वे बाहर नहीं निकल सके। इसी बीच पूरे घर में धुआं भर गया और दम घुटने से उनकी मौत हो गई। यह दृश्य देखकर रेस्क्यू टीम भी भावुक हो गई, क्योंकि साफ था कि ये लोग आखिरी पल तक बचने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन एक बंद दरवाजे ने उनकी जिंदगी छीन ली। प्लायवुड के कारण तेजी से आग घर में फैल गई पुलिस जांच में सामने आया है कि मनोज पुगलिया का घर पूरी तरह फर्निश्ड था। खासतौर पर फर्स्ट फ्लोर पर प्लायवुड और लकड़ी के फर्नीचर से इंटीरियर किया गया था। जब फर्स्ट फ्लोर पर आग लगी, तो इन ज्वलनशील चीजों की वजह से आग बहुत तेजी से फैल गई और देखते ही देखते पूरे घर को अपनी चपेट में ले लिया। जांच में पोर्च में शॉर्ट सर्किट के निशान भी मिले हैं। यहीं पर घर में खड़ी बुलेट, करीब 17 लाख रुपए की हायाबुसा बाइक और एक स्कूटर जलकर खाक हो गए। घर में कुछ केमिकल भी रखे हुए थे, जिससे आग और ज्यादा भड़क गई। इन सभी कारणों ने मिलकर आग को बेहद खतरनाक बना दिया, जिससे बचाव का मौका भी बहुत कम मिल पाया। मेहनत से खड़ा किया था सब कुछ… एक पल में सब खत्म मनोज पुगलिया मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले थे। करीब 30 साल पहले वह बेहतर जिंदगी और सपनों को पूरा करने के लिए इंदौर आए थे। शुरुआत आसान नहीं थी…। सियागंज में एक छोटी सी दुकान से उन्होंने इंडस्ट्रियल सप्लाई का काम शुरू किया। दिन-रात मेहनत करके धीरे-धीरे अपने कारोबार को बढ़ाया और एक मजबूत पहचान बनाई। सालों की मेहनत से उन्होंने न सिर्फ व्यापार खड़ा किया, बल्कि अपने परिवार के लिए एक बेहतर भविष्य भी तैयार किया। उनकी कंपनी का एक ऑफिस सियागंज में था, जिसे बड़ा बेटा सौरभ संभालता था। वहीं पीथमपुर में दूसरा ऑफिस था, जहां मंझला बेटा सौमिल और छोटा बेटा हर्षित काम देखते थे। पूरा परिवार मिलकर इस कारोबार को आगे बढ़ा रहा था, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर। जिस घर और कारोबार को मनोज ने अपनी पूरी जिंदगी लगाकर खड़ा किया, वह एक ही हादसे में बिखर गया। आज पीछे रह गई हैं तो सिर्फ उनकी मेहनत की कहानियां…और अपनों को खोने का गहरा दर्द। हादसे में सबसे ज्यादा विजय के परिवार को नुकसान इस हादसे में मनोज पुगलिया और उनकी बहू सिमरन के साथ-साथ मनोज के साले विजय सेठिया और उनके परिवार के लोगों की भी जान चली गई। घर में अभी हाल ही में खुशियों का माहौल था। 23 जनवरी को मनोज के बेटे सौमिल की शादी हुई थी। शादी के बाद घर में छोटे-छोटे कार्यक्रम चल रहे थे, इसी वजह से रिश्तेदारों का आना-जाना लगा हुआ था। इन्हीं खुशियों के बीच विजय सेठिया भी अपने परिवार के साथ इंदौर आए थे। उन्हें जबड़े का कैंसर था और इलाज के लिए वे यहां ठहरे हुए थे। शादी के समय से ही उनका पूरा परिवार मनोज के घर पर रह रहा था। लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि खुशियों से भरा यह घर अचानक मातम में बदल जाएगा। एक परंपरा ने बचा ली छोटी बहू की जिंदगी इस हादसे में मनोज पुगलिया की बड़ी बहू सिमरन की जान चली गई, लेकिन छोटी बहू की जिंदगी एक परंपरा की वजह से बच गई। परिवार के एक करीबी रिश्तेदार ने बताया कि उनके यहां मान्यता है कि नई बहू को मंगलवार के दिन ससुराल नहीं लाया जाता। इसी परंपरा के चलते सौमिल की पत्नी उस दिन अपने मायके पेटलावद में ही रुकी हुई थी। बुधवार को उसे घर लाने की तैयारी थी। परिवार में एक छोटा सा कार्यक्रम भी रखा गया था, जिसमें उसके मायके वाले भी शामिल होने वाले थे। सबसे मासूम जान… सबसे दर्दनाक विदाई इस पूरे हादसे में सबसे ज्यादा दिल तोड़ने वाली मौत 6 साल के मासूम तन्मय की रही। हादसे के बाद जब रेस्क्यू टीम घर के अंदर पहुंची, तो तन्मय का कहीं पता नहीं चल रहा था। एसडीआरएफ की टीम ने काफी देर तक खोजबीन की, तब जाकर बड़ी मुश्किल से बच्चे का शव मिला। आग इतनी भयानक थी कि तन्मय बुरी तरह झुलस चुका था। हालत ऐसी थी कि डॉक्टरों की टीम को उसके छोटे से शरीर को पोटली में लपेटकर एमवाय हॉस्पिटल पोस्टमार्टम के लिए ले जाना पड़ा। पोस्टमॉर्टम के बाद तन्मय के शव को एक बॉक्स में रखकर श्मशान घाट भेजा गया, जहां उसे अंतिम विदाई दी गई। ———————— इस हादसे से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… इंदौर में EV ब्लास्ट, एक साथ 7 चिताएं जलीं इंदौर में इलेक्ट्रिक कार टाटा पंच में चार्जिंग के दौरान शॉर्ट सर्किट होने से आग लग गई, जिसने तीन मंजिला मकान को अपनी चपेट में ले लिया। हादसे में रबर कारोबारी मनोज पुगलिया, उनकी गर्भवती बहू सिमरन समेत 8 लोगों की मौत हो गई। पूरी खबर पढ़ें…

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बचाने की कोशिश की, लेकिन आग की लपटें और घना धुआं उन्हें वापस अंदर जाने नहीं दे सका। एक पल में सब कुछ बदल गया…और पीछे रह गईं सिर्फ यादें और अपनों को खोने का दर्द। जब बचाने की कोशिश भी नाकाम हो गई… मनोज के बड़े बेटे सौरभ ने उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए बताया कि जैसे ही इलेक्ट्रिक कार में आग लगी, कुछ ही पलों में मुख्य गेट आग की चपेट में आ गया। बाहर निकलने का रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका था। ऐसे हालात में सौरभ ने हिम्मत दिखाई और किसी तरह अपनी मां और दोनों भाइयों को बाहर निकाल लिया। लेकिन अंदर बाकी लोग फंसे हुए थे… और उन्हें बचाने की उम्मीद अभी बाकी थी। सौरभ दोबारा घर के अंदर गए, लेकिन तब तक पूरा घर घने धुएं से भर चुका था। सांस लेना मुश्किल हो रहा था, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। हालात इतने खराब थे कि अंदर फंसे लोग आवाज तक नहीं लगा पा रहे थे। पत्नी सिमरन, मामा, उनके बच्चे और पिता—सब अंदर ही फंस गए। कोई भाग नहीं सका, कोई मदद के लिए पुकार नहीं सका। जो जहां था, वहीं ठहर गया। सबसे दर्दनाक तस्वीर सिमरन की थी…वह बैठी हुई अवस्था में ही रह गईं, जैसे आखिरी पल तक इंतजार कर रही हों कि कोई उन्हें बचा 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से फैल गई और देखते ही देखते पूरे घर को अपनी चपेट में ले लिया। जांच में पोर्च में शॉर्ट सर्किट के निशान भी मिले हैं। यहीं पर घर में खड़ी बुलेट, करीब 17 लाख रुपए की हायाबुसा बाइक और एक स्कूटर जलकर खाक हो गए। घर में कुछ केमिकल भी रखे हुए थे, जिससे आग और ज्यादा भड़क गई। इन सभी कारणों ने मिलकर आग को बेहद खतरनाक बना दिया, जिससे बचाव का मौका भी बहुत कम मिल पाया। मेहनत से खड़ा किया था सब कुछ… एक पल में सब खत्म मनोज पुगलिया मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले थे। करीब 30 साल पहले वह बेहतर जिंदगी और सपनों को पूरा करने के लिए इंदौर आए थे। शुरुआत आसान नहीं थी…। सियागंज में एक छोटी सी दुकान से उन्होंने इंडस्ट्रियल सप्लाई का काम शुरू किया। दिन-रात मेहनत करके धीरे-धीरे अपने कारोबार को बढ़ाया और एक मजबूत पहचान बनाई। सालों की मेहनत से उन्होंने न सिर्फ व्यापार खड़ा किया, बल्कि अपने परिवार के लिए एक बेहतर भविष्य भी तैयार किया। उनकी कंपनी का एक ऑफिस सियागंज में था, जिसे बड़ा बेटा सौरभ संभालता था। वहीं पीथमपुर में दूसरा ऑफिस था, जहां मंझला बेटा सौमिल और छोटा बेटा हर्षित काम देखते थे। पूरा परिवार मिलकर इस कारोबार को आगे बढ़ा रहा था, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर। जिस घर और कारोबार को मनोज ने अपनी पूरी जिंदगी लगाकर खड़ा किया, वह एक ही हादसे में बिखर गया। आज पीछे रह गई हैं तो सिर्फ उनकी मेहनत की कहानियां…और अपनों को खोने का गहरा दर्द। हादसे में सबसे ज्यादा विजय के परिवार को नुकसान इस हादसे में मनोज पुगलिया और उनकी बहू सिमरन के साथ-साथ मनोज के साले विजय सेठिया और उनके परिवार के लोगों की भी जान चली गई। घर में अभी हाल ही में खुशियों का माहौल था। 23 जनवरी को मनोज के बेटे सौमिल की शादी हुई थी। शादी के बाद घर में छोटे-छोटे कार्यक्रम चल रहे थे, इसी वजह से रिश्तेदारों का आना-जाना लगा हुआ था। इन्हीं खुशियों के बीच विजय सेठिया भी अपने परिवार के साथ इंदौर आए थे। उन्हें जबड़े का कैंसर था और इलाज के लिए वे यहां ठहरे हुए थे। शादी के समय से ही उनका पूरा परिवार मनोज के घर पर रह रहा था। लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि खुशियों से भरा यह घर अचानक मातम में बदल जाएगा। एक परंपरा ने बचा ली छोटी बहू की जिंदगी इस हादसे में मनोज पुगलिया की बड़ी बहू सिमरन की जान चली गई, लेकिन छोटी बहू की जिंदगी एक परंपरा की वजह से बच गई। परिवार के एक करीबी रिश्तेदार ने बताया कि उनके यहां मान्यता है कि नई बहू को मंगलवार के दिन ससुराल नहीं लाया जाता। इसी परंपरा के चलते सौमिल की पत्नी उस दिन अपने मायके पेटलावद में ही रुकी हुई थी। बुधवार को उसे घर लाने की तैयारी थी। परिवार में एक छोटा सा कार्यक्रम भी रखा गया था, जिसमें उसके मायके वाले भी शामिल होने वाले थे। सबसे मासूम जान… सबसे दर्दनाक विदाई इस पूरे हादसे में सबसे ज्यादा दिल तोड़ने वाली मौत 6 साल के मासूम तन्मय की रही। हादसे के बाद जब रेस्क्यू टीम घर के अंदर पहुंची, तो तन्मय का कहीं पता नहीं चल रहा था। एसडीआरएफ की टीम ने काफी देर तक खोजबीन की, तब जाकर बड़ी मुश्किल से बच्चे का शव मिला। आग इतनी भयानक थी कि तन्मय बुरी तरह झुलस चुका था। हालत ऐसी थी कि डॉक्टरों की टीम को उसके छोटे से शरीर को पोटली में लपेटकर एमवाय हॉस्पिटल पोस्टमार्टम के लिए ले जाना पड़ा। पोस्टमॉर्टम के बाद तन्मय के शव को एक बॉक्स में रखकर श्मशान घाट भेजा गया, जहां उसे अंतिम विदाई दी गई। ———————— इस हादसे से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… इंदौर में EV ब्लास्ट, एक साथ 7 चिताएं जलीं इंदौर में इलेक्ट्रिक कार टाटा 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