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सतलुज:डायरेक्टर हनी त्रेहान बोले- पंजाब की राजनीति में वर्षों से दबे दर्द की कहानी है ये फिल्म

सतलुज:डायरेक्टर हनी त्रेहान बोले- पंजाब की राजनीति में वर्षों से दबे दर्द की कहानी है ये फिल्म

दिलजीत दोसांझ स्टारर ‘सतलुज’ साढ़े तीन साल के इंतजार के बाद फाइनली जी5 पर आ रही है। इसके निर्देशक हनी त्रेहान ने खास बातचीत में फिल्म के रिलीज तक के संघर्ष और जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी को परदे तक लाने के सफर पर बात की… हनी त्रेहान कहते हैं कि ‘सतलुज’ की सबसे बड़ी चुनौती फिल्म बनाना नहीं, बल्कि उसे दर्शकों तक पहुंचाना रही। शूटिंग से लेकर पोस्ट-प्रोडक्शन तक किसी तरह की बाधा नहीं आई। पंजाब में जहां-जहां शूटिंग हुई, वहां प्रशासन ने पूरा सहयोग दिया, लेकिन फिल्म पूरी होने के बाद थिएट्रिकल रिलीज के लिए सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिला और यहीं से संघर्ष शुरू हो गया। करीब साढ़े तीन साल तक फिल्म रिलीज का इंतजार करती रही।’ सिर्फ एक मैसेज किया, 45 सेकेंड में आया जवाब, फिल्म करने को राजी हुए दिलजीत हनी बताते हैं कि ‘कोविड के दौरान मैंने सिर्फ इतना मैसेज किया था कि दिलजीत आप भारत में हैं या अमेरिका? उसी रात उनकी कैलिफोर्निया की फ्लाइट थी, इसलिए मुझे उम्मीद नहीं थी कि मुलाकात हो पाएगी। कुछ ही सेकेंड में जवाब आया कि समय निकला तो जरूर मिलेंगे। एयरपोर्ट जाते वक्त दिलजीत सीधे मुझसे मिलने पहुंचे। दिलजीत ने एक बार भी पारिश्रमिक या बिजनेस मॉडल के बारे में सवाल नहीं किया। उनकी दिलचस्पी सिर्फ इस बात में थी कि कहानी क्यों कही जा रही है और कितनी ईमानदारी से परदे पर उतारी जाएगी।’ यह उन लोगों की कहानी है, जिन्होंने सच और इंसाफ के लिए जान दांव पर लगा दी हनी कहते हैं कि ‘सतलुज’ का उद्देश्य किसी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन या विरोध करना नहीं है। मेरे लिए यह उन लोगों की कहानी है, जिन्होंने सच और इंसाफ के लिए जान तक दांव पर लगा दी। मैं चाहता हूं कि दर्शक फिल्म को खुले मन से देखें और इसके जरिए पंजाब के उस दौर, जसवंत सिंह के संघर्ष और न्याय की अहमियत पर नए सिरे से सोचें। किसी फिल्म की सबसे बड़ी सफलता बॉक्स ऑफिस नहीं, बल्कि दर्शकों के मन में उठने वाले सवाल भी होते हैं।’ पंजाब में शूटिंग के दौरान कहीं विरोध का सामना नहीं करना पड़ा बकौल हनी…‘सतलुज’ सिर्फ एक क्राइम ड्रामा नहीं, बल्कि पंजाब के उस दर्द की कहानी है, जो लंबे समय तक इतिहास और राजनीति की परतों में दबा रहा। इतनी संवेदनशील कहानी होने के बावजूद पंजाब में शूटिंग के दौरान कहीं विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। पुलिस स्टेशन, सरकारी इमारतों और सार्वजनिक स्थानों पर सभी जरूरी अनुमति के साथ काम हुआ और प्रशासन ने पूरा सहयोग दिया। फिल्म देखने के बाद पंजाब के लोगों ने भी कहा कि पहली बार इस दौर को सनसनी की तरह नहीं, बल्कि संवेदनशीलता के साथ दिखाया गया है। जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे? जन्म : 2 नवंबर 1952, मृत्यु : 6 सितंबर 1995 घर: तरनतारन, पंजाब अमृतसर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक में डायरेक्टर थे। समाजसेवी और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी थे। शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार विंग से जुड़े थे। जसवंत ने 16 जनवरी 1995 को पंजाब पुलिस पर फर्जी एनकाउंटर के आरोप लगाए थे। सितंबर 1995 को जसवंत घर के बाहर से गायब हुए। पुलिस पर अपहरण का आरोप लगा। 1995 में ही जसवंत की हत्या भी कर दी गई थी। 2005 में कोर्ट ने जसवंत सिंह केस में पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह समेत 6 पुलिसकर्मियों को सजा सुनाई थी।

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सतलुज:डायरेक्टर हनी त्रेहान बोले- पंजाब की राजनीति में वर्षों से दबे दर्द की कहानी है ये फिल्म

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दिलजीत दोसांझ स्टारर ‘सतलुज’ साढ़े तीन साल के इंतजार के बाद फाइनली जी5 पर आ रही है। इसके निर्देशक हनी त्रेहान ने खास बातचीत में फिल्म के रिलीज तक के संघर्ष और जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी को परदे तक लाने के सफर पर बात की… हनी त्रेहान कहते हैं कि ‘सतलुज’ की सबसे बड़ी चुनौती फिल्म बनाना नहीं, बल्कि उसे दर्शकों तक पहुंचाना रही। शूटिंग से लेकर पोस्ट-प्रोडक्शन तक किसी तरह की बाधा नहीं आई। पंजाब में जहां-जहां शूटिंग हुई, वहां प्रशासन ने पूरा सहयोग दिया, लेकिन फिल्म पूरी होने के बाद थिएट्रिकल रिलीज के लिए सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिला और यहीं से संघर्ष शुरू हो गया। करीब साढ़े तीन साल तक फिल्म रिलीज का इंतजार करती रही।’ सिर्फ एक मैसेज किया, 45 सेकेंड में आया जवाब, फिल्म करने को राजी हुए दिलजीत हनी बताते हैं कि ‘कोविड के दौरान मैंने सिर्फ इतना मैसेज किया था कि दिलजीत आप भारत में हैं या अमेरिका? उसी रात उनकी कैलिफोर्निया की फ्लाइट थी, इसलिए मुझे उम्मीद नहीं थी कि मुलाकात हो पाएगी। कुछ ही सेकेंड में जवाब आया कि समय निकला तो जरूर मिलेंगे। एयरपोर्ट जाते वक्त दिलजीत सीधे मुझसे मिलने पहुंचे। दिलजीत ने एक बार भी पारिश्रमिक या बिजनेस मॉडल के बारे में सवाल नहीं किया। उनकी दिलचस्पी सिर्फ इस बात में थी कि कहानी क्यों कही जा रही है और कितनी ईमानदारी से परदे पर उतारी जाएगी।’ यह उन लोगों की कहानी है, जिन्होंने सच और इंसाफ के लिए जान दांव पर लगा दी हनी कहते हैं कि ‘सतलुज’ का उद्देश्य किसी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन या विरोध करना नहीं है। मेरे लिए यह उन लोगों की कहानी है, जिन्होंने सच और इंसाफ के लिए जान तक दांव पर लगा दी। मैं चाहता हूं कि दर्शक फिल्म को खुले मन से देखें और इसके जरिए पंजाब के उस दौर, जसवंत सिंह के संघर्ष और न्याय की अहमियत पर नए सिरे से सोचें। किसी फिल्म की सबसे बड़ी सफलता बॉक्स ऑफिस नहीं, बल्कि दर्शकों के मन में उठने वाले सवाल भी होते हैं।’ पंजाब में शूटिंग के दौरान कहीं विरोध का सामना नहीं करना पड़ा बकौल हनी…‘सतलुज’ सिर्फ एक क्राइम ड्रामा नहीं, बल्कि पंजाब के उस दर्द की कहानी है, जो लंबे समय तक इतिहास और राजनीति की परतों में दबा रहा। इतनी संवेदनशील कहानी होने के बावजूद पंजाब में शूटिंग के दौरान कहीं विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। पुलिस स्टेशन, सरकारी इमारतों और सार्वजनिक स्थानों पर सभी जरूरी अनुमति के साथ काम हुआ और प्रशासन ने पूरा सहयोग दिया। फिल्म देखने के बाद पंजाब के लोगों ने भी कहा कि पहली बार इस दौर को सनसनी की तरह नहीं, बल्कि संवेदनशीलता के साथ दिखाया गया है। जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे? जन्म : 2 नवंबर 1952, मृत्यु : 6 सितंबर 1995 घर: तरनतारन, पंजाब अमृतसर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक में डायरेक्टर थे। समाजसेवी और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी थे। शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार विंग से जुड़े थे। जसवंत ने 16 जनवरी 1995 को पंजाब पुलिस पर फर्जी एनकाउंटर के आरोप लगाए थे। सितंबर 1995 को जसवंत घर के बाहर से गायब हुए। पुलिस पर अपहरण का आरोप लगा। 1995 में ही जसवंत की हत्या भी कर दी गई थी। 2005 में कोर्ट ने जसवंत सिंह केस में पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह समेत 6 पुलिसकर्मियों को सजा सुनाई थी।

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