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मूवी रिव्यू – ‘मां बहन’:माधुरी दीक्षित-तृप्ति डिमरी भी नहीं बचा पाईं यह बिखरी हुई डार्क कॉमेडी, हंसी से ज्यादा सिर पकड़ने पर मजबूर करती है

मूवी रिव्यू – ‘मां बहन’:माधुरी दीक्षित-तृप्ति डिमरी भी नहीं बचा पाईं यह बिखरी हुई डार्क कॉमेडी, हंसी से ज्यादा सिर पकड़ने पर मजबूर करती है

डार्क कॉमेडी बनाना आसान नहीं होता। इसमें अपराध भी चाहिए, हास्य भी चाहिए और किरदारों का पागलपन भी। नेटफ्लिक्स की नई फिल्म मां बहन इन तीनों चीजों को एक साथ परोसने की कोशिश तो करती है, लेकिन आखिर तक आते आते यह तय नहीं कर पाती कि इसे कॉमेडी बनना है, थ्रिलर बनना है या पारिवारिक ड्रामा। नतीजा एक ऐसी फिल्म के रूप में सामने आता है जिसमें शोर बहुत है, लेकिन असर बेहद कम। फिल्म की कहानी कहानी रेखा और उसकी दो बेटियों के इर्द गिर्द घूमती है। एक दिन उनके घर की रसोई में एक लाश मिल जाती है और यहीं से शुरू होता है झूठ, छिपाने और बचने का सिलसिला। पड़ोसियों की ताकझांक, परिवार के भीतर की खींचतान और लगातार बढ़ती मुसीबतों के बीच तीनों महिलाएं इस राज को छिपाने की कोशिश करती हैं। सुनने में यह सेटअप दिलचस्प लगता है, लेकिन समस्या यह है कि फिल्म पहले आधे घंटे में जितना वादा करती है, उसके बाद उतना निभा नहीं पाती। फिल्म में एक्टिंग माधुरी दीक्षित पूरी फिल्म में सबसे ज्यादा ईमानदार नजर आती हैं। वह अपने अनुभव से कई कमजोर दृश्यों को संभालने की कोशिश करती हैं, लेकिन कमजोर लेखन उनके हाथ बांध देता है। तृप्ति डिमरी के हिस्से कुछ अच्छे पल आते हैं, मगर उनका किरदार लगातार एक जैसा बना रहता है। रवि किशन अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं, लेकिन उन्हें भी ऐसा कोई दृश्य नहीं मिलता जो लंबे समय तक याद रह सके। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कलाकार मेहनत करते दिखते हैं, लेकिन किरदार कागज पर अधूरे लिखे गए हैं। दर्शक उनसे जुड़ने से पहले ही कहानी अगले मोड़ पर भागने लगती है। फिल्म का निर्देशन सुरेश त्रिवेणी ने पहले तुम्हारी सुलु जैसी संवेदनशील फिल्म दी थी, इसलिए उम्मीदें ज्यादा थीं। यहां उनका निर्देशन कई जगह असमंजस का शिकार लगता है। फिल्म डार्क कॉमेडी बनना चाहती है, लेकिन कई दृश्य इतने बनावटी लगते हैं कि न हंसी आती है और न तनाव महसूस होता है। सबसे बड़ी कमी स्क्रीनप्ले है। कई घटनाएं सिर्फ इसलिए होती हैं क्योंकि कहानी को आगे बढ़ाना है। किरदारों के फैसले स्वाभाविक नहीं लगते। फिल्म में रहस्य का तत्व भी है, लेकिन उसके खुलासे उतने प्रभावशाली नहीं हैं जितने होने चाहिए थे। तकनीकी तौर पर फिल्म ठीक ठाक है। कैमरा वर्क और प्रोडक्शन डिजाइन कहानी के छोटे शहर वाले माहौल को पकड़ते हैं, लेकिन एडिटिंग बार बार लय तोड़ती है। कई दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे और कई महत्वपूर्ण पल अधूरे महसूस होते हैं। फिल्म में संगीत फिल्म का संगीत ऐसा नहीं है जो थिएटर या ओटीटी से बाहर निकलने के बाद याद रह जाए। बैकग्राउंड स्कोर कुछ जगह माहौल बनाने की कोशिश करता है, लेकिन कहानी की कमजोर पकड़ के कारण उसका असर भी सीमित रह जाता है। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट मां बहन एक शानदार विचार पर बनी औसत फिल्म है। लाश, झूठ और अजीबोगरीब परिवार वाला इसका सेटअप दिलचस्प था, लेकिन कमजोर लेखन, अस्थिर टोन और अधूरी कॉमेडी इसे खास बनने से रोक देती है। माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती हैं, लेकिन जब कहानी ही बार बार पटरी से उतरती रहे तो कलाकार भी ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। अगर आप सिर्फ स्टार कास्ट के लिए देखना चाहते हैं तो एक बार मौका दे सकते हैं, लेकिन मजबूत डार्क कॉमेडी की उम्मीद लेकर बैठेंगे तो निराशा हाथ लगेगी।

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डार्क कॉमेडी बनाना आसान नहीं होता। इसमें अपराध भी चाहिए, हास्य भी चाहिए और किरदारों का पागलपन भी। नेटफ्लिक्स की नई फिल्म मां बहन इन तीनों चीजों को एक साथ परोसने की कोशिश तो करती है, लेकिन आखिर तक आते आते यह तय नहीं कर पाती कि इसे कॉमेडी बनना है, थ्रिलर बनना है या पारिवारिक ड्रामा। नतीजा एक ऐसी फिल्म के रूप में सामने आता है जिसमें शोर बहुत है, लेकिन असर बेहद कम। फिल्म की कहानी कहानी रेखा और उसकी दो बेटियों के इर्द गिर्द घूमती है। एक दिन उनके घर की रसोई में एक लाश मिल जाती है और यहीं से शुरू होता है झूठ, छिपाने और बचने का सिलसिला। पड़ोसियों की ताकझांक, परिवार के भीतर की खींचतान और लगातार बढ़ती मुसीबतों के बीच तीनों महिलाएं इस राज को छिपाने की कोशिश करती हैं। सुनने में यह सेटअप दिलचस्प लगता है, लेकिन समस्या यह है कि फिल्म पहले आधे घंटे में जितना वादा करती है, उसके बाद उतना निभा नहीं पाती। फिल्म में एक्टिंग माधुरी दीक्षित पूरी फिल्म में सबसे ज्यादा ईमानदार नजर आती हैं। वह अपने अनुभव से कई कमजोर दृश्यों को संभालने की कोशिश करती हैं, लेकिन कमजोर लेखन उनके हाथ बांध देता है। तृप्ति डिमरी के हिस्से कुछ अच्छे पल आते हैं, मगर उनका किरदार लगातार एक जैसा बना रहता है। रवि किशन अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं, लेकिन उन्हें भी ऐसा कोई दृश्य नहीं मिलता जो लंबे समय तक याद रह सके। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कलाकार मेहनत करते दिखते हैं, लेकिन किरदार कागज पर अधूरे लिखे गए हैं। दर्शक उनसे जुड़ने से पहले ही कहानी अगले मोड़ पर भागने लगती है। फिल्म का निर्देशन सुरेश त्रिवेणी ने पहले तुम्हारी सुलु जैसी संवेदनशील फिल्म दी थी, इसलिए उम्मीदें ज्यादा थीं। यहां उनका निर्देशन कई जगह असमंजस का शिकार लगता है। फिल्म डार्क कॉमेडी बनना चाहती है, लेकिन कई दृश्य इतने बनावटी लगते हैं कि न हंसी आती है और न तनाव महसूस होता है। सबसे बड़ी कमी स्क्रीनप्ले है। कई घटनाएं सिर्फ इसलिए होती हैं क्योंकि कहानी को आगे बढ़ाना है। किरदारों के फैसले स्वाभाविक नहीं लगते। फिल्म में रहस्य का तत्व भी है, लेकिन उसके खुलासे उतने प्रभावशाली नहीं हैं जितने होने चाहिए थे। तकनीकी तौर पर फिल्म ठीक ठाक है। कैमरा वर्क और प्रोडक्शन डिजाइन कहानी के छोटे शहर वाले माहौल को पकड़ते हैं, लेकिन एडिटिंग बार बार लय तोड़ती है। कई दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे और कई महत्वपूर्ण पल अधूरे महसूस होते हैं। फिल्म में संगीत फिल्म का संगीत ऐसा नहीं है जो थिएटर या ओटीटी से बाहर निकलने के बाद याद रह जाए। बैकग्राउंड स्कोर कुछ जगह माहौल बनाने की कोशिश करता है, लेकिन कहानी की कमजोर पकड़ के कारण उसका असर भी सीमित रह जाता है। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट मां बहन एक शानदार विचार पर बनी औसत फिल्म है। लाश, झूठ और अजीबोगरीब परिवार वाला इसका सेटअप दिलचस्प था, लेकिन कमजोर लेखन, अस्थिर टोन और अधूरी कॉमेडी इसे खास बनने से रोक देती है। माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती हैं, लेकिन जब कहानी ही बार बार पटरी से उतरती रहे तो कलाकार भी ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। अगर आप सिर्फ स्टार कास्ट के लिए देखना चाहते हैं तो एक बार मौका दे सकते हैं, लेकिन मजबूत डार्क कॉमेडी की उम्मीद लेकर बैठेंगे तो निराशा हाथ लगेगी।

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