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शादी पर बोले विजय वर्मा – ‘उम्मीद पर दुनिया टिकी:मटका किंग की स्टारकास्ट बोली- भावनाओं को दबाकर नहीं रख सकते, यही हमें जिंदा रखती है

शादी पर बोले विजय वर्मा - ‘उम्मीद पर दुनिया टिकी:मटका किंग की स्टारकास्ट बोली- भावनाओं को दबाकर नहीं रख सकते, यही हमें जिंदा रखती है

मटका किंग अपनी दमदार कहानी और 60-70 के दशक की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इस सीरीज में जुए की दुनिया के जरिए पहचान, इज्जत और सत्ता के खेल को दिखाने की कोशिश की गई है। इसी बीच दैनिक भास्कर ने फिल्म के डायरेक्टर नागराज मंजुले और स्टारकास्ट विजय वर्मा, कृतिका कामरा और साईं तम्हंकर से खास बातचीत की। इस दौरान सभी ने न सिर्फ अपने किरदारों के बारे में खुलकर बात की, बल्कि सीरीज की कहानी, उसके दौर और उसके सामाजिक पहलुओं पर भी दिलचस्प बातें साझा कीं। यह सीरीज सिर्फ एक खेल की नहीं, बल्कि उस दौर और उससे जुड़े लोगों की कहानी को सामने लाने का प्रयास है। नागराज मंजुले- आप हमेशा समाज को रॉ और अनफिल्टर्ड तरीके से दिखाते हैं। मटका किंग में आपने क्या एक्सप्लोर किया है? यह कहानी सिर्फ जुए के खेल की नहीं है, बल्कि उस दुनिया की है जो इसके इर्द-गिर्द बनती है। हम जानते हैं कि मटका खेला जाता था, लेकिन जो लोग इसे खेलते थे, उनकी जिंदगी कैसी थी, यह कम लोग जानते हैं। यह खेल कैसे इतना बड़ा और आकर्षक बना हमने उसी समाज, उस दौर और उन लोगों की कहानी बताने की कोशिश की है। 60-70 के दशक को पर्दे पर जीवंत बनाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा और इतनी दमदार स्टारकास्ट के साथ काम करने का आपका अनुभव कैसा रहा? नागराज मंजुले- यह ज्यादा मुश्किल से पहले सोचने का काम होता है। जब आप उस दौर को लिख लेते हैं, तो पूरी टीम उसे साकार करने में जुट जाती है। हमारे पास कॉस्ट्यूम, प्रोडक्शन डिजाइन, म्यूजिक और डीओपी जैसे विभागों में बेहद टैलेंटेड लोग थे, जिन्होंने मिलकर उस समय को जीवंत बनाने की कोशिश की। वहीं स्टारकास्ट के साथ काम करने का अनुभव शानदार रहा, पहली बार इतने बड़े और नामी कलाकारों के साथ काम किया। हर किरदार मजबूत है, ऐसा लगता है जैसे हर खिलाड़ी अपने आप में मैच जिताने वाला है। स्क्रिप्ट में ऐसा क्या खास था और आपके किरदार में ऐसी कौन-सी बात थी, जिसकी वजह से आपने तुरंत इस प्रोजेक्ट के लिए हां कह दी और आप उससे कितना रिलेट कर पाए? विजय वर्मा- सबसे बड़ी वजह थी नागराज मंजुले के साथ काम करने का मौका। मैं उनके काम का हमेशा से फैन रहा हूं, और उनके साथ काम करना अपने आप में खास अनुभव है। स्क्रिप्ट में जो किरदार था, उसमें एक शांत लेकिन गहरी इंटेंसिटी है वह अपने काम को पूरी ईमानदारी से करता है, लेकिन जिस दुनिया का वह हिस्सा है, उसे समाज खुलकर स्वीकार नहीं करता, यही उसका सबसे बड़ा संघर्ष है। जहां तक रिलेट करने की बात है, यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया रही कभी मैं किरदार के बहुत करीब महसूस करता था, तो कभी उससे दूर। कई बार ऐसा भी हुआ कि हम दोनों कहीं बीच में आकर मिले, और वहीं से उस किरदार को समझने का रास्ता बना। ट्रेलर में आपके किरदार के रिश्तों में एक जटिलता और कई परतें नजर आती हैं, इसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?
कृतिका कामरा- इस कहानी में सभी किरदार और उनके रिश्ते जटिल हैं। मेरा किरदार गुलरुख दुबाश एक अलग दुनिया से आता है, लेकिन उसे इस खेल और विजय के किरदार की दुनिया आकर्षित करती है। उसकी अपनी कमियां और इच्छाएं हैं, जो उसे इस सफर का हिस्सा बनाती हैं। आपके किरदार में कितनी लेयर्स देखने को मिलेंगी? साईं तम्हंकर- बहुत सारी लेयर्स हैं। मेरा किरदार ‘बरखा’ ऐसा है जो अपनी भावनाओं को दबाकर नहीं रख सकती। अगर वह कुछ महसूस करती है, तो उसे व्यक्त करना जरूरी है। यह उसकी सबसे बड़ी खासियत है। आजकल ओटीटी और सिनेमा में महिला किरदारों को ज्यादा गहराई मिल रही है। इस पर आपकी राय? साईं तम्हंकर- यह बहुत अच्छा बदलाव है। अब महिला किरदार सिर्फ सजावट नहीं हैं, बल्कि कहानी का अहम हिस्सा हैं। हालांकि अभी भी सुधार की गुंजाइश है। ट्रेलर में एक लाइन है ‘जिंदगी उम्मीद पर टिकी है’। आपकी जिंदगी में उम्मीद का क्या मतलब है? नागराज मंजुले- बस चलते रहना चाहिए। उम्मीद यही है कि आगे अच्छा होगा। विजय वर्मा- मुश्किल वक्त में सिर्फ उम्मीद ही साथ देती है। समय हमेशा बदलता है, और यही भरोसा हमें आगे बढ़ाता है। कृतिका कामरा- उम्मीद ही वह भावना है जो हमें जिंदा रखती है। अगर उम्मीद नहीं, तो कुछ भी नहीं। साईं तम्हंकर- उम्मीद जीवन की ड्राइविंग फोर्स है। इसके बिना जीना मुश्किल है। आखिरी सवाल दर्शक जानना चाहते हैं कि विजय वर्मा कब तक सिंगल रहने वाले हैं? विजय वर्मा- दुनिया उम्मीद पर टिकी है… फिलहाल उम्मीद ही पेट्रोल है!

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मटका किंग अपनी दमदार कहानी और 60-70 के दशक की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इस सीरीज में जुए की दुनिया के जरिए पहचान, इज्जत और सत्ता के खेल को दिखाने की कोशिश की गई है। इसी बीच दैनिक भास्कर ने फिल्म के डायरेक्टर नागराज मंजुले और स्टारकास्ट विजय वर्मा, कृतिका कामरा और साईं तम्हंकर से खास बातचीत की। इस दौरान सभी ने न सिर्फ अपने किरदारों के बारे में खुलकर बात की, बल्कि सीरीज की कहानी, उसके दौर और उसके सामाजिक पहलुओं पर भी दिलचस्प बातें साझा कीं। यह सीरीज सिर्फ एक खेल की नहीं, बल्कि उस दौर और उससे जुड़े लोगों की कहानी को सामने लाने का प्रयास है। नागराज मंजुले- आप हमेशा समाज को रॉ और अनफिल्टर्ड तरीके से दिखाते हैं। मटका किंग में आपने क्या एक्सप्लोर किया है? यह कहानी सिर्फ जुए के खेल की नहीं है, बल्कि उस दुनिया की है जो इसके इर्द-गिर्द बनती है। हम जानते हैं कि मटका खेला जाता था, लेकिन जो लोग इसे खेलते थे, उनकी जिंदगी कैसी थी, यह कम लोग जानते हैं। यह खेल कैसे इतना बड़ा और आकर्षक बना हमने उसी समाज, उस दौर और उन लोगों की कहानी बताने की कोशिश की है। 60-70 के दशक को पर्दे पर जीवंत बनाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा और इतनी दमदार स्टारकास्ट के साथ काम करने का आपका अनुभव कैसा रहा? नागराज मंजुले- यह ज्यादा मुश्किल से पहले सोचने का काम होता है। जब आप उस दौर को लिख लेते हैं, तो पूरी टीम उसे साकार करने में जुट जाती है। हमारे पास कॉस्ट्यूम, प्रोडक्शन डिजाइन, म्यूजिक और डीओपी जैसे विभागों में बेहद टैलेंटेड लोग थे, जिन्होंने मिलकर उस समय को जीवंत बनाने की कोशिश की। वहीं स्टारकास्ट के साथ काम करने का अनुभव शानदार रहा, पहली बार इतने बड़े और नामी कलाकारों के साथ काम किया। हर किरदार मजबूत है, ऐसा लगता है जैसे हर खिलाड़ी अपने आप में मैच जिताने वाला है। स्क्रिप्ट में ऐसा क्या खास था और आपके किरदार में ऐसी कौन-सी बात थी, जिसकी वजह से आपने तुरंत इस प्रोजेक्ट के लिए हां कह दी और आप उससे कितना रिलेट कर पाए? विजय वर्मा- सबसे बड़ी वजह थी नागराज मंजुले के साथ काम करने का मौका। मैं उनके काम का हमेशा से फैन रहा हूं, और उनके साथ काम करना अपने आप में खास अनुभव है। स्क्रिप्ट में जो किरदार था, उसमें एक शांत लेकिन गहरी इंटेंसिटी है वह अपने काम को पूरी ईमानदारी से करता है, लेकिन जिस दुनिया का वह हिस्सा है, उसे समाज खुलकर स्वीकार नहीं करता, यही उसका सबसे बड़ा संघर्ष है। जहां तक रिलेट करने की बात है, यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया रही कभी मैं किरदार के बहुत करीब महसूस करता था, तो कभी उससे दूर। कई बार ऐसा भी हुआ कि हम दोनों कहीं बीच में आकर मिले, और वहीं से उस किरदार को समझने का रास्ता बना। ट्रेलर में आपके किरदार के रिश्तों में एक जटिलता और कई परतें नजर आती हैं, इसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगी?
कृतिका कामरा- इस कहानी में सभी किरदार और उनके रिश्ते जटिल हैं। मेरा किरदार गुलरुख दुबाश एक अलग दुनिया से आता है, लेकिन उसे इस खेल और विजय के किरदार की दुनिया आकर्षित करती है। उसकी अपनी कमियां और इच्छाएं हैं, जो उसे इस सफर का हिस्सा बनाती हैं। आपके किरदार में कितनी लेयर्स देखने को मिलेंगी? साईं तम्हंकर- बहुत सारी लेयर्स हैं। मेरा किरदार ‘बरखा’ ऐसा है जो अपनी भावनाओं को दबाकर नहीं रख सकती। अगर वह कुछ महसूस करती है, तो उसे व्यक्त करना जरूरी है। यह उसकी सबसे बड़ी खासियत है। आजकल ओटीटी और सिनेमा में महिला किरदारों को ज्यादा गहराई मिल रही है। इस पर आपकी राय? साईं तम्हंकर- यह बहुत अच्छा बदलाव है। अब महिला किरदार सिर्फ सजावट नहीं हैं, बल्कि कहानी का अहम हिस्सा हैं। हालांकि अभी भी सुधार की गुंजाइश है। ट्रेलर में एक लाइन है ‘जिंदगी उम्मीद पर टिकी है’। आपकी जिंदगी में उम्मीद का क्या मतलब है? नागराज मंजुले- बस चलते रहना चाहिए। उम्मीद यही है कि आगे अच्छा होगा। विजय वर्मा- मुश्किल वक्त में सिर्फ उम्मीद ही साथ देती है। समय हमेशा बदलता है, और यही भरोसा हमें आगे बढ़ाता है। कृतिका कामरा- उम्मीद ही वह भावना है जो हमें जिंदा रखती है। अगर उम्मीद नहीं, तो कुछ भी नहीं। साईं तम्हंकर- उम्मीद जीवन की ड्राइविंग फोर्स है। इसके बिना जीना मुश्किल है। आखिरी सवाल दर्शक जानना चाहते हैं कि विजय वर्मा कब तक सिंगल रहने वाले हैं? विजय वर्मा- दुनिया उम्मीद पर टिकी है… फिलहाल उम्मीद ही पेट्रोल है!

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