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पीरियड में तेज दर्द होना भी बांझपन का संकेत:25% महिलाओं में इन्फर्टिलिटी के पीछे एंडोमेट्रियोसिस; हर 10 में से एक महिला पीड़ित, लेकिन है अनजान

पीरियड में तेज दर्द होना भी बांझपन का संकेत:25% महिलाओं में इन्फर्टिलिटी के पीछे एंडोमेट्रियोसिस; हर 10 में से एक महिला पीड़ित, लेकिन है अनजान

पीरियड के दौरान दर्द को अक्सर सामान्य मान लिया जाता है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि हर दर्द सामान्य नहीं होता। एंडोमेट्रियोसिस नाम की गंभीर बीमारी हर 10 में से एक किशोरी और महिला को प्रभावित कर रही है, लेकिन ज्यादातर महिलाएं इससे अनजान हैं। यही वजह है कि इसकी पहचान 4 से 11 साल की देरी से होती है। चिंता की बात यह है कि आईवीएफ के लिए आने वाली करीब 25 प्रतिशत महिलाओं में बांझपन का कारण यही बीमारी बन रही है। समय रहते पहचान न होने पर यह किडनी, आंत और प्रजनन क्षमता तक को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। प्रजनन एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रिया भावे चित्तावर के अनुसार, एंडोमेट्रियोसिस में गर्भाशय की अंदरूनी परत जैसा टिशु शरीर के अन्य हिस्सों में बढ़ने लगता है। पीरियड के दौरान यह टिशु भी सक्रिय होता है, जिससे शरीर में सूजन, दर्द, चॉकलेट सिस्ट और एडहीजन बनने लगते हैं। धीरे-धीरे यह बीमारी गंभीर रूप लेकर अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकती है। राजधानी भोपाल से लेकर मध्यप्रदेश हो या देश से लेकर दुनिया हो, कहीं भी महिला इससे सुरक्षित नहीं हैं। केस स्टडी 1- दर्द से किडनी फेलियर तक 33 वर्षीय युवती को कई सालों से पीरियड के दौरान तेज दर्द होता था। वह इसे सामान्य समझकर दर्दनाशक दवाएं लेती रही और कभी जांच नहीं कराई। धीरे-धीरे दर्द बढ़ता गया, लेकिन उसने इसे नजरअंदाज किया। कुछ समय बाद पेट में सूजन और पेशाब में समस्या शुरू हुई। जांच में पता चला कि एंडोमेट्रियोसिस टिशु ट्यूमर जैसा बनकर यूटेरस ट्यूब पर दबाव डाल रहा है, जिससे किडनी पर असर पड़ा। हालत बिगड़ने पर दोनों किडनी फेल होने लगीं। डॉक्टरों ने बताया कि अगर समय पर जांच हो जाती, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। केस स्टडी 2- आंतों तक पहुंचा रोग 39 वर्षीय महिला में एंडोमेट्रियोसिस लंबे समय तक अनदेखा रहा। बाद में यह टिशु आंतों तक फैल गया और गंभीर संक्रमण हो गया। डॉक्टरों को पहले आंत का प्रभावित हिस्सा हटाना पड़ा, फिर सर्जरी कर टिशु निकाला गया। यह केस दिखाता है कि बीमारी कितनी खतरनाक हो सकती है। केस स्टडी 3: बांझपन की वजह बना रोग एक 32 वर्षीय महिला कई सालों से गर्भधारण नहीं कर पा रही थी। जांच के दौरान एंडोमेट्रियोसिस सामने आया। डॉक्टरों के अनुसार, यही बीमारी उसकी इंफर्टिलिटी का कारण बनी थी। इस टिशु के कारण बॉडी का हार्मोनल बैलेंस बुरी तरह से प्रभावित होता है। जिससे बॉडी में एस्ट्रोजेन का लेवल कम हो जाता है। जो प्रेगनेंसी में समस्या पैदा करता है। 4 से 11 साल देरी से होती है पहचान यह बीमारी 4 से 11 साल की देरी से पकड़ में आती है, क्योंकि महिलाएं इसे सामान्य पीरियड दर्द समझ लेती हैं। डॉ. चित्तावर कहती हैं कि अगर दर्द इतना हो कि महिला रोजमर्रा के काम नहीं कर पाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आईवीएफ के लिए आने वाली करीब 25 प्रतिशत महिलाओं में एंडोमेट्रियोसिस ही बांझपन का कारण बन रहा है। यह टिशु प्रजनन अंगों को प्रभावित कर गर्भधारण की क्षमता को धीरे-धीरे कम करता है। रोग का दो ही स्थितियों में पता चलता है- पीरियड के दर्द को ना समझें सामान्य एंडोमेट्रियोसिस के लक्षण अक्सर सामान्य पीरियड दर्द से मिलते-जुलते होते हैं, यही कारण है कि महिलाएं इसे नजरअंदाज कर देती हैं। लेकिन कुछ संकेत ऐसे हैं, जिन्हें गंभीरता से लेना जरूरी है। सबसे प्रमुख लक्षण है पीरियड के दौरान असहनीय दर्द, जो दवा लेने के बाद ही कम हो। कई महिलाओं को पीरियड के पहले और बाद में भी लगातार दर्द बना रहता है। इसके अलावा दर्द के कारण दैनिक कार्य न कर पाना, भारी ब्लीडिंग, पेट में सूजन, उल्टी या मतली, लंबे समय तक पेल्विक दर्द और थकान भी इसके संकेत हो सकते हैं। इसलिए यह रोग खतरनाक
एक्सपर्ट के अनुसार, सबसे गंभीर असर प्रजनन क्षमता पर पड़ता है। कई मामलों में यह बीमारी गर्भधारण को मुश्किल बना देती है। यदि समय रहते इलाज न किया जाए, तो यह किडनी, आंत और अन्य अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए लक्षण दिखते ही डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। WHO ने इस क्रॉनिक बीमारी की कैटेगरी में रखा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, एंडोमेट्रियोसिस एक कॉमन लेकिन कम पहचानी जाने वाली बीमारी है। यह एक क्रॉनिक (दीर्घकालिक) कैटेगरी वाला रोग है, जिसमें गर्भाशय की लाइनिंग जैसा टिशु शरीर के अन्य हिस्सों में बढ़ने लगता है। इस बीमारी का असर सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई, नौकरी और रिश्तों पर भी पड़ता है। इसके बावजूद जागरूकता की कमी के कारण महिलाएं लंबे समय तक सही इलाज से वंचित रह जाती हैं। देर से पहचान सबसे बड़ा खतरा WHO का कहना है कि एंडोमेट्रियोसिस की पहचान में औसतन 4 से 12 साल की देरी होती है। इसकी मुख्य वजह यह है कि इसके लक्षणों को अक्सर सामान्य पीरियड दर्द समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इसका स्थायी इलाज अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन दर्द निवारक दवाएं, हार्मोनल थेरेपी और जरूरत पड़ने पर सर्जरी से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। WHO सलाह देता है कि यदि दर्द दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहा हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

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पीरियड के दौरान दर्द को अक्सर सामान्य मान लिया जाता है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि हर दर्द सामान्य नहीं होता। एंडोमेट्रियोसिस नाम की गंभीर बीमारी हर 10 में से एक किशोरी और महिला को प्रभावित कर रही है, लेकिन ज्यादातर महिलाएं इससे अनजान हैं। यही वजह है कि इसकी पहचान 4 से 11 साल की देरी से होती है। चिंता की बात यह है कि आईवीएफ के लिए आने वाली करीब 25 प्रतिशत महिलाओं में बांझपन का कारण यही बीमारी बन रही है। समय रहते पहचान न होने पर यह किडनी, आंत और प्रजनन क्षमता तक को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। प्रजनन एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रिया भावे चित्तावर के अनुसार, एंडोमेट्रियोसिस में गर्भाशय की अंदरूनी परत जैसा टिशु शरीर के अन्य हिस्सों में बढ़ने लगता है। पीरियड के दौरान यह टिशु भी सक्रिय होता है, जिससे शरीर में सूजन, दर्द, चॉकलेट सिस्ट और एडहीजन बनने लगते हैं। धीरे-धीरे यह बीमारी गंभीर रूप लेकर अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकती है। राजधानी भोपाल से लेकर मध्यप्रदेश हो या देश से लेकर दुनिया हो, कहीं भी महिला इससे सुरक्षित नहीं हैं। केस स्टडी 1- दर्द से किडनी फेलियर तक 33 वर्षीय युवती को कई सालों से पीरियड के दौरान तेज दर्द होता था। वह इसे सामान्य समझकर दर्दनाशक दवाएं लेती रही और कभी जांच नहीं कराई। धीरे-धीरे दर्द बढ़ता गया, लेकिन उसने इसे नजरअंदाज किया। कुछ समय बाद पेट में सूजन और पेशाब में समस्या शुरू हुई। जांच में पता चला कि एंडोमेट्रियोसिस टिशु ट्यूमर जैसा बनकर यूटेरस ट्यूब पर दबाव डाल रहा है, जिससे किडनी पर असर पड़ा। हालत बिगड़ने पर दोनों किडनी फेल होने लगीं। डॉक्टरों ने बताया कि अगर समय पर जांच हो जाती, तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। केस स्टडी 2- आंतों तक पहुंचा रोग 39 वर्षीय महिला में एंडोमेट्रियोसिस लंबे समय तक अनदेखा रहा। बाद में यह टिशु आंतों तक फैल गया और गंभीर संक्रमण हो गया। डॉक्टरों को पहले आंत का प्रभावित हिस्सा हटाना पड़ा, फिर सर्जरी कर टिशु निकाला गया। यह केस दिखाता है कि बीमारी कितनी खतरनाक हो सकती है। केस स्टडी 3: बांझपन की वजह बना रोग एक 32 वर्षीय महिला कई सालों से गर्भधारण नहीं कर पा रही थी। जांच के दौरान एंडोमेट्रियोसिस सामने आया। डॉक्टरों के अनुसार, यही बीमारी उसकी इंफर्टिलिटी का कारण बनी थी। इस टिशु के कारण बॉडी का हार्मोनल बैलेंस बुरी तरह से प्रभावित होता है। जिससे बॉडी में एस्ट्रोजेन का लेवल कम हो जाता है। जो प्रेगनेंसी में समस्या पैदा करता है। 4 से 11 साल देरी से होती है पहचान यह बीमारी 4 से 11 साल की देरी से पकड़ में आती है, क्योंकि महिलाएं इसे सामान्य पीरियड दर्द समझ लेती हैं। डॉ. चित्तावर कहती हैं कि अगर दर्द इतना हो कि महिला रोजमर्रा के काम नहीं कर पाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आईवीएफ के लिए आने वाली करीब 25 प्रतिशत महिलाओं में एंडोमेट्रियोसिस ही बांझपन का कारण बन रहा है। यह टिशु प्रजनन अंगों को प्रभावित कर गर्भधारण की क्षमता को धीरे-धीरे कम करता है। रोग का दो ही स्थितियों में पता चलता है- पीरियड के दर्द को ना समझें सामान्य एंडोमेट्रियोसिस के लक्षण अक्सर सामान्य पीरियड दर्द से मिलते-जुलते होते हैं, यही कारण है कि महिलाएं इसे नजरअंदाज कर देती हैं। लेकिन कुछ संकेत ऐसे हैं, जिन्हें गंभीरता से लेना जरूरी है। सबसे प्रमुख लक्षण है पीरियड के दौरान असहनीय दर्द, जो दवा लेने के बाद ही कम हो। कई महिलाओं को पीरियड के पहले और बाद में भी लगातार दर्द बना रहता है। इसके अलावा दर्द के कारण दैनिक कार्य न कर पाना, भारी ब्लीडिंग, पेट में सूजन, उल्टी या मतली, लंबे समय तक पेल्विक दर्द और थकान भी इसके संकेत हो सकते हैं। इसलिए यह रोग खतरनाक
एक्सपर्ट के अनुसार, सबसे गंभीर असर प्रजनन क्षमता पर पड़ता है। कई मामलों में यह बीमारी गर्भधारण को मुश्किल बना देती है। यदि समय रहते इलाज न किया जाए, तो यह किडनी, आंत और अन्य अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए लक्षण दिखते ही डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। WHO ने इस क्रॉनिक बीमारी की कैटेगरी में रखा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, एंडोमेट्रियोसिस एक कॉमन लेकिन कम पहचानी जाने वाली बीमारी है। यह एक क्रॉनिक (दीर्घकालिक) कैटेगरी वाला रोग है, जिसमें गर्भाशय की लाइनिंग जैसा टिशु शरीर के अन्य हिस्सों में बढ़ने लगता है। इस बीमारी का असर सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई, नौकरी और रिश्तों पर भी पड़ता है। इसके बावजूद जागरूकता की कमी के कारण महिलाएं लंबे समय तक सही इलाज से वंचित रह जाती हैं। देर से पहचान सबसे बड़ा खतरा WHO का कहना है कि एंडोमेट्रियोसिस की पहचान में औसतन 4 से 12 साल की देरी होती है। इसकी मुख्य वजह यह है कि इसके लक्षणों को अक्सर सामान्य पीरियड दर्द समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इसका स्थायी इलाज अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन दर्द निवारक दवाएं, हार्मोनल थेरेपी और जरूरत पड़ने पर सर्जरी से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। WHO सलाह देता है कि यदि दर्द दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहा हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

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