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सूरज बड़जात्या बोले- अच्छी कहानी अपनी जगह बना लेती है:एक्शन के शोर के बीच ‘संगमरमर’ में पारिवारिक मूल्यों और लंबे प्रेम सफर की कहानी

सूरज बड़जात्या बोले- अच्छी कहानी अपनी जगह बना लेती है:एक्शन के शोर के बीच ‘संगमरमर’ में पारिवारिक मूल्यों और लंबे प्रेम सफर की कहानी

सूरज बड़जात्या एक बार फिर प्रेम और पारिवारिक मूल्यों की अपनी विशिष्ट दुनिया के साथ दर्शकों के सामने हैं। अपने नए शो ‘संगमरमर’ के जरिए वह बदलते समय में रिश्तों की गहराई और भावनाओं की निरंतरता को नए अंदाज में प्रस्तुत कर रहे हैं। 25 वर्षों में फैली यह प्रेम यात्रा सिर्फ दो लोगों की कहानी नहीं, बल्कि उन संवेदनाओं का विस्तार है जो पीढ़ियों को जोड़ती हैं। जियो स्टूडियोज के सहयोग से बनी यह श्रृंखला टेलीविजन और ओटीटी के बीच एक सेतु बनाने की कोशिश भी है, जहां पारिवारिक दर्शक और नई पीढ़ी एक साथ जुड़ सकें। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में सूरज बड़जात्या ने प्रेम की बदलती परिभाषाओं पर खुलकर अपनी बात रखी। उनका मानना है कि दौर चाहे कोई भी हो, हर इंसान के भीतर सच्चे प्रेम और सम्मान की चाह समान रहती है। एक्शन और शोर-शराबे के बीच भी भावनात्मक कहानियों की अपनी जगह होती है,बशर्ते उनमें सच्चाई और विश्वास हो। बड़जात्या का विश्वास है कि अच्छी कहानी अंततः अपना रास्ता खुद बना लेती है और परिवार संग देखे जाने वाली फिल्मों की मांग आज भी कायम है। पेश है सूरज बड़जात्या से हुई बातचीत के कुछ प्रमुख अंश.. सवाल: ‘संगमरमर’ आपके लिए कितनी खास है? इसमें आपका क्या जुड़ाव है? जवाब: ‘संगमरमर’ मेरे बहुत करीब है, क्योंकि यह मेरे पिता की पसंदीदा कहानियों में से एक रही है। मैं जियो स्टूडियोज का आभारी हूं कि वे हमारे पास आए और उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा प्रोजेक्ट बनाना है जो टेलीविजन और ओटीटी के बीच सेतु का काम करे। ऐसा कंटेंट जो दोनों माध्यमों पर समान रूप से चले और लोगों को जोड़ सके। इसके बाद हम सब बैठे, लेखिका रजनीता शर्मा जी जुड़ीं और करीब आठ-नौ महीनों तक इस कहानी को गढ़ते रहे। यह अमृता और आदित्य की 25 वर्षों की प्रेम-यात्रा है, जो 1998 में आगरा की गलियों से शुरू होती है। अंताक्षरी के बहाने मुलाकात, फिर परिस्थितियों के कारण शादी न हो पाना, और उसके बाद भी साथ निभाते हुए 25 सालों का सफर। इस यात्रा में जन्म है, मृत्यु है, खुशियां हैं, रक्तचाप की परेशानियां हैं, चिंता के दौरे हैं, सब कुछ है। यह एक परतदार प्रेम कहानी है। ‘संगमरमर’ उस रिश्ते की पवित्रता का प्रतीक है, जो समय के साथ फीका नहीं पड़ता। सवाल : आज के दौर में प्रेम की परिभाषा बदल रही है। ऐसे समय में ‘संगमरमर’ कितनी प्रासंगिक है? जवाब: मेरा मानना है कि हर व्यक्ति के भीतर यह इच्छा होती है कि कोई उसे सच्चा प्रेम करे, सम्मान दे और जिसके साथ वह अपने मन की बातें बांट सके। यह आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होती। हम सब सपने देखते हैं। अगर प्रेम के सपने खत्म हो जाएं, तो न ‘सैयारा’ चलेगी, न ‘मैंने प्यार किया’, न ‘हम आपके हैं कौन’। लोग बार-बार इन फिल्मों को इसलिए देखते हैं क्योंकि वे प्रेम का सपना दिखाती हैं। आज समाज में अविश्वास और तनाव अधिक है, इसलिए लोग अपने चारों ओर एक सुरक्षा-घेरा बना लेते हैं। यह स्वाभाविक है, लेकिन मूल भावना वही है,प्रेम और भरोसा। ऐसी कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि भरोसा करना जरूरी है और प्रेम अब भी प्रासंगिक है। सवाल : आपकी सादगी और मासूमियत आज भी बरकरार है। आप बाहरी शोर से खुद को कैसे अलग रखते हैं? जवाब: यह उम्र के साथ अपने आप होता है। समय सिखा देता है कि अंत में वही चीजें मायने रखती हैं जो सच्ची हैं, बाकी सब अहंकार है। मैं चाहता हूं कि जितना समय है, उसमें और कहानियां बनाऊं, ताकि लोग समझ सकें कि जीवन में रिश्ते ही सबसे महत्वपूर्ण हैं। पति-पत्नी महीनों बात नहीं करते, लेकिन कोई परामर्शदाता आकर समस्या हल नहीं करेगा। उन्हें स्वयं ही पहल करनी होगी। अगर आपने इस दुनिया में एक बच्चे को जन्म दिया है, तो आपको लड़ने का अधिकार नहीं है। जिम्मेदारी और समझदारी जरूरी है। सवाल: आज जब एक्शन और बड़े पैमाने की फिल्में चल रही हैं, तब ‘संगमरमर’ जैसी भावनात्मक कहानी लाना क्या जोखिम नहीं है? जवाब: अच्छी कहानी अपनी जगह खुद बना लेती है। हर एक्शन फिल्म सफल नहीं होती और हर दक्षिण भारतीय फिल्म भी नहीं चलती। जो अच्छी होती है, वही दर्शकों तक पहुंचती है। मुझे एक प्रसंग याद है. अभिनेता डैनी साहब को बी. आर. चोपड़ा जी ने एक फिल्म में छोटा-सा दृश्य दिया था। उन्होंने कहा था कि एक दृश्य काफी है। वही दृश्य उन्हें पहचान दिलाने वाला बना। इसलिए अपनी छाप छोड़ने के लिए एक सशक्त क्षण ही पर्याप्त होता है। मेरी फिल्मों ‘मैंने प्यार किया’, ‘हम आपके हैं कौन’, ‘हम साथ-साथ हैं’, ‘विवाह’ को शुरुआत में व्यापारिक दृष्टि से संदेह मिला, लेकिन समय के साथ वे दर्शकों के दिलों में बस गईं। यदि आज भी लोग रविवार को परिवार के साथ तीन-तीन घंटे की फिल्म देखते हैं, तो इसका अर्थ है कि ऐसी कहानियों की मांग अब भी है। सवाल : ओटीटी मंच पर पारिवारिक और महिला-केन्द्रित विषय लाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा? जवाब:यह एक संघर्ष है, क्योंकि अक्सर माना जाता है कि पुरुष-केन्द्रित विषय ही अधिक चलते हैं। लेकिन जियो और जियो हॉटस्टार ने पूरा विश्वास दिखाया। उन्होंने कहा कि आप वही बनाइए जो बनाना चाहते हैं। हमने कभी यह सोचकर काम नहीं किया कि कितने दर्शक मिलेंगे या कितनी संख्या आएगी। जब संख्या का विचार हावी हो जाता है, तो ईमान डगमगा जाता है। ‘संगमरमर’ पूरी तरह विश्वास और निष्ठा से बनाई गई है। सवाल : आपकी कहानी कहने में संगीत का विशेष स्थान रहा है। ‘संगमरमर’ का संगीत कितना अलग होगा? जवाब: इस बार हमें पूरी स्वतंत्रता मिली। यह सोचकर कोई बंधन नहीं था कि किस क्षेत्र को पसंद आएगा या कौन-सी आवाज युवाओं को आकर्षित करेगी। हमने सीधे जड़ों से जुड़कर काम किया है। एक ओढ़नी का गीत है, जिसे हर्षदीप ने गाया है, वह पूरी तरह लोक-सुगंध से भरा है। होली का गीत है, जिसमें उत्तर भारत की असली होली का रंग और भाषा है। इसमें ‘नदिया के पार’ जैसी सादगी और मिट्टी की खुशबू है। यह प्रेम, रंग और संस्कृति का संपूर्ण मिश्रण है,एक विशुद्ध राजश्री की प्रस्तुति। सवाल: आपके जो चाहने वाले हैं आपकी फिल्मों का वो बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, उनको क्या कहना चाहोगे आप? जवाब: मैं बस इतना कहना चाहूंगा कि पहले ‘संगमरमर’ देखिए, फिर मेरी फिल्म भी आने वाली है, उसके लिए समय है। सबसे बड़ी बात यह है कि यदि कोई युवा अपने दादा-दादी को यह कहानी दिखाए और कहे कि देखिए ऐसी भी एक दुनिया है, तो वही हमारे लिए पर्याप्त है।

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इसमें आपका क्या जुड़ाव है? जवाब: ‘संगमरमर’ मेरे बहुत करीब है, क्योंकि यह मेरे पिता की पसंदीदा कहानियों में से एक रही है। मैं जियो स्टूडियोज का आभारी हूं कि वे हमारे पास आए और उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा प्रोजेक्ट बनाना है जो टेलीविजन और ओटीटी के बीच सेतु का काम करे। ऐसा कंटेंट जो दोनों माध्यमों पर समान रूप से चले और लोगों को जोड़ सके। इसके बाद हम सब बैठे, लेखिका रजनीता शर्मा जी जुड़ीं और करीब आठ-नौ महीनों तक इस कहानी को गढ़ते रहे। यह अमृता और आदित्य की 25 वर्षों की प्रेम-यात्रा है, जो 1998 में आगरा की गलियों से शुरू होती है। अंताक्षरी के बहाने मुलाकात, फिर परिस्थितियों के कारण शादी न हो पाना, और उसके बाद भी साथ निभाते हुए 25 सालों का सफर। इस यात्रा में जन्म है, मृत्यु है, खुशियां हैं, रक्तचाप की परेशानियां हैं, चिंता के दौरे हैं, सब कुछ है। यह एक परतदार प्रेम कहानी है। ‘संगमरमर’ उस रिश्ते की पवित्रता का प्रतीक है, जो समय के साथ फीका नहीं पड़ता। सवाल : आज के दौर में प्रेम की परिभाषा बदल रही है। ऐसे समय में ‘संगमरमर’ कितनी प्रासंगिक है? जवाब: मेरा मानना है कि हर व्यक्ति के भीतर यह इच्छा होती है कि कोई उसे सच्चा प्रेम करे, सम्मान दे और जिसके साथ वह अपने मन की बातें बांट सके। यह आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होती। हम सब सपने देखते हैं। अगर प्रेम के सपने खत्म हो जाएं, तो न ‘सैयारा’ चलेगी, न ‘मैंने प्यार किया’, न ‘हम आपके हैं कौन’। लोग बार-बार इन फिल्मों को इसलिए देखते हैं क्योंकि वे प्रेम का सपना दिखाती हैं। आज समाज में अविश्वास और तनाव अधिक है, इसलिए लोग अपने चारों ओर एक सुरक्षा-घेरा बना लेते हैं। यह स्वाभाविक है, लेकिन मूल भावना वही है,प्रेम और भरोसा। ऐसी कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि भरोसा करना जरूरी है और प्रेम अब भी प्रासंगिक है। सवाल : आपकी सादगी और मासूमियत आज भी बरकरार है। आप बाहरी शोर से खुद को कैसे अलग रखते हैं? जवाब: यह उम्र के साथ अपने आप होता है। समय सिखा देता है कि अंत में वही चीजें मायने रखती हैं जो सच्ची हैं, बाकी सब अहंकार है। मैं चाहता हूं कि जितना समय है, उसमें और कहानियां बनाऊं, ताकि लोग समझ सकें कि जीवन में रिश्ते ही सबसे महत्वपूर्ण हैं। पति-पत्नी महीनों बात नहीं करते, लेकिन कोई परामर्शदाता आकर समस्या हल नहीं करेगा। उन्हें स्वयं ही पहल करनी होगी। अगर आपने इस दुनिया में एक बच्चे को जन्म दिया है, तो आपको लड़ने का अधिकार नहीं है। जिम्मेदारी और समझदारी जरूरी है। सवाल: आज जब एक्शन और बड़े पैमाने की फिल्में चल रही हैं, तब ‘संगमरमर’ जैसी भावनात्मक कहानी लाना क्या जोखिम नहीं है? जवाब: अच्छी कहानी अपनी जगह खुद बना लेती है। हर एक्शन फिल्म सफल नहीं होती और हर दक्षिण भारतीय फिल्म भी नहीं चलती। जो अच्छी होती है, वही दर्शकों तक पहुंचती है। मुझे एक प्रसंग याद है. अभिनेता डैनी साहब को बी. आर. चोपड़ा जी ने एक फिल्म में छोटा-सा दृश्य दिया था। उन्होंने कहा था कि एक दृश्य काफी है। वही दृश्य उन्हें पहचान दिलाने वाला बना। इसलिए अपनी छाप छोड़ने के लिए एक सशक्त क्षण ही पर्याप्त होता है। मेरी फिल्मों ‘मैंने प्यार किया’, ‘हम आपके हैं कौन’, ‘हम साथ-साथ हैं’, ‘विवाह’ को शुरुआत में व्यापारिक दृष्टि से संदेह मिला, लेकिन समय के साथ वे दर्शकों के दिलों में बस गईं। यदि आज भी लोग रविवार को परिवार के साथ तीन-तीन घंटे की फिल्म देखते हैं, तो इसका अर्थ है कि ऐसी कहानियों की मांग अब भी है। सवाल : ओटीटी मंच पर पारिवारिक और महिला-केन्द्रित विषय लाना कितना चुनौतीपूर्ण रहा? जवाब:यह एक संघर्ष है, क्योंकि अक्सर माना जाता है कि पुरुष-केन्द्रित विषय ही अधिक चलते हैं। लेकिन जियो और जियो हॉटस्टार ने पूरा विश्वास दिखाया। उन्होंने कहा कि आप वही बनाइए जो बनाना चाहते हैं। हमने कभी यह सोचकर काम नहीं किया कि कितने दर्शक मिलेंगे या कितनी संख्या आएगी। जब संख्या का विचार हावी हो जाता है, तो ईमान डगमगा जाता है। ‘संगमरमर’ पूरी तरह विश्वास और निष्ठा से बनाई गई है। सवाल : आपकी कहानी कहने में संगीत का विशेष स्थान रहा है। ‘संगमरमर’ का संगीत कितना अलग होगा? जवाब: इस बार हमें पूरी स्वतंत्रता मिली। यह सोचकर कोई बंधन नहीं था कि किस क्षेत्र को पसंद आएगा या कौन-सी आवाज युवाओं को आकर्षित करेगी। हमने सीधे जड़ों से जुड़कर काम किया है। एक ओढ़नी का गीत है, जिसे हर्षदीप ने गाया है, वह पूरी तरह लोक-सुगंध से भरा है। होली का गीत है, जिसमें उत्तर भारत की असली होली का रंग और भाषा है। इसमें ‘नदिया के पार’ जैसी सादगी और मिट्टी की खुशबू है। यह प्रेम, रंग और संस्कृति का संपूर्ण मिश्रण है,एक विशुद्ध राजश्री की प्रस्तुति। सवाल: आपके जो चाहने वाले हैं आपकी फिल्मों का वो बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, उनको क्या कहना चाहोगे आप? जवाब: मैं बस इतना कहना चाहूंगा कि पहले ‘संगमरमर’ देखिए, फिर मेरी फिल्म भी आने वाली है, उसके लिए समय है। सबसे बड़ी बात यह है कि यदि कोई युवा अपने दादा-दादी को यह कहानी दिखाए और कहे कि देखिए ऐसी भी एक दुनिया है, तो वही हमारे लिए पर्याप्त है।

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