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वादे ‘लखपति दीदी’ के, हालात ‘मजदूर’ से बदतर:यूनिफॉर्म सिलाई का मेहनताना अटका, 46 जिलों की हजारों महिलाएं प्रभावित

वादे ‘लखपति दीदी’ के, हालात ‘मजदूर’ से बदतर:यूनिफॉर्म सिलाई का मेहनताना अटका, 46 जिलों की हजारों महिलाएं प्रभावित

मैंने चार स्कूलों के करीब 800-900 ड्रेस सिले थे। दो साल हो गए, लेकिन अब तक पूरा पैसा नहीं मिला। इससे हमारी हालत बहुत खराब हो गई है। सरकार कहती है कि हमें ‘लखपति दीदी’ बनाएंगे, लेकिन जब मेहनत का पैसा ही नहीं मिल रहा, तो हम लखपति कैसे बनेंगे? यह दर्द हरदा जिले के हंडिया की रहने वाली संगीता नागवंशी का है। संगीता ‘जय मां काली’ स्व-सहायता समूह से जुड़ी हैं। उनके समूह को साल 2023-24 में स्कूल यूनिफॉर्म सिलाई का काम मिला था। उन्होंने चार स्कूलों के लिए बच्चों की ड्रेस तय समय पर सिलकर पहुंचा दीं, लेकिन दो साल बाद भी उन्हें पूरा पैसा नहीं मिला। करीब 50 हजार रुपए अब भी बकाया हैं।
महिलाओं की ये तकलीफ सिर्फ हरदा तक सीमित नहीं है। प्रदेश के 46 जिलों में हजारों स्व-सहायता समूहों की महिलाओं का लगभग 36 करोड़ 56 लाख रुपए भुगतान बकाया है।
ये आलम तब है जब सरकार स्व-सहायता समूहों के जरिए महिलाओं को स्वावलंबी और ‘लखपति दीदी’ बनाने के वादे कर रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में 22 लाख से अधिक महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाया जा चुका है और इस मामले में देश में एमपी पांचवें नंबर पर है। सबसे पहले जानिए…कैसे मिला काम, कैसे अटका भुगतान
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत वर्ष 2022-23 और 2023-24 में महिलाओं को सरकारी स्कूलों के लिए यूनिफॉर्म सिलाई का काम दिया गया। स्व-सहायता समूहों को बाजार से कपड़ा खरीदकर यूनिफॉर्म सिलनी थी और तय समय में स्कूलों तक पहुंचाना था। इसमें लड़कों के लिए शर्ट-पैंट और लड़कियों के लिए सलवार-कुर्ती शामिल थीं।
एक समूह को औसतन 3-4 स्कूलों के बच्चों के यूनिफॉर्म सिलने का जिम्मा दिया गया।महिलाओं को ड्रेस की संख्या के आधार पर भुगतान होना था। शुरुआत में दो किस्तों में भुगतान किया गया, लेकिन तीसरी किस्त रोक दी गई।
कुल भुगतान का लगभग 25 फीसदी हिस्सा आज भी अटका हुआ है। तीन साल बीत जाने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि यह राशि कब तक मिलेगी। 46 जिलों में 36.56 करोड़ रुपए बकाया
जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा भुगतान छतरपुर जिले में बकाया है, जहां 3.42 करोड़ रुपए से अधिक राशि अटकी हुई है।
इसके बाद शिवपुरी में करीब 2.70 करोड़, सागर में 2.67 करोड़ और खंडवा में 2.45 करोड़ बकाया है। हालांकि, अनुपपुर, भिंड, इंदौर, खरगोन, नीमच और श्योपुर जैसे छह जिलों में पूरा भुगतान हो चुका है। 46 जिलों में 36.56 करोड़ रुपए बकाया
जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा भुगतान छतरपुर जिले में बकाया है, जहां 3.42 करोड़ रुपए का भुगतान नहीं हुआ है।
इसके बाद शिवपुरी में करीब 2.70 करोड़, सागर में 2.67 करोड़ और खंडवा में 2.45 करोड़ बकाया है। हालांकि, अनुपपुर, भिंड, इंदौर, खरगोन, नीमच और श्योपुर जैसे छह जिलों में पूरा भुगतान हो चुका है। तीन मामलों से समझिए महिलाएं कैसी दिक्कतें झेल रहीं 1. कपड़ा व्यापारी पैसे मांगता है, कैसे दें
हंडिया की खतीजा बेगम की कहानी भी ऐसी ही है। उन्होंने यूनिफॉर्म सिलाई के लिए उधार में कपड़ा खरीदा था, लेकिन अब तक भुगतान नहीं मिला।
खतीजा कहती हैं कि कपड़ा व्यापारी बार-बार फोन कर पैसे मांगता है। जब हमें ही पैसा नहीं मिला, तो हम उसे कैसे दें? हमारी हालत ऐसी नहीं कि अपनी जेब से भुगतान कर सकें। उनके समूह का करीब 55 हजार रुपए अब भी बकाया है। 2. गाली-गलौज की नौबत, लोन लेना पड़ रहा हंडिया की राधे-राधे समूह की संचालिका रजिया बी को करीब 1000 ड्रेस सिलने का काम मिला था। उनका कहना है कि समूह की महिलाओं ने दिन-रात मेहनत कर समय पर काम पूरा किया, लेकिन करीब 90 हजार रुपए अब भी नहीं मिले।
रजिया ने बताया कि हमारे समूह की महिलाएं बहुत गरीब हैं और 100-200 रुपए की मजदूरी कर घर चलाती हैं। जब जरूरत पड़ती है तो वे अपने पैसे मांगने आती हैं। पैसे न होने पर कुछ महिलाएं आरोप लगाती हैं कि मैंने ही उनके पैसे हजम कर लिए।
3. पापड़ और चिरौंजी बेचकर गुजारा कर रहीं
संगीता नागवंशी बताती हैं कि इस साल उनके समूह को यूनिफॉर्म सिलाई का काम भी नहीं मिला। इससे कई महिलाएं बेरोजगार हो गई हैं।
उन्होंने कहा कि गुजारा करने के लिए छोटे-मोटे काम करने पड़ रहे हैं। मैं कभी नर्मदा किनारे नारियल और चिरौंजी बेचती हूं, तो कभी पापड़ और बत्ती बनाकर बेचती हूं। इसी से घर चलाने की कोशिश कर रही हूं। जिम्मेदारों का रवैया क्या है… विधानसभा में भी उठा मुद्दा, सत्यापन करा रहे अफसर
इस साल विधानसभा के बजट सत्र में हजारों महिलाओं की इस समस्या को देखते हुए सीधी से भाजपा विधायक रीति पाठक ने यह मुद्दा विधानसभा में उठाया।
उन्होंने पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल से बकाया भुगतान को लेकर सवाल किया, लेकिन मंत्री यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि महिलाओं को उनका पैसा कब तक मिलेगा।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के जिम्मेदार अधिकारियों के अनुसार, प्रारंभिक भुगतान में कुछ अनियमितताएं सामने आने के चलते प्रदेशभर में जिला स्तर पर समूहों का सत्यापन कराया जा रहा है। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही भुगतान की अगली कार्रवाई शुरू की जाएगी, जिसमें अभी 3 से 4 महीने का अतिरिक्त समय लग सकता है।

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वादे ‘लखपति दीदी’ के, हालात ‘मजदूर’ से बदतर:यूनिफॉर्म सिलाई का मेहनताना अटका, 46 जिलों की हजारों महिलाएं प्रभावित

मैंने चार स्कूलों के करीब 800-900 ड्रेस सिले थे। दो साल हो गए, लेकिन अब तक पूरा पैसा नहीं मिला। इससे हमारी हालत बहुत खराब हो गई है। सरकार कहती है कि हमें ‘लखपति दीदी’ बनाएंगे, लेकिन जब मेहनत का पैसा ही नहीं मिल रहा, तो हम लखपति कैसे बनेंगे? यह दर्द हरदा जिले के हंडिया की रहने वाली संगीता नागवंशी का है। संगीता ‘जय मां काली’ स्व-सहायता समूह से जुड़ी हैं। उनके समूह को साल 2023-24 में स्कूल यूनिफॉर्म सिलाई का काम मिला था। उन्होंने चार स्कूलों के लिए बच्चों की ड्रेस तय समय पर सिलकर पहुंचा दीं, लेकिन दो साल बाद भी उन्हें पूरा पैसा नहीं मिला। करीब 50 हजार रुपए अब भी बकाया हैं।
महिलाओं की ये तकलीफ सिर्फ हरदा तक सीमित नहीं है। प्रदेश के 46 जिलों में हजारों स्व-सहायता समूहों की महिलाओं का लगभग 36 करोड़ 56 लाख रुपए भुगतान बकाया है।
ये आलम तब है जब सरकार स्व-सहायता समूहों के जरिए महिलाओं को स्वावलंबी और ‘लखपति दीदी’ बनाने के वादे कर रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में 22 लाख से अधिक महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाया जा चुका है और इस मामले में देश में एमपी पांचवें नंबर पर है। सबसे पहले जानिए…कैसे मिला काम, कैसे अटका भुगतान
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत वर्ष 2022-23 और 2023-24 में महिलाओं को सरकारी स्कूलों के लिए यूनिफॉर्म सिलाई का काम दिया गया। स्व-सहायता समूहों को बाजार से कपड़ा खरीदकर यूनिफॉर्म सिलनी थी और तय समय में स्कूलों तक पहुंचाना था। इसमें लड़कों के लिए शर्ट-पैंट और लड़कियों के लिए सलवार-कुर्ती शामिल थीं।
एक समूह को औसतन 3-4 स्कूलों के बच्चों के यूनिफॉर्म सिलने का जिम्मा दिया गया।महिलाओं को ड्रेस की संख्या के आधार पर भुगतान होना था। शुरुआत में दो किस्तों में भुगतान किया गया, लेकिन तीसरी किस्त रोक दी गई।
कुल भुगतान का लगभग 25 फीसदी हिस्सा आज भी अटका हुआ है। तीन साल बीत जाने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि यह राशि कब तक मिलेगी। 46 जिलों में 36.56 करोड़ रुपए बकाया
जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा भुगतान छतरपुर जिले में बकाया है, जहां 3.42 करोड़ रुपए से अधिक राशि अटकी हुई है।
इसके बाद शिवपुरी में करीब 2.70 करोड़, सागर में 2.67 करोड़ और खंडवा में 2.45 करोड़ बकाया है। हालांकि, अनुपपुर, भिंड, इंदौर, खरगोन, नीमच और श्योपुर जैसे छह जिलों में पूरा भुगतान हो चुका है। 46 जिलों में 36.56 करोड़ रुपए बकाया
जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा भुगतान छतरपुर जिले में बकाया है, जहां 3.42 करोड़ रुपए का भुगतान नहीं हुआ है।
इसके बाद शिवपुरी में करीब 2.70 करोड़, सागर में 2.67 करोड़ और खंडवा में 2.45 करोड़ बकाया है। हालांकि, अनुपपुर, भिंड, इंदौर, खरगोन, नीमच और श्योपुर जैसे छह जिलों में पूरा भुगतान हो चुका है। तीन मामलों से समझिए महिलाएं कैसी दिक्कतें झेल रहीं 1. कपड़ा व्यापारी पैसे मांगता है, कैसे दें
हंडिया की खतीजा बेगम की कहानी भी ऐसी ही है। उन्होंने यूनिफॉर्म सिलाई के लिए उधार में कपड़ा खरीदा था, लेकिन अब तक भुगतान नहीं मिला।
खतीजा कहती हैं कि कपड़ा व्यापारी बार-बार फोन कर पैसे मांगता है। जब हमें ही पैसा नहीं मिला, तो हम उसे कैसे दें? हमारी हालत ऐसी नहीं कि अपनी जेब से भुगतान कर सकें। उनके समूह का करीब 55 हजार रुपए अब भी बकाया है। 2. गाली-गलौज की नौबत, लोन लेना पड़ रहा हंडिया की राधे-राधे समूह की संचालिका रजिया बी को करीब 1000 ड्रेस सिलने का काम मिला था। उनका कहना है कि समूह की महिलाओं ने दिन-रात मेहनत कर समय पर काम पूरा किया, लेकिन करीब 90 हजार रुपए अब भी नहीं मिले।
रजिया ने बताया कि हमारे समूह की महिलाएं बहुत गरीब हैं और 100-200 रुपए की मजदूरी कर घर चलाती हैं। जब जरूरत पड़ती है तो वे अपने पैसे मांगने आती हैं। पैसे न होने पर कुछ महिलाएं आरोप लगाती हैं कि मैंने ही उनके पैसे हजम कर लिए।
3. पापड़ और चिरौंजी बेचकर गुजारा कर रहीं
संगीता नागवंशी बताती हैं कि इस साल उनके समूह को यूनिफॉर्म सिलाई का काम भी नहीं मिला। इससे कई महिलाएं बेरोजगार हो गई हैं।
उन्होंने कहा कि गुजारा करने के लिए छोटे-मोटे काम करने पड़ रहे हैं। मैं कभी नर्मदा किनारे नारियल और चिरौंजी बेचती हूं, तो कभी पापड़ और बत्ती बनाकर बेचती हूं। इसी से घर चलाने की कोशिश कर रही हूं। जिम्मेदारों का रवैया क्या है… विधानसभा में भी उठा मुद्दा, सत्यापन करा रहे अफसर
इस साल विधानसभा के बजट सत्र में हजारों महिलाओं की इस समस्या को देखते हुए सीधी से भाजपा विधायक रीति पाठक ने यह मुद्दा विधानसभा में उठाया।
उन्होंने पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल से बकाया भुगतान को लेकर सवाल किया, लेकिन मंत्री यह स्पष्ट नहीं कर पाए कि महिलाओं को उनका पैसा कब तक मिलेगा।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के जिम्मेदार अधिकारियों के अनुसार, प्रारंभिक भुगतान में कुछ अनियमितताएं सामने आने के चलते प्रदेशभर में जिला स्तर पर समूहों का सत्यापन कराया जा रहा है। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही भुगतान की अगली कार्रवाई शुरू की जाएगी, जिसमें अभी 3 से 4 महीने का अतिरिक्त समय लग सकता है।

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