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Houthi Missile Attack Video; Saudi Arabia F-15 Jet Shot Claim

Houthi Missile Attack Video; Saudi Arabia F-15 Jet Shot Claim

पैरों में हवाई चप्पल, कमर में लुंगी, मुंह में कात दबाए हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब का F-15 फाइटर जेट गिरा दिया है। वो भी अपनी देसी बैलिस्टिक मिसाइल से।

.

यमन की सऊदी समर्थित सेना की बख्तरबंद गाड़ियां छीन लीं और निशाना चूकी DF-15 मिसाइल भी उठा ले गए। हूतियों के हमले से इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का तक हाई अलर्ट पर है।

आखिर कौन हैं ये हूती लड़ाके और चाहते क्या हैं, सऊदी जैसा अमीर और ताकतवर देश इन विद्रोहियों के आगे बेबस क्यों नजर आ रहा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…

सवाल-1: चप्पल और लुंगी पहने ये हूती लड़ाके आखिर हैं कौन? जवाबः यमन की कुल 4 करोड़ की आबादी में करीब 35% जैदी शिया हैं। इन्हीं शियाओं का हथियारबंद समूह और राजनीतिक ऑर्गेनाइजेशन है हूती…

  • 1990 में हुसैन अल-हूती ने सुन्नियों के खिलाफ इस समूह की नींव रखी। यमन में अब्दुल्ला सालेह की सत्ता के दौरान ये संगठन मजबूत होने लगा।
  • 2010 के आखिर में लीबिया, इजिप्ट, यमन, सीरिया और बहरीन जैसे देशों में ‘अरब क्रांति’ शुरू हुई। कई देशों में तख्तापलट हुआ। यमन में भी सरकार के विरोध में गृहयुद्ध शुरू हुआ।

फाउंडर हुसैन अल-हूती के नाम पर ही ‘अंसार अल्लाह’ नाम के संगठन को हूती कहा जाता है।

  • 2012 में अब्दरब्बू मंसूर हादी, अब्दुल्ला का तख्तापलट कर खुद राष्ट्रपति बन गए। 33 साल से सत्ता पर काबिज अब्दुल्ला को यमन छोड़कर विदेश भागना पड़ा।
  • इस दौरान यमन की सेना में दो-फाड़ हो गई। राजनीतिक अस्थिरता का फायदा हूतियों ने उठाया और यमन के दक्षिणी इलाकों पर काबिज होने लगे।
  • अब इस गृहयुद्ध में एंट्री होती है सऊदी अरब और ईरान की। दरअसल, सऊदी सुन्नियों का नेता बनता है और ईरान शियाओं का। हूतियों को ईरान का समर्थन मिला, तो यमन सरकार को सऊदी अरब का।
  • 2015 तक हूती विद्रोहियों ने यमन के एक बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया। 2015 में हालात ऐसे हुए कि हूतियों ने पूरी सरकार को निर्वासन में जाने पर मजबूर कर दिया। 2015 में हूती विद्रोही गुट में करीब 30 हजार लड़ाके थे। अब इनकी संख्या करीब 3.5 लाख है।

सवाल-2: सऊदी पर हमला क्यों कर रहे हूती, कितना नुकसान किया? जवाबः हालिया लड़ाई की शुरुआत बीती 5 अगस्त से हुई…

  • हूतियों ने सऊदी के समर्थन वाली यमन सरकार के कैंपों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए। आरोप लगाया कि यहां सऊदी गठबंधन सेना अपना जमावड़ा बढ़ा रही थी।
  • 3 सितंबर को हूतियों ने यमन के लाल सागर तट पर तीन तरफ से हमले शुरू किए। फिर मोखा शहर की घेराबंदी की।
इस वीडियो के आधार पर दावा है कि हूतियों ने सऊदी अरब और PLC की सेना की दर्जनों बख्तरबंद गाड़ियां कब्जा कर ली हैं।

इस वीडियो के आधार पर दावा है कि हूतियों ने सऊदी अरब और PLC की सेना की दर्जनों बख्तरबंद गाड़ियां कब्जा कर ली हैं।

  • हूतियों की बढ़त देखकर सऊदी अरब ने जवाबी हमला शुरू कर दिया। मिसाइल और ड्रोन हमलों में 73 लोग घायल हुए।
  • 10 सितंबर को हूतियों ने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से सिर्फ 80 किमी दूर मोखा बंदरगाह पर कब्जा कर लिया। इसके बाद हूती लड़ाके बाब अल-मंदेब की तरफ बढ़े और समुद्र से लगे धुबाब पोर्ट और लाल सागर के आसपास के हानिश जैसे द्वीप समूहों पर भी कब्जा कर लिया।
  • 11 सितंबर को बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास पेरिम यानी मयून द्वीप पर कब्जा कर लिया गया। यहां कब्जे से हूतियों को इस समुद्री रास्ते के बेहद करीब रणनीतिक ठिकाना मिल गया है। हूतियों का दावा है कि उन्होंने पूरे पश्चिमी तट और बाब अल-मंदेब के इलाके पर कब्जा कर लिया है।

सऊदी अरब ने कहा कि 15-16 सितंबर की रात हूतियों ने पवित्र शहर मक्का को टारगेट करके ड्रोन अटैक किया था। इसे मक्का में घुसने से पहले ही मार गिराया गया। हालांकि हूतियों ने मक्का को निशाना बनाने से इनकार किया।

16 सितंबर को हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सारेया ने कहा, ‘अल्लाह की मदद से यमन की सशस्त्र सेना ने मारिब प्रांत में सऊदी अरब को अमेरिका से मिले F-15 फाइटर जेट को स्वदेशी तौर पर बनाई मिसाइल से मार गिराया है।’

हूतियों ने इसका एक वीडियो भी जारी किया है…

जेट पर मिसाइल का हमला और जेट का जलता हुआ मलबा। हथियारबंद लड़ाके मलबे के पास जश्न मना रहे हैं। जेट के एक हिस्से पर सऊदी अरब का झंडा दिख रहा है।

जेट पर मिसाइल का हमला और जेट का जलता हुआ मलबा। हथियारबंद लड़ाके मलबे के पास जश्न मना रहे हैं। जेट के एक हिस्से पर सऊदी अरब का झंडा दिख रहा है।

सऊदी अरब या अमेरिका ने जेट गिराने के दावे पर अब तक कोई बयान नहीं दिया है।

सवाल-3: अमीर और ताकतवर सऊदी अरब बेबस क्यों नजर आ रहा है? जवाबः इसकी 3 बड़ी वजहें हैं-

1. सऊदी समर्थित फौजों में तालमेल नहीं, हूतियों की मजबूत तैयारी

  • सऊदी समर्थित यमनी फौजें कई अलग-अलग सशस्त्र गुटों में बंटी हैं। इनके अलग-अलग कमांडर हैं और उनके अपने-अपने इरादे और महत्वाकांक्षाएं हैं।
  • 2026 की शुरुआत से सऊदी अरब इन सभी गुटों को एक कमांड के तहत लाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन बरसों पुराना ये बिखराव दूर नहीं हो पाया है।
  • दूसरी तरफ, हूतियों की फौज कई मायनों में बेहतर है। ईरान ने अपनी कुद्ज फोर्स के जरिए हूतियों को ट्रेनिंग, एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, समुद्री हथियार और टेक्नोलॉजी सहित भारी मात्रा में हथियार दिए हैं।
  • अब हूती खुद भी ज्यादा रेंज वाले रॉकेट, बम और मिसाइल्स बनाने लगे हैं।

2. सऊदी में इंटरसेप्टर मिसाइल और एयर डिफेंस की कमी

  • सऊदी अरब ने अब तक हूतियों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले नहीं किए हैं, क्योंकि उसके पास इंटरसेप्टर मिसाइल की कमी हो गई है।
  • सऊदी को मिसाइल्स की सप्लाई करने वाले अमेरिका के पास भी 6 महीने से जारी ईरान जंग के चलते इंटरसेप्टर्स का स्टॉक घट गया है।

3. ईरान जंग में फंसा अमेरिका एक और जंग नहीं चाहता

  • रिपोर्ट्स के मुताबिक, 10 सितंबर को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को फोन करके हूतियों पर हवाई हमले करने को कहा। इसे ट्रम्प ने ठुकरा दिया और सिर्फ इंटेलिजेंस सपोर्ट देने की बात कही।
  • चैथम हाउस के एक्सपर्ट फारिया अल-मुस्लिमी कहते हैं कि भले ही सऊदी अरब मिडिल-ईस्ट में अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोगी हो, लेकिन अमेरिका और हूती दोनों के पास एक-दूसरे के खिलाफ जंग न शुरू करने की मजबूत वजहें हैं।
  • अमेरिकी सेना होर्मुज में फंसी हुई है। वहां अभी तक ईरान का कंट्रोल बना हुआ है। जंग में अब तक अमेरिका के 18 सैनिकों की मौत हुई है और करीब 50 एयरक्राफ्ट और ड्रोन डैमेज हुए हैं। इस जंग में अमेरिकी डिफेंस डिपार्टमेंट के 38 अरब डॉलर खर्च हुए हैं। ट्रम्प नहीं चाहते कि मिडिल ईस्ट में एक और महंगा सैन्य अभियान शुरू हो।

ट्रम्प के इनकार करने के बाद सऊदी ने इजराइल से खुफिया जानकारी और दूसरी सैन्य मदद मांगी, ताकि बाब अल-मंदेब पर हूतियों का कब्जा रोका जा सके, जबकि सऊदी और इजराइल के बीच सीधे राजनयिक संबंध नहीं हैं।

वहीं, पाकिस्तान और तुर्किये, सऊदी के साथ मक्का पैक्ट होने के बावजूद उसे सीधी सैन्य मदद के बजाय हूतियों से बातचीत करवाने में मध्यस्थता करने का प्रस्ताव दे रहे हैं।

सवाल-4: पाकिस्तान, सऊदी अरब की सैन्य मदद क्यों नहीं कर रहा? जवाब: 10 सितंबर को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा, ‘सऊदी पर हूतियों के हमले के खिलाफ मक्का पैक्ट के तहत कोई कार्रवाई करने को लेकर अब तक कोई बातचीत नहीं हुई है। जब वक्त आएगा, तब कदम उठाएंगे।’

पाकिस्तान के इस रुख के पीछे 3 वजहें हैं… 1. साझा सैन्य कमांड का कोई ढांचा नहींः तुर्किये के डिप्लोमैट रहे मुस्तफा एनेस एसेन के मुताबिक, ‘मक्का पैक्ट तब तक सिर्फ प्रतीकात्मक है, जब तक इसका एक जॉइंट सैन्य कमांड स्ट्रक्चर नहीं बनता। तुर्किये और पाकिस्तान, ईरान या भारत से सीधे टकराव में शामिल नहीं होंगे।

2. मध्यस्थ की भूमिका को खतराः पाकिस्तान अमेरिका-ईरान जंग में मध्यस्थता की भूमिका निभा रहा है। उसने ईरान से हूतियों पर लगाम कसने के लिए कहा और सऊदी पर हमलों की निंदा भी की। लेकिन इससे आगे बढ़ा, तो पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली भूमिका खतरे में पड़ सकती है।

3. शिया-सुन्नी की लड़ाई में नहीं उलझना चाहताः पाकिस्तान भले सुन्नी बहुल मुल्क हो, लेकिन शियाओं की भी बड़ी आबादी है। 2015 में सऊदी ने यमन में हूतियों के खिलाफ जंग में मदद मांगी, तो पाकिस्तान ने सैन्य दखल से इनकार कर दिया था। तब के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था, ‘हम किसी सांप्रदायिक जंग का हिस्सा नहीं बनना चाहते, क्योंकि इसकी दरारें पाकिस्तान के अंदर भी नजर आएंगी।’ —–

ये खबर भी पढ़ें…

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होर्मुज स्ट्रेट के बाद अब एक और समुद्री ऑयल रूट बाब अल-मंदेब स्ट्रेट संकट में है। यमन के हूती विद्रोहियों ने यहां कब्जे का एलान किया है। पूरी खबर पढ़ें…

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राजनीति

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पैरों में हवाई चप्पल, कमर में लुंगी, मुंह में कात दबाए हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब का F-15 फाइटर जेट गिरा दिया है। वो भी अपनी देसी बैलिस्टिक मिसाइल से।

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यमन की सऊदी समर्थित सेना की बख्तरबंद गाड़ियां छीन लीं और निशाना चूकी DF-15 मिसाइल भी उठा ले गए। हूतियों के हमले से इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का तक हाई अलर्ट पर है।

आखिर कौन हैं ये हूती लड़ाके और चाहते क्या हैं, सऊदी जैसा अमीर और ताकतवर देश इन विद्रोहियों के आगे बेबस क्यों नजर आ रहा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…

सवाल-1: चप्पल और लुंगी पहने ये हूती लड़ाके आखिर हैं कौन? जवाबः यमन की कुल 4 करोड़ की आबादी में करीब 35% जैदी शिया हैं। इन्हीं शियाओं का हथियारबंद समूह और राजनीतिक ऑर्गेनाइजेशन है हूती…

  • 1990 में हुसैन अल-हूती ने सुन्नियों के खिलाफ इस समूह की नींव रखी। यमन में अब्दुल्ला सालेह की सत्ता के दौरान ये संगठन मजबूत होने लगा।
  • 2010 के आखिर में लीबिया, इजिप्ट, यमन, सीरिया और बहरीन जैसे देशों में ‘अरब क्रांति’ शुरू हुई। कई देशों में तख्तापलट हुआ। यमन में भी सरकार के विरोध में गृहयुद्ध शुरू हुआ।

फाउंडर हुसैन अल-हूती के नाम पर ही ‘अंसार अल्लाह’ नाम के संगठन को हूती कहा जाता है।

  • 2012 में अब्दरब्बू मंसूर हादी, अब्दुल्ला का तख्तापलट कर खुद राष्ट्रपति बन गए। 33 साल से सत्ता पर काबिज अब्दुल्ला को यमन छोड़कर विदेश भागना पड़ा।
  • इस दौरान यमन की सेना में दो-फाड़ हो गई। राजनीतिक अस्थिरता का फायदा हूतियों ने उठाया और यमन के दक्षिणी इलाकों पर काबिज होने लगे।
  • अब इस गृहयुद्ध में एंट्री होती है सऊदी अरब और ईरान की। दरअसल, सऊदी सुन्नियों का नेता बनता है और ईरान शियाओं का। हूतियों को ईरान का समर्थन मिला, तो यमन सरकार को सऊदी अरब का।
  • 2015 तक हूती विद्रोहियों ने यमन के एक बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया। 2015 में हालात ऐसे हुए कि हूतियों ने पूरी सरकार को निर्वासन में जाने पर मजबूर कर दिया। 2015 में हूती विद्रोही गुट में करीब 30 हजार लड़ाके थे। अब इनकी संख्या करीब 3.5 लाख है।

सवाल-2: सऊदी पर हमला क्यों कर रहे हूती, कितना नुकसान किया? जवाबः हालिया लड़ाई की शुरुआत बीती 5 अगस्त से हुई…

  • हूतियों ने सऊदी के समर्थन वाली यमन सरकार के कैंपों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए। आरोप लगाया कि यहां सऊदी गठबंधन सेना अपना जमावड़ा बढ़ा रही थी।
  • 3 सितंबर को हूतियों ने यमन के लाल सागर तट पर तीन तरफ से हमले शुरू किए। फिर मोखा शहर की घेराबंदी की।
इस वीडियो के आधार पर दावा है कि हूतियों ने सऊदी अरब और PLC की सेना की दर्जनों बख्तरबंद गाड़ियां कब्जा कर ली हैं।

इस वीडियो के आधार पर दावा है कि हूतियों ने सऊदी अरब और PLC की सेना की दर्जनों बख्तरबंद गाड़ियां कब्जा कर ली हैं।

  • हूतियों की बढ़त देखकर सऊदी अरब ने जवाबी हमला शुरू कर दिया। मिसाइल और ड्रोन हमलों में 73 लोग घायल हुए।
  • 10 सितंबर को हूतियों ने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से सिर्फ 80 किमी दूर मोखा बंदरगाह पर कब्जा कर लिया। इसके बाद हूती लड़ाके बाब अल-मंदेब की तरफ बढ़े और समुद्र से लगे धुबाब पोर्ट और लाल सागर के आसपास के हानिश जैसे द्वीप समूहों पर भी कब्जा कर लिया।
  • 11 सितंबर को बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास पेरिम यानी मयून द्वीप पर कब्जा कर लिया गया। यहां कब्जे से हूतियों को इस समुद्री रास्ते के बेहद करीब रणनीतिक ठिकाना मिल गया है। हूतियों का दावा है कि उन्होंने पूरे पश्चिमी तट और बाब अल-मंदेब के इलाके पर कब्जा कर लिया है।

सऊदी अरब ने कहा कि 15-16 सितंबर की रात हूतियों ने पवित्र शहर मक्का को टारगेट करके ड्रोन अटैक किया था। इसे मक्का में घुसने से पहले ही मार गिराया गया। हालांकि हूतियों ने मक्का को निशाना बनाने से इनकार किया।

16 सितंबर को हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सारेया ने कहा, ‘अल्लाह की मदद से यमन की सशस्त्र सेना ने मारिब प्रांत में सऊदी अरब को अमेरिका से मिले F-15 फाइटर जेट को स्वदेशी तौर पर बनाई मिसाइल से मार गिराया है।’

हूतियों ने इसका एक वीडियो भी जारी किया है…

जेट पर मिसाइल का हमला और जेट का जलता हुआ मलबा। हथियारबंद लड़ाके मलबे के पास जश्न मना रहे हैं। जेट के एक हिस्से पर सऊदी अरब का झंडा दिख रहा है।

जेट पर मिसाइल का हमला और जेट का जलता हुआ मलबा। हथियारबंद लड़ाके मलबे के पास जश्न मना रहे हैं। जेट के एक हिस्से पर सऊदी अरब का झंडा दिख रहा है।

सऊदी अरब या अमेरिका ने जेट गिराने के दावे पर अब तक कोई बयान नहीं दिया है।

सवाल-3: अमीर और ताकतवर सऊदी अरब बेबस क्यों नजर आ रहा है? जवाबः इसकी 3 बड़ी वजहें हैं-

1. सऊदी समर्थित फौजों में तालमेल नहीं, हूतियों की मजबूत तैयारी

  • सऊदी समर्थित यमनी फौजें कई अलग-अलग सशस्त्र गुटों में बंटी हैं। इनके अलग-अलग कमांडर हैं और उनके अपने-अपने इरादे और महत्वाकांक्षाएं हैं।
  • 2026 की शुरुआत से सऊदी अरब इन सभी गुटों को एक कमांड के तहत लाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन बरसों पुराना ये बिखराव दूर नहीं हो पाया है।
  • दूसरी तरफ, हूतियों की फौज कई मायनों में बेहतर है। ईरान ने अपनी कुद्ज फोर्स के जरिए हूतियों को ट्रेनिंग, एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, समुद्री हथियार और टेक्नोलॉजी सहित भारी मात्रा में हथियार दिए हैं।
  • अब हूती खुद भी ज्यादा रेंज वाले रॉकेट, बम और मिसाइल्स बनाने लगे हैं।

2. सऊदी में इंटरसेप्टर मिसाइल और एयर डिफेंस की कमी

  • सऊदी अरब ने अब तक हूतियों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले नहीं किए हैं, क्योंकि उसके पास इंटरसेप्टर मिसाइल की कमी हो गई है।
  • सऊदी को मिसाइल्स की सप्लाई करने वाले अमेरिका के पास भी 6 महीने से जारी ईरान जंग के चलते इंटरसेप्टर्स का स्टॉक घट गया है।

3. ईरान जंग में फंसा अमेरिका एक और जंग नहीं चाहता

  • रिपोर्ट्स के मुताबिक, 10 सितंबर को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को फोन करके हूतियों पर हवाई हमले करने को कहा। इसे ट्रम्प ने ठुकरा दिया और सिर्फ इंटेलिजेंस सपोर्ट देने की बात कही।
  • चैथम हाउस के एक्सपर्ट फारिया अल-मुस्लिमी कहते हैं कि भले ही सऊदी अरब मिडिल-ईस्ट में अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोगी हो, लेकिन अमेरिका और हूती दोनों के पास एक-दूसरे के खिलाफ जंग न शुरू करने की मजबूत वजहें हैं।
  • अमेरिकी सेना होर्मुज में फंसी हुई है। वहां अभी तक ईरान का कंट्रोल बना हुआ है। जंग में अब तक अमेरिका के 18 सैनिकों की मौत हुई है और करीब 50 एयरक्राफ्ट और ड्रोन डैमेज हुए हैं। इस जंग में अमेरिकी डिफेंस डिपार्टमेंट के 38 अरब डॉलर खर्च हुए हैं। ट्रम्प नहीं चाहते कि मिडिल ईस्ट में एक और महंगा सैन्य अभियान शुरू हो।

ट्रम्प के इनकार करने के बाद सऊदी ने इजराइल से खुफिया जानकारी और दूसरी सैन्य मदद मांगी, ताकि बाब अल-मंदेब पर हूतियों का कब्जा रोका जा सके, जबकि सऊदी और इजराइल के बीच सीधे राजनयिक संबंध नहीं हैं।

वहीं, पाकिस्तान और तुर्किये, सऊदी के साथ मक्का पैक्ट होने के बावजूद उसे सीधी सैन्य मदद के बजाय हूतियों से बातचीत करवाने में मध्यस्थता करने का प्रस्ताव दे रहे हैं।

सवाल-4: पाकिस्तान, सऊदी अरब की सैन्य मदद क्यों नहीं कर रहा? जवाब: 10 सितंबर को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा, ‘सऊदी पर हूतियों के हमले के खिलाफ मक्का पैक्ट के तहत कोई कार्रवाई करने को लेकर अब तक कोई बातचीत नहीं हुई है। जब वक्त आएगा, तब कदम उठाएंगे।’

पाकिस्तान के इस रुख के पीछे 3 वजहें हैं… 1. साझा सैन्य कमांड का कोई ढांचा नहींः तुर्किये के डिप्लोमैट रहे मुस्तफा एनेस एसेन के मुताबिक, ‘मक्का पैक्ट तब तक सिर्फ प्रतीकात्मक है, जब तक इसका एक जॉइंट सैन्य कमांड स्ट्रक्चर नहीं बनता। तुर्किये और पाकिस्तान, ईरान या भारत से सीधे टकराव में शामिल नहीं होंगे।

2. मध्यस्थ की भूमिका को खतराः पाकिस्तान अमेरिका-ईरान जंग में मध्यस्थता की भूमिका निभा रहा है। उसने ईरान से हूतियों पर लगाम कसने के लिए कहा और सऊदी पर हमलों की निंदा भी की। लेकिन इससे आगे बढ़ा, तो पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली भूमिका खतरे में पड़ सकती है।

3. शिया-सुन्नी की लड़ाई में नहीं उलझना चाहताः पाकिस्तान भले सुन्नी बहुल मुल्क हो, लेकिन शियाओं की भी बड़ी आबादी है। 2015 में सऊदी ने यमन में हूतियों के खिलाफ जंग में मदद मांगी, तो पाकिस्तान ने सैन्य दखल से इनकार कर दिया था। तब के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था, ‘हम किसी सांप्रदायिक जंग का हिस्सा नहीं बनना चाहते, क्योंकि इसकी दरारें पाकिस्तान के अंदर भी नजर आएंगी।’ —–

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