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बिहार का वह डॉन जिसका श्रीप्रकाश शुक्ला बना था ड्राइवर, जरायम की दुनिया में आज भी क्यों होते हैं दोनों के चर्चे? | sriprakash shukla | sri prakash shukla godfather driver | sriprakash shukla surajbhna singh friendship | suraj bhan singh | up police | ghaziabad encounter story

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Sriprakash Shukla Crime Story: 90 के दशक में उत्तर प्रदेश में एक जुमला बड़ा मशहूर था- शाम के बाद घर से मत निकलो, कहीं श्रीप्रकाश शुक्ला की गोली का शिकार न हो जाओ. यह वो दौर था जब यूपी की पुलिस के पास पुरानी थ्री-नॉट-थ्री (303) राइफलें हुआ करती थीं और एक 25 साल का लड़का सड़कों पर 30 गाड़ियों से चलता, जिसमें 25 गाड़ियों में राइफल शीशे से बाहर निकली होती थी. कैसे शिव प्रकाश शुक्ला श्रीप्रकाश शुक्ला बना? श्रीप्रकाश शुक्ला को एके-47 राइफल सबसे पहले किसने थमाई? कैसे गोरखपुर के मामखौर गांव एक साधारण ब्राह्मण परिवार का लड़का जुर्म की दुनिया का पोस्टर बॉय बन गया? उस अधिकारी से समझेंगे, जो श्रीप्रकाश शुक्ला के एनकाउंटर में शामिल था. श्रीप्रकाश शुक्ला वह नाम था, जिसने पहली बार उत्तर प्रदेश पुलिस को अपनी ताकत के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. जानेंगे बिहार के उस डॉन के यहां वाकई में श्रीप्रकाश शुक्ला क्या करता था?

मामखौर गांव के लोगों का कहना है कि श्रीप्रकाश शुक्ला कोई पैदाइशी अपराधी नहीं था. वह एक अखाड़े का पहलवान हुआ करता था, जो पांच-पांच लीटर दूध अकेले पी जाता था. लेकिन 1993 में एक घटना ने उसे अपराधी बना दिया. एक मनचले ने उसकी बहन को देखकर सीटी बजा दी थी. पहलवानी के जोश और खून की गर्मी में श्रीप्रकाश ने उस शख्स को पीट-पीटकर मार डाला. पुलिस से बचने के लिए बिहार भाग गया. जहां उसको बिहार के मोकामा के एक बाहुबली सूरजभान सिंह ने उसे संरक्षण दिया. श्रीप्रकाश शुक्ला सूरजभान सिंह का दाहिना हाथ बन गया. फिर बाद में वह बैंकॉक भाग गया, लेकिन जब लौटा तो वह शिव प्रकाश शुक्ला नहीं, बल्कि जरायम जगत का उभरता हुआ डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला बन चुका था.

बिहार का ठिकाना और सूरजभान सिंह से यारी

एसटीएफ में शामिल एक अधिकारी के मुताबिक, यूपी में पुलिस का दबाव बढ़ा तो श्रीप्रकाश ने बिहार का रुख किया. बिहार उस वक्त बाहुबलियों और गैंगवार का गढ़ था. श्रीप्रकाश शुक्ला की मुलाकात वहां मोकामा के डॉन सूरजभान सिंह से हुई. सूरजभान को एक ऐसे शूटर की तलाश थी जो बिना पलक झपकाए ट्रिगर दबा सके और श्रीप्रकाश को चाहिए था सियासी और बाहुबली संरक्षण.

श्रीप्रकाश शुक्ला का मोकामा और बेगूसराय कनेक्शन

श्रीप्रकाश बिहार के मोकामा और बेगूसराय इलाकों में काफी समय तक रहा. वह सूरजभान सिंह के लिए काम करने लगा. बिहार में रहते हुए उसने रेलवे के ठेकों और कोयले के काले कारोबार में अपनी पैठ बनाई. सूरजभान और श्रीप्रकाश की जोड़ी ने बिहार के अंडरवर्ल्ड में खलबली मचा दी थी. कहा जाता है कि श्रीप्रकाश शुक्ला ही वो शख्स था जिसने बिहार के अपराधियों को एके-47 की ‘लज्जत’ चखाई थी.

बृज बिहारी प्रसाद हत्याकांड

बिहार में श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम की दहशत तब फैली जब उसने 1998 में बिहार के कद्दावर मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या कर दी. बृज बिहारी उस वक्त पटना के आईजीआईएमएस अस्पताल में भर्ती थे और भारी सुरक्षा के बीच टहल रहे थे. श्रीप्रकाश और उसके साथियों ने अस्पताल के परिसर में ही अपनी लाल बत्ती वाली गाड़ी से उतरकर एके-47 से गोलियों की ऐसी बौछार की कि सुरक्षाकर्मी देखते रह गए. इस हत्याकांड ने पूरे देश को हिला दिया था क्योंकि यह पहली बार था जब किसी मंत्री को इतने हाई-प्रोफाइल जोन में घुसकर मारा गया था.

इश्क, मोबाइल फोन और एसटीएफ का जाल

कहते हैं कि अपराधी चाहे कितना भी शातिर हो, कोई न कोई कमजोरी उसे ले डूबती है. श्रीप्रकाश की कमजोरी थी उसका इश्क और फोन. उस दौर में मोबाइल फोन बहुत महंगे होते थे और बहुत कम लोग इसका इस्तेमाल करते थे. श्रीप्रकाश की एक प्रेमिका गाजियाबाद में रहती थी. वह पुलिस से बचने के लिए जगह-जगह ठिकाने बदलता था, लेकिन अपनी प्रेमिका से लंबी बातें करना नहीं छोड़ता था.

एसटीएफ का गठन

इसी दौरान, उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सरकार ने अपराधियों के खात्मे के लिए STF यानी Special Task Force का गठन किया. एसटीएफ के पहले बड़े टारगेट के रूप में श्रीप्रकाश शुक्ला का नाम था. एसटीएफ ने मोबाइल टावर लोकेशन और कॉल इंटरसेप्शन की तकनीक का इस्तेमाल किया. पुलिस को पता चला कि श्रीप्रकाश अपनी प्रेमिका को दिल्ली और गाजियाबाद के नंबरों पर फोन करता है. यही कॉल रिकॉर्ड्स उसकी मौत का वारंट बने.

जब सीएम की ‘सुपारी’ लेकर की बड़ी गलती

श्रीप्रकाश के अंत की शुरुआत तब हुई जब उसने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सुपारी लेने की जुर्रत की. इंटेलिजेंस को खबर मिली कि श्रीप्रकाश ने 6 करोड़ रुपये में सीएम को मारने का ठेका लिया है. यह खबर पुलिस के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी. इसके बाद आदेश साफ था ‘श्रीप्रकाश जिंदा नहीं बचना चाहिए’.

गाजियाबाद में वो आखिरी एनकाउंटर

23 सितंबर 1998 का दिन था. एसटीएफ को पक्की सूचना मिली कि श्रीप्रकाश गाजियाबाद के वसुंधरा इलाके से गुजरने वाला है. पुलिस ने जाल बिछाया. जैसे ही श्रीप्रकाश की नीले रंग की सिएलो कार दिखाई दी, पुलिस ने उसे चारों तरफ से घेर लिया. श्रीप्रकाश ने अपनी आदत के मुताबिक गोलियां चलानी शुरू कर दीं, लेकिन इस बार उसका सामना यूपी के सबसे जांबाज पुलिस अधिकारियों से था. कुछ ही मिनटों की मुठभेड़ के बाद गाजियाबाद की सड़क पर श्रीप्रकाश शुक्ला का लहूलुहान शव पड़ा था.

महज 25 साल की उम्र में जुर्म की ऊंचाइयों को छूने वाले श्रीप्रकाश शुक्ला का अंत हो चुका था. उसके पास से वही विदेशी हथियार और मोबाइल फोन मिले, जो कभी उसकी शान हुआ करते थे. उसकी कहानी आज भी यूपी-बिहार के अपराध जगत में सुनाई जाती है. कहा जाता है कि आज भी सूरजभान सिंह उसके परिवार का ख्याल रखता है. सूरजभान सिंह बाद में बलिया के सांसद बने और हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पत्नी वीणा देवी बाहुबली अनंत सिंह के खिलाफ लड़ी थी. हालांकि वह अनंत सिंह से हार गईं. लेकिन श्रीप्रकाश शुक्ला और सूरजभान सिंह में काफी नजदीकी थी.

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Sriprakash Shukla Crime Story: 90 के दशक में उत्तर प्रदेश में एक जुमला बड़ा मशहूर था- शाम के बाद घर से मत निकलो, कहीं श्रीप्रकाश शुक्ला की गोली का शिकार न हो जाओ. यह वो दौर था जब यूपी की पुलिस के पास पुरानी थ्री-नॉट-थ्री (303) राइफलें हुआ करती थीं और एक 25 साल का लड़का सड़कों पर 30 गाड़ियों से चलता, जिसमें 25 गाड़ियों में राइफल शीशे से बाहर निकली होती थी. कैसे शिव प्रकाश शुक्ला श्रीप्रकाश शुक्ला बना? श्रीप्रकाश शुक्ला को एके-47 राइफल सबसे पहले किसने थमाई? कैसे गोरखपुर के मामखौर गांव एक साधारण ब्राह्मण परिवार का लड़का जुर्म की दुनिया का पोस्टर बॉय बन गया? उस अधिकारी से समझेंगे, जो श्रीप्रकाश शुक्ला के एनकाउंटर में शामिल था. श्रीप्रकाश शुक्ला वह नाम था, जिसने पहली बार उत्तर प्रदेश पुलिस को अपनी ताकत के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. जानेंगे बिहार के उस डॉन के यहां वाकई में श्रीप्रकाश शुक्ला क्या करता था?

मामखौर गांव के लोगों का कहना है कि श्रीप्रकाश शुक्ला कोई पैदाइशी अपराधी नहीं था. वह एक अखाड़े का पहलवान हुआ करता था, जो पांच-पांच लीटर दूध अकेले पी जाता था. लेकिन 1993 में एक घटना ने उसे अपराधी बना दिया. एक मनचले ने उसकी बहन को देखकर सीटी बजा दी थी. पहलवानी के जोश और खून की गर्मी में श्रीप्रकाश ने उस शख्स को पीट-पीटकर मार डाला. पुलिस से बचने के लिए बिहार भाग गया. जहां उसको बिहार के मोकामा के एक बाहुबली सूरजभान सिंह ने उसे संरक्षण दिया. श्रीप्रकाश शुक्ला सूरजभान सिंह का दाहिना हाथ बन गया. फिर बाद में वह बैंकॉक भाग गया, लेकिन जब लौटा तो वह शिव प्रकाश शुक्ला नहीं, बल्कि जरायम जगत का उभरता हुआ डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला बन चुका था.

बिहार का ठिकाना और सूरजभान सिंह से यारी

एसटीएफ में शामिल एक अधिकारी के मुताबिक, यूपी में पुलिस का दबाव बढ़ा तो श्रीप्रकाश ने बिहार का रुख किया. बिहार उस वक्त बाहुबलियों और गैंगवार का गढ़ था. श्रीप्रकाश शुक्ला की मुलाकात वहां मोकामा के डॉन सूरजभान सिंह से हुई. सूरजभान को एक ऐसे शूटर की तलाश थी जो बिना पलक झपकाए ट्रिगर दबा सके और श्रीप्रकाश को चाहिए था सियासी और बाहुबली संरक्षण.

श्रीप्रकाश शुक्ला का मोकामा और बेगूसराय कनेक्शन

श्रीप्रकाश बिहार के मोकामा और बेगूसराय इलाकों में काफी समय तक रहा. वह सूरजभान सिंह के लिए काम करने लगा. बिहार में रहते हुए उसने रेलवे के ठेकों और कोयले के काले कारोबार में अपनी पैठ बनाई. सूरजभान और श्रीप्रकाश की जोड़ी ने बिहार के अंडरवर्ल्ड में खलबली मचा दी थी. कहा जाता है कि श्रीप्रकाश शुक्ला ही वो शख्स था जिसने बिहार के अपराधियों को एके-47 की ‘लज्जत’ चखाई थी.

बृज बिहारी प्रसाद हत्याकांड

बिहार में श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम की दहशत तब फैली जब उसने 1998 में बिहार के कद्दावर मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या कर दी. बृज बिहारी उस वक्त पटना के आईजीआईएमएस अस्पताल में भर्ती थे और भारी सुरक्षा के बीच टहल रहे थे. श्रीप्रकाश और उसके साथियों ने अस्पताल के परिसर में ही अपनी लाल बत्ती वाली गाड़ी से उतरकर एके-47 से गोलियों की ऐसी बौछार की कि सुरक्षाकर्मी देखते रह गए. इस हत्याकांड ने पूरे देश को हिला दिया था क्योंकि यह पहली बार था जब किसी मंत्री को इतने हाई-प्रोफाइल जोन में घुसकर मारा गया था.

इश्क, मोबाइल फोन और एसटीएफ का जाल

कहते हैं कि अपराधी चाहे कितना भी शातिर हो, कोई न कोई कमजोरी उसे ले डूबती है. श्रीप्रकाश की कमजोरी थी उसका इश्क और फोन. उस दौर में मोबाइल फोन बहुत महंगे होते थे और बहुत कम लोग इसका इस्तेमाल करते थे. श्रीप्रकाश की एक प्रेमिका गाजियाबाद में रहती थी. वह पुलिस से बचने के लिए जगह-जगह ठिकाने बदलता था, लेकिन अपनी प्रेमिका से लंबी बातें करना नहीं छोड़ता था.

एसटीएफ का गठन

इसी दौरान, उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सरकार ने अपराधियों के खात्मे के लिए STF यानी Special Task Force का गठन किया. एसटीएफ के पहले बड़े टारगेट के रूप में श्रीप्रकाश शुक्ला का नाम था. एसटीएफ ने मोबाइल टावर लोकेशन और कॉल इंटरसेप्शन की तकनीक का इस्तेमाल किया. पुलिस को पता चला कि श्रीप्रकाश अपनी प्रेमिका को दिल्ली और गाजियाबाद के नंबरों पर फोन करता है. यही कॉल रिकॉर्ड्स उसकी मौत का वारंट बने.

जब सीएम की ‘सुपारी’ लेकर की बड़ी गलती

श्रीप्रकाश के अंत की शुरुआत तब हुई जब उसने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सुपारी लेने की जुर्रत की. इंटेलिजेंस को खबर मिली कि श्रीप्रकाश ने 6 करोड़ रुपये में सीएम को मारने का ठेका लिया है. यह खबर पुलिस के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी. इसके बाद आदेश साफ था ‘श्रीप्रकाश जिंदा नहीं बचना चाहिए’.

गाजियाबाद में वो आखिरी एनकाउंटर

23 सितंबर 1998 का दिन था. एसटीएफ को पक्की सूचना मिली कि श्रीप्रकाश गाजियाबाद के वसुंधरा इलाके से गुजरने वाला है. पुलिस ने जाल बिछाया. जैसे ही श्रीप्रकाश की नीले रंग की सिएलो कार दिखाई दी, पुलिस ने उसे चारों तरफ से घेर लिया. श्रीप्रकाश ने अपनी आदत के मुताबिक गोलियां चलानी शुरू कर दीं, लेकिन इस बार उसका सामना यूपी के सबसे जांबाज पुलिस अधिकारियों से था. कुछ ही मिनटों की मुठभेड़ के बाद गाजियाबाद की सड़क पर श्रीप्रकाश शुक्ला का लहूलुहान शव पड़ा था.

महज 25 साल की उम्र में जुर्म की ऊंचाइयों को छूने वाले श्रीप्रकाश शुक्ला का अंत हो चुका था. उसके पास से वही विदेशी हथियार और मोबाइल फोन मिले, जो कभी उसकी शान हुआ करते थे. उसकी कहानी आज भी यूपी-बिहार के अपराध जगत में सुनाई जाती है. कहा जाता है कि आज भी सूरजभान सिंह उसके परिवार का ख्याल रखता है. सूरजभान सिंह बाद में बलिया के सांसद बने और हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पत्नी वीणा देवी बाहुबली अनंत सिंह के खिलाफ लड़ी थी. हालांकि वह अनंत सिंह से हार गईं. लेकिन श्रीप्रकाश शुक्ला और सूरजभान सिंह में काफी नजदीकी थी.

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