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लैब में आर्टिफिशियल स्किन और कॉर्निया होंगी तैयार:एम्स भोपाल में एआई और इंटीग्रेटिव मेडिसिन पर फोकस

लैब में आर्टिफिशियल स्किन और कॉर्निया होंगी तैयार:एम्स भोपाल में एआई और इंटीग्रेटिव मेडिसिन पर फोकस

गंभीर बीमारियों के इलाज में अब बड़ा बदलाव आने के संकेत मिल रहे हैं। एक ओर डीआरडीओ की लैब में आर्टिफिशियल स्किन और कॉर्निया तैयार करने पर तेजी से काम चल रहा है, वहीं एम्स भोपाल में इंटीग्रेटिव मेडिसिन और एडवांस ट्रीटमेंट मॉडल पर रिसर्च इसे जमीन पर उतारने की दिशा में बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह तकनीक क्लिनिकल स्तर पर सफल होती है, तो बर्न केस, गंभीर घाव और आंखों की रोशनी खो चुके मरीजों के इलाज में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा। इससे अंगों की कमी से जूझ रहे हजारों मरीजों को नई उम्मीद मिल सकती है। एम्स में आोजित कार्यक्रम के दौरान रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की लैब में आर्टिफिशियल स्किन, बोन और कॉर्निया तैयार करने पर काम तेज हो गया है। इसमें पशुओं के कोलेजन का उपयोग किया जा रहा है। बर्न केस में सबसे बड़ी समस्या स्किन ग्राफ्ट की कमी होती है, जिससे मरीजों में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। आर्टिफिशियल स्किन इस चुनौती को काफी हद तक कम कर सकती है। वहीं, कॉर्निया की कमी से जूझ रहे मरीजों के लिए यह तकनीक नई रोशनी साबित हो सकती है। एम्स भोपाल में एआई और इंटीग्रेटिव मेडिसिन पर फोकस एम्स भोपाल में चिकित्सा शिक्षा और नवाचार को बढ़ावा देते हुए नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज (एनएएमएस) के सहयोग से अंग प्रत्यारोपण और स्वास्थ्य सेवाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर पहली रीजनल सीएमई आयोजित की गई। इस कार्यक्रम में देशभर से आए विशेषज्ञों ने बताया कि भविष्य में आर्टिफिशियल ऑर्गन और इंटीग्रेटिव मेडिसिन मिलकर इलाज को अधिक प्रभावी बनाएंगे। स्वास्थ्य सूत्रों के अनुसार, एम्स भोपाल जैसे संस्थान आने वाले समय में इन तकनीकों के ट्रायल और क्लिनिकल उपयोग के प्रमुख केंद्र बन सकते हैं। अंगों की कमी के बीच नई उम्मीद भारत में हर साल हजारों मरीज अंगों की कमी के कारण समय पर इलाज नहीं करा पाते। ऐसे में आर्टिफिशियल स्किन और कॉर्निया जैसी तकनीकें गेम-चेंजर साबित हो सकती हैं। इससे न केवल इलाज की उपलब्धता बढ़ेगी, बल्कि मरीजों के ठीक होने की संभावना भी बेहतर होगी। ट्रांसप्लांट को-ऑर्डिनेटर की अहम भूमिका अंगदान और प्रत्यारोपण की पूरी प्रक्रिया में ट्रांसप्लांट को-ऑर्डिनेटर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। वे मरीजों के परिजनों को संवेदनशील तरीके से समझाते हैं, उनकी सहमति सुनिश्चित करते हैं और पूरी प्रक्रिया को सुचारू रूप से संचालित करते हैं। साथ ही यह भी ध्यान रखते हैं कि अंगदान के बाद पार्थिव शरीर पूरे सम्मान के साथ परिवार को सौंपा जाए। अंगदान का एक प्रेरणादायक पहलू सेना से जुड़ा अंगदान को लेकर लोगों में कई तरह की आशंकाएं रहती हैं, लेकिन विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि यह पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी प्रक्रिया है। इसमें किसी भी तरह का दबाव या जबरदस्ती नहीं होती। अंगदान का एक प्रेरणादायक पहलू सेना से जुड़ा भी सामने आया है, जहां शहीद सैनिकों के परिजनों ने अंगदान कर कई लोगों को नई जिंदगी दी। इन उदाहरणों ने अंगदान को चिकित्सा से आगे बढ़ाकर राष्ट्रसेवा से जोड़ दिया है।

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गंभीर बीमारियों के इलाज में अब बड़ा बदलाव आने के संकेत मिल रहे हैं। एक ओर डीआरडीओ की लैब में आर्टिफिशियल स्किन और कॉर्निया तैयार करने पर तेजी से काम चल रहा है, वहीं एम्स भोपाल में इंटीग्रेटिव मेडिसिन और एडवांस ट्रीटमेंट मॉडल पर रिसर्च इसे जमीन पर उतारने की दिशा में बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह तकनीक क्लिनिकल स्तर पर सफल होती है, तो बर्न केस, गंभीर घाव और आंखों की रोशनी खो चुके मरीजों के इलाज में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा। इससे अंगों की कमी से जूझ रहे हजारों मरीजों को नई उम्मीद मिल सकती है। एम्स में आोजित कार्यक्रम के दौरान रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की लैब में आर्टिफिशियल स्किन, बोन और कॉर्निया तैयार करने पर काम तेज हो गया है। इसमें पशुओं के कोलेजन का उपयोग किया जा रहा है। बर्न केस में सबसे बड़ी समस्या स्किन ग्राफ्ट की कमी होती है, जिससे मरीजों में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। आर्टिफिशियल स्किन इस चुनौती को काफी हद तक कम कर सकती है। वहीं, कॉर्निया की कमी से जूझ रहे मरीजों के लिए यह तकनीक नई रोशनी साबित हो सकती है। एम्स भोपाल में एआई और इंटीग्रेटिव मेडिसिन पर फोकस एम्स भोपाल में चिकित्सा शिक्षा और नवाचार को बढ़ावा देते हुए नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज (एनएएमएस) के सहयोग से अंग प्रत्यारोपण और स्वास्थ्य सेवाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर पहली रीजनल सीएमई आयोजित की गई। इस कार्यक्रम में देशभर से आए विशेषज्ञों ने बताया कि भविष्य में आर्टिफिशियल ऑर्गन और इंटीग्रेटिव मेडिसिन मिलकर इलाज को अधिक प्रभावी बनाएंगे। स्वास्थ्य सूत्रों के अनुसार, एम्स भोपाल जैसे संस्थान आने वाले समय में इन तकनीकों के ट्रायल और क्लिनिकल उपयोग के प्रमुख केंद्र बन सकते हैं। अंगों की कमी के बीच नई उम्मीद भारत में हर साल हजारों मरीज अंगों की कमी के कारण समय पर इलाज नहीं करा पाते। ऐसे में आर्टिफिशियल स्किन और कॉर्निया जैसी तकनीकें गेम-चेंजर साबित हो सकती हैं। इससे न केवल इलाज की उपलब्धता बढ़ेगी, बल्कि मरीजों के ठीक होने की संभावना भी बेहतर होगी। ट्रांसप्लांट को-ऑर्डिनेटर की अहम भूमिका अंगदान और प्रत्यारोपण की पूरी प्रक्रिया में ट्रांसप्लांट को-ऑर्डिनेटर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। वे मरीजों के परिजनों को संवेदनशील तरीके से समझाते हैं, उनकी सहमति सुनिश्चित करते हैं और पूरी प्रक्रिया को सुचारू रूप से संचालित करते हैं। साथ ही यह भी ध्यान रखते हैं कि अंगदान के बाद पार्थिव शरीर पूरे सम्मान के साथ परिवार को सौंपा जाए। अंगदान का एक प्रेरणादायक पहलू सेना से जुड़ा अंगदान को लेकर लोगों में कई तरह की आशंकाएं रहती हैं, लेकिन विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि यह पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी प्रक्रिया है। इसमें किसी भी तरह का दबाव या जबरदस्ती नहीं होती। अंगदान का एक प्रेरणादायक पहलू सेना से जुड़ा भी सामने आया है, जहां शहीद सैनिकों के परिजनों ने अंगदान कर कई लोगों को नई जिंदगी दी। इन उदाहरणों ने अंगदान को चिकित्सा से आगे बढ़ाकर राष्ट्रसेवा से जोड़ दिया है।

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