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West Bengal Politics: Mamata vs Modi Election Race

West Bengal Politics: Mamata vs Modi Election Race

कोलकाता2 घंटे पहलेलेखक: प्रदीप पांडेय

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SIR को लेकर घमासान के बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति में गरमाहट बढ़ रही है। बंगाल की सियासी हवा में अभी ‘एम’ हावी है। एम यानी- महिला, मुस्लिम, मस्जिद, मंदिर, मटन, मछली, मनी पॉवर, मसल पॉवर…, ममता और मोदी।

बंगाल की राजनीति यहां के दो सबसे बड़े फुटबॉल क्लबों- मोहन बागान या ईस्ट बंगाल की तरह दो ध्रुवों में बंटी है। पहले बंगाल की राजनीति कांग्रेस बनाम लेफ्ट थी, फिर 34 साल लेफ्ट का राज रहा। अब 15 साल से तृणमूल सत्ता में है और पिछले पांच साल से उसका सीधा मुकाबला भाजपा से है।

टीएमसी के लिए आज भी ममता का फेस वाममोर्चा के 34 साल का ‘लाल किला’ भेदकर सीएम बनीं ममता बनर्जी डेढ़ दशक की सत्ता के बाद भी आक्रामक शैली में मोर्चे पर हैं। टीएमसी के लिए आज भी ममता का फेस, लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं और मुस्लिमों का एकजुट वोट, जीत का फॉर्मूला है। वहीं, भाजपा पीएम मोदी के चेहरे, अनुशासित संगठन और ‘डबल इंजन’ के नारे के साथ मैदान में है।

हालांकि, सड़क पर मुकाबले के लिए उसे अभी भी ऐसे ‘मुद्दे, मौके और स्थानीय बड़े चेहरे’ की तलाश है, जो उसकी विधानसभा सीटें 77 से 148 तक पहुंचा सके। स्थानीय स्तर पर ममता के कद के नेता की कमी बड़ी चुनौती है। इस बीच, वाममोर्चा व कांग्रेस राज्य में अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष कर रहे हैं।

जो सड़क जीते सरकार उसी की एक बंगाली दैनिक के सीनियर पत्रकार कहते हैं कि यहां जो सड़क जीत लेता है वह चुनाव जीत लेता है और फिलहाल सड़क पर ममता ही दिख रही हैं। दूसरी ओर, कोलकाता में रेस्टोरेंट चलाने वाले यूपी मूल के एक युवक ने कहा- पिछले पांच साल में भाजपा का वोटर बेस बढ़ा है, पर पार्टी को यह भरोसा दिलाना होगा कि सरकार बदल रही है। अगर ऐसा होता है तो सपोर्ट वोट में बदल पाएगा।

टीएमसी; एसआईआर से संगठन एक्टिव… अब टिकट पर मंथन ममता की सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार, भर्ती घोटाले में मंत्रियों की गिरफ्तारी, 25 हजार से ज्यादा नियुक्तियां रद्द होना, आरजी कर जैसी घटना और डेढ़ दशक की सत्ता की एंटी इन्कंबेंसी है। हालांकि ममता के ईडी छापे के बीच घुसकर फाइल निकालने, एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने और सड़क पर मोर्चा संभालने से पार्टी का कैडर गांव-गांव तक एक्टिव हो गया। यही कारण है कि चुनाव से तीन महीने पहले पार्टी मैदान में दिख रही है। ममता के सांसद भतीजे अभिषेक बनर्जी भाजपा के आरोपों को काउंटर करने के साथ ही संगठन का मैनेजमेंट संभाल रहे हैं।

भाजपा; कई राज्यों के नेता मैदान में, अभी से डोर टू डोर भाजपा घुसपैठ, भ्रष्टाचार, महिलाओं के खिलाफ अपराध के मुद्दे पर ममता की घेराबंदी बढ़ा रही है। नेता प्रतिपक्ष सुभेंदु अधिकारी सड़क पर मुखर हैं तो प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्‌टाचार्य संगठन की मजबूती के साथ बंगाली भद्रलोक को साध रहे हैं।

पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दौरों के साथ पार्टी इस बार बूथ लेवल पर फोकस कर रही है। हर सीट पर एक-एक सीनियर नेता को लगाया गया है। यूपी, बिहार, ओडिशा, उत्तराखंड सहित कई राज्यों के इन सीनियर नेताओं को डोर टू डोर दस्तक देकर हर बूथ को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में दो-तीन माह ही बचे हैं। यहां अभी भाषण और रैलियों का शोर नहीं है। लेकिन, सियासत भरपूर गर्म है। कोलकाता के न्यू मार्केट से चांदनी चौक, न्यू टाउन से जेसप बिल्डिंग और मुर्शिदाबाद के बेलडांगा से बर्द्धमान तक करीब 600 किमी के सफर में साफ हो गया कि अभी वोटर लिस्ट ही चुनावी रणभूमि बनी हुई है। पूरी खबर पढ़ें…

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बंगाल की राजनीति यहां के दो सबसे बड़े फुटबॉल क्लबों- मोहन बागान या ईस्ट बंगाल की तरह दो ध्रुवों में बंटी है। पहले बंगाल की राजनीति कांग्रेस बनाम लेफ्ट थी, फिर 34 साल लेफ्ट का राज रहा। अब 15 साल से तृणमूल सत्ता में है और पिछले पांच साल से उसका सीधा मुकाबला भाजपा से है।

टीएमसी के लिए आज भी ममता का फेस वाममोर्चा के 34 साल का ‘लाल किला’ भेदकर सीएम बनीं ममता बनर्जी डेढ़ दशक की सत्ता के बाद भी आक्रामक शैली में मोर्चे पर हैं। टीएमसी के लिए आज भी ममता का फेस, लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं और मुस्लिमों का एकजुट वोट, जीत का फॉर्मूला है। वहीं, भाजपा पीएम मोदी के चेहरे, अनुशासित संगठन और ‘डबल इंजन’ के नारे के साथ मैदान में है।

हालांकि, सड़क पर मुकाबले के लिए उसे अभी भी ऐसे ‘मुद्दे, मौके और स्थानीय बड़े चेहरे’ की तलाश है, जो उसकी विधानसभा सीटें 77 से 148 तक पहुंचा सके। स्थानीय स्तर पर ममता के कद के नेता की कमी बड़ी चुनौती है। इस बीच, वाममोर्चा व कांग्रेस राज्य में अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष कर रहे हैं।

जो सड़क जीते सरकार उसी की एक बंगाली दैनिक के सीनियर पत्रकार कहते हैं कि यहां जो सड़क जीत लेता है वह चुनाव जीत लेता है और फिलहाल सड़क पर ममता ही दिख रही हैं। दूसरी ओर, कोलकाता में रेस्टोरेंट चलाने वाले यूपी मूल के एक युवक ने कहा- पिछले पांच साल में भाजपा का वोटर बेस बढ़ा है, पर पार्टी को यह भरोसा दिलाना होगा कि सरकार बदल रही है। अगर ऐसा होता है तो सपोर्ट वोट में बदल पाएगा।

टीएमसी; एसआईआर से संगठन एक्टिव… अब टिकट पर मंथन ममता की सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार, भर्ती घोटाले में मंत्रियों की गिरफ्तारी, 25 हजार से ज्यादा नियुक्तियां रद्द होना, आरजी कर जैसी घटना और डेढ़ दशक की सत्ता की एंटी इन्कंबेंसी है। हालांकि ममता के ईडी छापे के बीच घुसकर फाइल निकालने, एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने और सड़क पर मोर्चा संभालने से पार्टी का कैडर गांव-गांव तक एक्टिव हो गया। यही कारण है कि चुनाव से तीन महीने पहले पार्टी मैदान में दिख रही है। ममता के सांसद भतीजे अभिषेक बनर्जी भाजपा के आरोपों को काउंटर करने के साथ ही संगठन का मैनेजमेंट संभाल रहे हैं।

भाजपा; कई राज्यों के नेता मैदान में, अभी से डोर टू डोर भाजपा घुसपैठ, भ्रष्टाचार, महिलाओं के खिलाफ अपराध के मुद्दे पर ममता की घेराबंदी बढ़ा रही है। नेता प्रतिपक्ष सुभेंदु अधिकारी सड़क पर मुखर हैं तो प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्‌टाचार्य संगठन की मजबूती के साथ बंगाली भद्रलोक को साध रहे हैं।

पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दौरों के साथ पार्टी इस बार बूथ लेवल पर फोकस कर रही है। हर सीट पर एक-एक सीनियर नेता को लगाया गया है। यूपी, बिहार, ओडिशा, उत्तराखंड सहित कई राज्यों के इन सीनियर नेताओं को डोर टू डोर दस्तक देकर हर बूथ को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

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