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EXCLUSIVE

Holi Sexual Abuse Victim Story; PTSD Stress Disorder

Holi Sexual Abuse Victim Story; PTSD Stress Disorder

48 मिनट पहले

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सवाल– मेरी उम्र 32 साल है। मैं बचपन में अपने ही रिश्तेदार के हाथों सेक्शुअल अब्यूज का शिकार हो चुकी हूं। मेरे अब्यूज की कहानी का होली से गहरा कनेक्शन है। होली में रंग खेलने के बहाने वो हमेशा मुझे गलत तरीके से छूता था।

मेरी उम्र कम थी। मैं डर और संकोच के कारण कुछ कह नहीं पाती थी। उससे बड़ी बात कि मैं समझ भी नहीं पाती थी कि ये क्या हो रहा है। बस अनकंफर्टेबल फील होता था। घर में कभी किसी ने मेरे इस डिसकंफर्ट को नोटिस नहीं किया। ये सिलसिला कुछ 4 साल तक चला होगा। अब मैं एडल्ट और इंडिपेंडेंट हूं, लेकिन होली नजदीक आते ही मेरा पास्ट ट्रॉमा ट्रिगर हो जाता है। मैं अपने दोस्तों और पार्टनर के साथ भी होली खेलने में सहज नहीं महसूस करती। होली के दिन मूड ऑफ रहता है। मैं इस ट्रॉमा से कैसे बाहर निकलूं?

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

सवाल पूछने के लिए आपका बहुत शुक्रिया। मैं आपकी मन:स्थिति समझ सकता हूं। यूं तो होली रंगों और खुशियों का त्योहार है, लेकिन जो भी लोग बचपन में इस त्योहार के बहाने सेक्शुअल अब्यूज या किसी भी तरह के गलत व्यवहार का शिकार हुए होते हैं, उनके भीतर यह दिन ट्रॉमा ट्रिगर कर सकता है।

यह PTSD (पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) का संकेत है। जिस घटना, जगह, व्यक्ति से हमारा ट्रॉमा जुड़ा हो, उसके आसपास होने पर वही पुराना ट्रॉमा फिर से सतह पर आ जाता है और मानसिक रूप से दुखी, परेशान कर सकता है।

PTSD कोई कमजोरी नहीं है

लेकिन यहां मैं आपसे एक बात पूरा जोर देकर कहना चाहता हूं कि PTSD कोई कमजोरी नहीं है। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड केयर एक्सेलेंस (NICE) और रॉयल कॉलेज ऑफ साइकिएट्रिस्ट्स का ये मानना है कि PTSD हमारे शरीर और ब्रेन का डिफेंस मैकेनिज्म है। यह इसलिए विकसित होता है क्योंकि हमारी बॉडी हमें प्रोटेक्ट करना चाहती है। किसी गहरे सदमे या डरावने अनुभव के बाद यह विकसित होता है।

इस बात को गहराई से समझने के लिए हमें थोड़ा अपने शरीर की बायोलॉजी को भी समझना पड़ेगा। तो आइए शुरू करते हैं।

दर्दनाक घटनाएं और कॉर्टिसोल स्टैंपिंग

जब कोई बच्चा सेक्शुअल अब्यूज का शिकार होता है तो उसके शरीर में फाइट-फ्लाइट-फ्रीज मोड एक्टिव हो जाता है।

इसके परिणामस्वरूप:

  • एड्रेनेलाइन हॉर्मोन रिलीज होता है।
  • कॉर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) रिलीज होता है।
  • दिल की धड़कन तेज हो जाती है
  • शरीर के सारे सेंसेज (इंद्रियां) ज्यादा एक्टिव हो जाते हैं।

कॉर्टिसोल स्टैंपिंग क्या है?

बहुत ज्यादा स्ट्रेस होने पर:

  • कॉर्टिसोल ब्रेन के मेमोरी सेंटर को ज्यादा मजबूत कर देता है।
  • ब्रेन उस घटना को एक “डेंजरस” घटना के रूप में “टैग” कर देता है।
  • उस बुरी घटना से जुड़ी सारी डिटेल्स (स्पर्श, गंध, रंग, ध्वनि) सब गहराई से ब्रेन में रजिस्टर हो जाते हैं।
  • इसके बरक्स जेनेरिक बातें, सामान्य विवरण धुंधले पड़ जाते हैं।
  • लेकिन खतरे से जुड़ी सारी डिटेल्स ब्रेन में बहुत गहरे और साफ बनी रहती हैं।
  • हमारी बायोलॉजी इस बात को सुनिश्चित करती है कि हम उस बुरी घटना से जुड़ी हर डिटेल को अच्छे से याद रखें।

इसलिए :

QuoteImage

हो सकता है कि सरवाइवर को रोजमर्रा की सामान्य बातें, घटनाएं याद न रहें। लेकिन उसे अब्यूज से जुड़ी हरेक बात, हर डिटेल बहुत अच्छे से याद रहती है।

QuoteImage

जरूरी बात:

कॉर्टिसोल हॉर्मोन डेंजर को याद रखने में हमारी मदद करता है, ताकि ठीक वैसा ही खतरा सूंघते ही हम तुरंत एलर्ट हो जाएं।

लेकिन इसका नुकसान ये होता है कि हम दुर्घटना से जुड़ी हर सेंसरी डिटेल को जरनलाइज करने लगते हैं।

जैसेकि चूंकि आपके अब्यूज की याद होली से जुड़ी है तो आपका ब्रेन हर होली को डेंजर के रूप में याद रखता है।

ब्रेन का अलार्म सिस्टम: एमिग्डला की भूमिका

एमिग्डला:

  • हमारे ब्रेन में बादाम के आकार की एक संरचना है।
  • ट्रॉमा की स्थिति में एमिग्डला खतरे का पता लगाता है।
  • ब्रेन को स्ट्रेस हॉर्मोन रिलीज करने का ऑर्डर देता है।
  • हमारे डर के रिएक्शन को एक्टिव करता है।
  • लॉजिकल थिंकिंग को किनारे कर देता है।
  • क्योंकि उसका मकसद उस वक्त सिर्फ हमें खतरे से बचाना है।

चाइल्डहुड ट्रॉमा की स्थिति में:

  • एमिग्डला बहुत ज्यादा सेंसिटिव हो जाता है।
  • ट्रॉमा से जुड़ी किसी भी बात पर तुंरत एक्टिव हो जाता है।
  • एमिग्डला अतीत और वर्तमान के बीच फर्क नहीं कर सकता।

इसलिए होली के दौरान जब भी ये चीजें होती हैं-

  1. अचानक किसी का छूना
  2. तेज आवाज
  3. रंगों की महक
  4. भीड़ में शारीरिक नजदीकी

तो एमिग्डला कहता है- “खतरा।” एक व्यक्ति को ये पता है कि अभी खतरा नहीं है। अभी तो मैं सुरक्षित हूं, फिर भी एमिग्डला सुपर एक्टिव होकर ये बताता है कि नहीं, ये बिल्कुल पुरानी वाली सिचुएशन है। आसपास खतरा है।

रिएलिटी और ब्रेन मैसेज के बीच में ये जो गैप है, इसी कारण पुराने ट्रॉमा को लेकर अकसर हमारा रिएक्शन हमारे कंट्रोल में नहीं होता।

होली ट्रॉमा और PTSD स्क्रीनिंग: सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट

यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 4 सेक्शंस हैं और 13 सवाल हैं। आप इन सवालों को ध्यान से पढ़ें और 0 से 4 के स्केल पर इसे रेट करें। 0 का मतलब है ‘बिलकुल नहीं’ और 4 का मतलब है, ‘हमेशा।’ अंत में अपना टोटल स्कोर काउंट करें और स्कोर की एनालिसिस करें। स्कोर इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया हुआ है।

जैसेेकि अगर आपका टोटल स्कोर 15 से कम है तो इसका मतलब है कि बहुत माइल्ड PTSD है, लेकिन अगर स्कोर 45 से ज्यादा है तो PTSD बहुत हाई है। ऐसे में प्रोफेशनल हेल्प बहुत जरूरी है।

CBT (कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी) आधारित मैनेजमेंट प्रोग्राम

(होली से एक सप्ताह पहले → होली के दौरान → अगली होली तक)

फेज 1: होली से एक सप्ताह पहले तैयारी

1. ट्रिगर को साफ-साफ समझना

डायरी में लिखें:

  • मुझे खासतौर पर क्या चीजें परेशान करती हैं?
  • इसमें से क्या मेरे पास्ट ट्रॉमा से जुड़ा हुआ है?
  • अब क्या बदला है या क्या अलग है?

CBT सवाल:

“आसपास ऐसा कौन सा एविडेंस है, जो ये बताए कि मैं अभी भी असुरक्षित हूं।”

2. बाउंड्री डिफेंस का अभ्यास

अपने लिए कुछ स्टेटमेंट तैयार करें। जो भी होली खेलना चाहे, उससे कहें:

  • “रंग लगाने से पहले कृपया मुझसे पूछ लें।”
  • “मुझे अचानक से टच न करें।”
  • “मुझे सिर्फ इतना ही पसंद है, इससे ज्यादा नहीं।”

प्रतिदिन ये वाक्य बोलने का अभ्यास करें।

3. प्रेडिक्टिबिलिटी प्लानिंग

प्लान:

  • होली के इवेंट में कितनी देर रहूंगी।
  • वहां और कौन-कौन मौजूद रहेगा।
  • वहां से निकलना हो तो क्या करूंगी।

प्रेडिक्टिबिलिटी हमारे एमिगडला को शांत रखती है । जब पहले से पता होता है कि आगे क्या होने वाला है तो ब्रेन स्ट्रेस मोड में नहीं जाता।

4. रेगुलेशन प्रैक्टिस (प्रतिदिन)

  • 10 मिनट गहरी सांस लेने का अभ्यास
  • हल्की फिजिकल एक्सरसाइज
  • ये करके आप अपने नर्वस सिस्टम को ट्रेनिंग दे रहे होते हैं।

फेज 2:

होली के दौरान एक्टिव मैनेजमेंट प्लान

A. रिअल टाइम ग्राउंडिंग

  • पैर जमीन पर मजबूती से टिकाए रखें।
  • शांत, गहरी सांस लेते रहें।

खुद से कहें:

“ये साल 2026 है। अब मैं पूरी तरह सुरक्षित हूं।”

B. अफेक्ट ब्रिज इंटरप्शन

खुद से पूछें:

“अब मैं कितने साल की हूं?”

जवाब :

“वो घटना तब की थी। तब मैं बच्ची थी, वलनरेबल थी। लेकिन अब मैं एडल्ट हूं। अब मैं सेफ हूं।”

C. धीरे-धीरे एक्सपोजर बढ़ाना

  • होली के प्रोग्राम अटेंड करने की शुरुआत धीरे-धीरे करें।
  • थोड़ी देर रहें।
  • बीच-बीच में ब्रेक लें।
  • अगर इमोशनल ट्रिगर महसूस हों तो तुरंत वहां से चली जाएं।
  • धीरे-धीरे कंट्रोल्ड एक्सपोजर से भावनाएं और इमोशनल रिएक्शन सहज होते जाते हैं।

फेज 3: रिवायरिंग प्रोग्राम

होली के बाद से लेकर अगली होली तक

1. हर महीने थोड़ा एक्सपोजर

  • शॉर्ट होली वीडियोज देखें।
  • बाउंड्री डिफेंस से जुड़े वाक्यों का अभ्यास करें।
  • सेफ टच के बारे में बात करें।

2. कॉग्निटिव रीस्ट्रक्चरिंग

अपने ट्रॉमा से जुड़े विचारों को चुनौती दें। उसे रीफ्रेज करें।

पुराना विचार:

“सभी त्योहार अनसेफ होते हैं.”

संतुलित विचार:

“कुछ अनुभव खराब और असुरक्षित थे. लेकिन अब मैं सेफ्टी का ध्यान रखती हूं। अब मैं सुरक्षित हूं।”

3. बॉडी रेगुलेशन हैबिट

  • हफ्ते में 3–4 बार एक्सरसाइज करें।
  • ब्रीदिंग एक्सरसाइज का अभ्यास करें।
  • योगा और स्ट्रेचिंग करें।
  • ट्रॉमा बॉडी की मेमोरी में सेव्ड है। धीरे-धीरे उससे मुक्त होने का अभ्यास करें।

4. एनुअल रिव्यू

  • अगली होली से पहले एक बार फिर सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट करें।
  • पिछले साल के स्कोर की तुलना करें।
  • प्रोगरेस नोट करें।

प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी है?

सामान्य स्थितियों में सेल्फ हेल्प से ही काफी मदद मिल सकती है, लेकिन अगर लक्षण गंभीर हों तो प्रोफेशनल हेल्प की सलाह दी जाती है। जैसेकि अगर ट्रॉमा के फ्लैशबैक बहुत गंभीर हों या मन में खुद को नुकसान पहुंचाने का ख्याल आए तो ऐसे में प्रोफेशनल हेल्प लेना जरूरी है।

फाइनल क्लिनिकल निष्कर्ष

स्ट्रेस हॉर्मोन कॉर्टिसोल ने आपको बचाने के लिए उस ट्रॉमा मेमोरी को मजबूत कर दिया। एमिग्डला ने खतरे को तेजी से पहचानना सीख लिया। लेकिन अब आप CBT आधारित एक्सपोजर और सेल्फ हेल्प से अपने ब्रेन के पुराने विचारों को बदल सकती हैं। धीरे-धीरे अपने ब्रेन को ये सिखा सकती हैं कि वो बुरी घटना बीत चुकी है। हर होली बुरी नहीं होती, हर स्पेस अनसेफ स्पेस नहीं होता।

यहां हमारा मकसद जबर्दस्ती होली मनाना, सेलिब्रेशन में शामिल होना नहीं है। हमारा मकसद है, अपने दिमाग की आजादी को फिर से हासिल करना। अगर आप पूरे साल अभ्यास करें तो अगले साल होली पिछली होली से अलग और बेहतर महसूस हो सकती है।

……………… ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ– पार्टी करता रहा, दोस्त का फोन नहीं उठाया: उस रात उसने आत्महत्या कर ली, क्या दोस्त की मौत का जिम्मेदार मैं हूं?

दोस्त की मृत्यु के लिए स्वयं को दोष देना या जिम्मेदार मानना ठीक नहीं है। आपका गिल्ट इस बात का सबूत बिल्कुल नहीं है कि अपने दोस्त की मौत के लिए आप जिम्मेदार हैं। लेकिन ये इस बात का संकेत जरूर है कि आप एक संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान हैं, जो अब एक गहरी तकलीफ से गुजर रहा है। आगे पढ़िए…

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Holi Sexual Abuse Victim Story; PTSD Stress Disorder

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48 मिनट पहले

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सवाल– मेरी उम्र 32 साल है। मैं बचपन में अपने ही रिश्तेदार के हाथों सेक्शुअल अब्यूज का शिकार हो चुकी हूं। मेरे अब्यूज की कहानी का होली से गहरा कनेक्शन है। होली में रंग खेलने के बहाने वो हमेशा मुझे गलत तरीके से छूता था।

मेरी उम्र कम थी। मैं डर और संकोच के कारण कुछ कह नहीं पाती थी। उससे बड़ी बात कि मैं समझ भी नहीं पाती थी कि ये क्या हो रहा है। बस अनकंफर्टेबल फील होता था। घर में कभी किसी ने मेरे इस डिसकंफर्ट को नोटिस नहीं किया। ये सिलसिला कुछ 4 साल तक चला होगा। अब मैं एडल्ट और इंडिपेंडेंट हूं, लेकिन होली नजदीक आते ही मेरा पास्ट ट्रॉमा ट्रिगर हो जाता है। मैं अपने दोस्तों और पार्टनर के साथ भी होली खेलने में सहज नहीं महसूस करती। होली के दिन मूड ऑफ रहता है। मैं इस ट्रॉमा से कैसे बाहर निकलूं?

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

सवाल पूछने के लिए आपका बहुत शुक्रिया। मैं आपकी मन:स्थिति समझ सकता हूं। यूं तो होली रंगों और खुशियों का त्योहार है, लेकिन जो भी लोग बचपन में इस त्योहार के बहाने सेक्शुअल अब्यूज या किसी भी तरह के गलत व्यवहार का शिकार हुए होते हैं, उनके भीतर यह दिन ट्रॉमा ट्रिगर कर सकता है।

यह PTSD (पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) का संकेत है। जिस घटना, जगह, व्यक्ति से हमारा ट्रॉमा जुड़ा हो, उसके आसपास होने पर वही पुराना ट्रॉमा फिर से सतह पर आ जाता है और मानसिक रूप से दुखी, परेशान कर सकता है।

PTSD कोई कमजोरी नहीं है

लेकिन यहां मैं आपसे एक बात पूरा जोर देकर कहना चाहता हूं कि PTSD कोई कमजोरी नहीं है। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड केयर एक्सेलेंस (NICE) और रॉयल कॉलेज ऑफ साइकिएट्रिस्ट्स का ये मानना है कि PTSD हमारे शरीर और ब्रेन का डिफेंस मैकेनिज्म है। यह इसलिए विकसित होता है क्योंकि हमारी बॉडी हमें प्रोटेक्ट करना चाहती है। किसी गहरे सदमे या डरावने अनुभव के बाद यह विकसित होता है।

इस बात को गहराई से समझने के लिए हमें थोड़ा अपने शरीर की बायोलॉजी को भी समझना पड़ेगा। तो आइए शुरू करते हैं।

दर्दनाक घटनाएं और कॉर्टिसोल स्टैंपिंग

जब कोई बच्चा सेक्शुअल अब्यूज का शिकार होता है तो उसके शरीर में फाइट-फ्लाइट-फ्रीज मोड एक्टिव हो जाता है।

इसके परिणामस्वरूप:

  • एड्रेनेलाइन हॉर्मोन रिलीज होता है।
  • कॉर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) रिलीज होता है।
  • दिल की धड़कन तेज हो जाती है
  • शरीर के सारे सेंसेज (इंद्रियां) ज्यादा एक्टिव हो जाते हैं।

कॉर्टिसोल स्टैंपिंग क्या है?

बहुत ज्यादा स्ट्रेस होने पर:

  • कॉर्टिसोल ब्रेन के मेमोरी सेंटर को ज्यादा मजबूत कर देता है।
  • ब्रेन उस घटना को एक “डेंजरस” घटना के रूप में “टैग” कर देता है।
  • उस बुरी घटना से जुड़ी सारी डिटेल्स (स्पर्श, गंध, रंग, ध्वनि) सब गहराई से ब्रेन में रजिस्टर हो जाते हैं।
  • इसके बरक्स जेनेरिक बातें, सामान्य विवरण धुंधले पड़ जाते हैं।
  • लेकिन खतरे से जुड़ी सारी डिटेल्स ब्रेन में बहुत गहरे और साफ बनी रहती हैं।
  • हमारी बायोलॉजी इस बात को सुनिश्चित करती है कि हम उस बुरी घटना से जुड़ी हर डिटेल को अच्छे से याद रखें।

इसलिए :

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हो सकता है कि सरवाइवर को रोजमर्रा की सामान्य बातें, घटनाएं याद न रहें। लेकिन उसे अब्यूज से जुड़ी हरेक बात, हर डिटेल बहुत अच्छे से याद रहती है।

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जरूरी बात:

कॉर्टिसोल हॉर्मोन डेंजर को याद रखने में हमारी मदद करता है, ताकि ठीक वैसा ही खतरा सूंघते ही हम तुरंत एलर्ट हो जाएं।

लेकिन इसका नुकसान ये होता है कि हम दुर्घटना से जुड़ी हर सेंसरी डिटेल को जरनलाइज करने लगते हैं।

जैसेकि चूंकि आपके अब्यूज की याद होली से जुड़ी है तो आपका ब्रेन हर होली को डेंजर के रूप में याद रखता है।

ब्रेन का अलार्म सिस्टम: एमिग्डला की भूमिका

एमिग्डला:

  • हमारे ब्रेन में बादाम के आकार की एक संरचना है।
  • ट्रॉमा की स्थिति में एमिग्डला खतरे का पता लगाता है।
  • ब्रेन को स्ट्रेस हॉर्मोन रिलीज करने का ऑर्डर देता है।
  • हमारे डर के रिएक्शन को एक्टिव करता है।
  • लॉजिकल थिंकिंग को किनारे कर देता है।
  • क्योंकि उसका मकसद उस वक्त सिर्फ हमें खतरे से बचाना है।

चाइल्डहुड ट्रॉमा की स्थिति में:

  • एमिग्डला बहुत ज्यादा सेंसिटिव हो जाता है।
  • ट्रॉमा से जुड़ी किसी भी बात पर तुंरत एक्टिव हो जाता है।
  • एमिग्डला अतीत और वर्तमान के बीच फर्क नहीं कर सकता।

इसलिए होली के दौरान जब भी ये चीजें होती हैं-

  1. अचानक किसी का छूना
  2. तेज आवाज
  3. रंगों की महक
  4. भीड़ में शारीरिक नजदीकी

तो एमिग्डला कहता है- “खतरा।” एक व्यक्ति को ये पता है कि अभी खतरा नहीं है। अभी तो मैं सुरक्षित हूं, फिर भी एमिग्डला सुपर एक्टिव होकर ये बताता है कि नहीं, ये बिल्कुल पुरानी वाली सिचुएशन है। आसपास खतरा है।

रिएलिटी और ब्रेन मैसेज के बीच में ये जो गैप है, इसी कारण पुराने ट्रॉमा को लेकर अकसर हमारा रिएक्शन हमारे कंट्रोल में नहीं होता।

होली ट्रॉमा और PTSD स्क्रीनिंग: सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट

यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 4 सेक्शंस हैं और 13 सवाल हैं। आप इन सवालों को ध्यान से पढ़ें और 0 से 4 के स्केल पर इसे रेट करें। 0 का मतलब है ‘बिलकुल नहीं’ और 4 का मतलब है, ‘हमेशा।’ अंत में अपना टोटल स्कोर काउंट करें और स्कोर की एनालिसिस करें। स्कोर इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया हुआ है।

जैसेेकि अगर आपका टोटल स्कोर 15 से कम है तो इसका मतलब है कि बहुत माइल्ड PTSD है, लेकिन अगर स्कोर 45 से ज्यादा है तो PTSD बहुत हाई है। ऐसे में प्रोफेशनल हेल्प बहुत जरूरी है।

CBT (कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी) आधारित मैनेजमेंट प्रोग्राम

(होली से एक सप्ताह पहले → होली के दौरान → अगली होली तक)

फेज 1: होली से एक सप्ताह पहले तैयारी

1. ट्रिगर को साफ-साफ समझना

डायरी में लिखें:

  • मुझे खासतौर पर क्या चीजें परेशान करती हैं?
  • इसमें से क्या मेरे पास्ट ट्रॉमा से जुड़ा हुआ है?
  • अब क्या बदला है या क्या अलग है?

CBT सवाल:

“आसपास ऐसा कौन सा एविडेंस है, जो ये बताए कि मैं अभी भी असुरक्षित हूं।”

2. बाउंड्री डिफेंस का अभ्यास

अपने लिए कुछ स्टेटमेंट तैयार करें। जो भी होली खेलना चाहे, उससे कहें:

  • “रंग लगाने से पहले कृपया मुझसे पूछ लें।”
  • “मुझे अचानक से टच न करें।”
  • “मुझे सिर्फ इतना ही पसंद है, इससे ज्यादा नहीं।”

प्रतिदिन ये वाक्य बोलने का अभ्यास करें।

3. प्रेडिक्टिबिलिटी प्लानिंग

प्लान:

  • होली के इवेंट में कितनी देर रहूंगी।
  • वहां और कौन-कौन मौजूद रहेगा।
  • वहां से निकलना हो तो क्या करूंगी।

प्रेडिक्टिबिलिटी हमारे एमिगडला को शांत रखती है । जब पहले से पता होता है कि आगे क्या होने वाला है तो ब्रेन स्ट्रेस मोड में नहीं जाता।

4. रेगुलेशन प्रैक्टिस (प्रतिदिन)

  • 10 मिनट गहरी सांस लेने का अभ्यास
  • हल्की फिजिकल एक्सरसाइज
  • ये करके आप अपने नर्वस सिस्टम को ट्रेनिंग दे रहे होते हैं।

फेज 2:

होली के दौरान एक्टिव मैनेजमेंट प्लान

A. रिअल टाइम ग्राउंडिंग

  • पैर जमीन पर मजबूती से टिकाए रखें।
  • शांत, गहरी सांस लेते रहें।

खुद से कहें:

“ये साल 2026 है। अब मैं पूरी तरह सुरक्षित हूं।”

B. अफेक्ट ब्रिज इंटरप्शन

खुद से पूछें:

“अब मैं कितने साल की हूं?”

जवाब :

“वो घटना तब की थी। तब मैं बच्ची थी, वलनरेबल थी। लेकिन अब मैं एडल्ट हूं। अब मैं सेफ हूं।”

C. धीरे-धीरे एक्सपोजर बढ़ाना

  • होली के प्रोग्राम अटेंड करने की शुरुआत धीरे-धीरे करें।
  • थोड़ी देर रहें।
  • बीच-बीच में ब्रेक लें।
  • अगर इमोशनल ट्रिगर महसूस हों तो तुरंत वहां से चली जाएं।
  • धीरे-धीरे कंट्रोल्ड एक्सपोजर से भावनाएं और इमोशनल रिएक्शन सहज होते जाते हैं।

फेज 3: रिवायरिंग प्रोग्राम

होली के बाद से लेकर अगली होली तक

1. हर महीने थोड़ा एक्सपोजर

  • शॉर्ट होली वीडियोज देखें।
  • बाउंड्री डिफेंस से जुड़े वाक्यों का अभ्यास करें।
  • सेफ टच के बारे में बात करें।

2. कॉग्निटिव रीस्ट्रक्चरिंग

अपने ट्रॉमा से जुड़े विचारों को चुनौती दें। उसे रीफ्रेज करें।

पुराना विचार:

“सभी त्योहार अनसेफ होते हैं.”

संतुलित विचार:

“कुछ अनुभव खराब और असुरक्षित थे. लेकिन अब मैं सेफ्टी का ध्यान रखती हूं। अब मैं सुरक्षित हूं।”

3. बॉडी रेगुलेशन हैबिट

  • हफ्ते में 3–4 बार एक्सरसाइज करें।
  • ब्रीदिंग एक्सरसाइज का अभ्यास करें।
  • योगा और स्ट्रेचिंग करें।
  • ट्रॉमा बॉडी की मेमोरी में सेव्ड है। धीरे-धीरे उससे मुक्त होने का अभ्यास करें।

4. एनुअल रिव्यू

  • अगली होली से पहले एक बार फिर सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट करें।
  • पिछले साल के स्कोर की तुलना करें।
  • प्रोगरेस नोट करें।

प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी है?

सामान्य स्थितियों में सेल्फ हेल्प से ही काफी मदद मिल सकती है, लेकिन अगर लक्षण गंभीर हों तो प्रोफेशनल हेल्प की सलाह दी जाती है। जैसेकि अगर ट्रॉमा के फ्लैशबैक बहुत गंभीर हों या मन में खुद को नुकसान पहुंचाने का ख्याल आए तो ऐसे में प्रोफेशनल हेल्प लेना जरूरी है।

फाइनल क्लिनिकल निष्कर्ष

स्ट्रेस हॉर्मोन कॉर्टिसोल ने आपको बचाने के लिए उस ट्रॉमा मेमोरी को मजबूत कर दिया। एमिग्डला ने खतरे को तेजी से पहचानना सीख लिया। लेकिन अब आप CBT आधारित एक्सपोजर और सेल्फ हेल्प से अपने ब्रेन के पुराने विचारों को बदल सकती हैं। धीरे-धीरे अपने ब्रेन को ये सिखा सकती हैं कि वो बुरी घटना बीत चुकी है। हर होली बुरी नहीं होती, हर स्पेस अनसेफ स्पेस नहीं होता।

यहां हमारा मकसद जबर्दस्ती होली मनाना, सेलिब्रेशन में शामिल होना नहीं है। हमारा मकसद है, अपने दिमाग की आजादी को फिर से हासिल करना। अगर आप पूरे साल अभ्यास करें तो अगले साल होली पिछली होली से अलग और बेहतर महसूस हो सकती है।

……………… ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ– पार्टी करता रहा, दोस्त का फोन नहीं उठाया: उस रात उसने आत्महत्या कर ली, क्या दोस्त की मौत का जिम्मेदार मैं हूं?

दोस्त की मृत्यु के लिए स्वयं को दोष देना या जिम्मेदार मानना ठीक नहीं है। आपका गिल्ट इस बात का सबूत बिल्कुल नहीं है कि अपने दोस्त की मौत के लिए आप जिम्मेदार हैं। लेकिन ये इस बात का संकेत जरूर है कि आप एक संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान हैं, जो अब एक गहरी तकलीफ से गुजर रहा है। आगे पढ़िए…

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