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MDR TB क्या है: लक्षण, कारण, इलाज और बचाव के 5 ज़रूरी रूल्स.

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World TB Day: आमतौर पर टयूबरक्यूलोसिस की बीमारी का इलाज 6 या 9 महीने तक लंबा चलता है और यह ठीक हो जाती है. लेकिन एक ऐसी टीबी भी होती है जिस पर इस बीमारी की सबसे असरदार दवाएं बेअसर हो जाती हैं. यह होती है मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट यानि एमडीआर टीबी. नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम के आंकड़े बताते हैं कि भारत में यह बीमारी इतनी आम है कि इस बीमारी से पीड़ित दुनिया के एक चौथाई मरीज इसी देश में रहते हैं.

हालांकि इसे रोकने के लिए देशभर में पूरा मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर काम कर रहा है और इसके लिए पूरी तरह निशुल्क इलाज दिया जाता है.बावजूद इसके यह बीमारी हर साल हजारों लोगों को लील जाती है. आखिर यह बीमारी क्या है? देशभर में मुफ्त इलाज और जनजागरुकता के बाद भी यह इतनी घातक क्यों है और इसके मरीजों की संख्या ज्यादा क्यों है, एक्सपर्ट से जानते हैं…

नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ ट्यूबरक्‍यूलोसि‍स एंड रेस्‍प‍िरेटरी ड‍िजीज की डायरेक्‍टर डॉ. उपासना अग्रवाल.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्यूबरक्यूलोसिस एंड रेस्पिरेटरी डिजीज, नई द‍िल्‍ली की डायरेक्टर डॉक्टर उपासना अग्रवाल बताती हैं, ‘मल्टीड्रग रेजिस्टेंस टीबी सामान्य ड्रग सेंसिटिव टीबी या प्राइमरी टीबी से थोड़ी अलग और ज्यादा घातक होती है. इस टीबी का बैक्टीरिया टीबी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सबसे असरदार प्रमुख शुरुआती दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट हो जाता है. ये दवाएं आइसोनियाजिड (Isoniazid), रिफैम्पिसिन (Rifampin), पाइराजाइनामाइड (Pyrazinamide), और ईथाम्बुटोल (Ethambutol) चारों या इनमें से कोई दो भी हो सकती हैं.’

डॉ. अग्रवाल बताती हैं कि ड्रग रेजिस्टेंट टीबी आमतौर पर आइसोनियाजिड और रिफैम्पिसिन इन दो दवाओं के प्रति प्रतिरोधी होती है लेकिन कुछ केसेज में कई अन्य दवाओं के प्रति भी बैक्टीरिया रेजिस्टेंट हो जाता है और वह मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट केस होता है.ऐसी स्थिति में मरीज का इलाज इन दवाओं के बजाय सेकेंडरी दवाओं से किया जाता है.

भारत के नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम के अनुसार देश में हर साल मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के 147000 मामले सामने आते हैं. भारत में किसी भी प्रकार की टीबी का इलाज एकदम मुफ्त मौजूद हैं इसके बावजूद एमडीआर से 13 से 14 फीसदी लोगों की मौत सालाना हो जाती है.

‘हालांकि इस बीमारी को लेकर अच्छी बात ये है कि यह पूरी तरह ठीक हो सकती है और भारत में इसका एकदम मुफ्त इलाज हर जिला स्तर पर सरकारी अस्पतालों में मौजूद है. लेकिन इसका इलाज 6 से 9 महीने या कई मामलों में 18 महीने तक भी लंबा खिंचता है, ऐसे में कई बार मरीज इतने लंबे इलाज में धैर्य खो देता है जो उसके लिए नुकसानदेह होता है और यह जानलेवा हो जाती है.’

  • इस बीमारी की ये हैं कठिनाई
  • . इस टीबी की मृत्यु दर काफी हाई है.
  • . इसमें सबसे इफैक्टिव चार दवाएं काम नहीं करती हैं.
  • . मरीज की बेसलाइन हालत ज्यादा खराब होती है.
  • . लंबे इलाज के चलते कुछ मरीज बीच में दवा छोड़ देते हैं.

डॉ. उपासना कहती हैं, चूंकि यह बीमारी आमतौर पर सेकेंडरी है और सामान्य टीबी या ड्रग सेंसिटिव टीबी के इलाज में आई कमियों के बाद सामने आती है तो अगर टीबी के मरीज इन चीजों का ध्यान रखें तो इसे रोका भी जा सकता है.

एमडीआर टीबी कंट्रोल करने के ये हैं 5 रूल्स

  1. . प्राइमरी या ड्रग सेंसिटिव टीबी का इलाज अगर एक बार शुरू हो गया है तो उसे किसी भी कीमत पर बीच में न छोड़ें.
  2. . टीबी के इलाज के साथ बताए गए परहेजों का कड़ाई से पालन करना है.
  3. . अगर टीबी की दवाएं टीबी के प्रकार को देखते हुए 6 या 9 महीने के लिए दी गई हैं तो उस अवधि को पूरा होने तक दवाएं जारी रखें.
  4. . बीच-बीच में दवा लेने में गैप न करें. यानि कुछ दिनों के लिए डोज छोड़ दी फिर लेना शुरू कर दी आदि. मरीज एक भी डोज का गैप न करें.
  5. . इलाज के दौरान किसी भी रुकावट को न आने दें. अगर कोई दूसरी बीमारी हो भी रही हो तो भी टीबी के इलाज को बीच में न रोकें. इस दवा को लेते रहें और डॉक्टर से अन्य बीमारी का इलाज भी ले सकते हैं.

आइए इस बीमारी के बारे में और विस्तार से जानते हैं..

मल्टीड्रग रेजिस्टेंट टीबी क्या होती है?

मल्टीड्रग रेजिस्टेंस टीबी वह होती है जिसमें टीबी का बैक्टीरिया टीबी के इलाज के लिए दी जाने वाली चारों सबसे असरदार प्राइमरी दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट हो जाता है. तब इसे दूसरी दवाओं से ठीक किया जाता है.

भारत में एमडीआर टीबी के कितने मरीज हैं?
नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम के आंकड़ों के अनुसार भारत में एमडीआर से पीड़ित करीब 147000 नए मरीज सालाना आते हैं. यह संख्या दुनिया के कुल टीबी मरीजों की एक चौथाई है, यानि इस टीबी के करीब 25 फीसदी केस अकेले भारत में हैं.

नए या पुराने किन मरीजों में यह टीबी ज्यादा है?
एमडीआर टीबी के 26 फीसदी मरीज वे हैं जो पहले से इलाज ले रहे हैं, जबकि 3 फीसदी से ज्यादा फ्रेश मरीजों में एमडीआर टीबी देखने को मिल रही है.

क्या यह टीबी घातक है?
सेंसिटिव टीबी के मुकाबले एमडीआर इसलिए घातक हो जाती है क्योंकि इसका बैक्टीरिया चारों फर्स्ट लाइन ड्रग यानि प्राइमरी दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाता है. इसके इलाज के लिए सेकेंडरी दवाएं इस्तेमाल की जाती हैं. इसके ठीक होने की संभावना भी 57 फीसदी है, जबकि इसमें जान जाने का खतरा 13 से 14 फीसदी है.

चार फर्स्ट लाइन ड्रग कौन सी हैं?
सेंसिटिव टीबी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली चार प्राइमरी फर्स्ट लाइन ड्रग हैं, आइसोनियाजिड (Isoniazid), रिफैम्पिसिन (Rifampin), पाइराजाइनामाइड (Pyrazinamide), और ईथाम्बुटोल (Ethambutol), इन्हें RIPE रेजिमेन भी कहा जाता है.

क्या ये टीबी ठीक हो सकती है?
डॉ. उपासना कहती हैं कि इस टीबी को भी ठीक किया जा सकता है. इसके इलाज के लिए भी दवाएं हैं. यह टीबी प्राइमरी दवा के प्रति रेजिस्टेंट होती है लेकिन सेकेंडरी दवाओं से इसका इलाज होता है.

कितने दिन चलता है इसका इलाज?
आमतौर पर ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के लिए 6 से 9 महीने का इलाज पर्याप्त होता है, लेकिन कुछ केसेज में यह इलाज 18 महीनों तक भी चलाना होता है.

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हालांकि इसे रोकने के लिए देशभर में पूरा मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर काम कर रहा है और इसके लिए पूरी तरह निशुल्क इलाज दिया जाता है.बावजूद इसके यह बीमारी हर साल हजारों लोगों को लील जाती है. आखिर यह बीमारी क्या है? देशभर में मुफ्त इलाज और जनजागरुकता के बाद भी यह इतनी घातक क्यों है और इसके मरीजों की संख्या ज्यादा क्यों है, एक्सपर्ट से जानते हैं…

नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ ट्यूबरक्‍यूलोसि‍स एंड रेस्‍प‍िरेटरी ड‍िजीज की डायरेक्‍टर डॉ. उपासना अग्रवाल.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ट्यूबरक्यूलोसिस एंड रेस्पिरेटरी डिजीज, नई द‍िल्‍ली की डायरेक्टर डॉक्टर उपासना अग्रवाल बताती हैं, ‘मल्टीड्रग रेजिस्टेंस टीबी सामान्य ड्रग सेंसिटिव टीबी या प्राइमरी टीबी से थोड़ी अलग और ज्यादा घातक होती है. इस टीबी का बैक्टीरिया टीबी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सबसे असरदार प्रमुख शुरुआती दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट हो जाता है. ये दवाएं आइसोनियाजिड (Isoniazid), रिफैम्पिसिन (Rifampin), पाइराजाइनामाइड (Pyrazinamide), और ईथाम्बुटोल (Ethambutol) चारों या इनमें से कोई दो भी हो सकती हैं.’

डॉ. अग्रवाल बताती हैं कि ड्रग रेजिस्टेंट टीबी आमतौर पर आइसोनियाजिड और रिफैम्पिसिन इन दो दवाओं के प्रति प्रतिरोधी होती है लेकिन कुछ केसेज में कई अन्य दवाओं के प्रति भी बैक्टीरिया रेजिस्टेंट हो जाता है और वह मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट केस होता है.ऐसी स्थिति में मरीज का इलाज इन दवाओं के बजाय सेकेंडरी दवाओं से किया जाता है.

भारत के नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम के अनुसार देश में हर साल मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के 147000 मामले सामने आते हैं. भारत में किसी भी प्रकार की टीबी का इलाज एकदम मुफ्त मौजूद हैं इसके बावजूद एमडीआर से 13 से 14 फीसदी लोगों की मौत सालाना हो जाती है.

‘हालांकि इस बीमारी को लेकर अच्छी बात ये है कि यह पूरी तरह ठीक हो सकती है और भारत में इसका एकदम मुफ्त इलाज हर जिला स्तर पर सरकारी अस्पतालों में मौजूद है. लेकिन इसका इलाज 6 से 9 महीने या कई मामलों में 18 महीने तक भी लंबा खिंचता है, ऐसे में कई बार मरीज इतने लंबे इलाज में धैर्य खो देता है जो उसके लिए नुकसानदेह होता है और यह जानलेवा हो जाती है.’

  • इस बीमारी की ये हैं कठिनाई
  • . इस टीबी की मृत्यु दर काफी हाई है.
  • . इसमें सबसे इफैक्टिव चार दवाएं काम नहीं करती हैं.
  • . मरीज की बेसलाइन हालत ज्यादा खराब होती है.
  • . लंबे इलाज के चलते कुछ मरीज बीच में दवा छोड़ देते हैं.

डॉ. उपासना कहती हैं, चूंकि यह बीमारी आमतौर पर सेकेंडरी है और सामान्य टीबी या ड्रग सेंसिटिव टीबी के इलाज में आई कमियों के बाद सामने आती है तो अगर टीबी के मरीज इन चीजों का ध्यान रखें तो इसे रोका भी जा सकता है.

एमडीआर टीबी कंट्रोल करने के ये हैं 5 रूल्स

  1. . प्राइमरी या ड्रग सेंसिटिव टीबी का इलाज अगर एक बार शुरू हो गया है तो उसे किसी भी कीमत पर बीच में न छोड़ें.
  2. . टीबी के इलाज के साथ बताए गए परहेजों का कड़ाई से पालन करना है.
  3. . अगर टीबी की दवाएं टीबी के प्रकार को देखते हुए 6 या 9 महीने के लिए दी गई हैं तो उस अवधि को पूरा होने तक दवाएं जारी रखें.
  4. . बीच-बीच में दवा लेने में गैप न करें. यानि कुछ दिनों के लिए डोज छोड़ दी फिर लेना शुरू कर दी आदि. मरीज एक भी डोज का गैप न करें.
  5. . इलाज के दौरान किसी भी रुकावट को न आने दें. अगर कोई दूसरी बीमारी हो भी रही हो तो भी टीबी के इलाज को बीच में न रोकें. इस दवा को लेते रहें और डॉक्टर से अन्य बीमारी का इलाज भी ले सकते हैं.

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मल्टीड्रग रेजिस्टेंट टीबी क्या होती है?

मल्टीड्रग रेजिस्टेंस टीबी वह होती है जिसमें टीबी का बैक्टीरिया टीबी के इलाज के लिए दी जाने वाली चारों सबसे असरदार प्राइमरी दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट हो जाता है. तब इसे दूसरी दवाओं से ठीक किया जाता है.

भारत में एमडीआर टीबी के कितने मरीज हैं?
नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम के आंकड़ों के अनुसार भारत में एमडीआर से पीड़ित करीब 147000 नए मरीज सालाना आते हैं. यह संख्या दुनिया के कुल टीबी मरीजों की एक चौथाई है, यानि इस टीबी के करीब 25 फीसदी केस अकेले भारत में हैं.

नए या पुराने किन मरीजों में यह टीबी ज्यादा है?
एमडीआर टीबी के 26 फीसदी मरीज वे हैं जो पहले से इलाज ले रहे हैं, जबकि 3 फीसदी से ज्यादा फ्रेश मरीजों में एमडीआर टीबी देखने को मिल रही है.

क्या यह टीबी घातक है?
सेंसिटिव टीबी के मुकाबले एमडीआर इसलिए घातक हो जाती है क्योंकि इसका बैक्टीरिया चारों फर्स्ट लाइन ड्रग यानि प्राइमरी दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाता है. इसके इलाज के लिए सेकेंडरी दवाएं इस्तेमाल की जाती हैं. इसके ठीक होने की संभावना भी 57 फीसदी है, जबकि इसमें जान जाने का खतरा 13 से 14 फीसदी है.

चार फर्स्ट लाइन ड्रग कौन सी हैं?
सेंसिटिव टीबी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली चार प्राइमरी फर्स्ट लाइन ड्रग हैं, आइसोनियाजिड (Isoniazid), रिफैम्पिसिन (Rifampin), पाइराजाइनामाइड (Pyrazinamide), और ईथाम्बुटोल (Ethambutol), इन्हें RIPE रेजिमेन भी कहा जाता है.

क्या ये टीबी ठीक हो सकती है?
डॉ. उपासना कहती हैं कि इस टीबी को भी ठीक किया जा सकता है. इसके इलाज के लिए भी दवाएं हैं. यह टीबी प्राइमरी दवा के प्रति रेजिस्टेंट होती है लेकिन सेकेंडरी दवाओं से इसका इलाज होता है.

कितने दिन चलता है इसका इलाज?
आमतौर पर ड्रग रेजिस्टेंट टीबी के लिए 6 से 9 महीने का इलाज पर्याप्त होता है, लेकिन कुछ केसेज में यह इलाज 18 महीनों तक भी चलाना होता है.

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