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ट्रम्प की सख्ती से भारतीय छात्रों का अमेरिका जाना कम:65 साल में पहली बार अप्रवासियों की संख्या घटी; पाकिस्तान-बांग्लादेश के छात्रों को ज्यादा वीजा

ट्रम्प की सख्ती से भारतीय छात्रों का अमेरिका जाना कम:65 साल में पहली बार अप्रवासियों की संख्या घटी; पाकिस्तान-बांग्लादेश के छात्रों को ज्यादा वीजा

अमेरिका में ट्रम्प सरकार की सख्त इमिग्रेशन पॉलिसी का सबसे बड़ा असर भारतीय छात्रों पर दिख रहा है। 2025 में भारतीय छात्रों को मिलने वाले F-1 स्टूडेंट वीजा में बड़ी गिरावट आई है। वहीं, पाकिस्तान, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के छात्रों को पहले के मुकाबले ज्यादा स्टूडेंट वीजा मिले हैं। सिर्फ छात्रों पर ही नहीं, सख्ती का असर अमेरिका में रहने वाले अप्रवासियों की संख्या पर भी दिखा है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2025 में अमेरिका में अप्रवासियों की संख्या रिकॉर्ड 5.33 करोड़ थी, जो जून तक घटकर 5.19 करोड़ रह गई। 1960 के दशक के बाद यह पहली बार है, जब अमेरिका में अप्रवासियों की संख्या कम हुई है। भारतीय स्टूडेंट्स को मिलने वाले अमेरिकी वीजा 62% घटे सेंटर फॉर इमिग्रेशन स्टडीज (CIS) के मुताबिक, मई से अगस्त के बीच 2025 में भारतीय छात्रों को सिर्फ 22,149 F-1 स्टूडेंट वीजा मिले। पिछले साल इसी समय में यह संख्या 58,694 थी। यानी एक साल में भारतीय छात्रों के वीजा 62% घट गए। चीनी छात्रों के वीजा में भी कमी आई। 2025 में मई से अगस्त के बीच चीन के 40,034 छात्रों को F-1 वीजा मिला, जबकि 2024 में इसी समय में यह संख्या 61,075 थी। जहां भारत और चीन के छात्रों को कम F-1 वीजा मिले, वहीं कई दूसरे एशियाई देशों के छात्रों की संख्या बढ़ी है। वित्त वर्ष 2025 की पहली छमाही में वियतनाम के छात्रों को 5,324 F-1 वीजा मिले, जो पिछले साल से 19.6% ज्यादा हैं। इसी दौरान बांग्लादेश के छात्रों को 2,098 F-1 वीजा मिले, यानी 20.1% की बढ़ोतरी हुई। पाकिस्तान के छात्रों को 1,928 वीजा मिले, जो 44.3% ज्यादा हैं। ट्रम्प सरकार ने वीजा आवेदकों की सोशल मीडिया स्क्रीनिंग की वीजा में आई इस गिरावट की एक बड़ी वजह ट्रम्प सरकार के नए नियम रहे। जैसे- अमेरिका की जगह यूरोप का रुख कर रहे हैं भारतीय छात्र कई भारतीय छात्र अब यूरोप का रुख कर रहे हैं। जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड, इटली और नीदरलैंड जैसे देश भारतीय छात्रों की नई पसंद बन रहे हैं। इसकी वजह कम फीस, आसान वीजा प्रक्रिया और पढ़ाई के बाद नौकरी के बेहतर मौके हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, यूरोप की कई यूनिवर्सिटीज की फीस अमेरिकी यूनिवर्सिटीज से 50% से 80% तक कम होती है। 2015 से 2023 के बीच यूरोप जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 45% बढ़ी, जबकि जर्मनी, फ्रांस, इटली और आयरलैंड में भारतीय छात्रों का दाखिला 68% बढ़ा। वहीं, कुछ भारतीय प्रोफेशनल भी वीजा नियमों और नौकरी को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत लौटने या दूसरे देशों का रुख करने लगे हैं। H-1B वीजा में अब भी भारत सबसे आगे स्टूडेंट वीजा में गिरावट के बावजूद नौकरी के लिए मिलने वाले H-1B वर्क वीजा में भारत की पकड़ अब भी सबसे मजबूत है। 2024 में जारी H-1B वीजा में 71% भारतीयों को मिले। चीन दूसरे स्थान पर रहा, जबकि फिलीपींस, कनाडा और साउथ कोरिया की हिस्सेदारी करीब 1-1% रही। यानी, स्टूडेंट वीजा घटे हैं, लेकिन नौकरी के लिए भारतीय प्रोफेशनल्स की मांग अब भी सबसे ज्यादा है। अमेरिका अब भी सबसे बड़ा प्रवासी देश सख्त नियमों और वीजा में गिरावट के बावजूद अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी देश बना हुआ है। बेहतर शिक्षा, नौकरी और कमाई के मौके आज भी लाखों लोगों को अमेरिका की ओर आकर्षित करते हैं। 2023 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में सबसे ज्यादा 1.1 करोड़ प्रवासी मेक्सिको से हैं। इसके बाद भारत (32 लाख), चीन (30 लाख), फिलीपींस (21 लाख) और क्यूबा (17 लाख) का स्थान है। प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक, अमेरिका में रहने वाले कुल प्रवासियों में 52% लैटिन अमेरिका और 27% एशिया से हैं। यानी, अमेरिका की प्रवासी आबादी में एशियाई देशों की बड़ी हिस्सेदारी है। ऐसे में वीजा नियमों में होने वाले बदलाव का असर भारत, चीन और दूसरे एशियाई देशों पर सबसे ज्यादा पड़ता है। अमेरिका में विदेशी टूरिस्टों की भी संख्या घटी अमेरिका आने वाले विदेशी टूरिस्टों की संख्या भी घटी है। 2025 में करीब 6.83 करोड़ विदेशी टूरिस्ट अमेरिका पहुंचे, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 7.23 करोड़ था। टूरिस्टों के खर्च में भी 8 अरब डॉलर से ज्यादा की कमी आई। सबसे ज्यादा गिरावट कनाडा से आने वाले टूरिस्टों में रही। भारत, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और चीन से आने वाले टूरिस्टों की संख्या भी कम हुई, जबकि मेक्सिको से आने वाले टूरिस्ट बढ़े। यानी, ट्रम्प सरकार की सख्ती का असर सिर्फ स्टूडेंट वीजा ही नहीं, बल्कि इमिग्रेशन और विदेशी टूरिज्म पर भी साफ दिख रहा है।

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ट्रम्प की सख्ती से भारतीय छात्रों का अमेरिका जाना कम:65 साल में पहली बार अप्रवासियों की संख्या घटी; पाकिस्तान-बांग्लादेश के छात्रों को ज्यादा वीजा

अमेरिका में ट्रम्प सरकार की सख्त इमिग्रेशन पॉलिसी का सबसे बड़ा असर भारतीय छात्रों पर दिख रहा है। 2025 में भारतीय छात्रों को मिलने वाले F-1 स्टूडेंट वीजा में बड़ी गिरावट आई है। वहीं, पाकिस्तान, बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों के छात्रों को पहले के मुकाबले ज्यादा स्टूडेंट वीजा मिले हैं। सिर्फ छात्रों पर ही नहीं, सख्ती का असर अमेरिका में रहने वाले अप्रवासियों की संख्या पर भी दिखा है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी 2025 में अमेरिका में अप्रवासियों की संख्या रिकॉर्ड 5.33 करोड़ थी, जो जून तक घटकर 5.19 करोड़ रह गई। 1960 के दशक के बाद यह पहली बार है, जब अमेरिका में अप्रवासियों की संख्या कम हुई है। भारतीय स्टूडेंट्स को मिलने वाले अमेरिकी वीजा 62% घटे सेंटर फॉर इमिग्रेशन स्टडीज (CIS) के मुताबिक, मई से अगस्त के बीच 2025 में भारतीय छात्रों को सिर्फ 22,149 F-1 स्टूडेंट वीजा मिले। पिछले साल इसी समय में यह संख्या 58,694 थी। यानी एक साल में भारतीय छात्रों के वीजा 62% घट गए। चीनी छात्रों के वीजा में भी कमी आई। 2025 में मई से अगस्त के बीच चीन के 40,034 छात्रों को F-1 वीजा मिला, जबकि 2024 में इसी समय में यह संख्या 61,075 थी। जहां भारत और चीन के छात्रों को कम F-1 वीजा मिले, वहीं कई दूसरे एशियाई देशों के छात्रों की संख्या बढ़ी है। वित्त वर्ष 2025 की पहली छमाही में वियतनाम के छात्रों को 5,324 F-1 वीजा मिले, जो पिछले साल से 19.6% ज्यादा हैं। इसी दौरान बांग्लादेश के छात्रों को 2,098 F-1 वीजा मिले, यानी 20.1% की बढ़ोतरी हुई। पाकिस्तान के छात्रों को 1,928 वीजा मिले, जो 44.3% ज्यादा हैं। ट्रम्प सरकार ने वीजा आवेदकों की सोशल मीडिया स्क्रीनिंग की वीजा में आई इस गिरावट की एक बड़ी वजह ट्रम्प सरकार के नए नियम रहे। जैसे- अमेरिका की जगह यूरोप का रुख कर रहे हैं भारतीय छात्र कई भारतीय छात्र अब यूरोप का रुख कर रहे हैं। जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड, इटली और नीदरलैंड जैसे देश भारतीय छात्रों की नई पसंद बन रहे हैं। इसकी वजह कम फीस, आसान वीजा प्रक्रिया और पढ़ाई के बाद नौकरी के बेहतर मौके हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, यूरोप की कई यूनिवर्सिटीज की फीस अमेरिकी यूनिवर्सिटीज से 50% से 80% तक कम होती है। 2015 से 2023 के बीच यूरोप जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 45% बढ़ी, जबकि जर्मनी, फ्रांस, इटली और आयरलैंड में भारतीय छात्रों का दाखिला 68% बढ़ा। वहीं, कुछ भारतीय प्रोफेशनल भी वीजा नियमों और नौकरी को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत लौटने या दूसरे देशों का रुख करने लगे हैं। H-1B वीजा में अब भी भारत सबसे आगे स्टूडेंट वीजा में गिरावट के बावजूद नौकरी के लिए मिलने वाले H-1B वर्क वीजा में भारत की पकड़ अब भी सबसे मजबूत है। 2024 में जारी H-1B वीजा में 71% भारतीयों को मिले। चीन दूसरे स्थान पर रहा, जबकि फिलीपींस, कनाडा और साउथ कोरिया की हिस्सेदारी करीब 1-1% रही। यानी, स्टूडेंट वीजा घटे हैं, लेकिन नौकरी के लिए भारतीय प्रोफेशनल्स की मांग अब भी सबसे ज्यादा है। अमेरिका अब भी सबसे बड़ा प्रवासी देश सख्त नियमों और वीजा में गिरावट के बावजूद अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी देश बना हुआ है। बेहतर शिक्षा, नौकरी और कमाई के मौके आज भी लाखों लोगों को अमेरिका की ओर आकर्षित करते हैं। 2023 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में सबसे ज्यादा 1.1 करोड़ प्रवासी मेक्सिको से हैं। इसके बाद भारत (32 लाख), चीन (30 लाख), फिलीपींस (21 लाख) और क्यूबा (17 लाख) का स्थान है। प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक, अमेरिका में रहने वाले कुल प्रवासियों में 52% लैटिन अमेरिका और 27% एशिया से हैं। यानी, अमेरिका की प्रवासी आबादी में एशियाई देशों की बड़ी हिस्सेदारी है। ऐसे में वीजा नियमों में होने वाले बदलाव का असर भारत, चीन और दूसरे एशियाई देशों पर सबसे ज्यादा पड़ता है। अमेरिका में विदेशी टूरिस्टों की भी संख्या घटी अमेरिका आने वाले विदेशी टूरिस्टों की संख्या भी घटी है। 2025 में करीब 6.83 करोड़ विदेशी टूरिस्ट अमेरिका पहुंचे, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 7.23 करोड़ था। टूरिस्टों के खर्च में भी 8 अरब डॉलर से ज्यादा की कमी आई। सबसे ज्यादा गिरावट कनाडा से आने वाले टूरिस्टों में रही। भारत, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और चीन से आने वाले टूरिस्टों की संख्या भी कम हुई, जबकि मेक्सिको से आने वाले टूरिस्ट बढ़े। यानी, ट्रम्प सरकार की सख्ती का असर सिर्फ स्टूडेंट वीजा ही नहीं, बल्कि इमिग्रेशन और विदेशी टूरिज्म पर भी साफ दिख रहा है।

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