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मूवी रिव्यू: इक्का:सनी देओल ने पूरी जान लगा दी, लेकिन 'ढाई किलो का हाथ' भी कमजोर स्क्रिप्ट के आगे बेबस नजर आता है

मूवी रिव्यू: इक्का:सनी देओल ने पूरी जान लगा दी, लेकिन 'ढाई किलो का हाथ' भी कमजोर स्क्रिप्ट के आगे बेबस नजर आता है

कोर्टरूम ड्रामा हमेशा से दर्शकों की पसंद रहे हैं। सनी देओल और अक्षय खन्ना जैसे दमदार कलाकारों की मौजूदगी से ‘इक्का’ से उम्मीद बढ़ती है। फिल्म शुरुआत में बांधे रखती है, लेकिन आगे बढ़ते-बढ़ते अपनी ही उलझनों में फंस जाती है। आखिर तक यह कोर्टरूम ड्रामा से ज्यादा मेलोड्रामा बन जाती है। सिनेमाघरों की बजाय सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई इस फिल्म की लंबाई 2 घंटे 20 मिनट है। दैनिक भास्कर ने फिल्म को 5 में से 2 स्टार दिए हैं। फिल्म की कहानी कैसी है? अर्जुन मेहरा (सनी देओल) ऐसे वकील हैं, जिन्होंने अपने करियर में कभी ऐसे शख्स का केस नहीं लड़ा, जिसे वह गलत मानते हों। लेकिन हालात उन्हें शौर्यमान (अक्षय खन्ना) का बचाव करने के लिए मजबूर कर देते हैं। शौर्यमान पर एक युवती पर जानलेवा हमला करने का आरोप है। यहीं से कहानी कानून, नैतिकता और इंसाफ के बीच की लड़ाई दिखाने की कोशिश करती है। शुरुआत दिलचस्प है और कई सवाल खड़े करती है। लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म बार-बार नए ट्विस्ट और खुलासों का सहारा लेती है। कई मोड़ कहानी से ज्यादा पटकथा की मजबूरी लगते हैं। क्लाइमैक्स तक फिल्म जरूरत से ज्यादा समझाने लगती है और यहीं इसका असर कमजोर पड़ जाता है। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? ‘इक्का’ देखने की सबसे बड़ी वजह सनी देओल हैं। लंबे समय बाद उन्हें सिर्फ गुस्से वाले हीरो नहीं, बल्कि भीतर से उलझे किरदार में देखा जाता है। कोर्टरूम में उनके कई सीन प्रभाव छोड़ते हैं और साफ दिखता है कि उन्होंने किरदार पर मेहनत की है। अक्षय खन्ना अपने खास अंदाज में नजर आते हैं। उनकी बॉडी लैंग्वेज और संवाद अदायगी किरदार को मजबूत बनाती है, लेकिन कई जगह उनका प्रदर्शन एक जैसा लगता है। तिलोत्तमा शोम संयमित अभिनय करती हैं और कई दृश्यों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराती हैं। दिया मिर्जा और संजीदा शेख के हिस्से सीमित दृश्य हैं, इसलिए वे ज्यादा असर नहीं छोड़ पातीं। निर्देशन और तकनीकी पक्ष कैसा है? सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा के पास अच्छा विषय था, लेकिन उसे परदे पर उतारते समय वह संतुलन नहीं बना पाए। कोर्टरूम की बहसें असर छोड़ सकती थीं, लेकिन जरूरत से ज्यादा बैकग्राउंड म्यूजिक, लंबे संवाद और भावनात्मक दृश्यों ने उनका प्रभाव कम कर दिया। सबसे ज्यादा निराश फिल्म की पटकथा करती है। हर थोड़ी देर में नया गवाह, नया सबूत और नया खुलासा आता है। कुछ समय बाद ये ट्विस्ट चौंकाने के बजाय थकाने लगते हैं। फिल्म लंबी महसूस होती है और कई दृश्य आसानी से छोटे किए जा सकते थे। म्यूजिक कैसा है? फिल्म का संगीत कहानी के साथ ज्यादा देर तक नहीं चलता। बैकग्राउंड स्कोर कई जगह जरूरत से ज्यादा ऊंचा है। कोर्टरूम सीन्स में सिर्फ कलाकारों की परफॉर्मेंस पर भरोसा किया जाता, तो असर ज्यादा होता। कहां रह गई कमी? ‘इक्का’ की सबसे बड़ी दिक्कत इसकी कहानी नहीं, बल्कि उसे कहने का तरीका है। फिल्म दर्शकों पर भरोसा करने के बजाय हर बात समझाने लगती है। हर भावनात्मक पल को ज्यादा भावुक और हर ट्विस्ट को जरूरत से ज्यादा खींचा गया है। नतीजा यह होता है कि जिस कहानी में कानून और इंसाफ की गहरी बहस हो सकती थी, वह धीरे-धीरे मेलोड्रामा में बदल जाती है। फाइनल वर्डिक्ट, देखें या नहीं? ‘इक्का’ में दमदार कलाकार हैं, अच्छा विषय है और कुछ कोर्टरूम सीन्स प्रभाव छोड़ते हैं। लेकिन कमजोर पटकथा, जरूरत से ज्यादा मेलोड्रामा और लंबा क्लाइमैक्स फिल्म को उस मुकाम तक नहीं पहुंचने देते, जहां यह पहुंच सकती थी। सनी देओल पूरी ईमानदारी से फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन इस बार उनका ‘ढाई किलो का हाथ’ भी कमजोर स्क्रिप्ट के आगे बेबस नजर आता है।

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