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Aadi Kailash Yatra Starts May

Aadi Kailash Yatra Starts May

उत्तराखंड में आदि कैलाश यात्रा 1 मई से शुरू करने की तैयारी है। मौसम अनुकूल रहा तो प्रशासन अप्रैल के आखिरी सप्ताह से इनर लाइन परमिट जारी कर सकता है। पिछले साल यहां 30 हजार से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचे थे, ऐसे में इस बार और बड़ी संख्या में यात्रियों के आ

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आदि कैलाश पिथौरागढ़ जिले के धारचूला क्षेत्र की व्यास घाटी में स्थित है। नवंबर से मार्च तक यहां भारी बर्फबारी के कारण आवागमन बंद रहता है। सुरक्षा कारणों के चलते व्यास घाटी में छियालेख से आगे जाने के लिए इनर लाइन परमिट अनिवार्य होता है, जिसे तहसील प्रशासन जारी करता है। पिथौरागढ़ के डीएम आशीष भटगांई ने बताया,

यात्रा को लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। जल्द ही आधिकारिक सूचना जारी की जाएगी।

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आदि कैलाश यात्रा में भारी संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु।

आदि कैलाश यात्रा में भारी संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु।

परमिट के लिए ऑनलाइन-ऑफलाइन दोनों सुविधा

आदि कैलाश और ओम पर्वत की यात्रा के लिए इनर लाइन परमिट धारचूला स्थित एसडीएम कार्यालय से ऑफलाइन लिया जा सकता है। आवेदन के लिए आधार कार्ड, मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट और पासपोर्ट साइज फोटो जरूरी होते हैं। यात्रा के लिए ऑनलाइन आवेदन की भी सुविधा है।

पिछले पांच साल में तेजी से बढ़े श्रद्धालु आदि कैलाश और ओम पर्वत के दर्शन के लिए आने वाले पर्यटकों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। साल 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के बाद इस धार्मिक स्थल को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पहचान मिली। इसके बाद यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।

आदि कैलाश यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने ध्यान लगाया था।

आदि कैलाश यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने ध्यान लगाया था।

2023 में पीएम मोदी ने की थी आदि कैलाश यात्रा

साल 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड दौरे के दौरान आदि कैलाश क्षेत्र का भ्रमण किया था। तब उन्होंने पिथौरागढ़ जिले में स्थित आदि कैलाश और पार्वती कुंड में पूजा-अर्चना की, साथ ही कुमाऊं के प्रसिद्ध जागेश्वर धाम में भी दर्शन किए थे।

यात्रा के बाद प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपने अनुभव साझा करते हुए लिखा था,

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यदि कोई मुझसे पूछे कि उत्तराखंड में एक जगह जरूर देखनी चाहिए तो मैं कहूंगा कि कुमाऊं क्षेत्र में पार्वती कुंड और जागेश्वर मंदिर अवश्य जाएं। यहां की प्राकृतिक सुंदरता और दिव्यता आपको मंत्रमुग्ध कर देगी।

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पीएम मोदी की दो साल पुरानी एक्स पोस्ट।

पीएम मोदी की दो साल पुरानी एक्स पोस्ट।

अब 5 पॉइंट्स में आदि कैलाश के बारे में जानिए…

1. भारत में स्थित ‘छोटा कैलाश’ आदि कैलाश उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की व्यास घाटी में भारत-तिब्बत सीमा के पास स्थित है। इसे छोटा कैलाश भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार विवाह के बाद भगवान शिव माता पार्वती के साथ कैलाश जाते समय यहां कुछ समय तक रुके थे और अपने पुत्रों कार्तिकेय व गणेश के साथ यहीं निवास किया था।

2. पार्वती सरोवर, गौरी कुंड और शिव-पार्वती मंदिर आदि कैलाश पर्वत के नीचे गौरी कुंड और सामने की पहाड़ी पर पार्वती सरोवर स्थित है, जहां से पर्वत के भव्य दर्शन होते हैं। पार्वती सरोवर के किनारे शिव-पार्वती मंदिर और ध्यान स्थल बने हैं। करीब 14,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर 1971 में कुटी गांव के लोगों ने बनवाया था।

3. जोलिंगकोंग से होते हैं आदि कैलाश के दर्शन धारचूला से करीब 70 किमी दूर गुंजी (3200 मीटर) और वहां से लगभग 25 किमी आगे जोलिंगकोंग (4400 मीटर) स्थित है। यहीं से आदि कैलाश के सबसे भव्य दर्शन होते हैं। जोलिंगकोंग से करीब 2 किमी दूर पार्वती सरोवर और लगभग 2–3 किमी दूर गौरी कुंड झील स्थित है।

4. ओम पर्वत और लिपुलेख मार्ग का महत्व गुंजी से लिपुलेख पास की ओर जाते समय नाभीढांग से 6191 मीटर ऊंचे ओम पर्वत के दर्शन होते हैं, जिसके शिखर पर बर्फ से ‘ॐ’ की आकृति दिखाई देती है। इसी मार्ग से कैलाश मानसरोवर के यात्री भी लिपुलेख पास के जरिए तिब्बत की ओर जाते हैं।

5. सीमावर्ती क्षेत्र, परमिट और यात्रा मार्ग आदि कैलाश सीमावर्ती और ऊंचाई वाला क्षेत्र है, इसलिए यहां जाने के लिए इनर लाइन परमिट, मेडिकल जांच और पुलिस सत्यापन जरूरी होता है। यात्रा के लिए हल्द्वानी, काठगोदाम या टनकपुर से पिथौरागढ़ होते हुए धारचूला पहुंचना पड़ता है। टनकपुर से धारचूला करीब 240 किमी और हल्द्वानी से करीब 280 किमी दूर है, यहां से आगे स्थानीय वाहनों से यात्रा की जाती है।

आदि कैलाश और कैलाश पर्वत में अंतर भी समझिए…

आदि कैलाश उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की व्यास घाटी में भारत की सीमा के भीतर स्थित है, इसलिए यहां की यात्रा अपेक्षाकृत आसान मानी जाती है। इसके लिए केवल इनर लाइन परमिट, मेडिकल जांच और स्थानीय प्रशासन की अनुमति जरूरी होती है। सड़क बनने के बाद अब श्रद्धालु धारचूला, गुंजी और जोलिंगकोंग तक वाहनों से पहुंचकर पार्वती सरोवर और गौरी कुंड के साथ आदि कैलाश के दर्शन कर सकते हैं।

वहीं, कैलाश पर्वत तिब्बत (चीन) में स्थित है और उसके पास पवित्र मानसरोवर झील है। वहां की यात्रा अंतरराष्ट्रीय होने के कारण पासपोर्ट-वीजा और भारत सरकार की आधिकारिक प्रक्रिया से होकर गुजरती है। यह यात्रा अधिक कठिन मानी जाती है, जिसमें ऊंचाई वाले इलाके में ट्रेकिंग और कैलाश पर्वत की परिक्रमा करनी पड़ती है। धार्मिक दृष्टि से कैलाश पर्वत को भगवान शिव का मुख्य धाम माना जाता है, जबकि आदि कैलाश को उसका प्रतीकात्मक स्वरूप या ‘छोटा कैलाश’ कहा जाता है।

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ये खबर भी पढ़ें :

कैलाश मानसरोवर का पुराना पैदल मार्ग हो रहा विलुप्त: यात्री विश्राम के लिए बनी धर्मशालाएं खंडहर; एक्सपर्ट बोले- धरोहर का हो संरक्षण

कैलाश मानसरोवर यात्रा का 400 किलोमीटर लंबा मार्ग, जिस पर कभी भक्तों के कदमों की आहट और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूंजते थे, अब सिमटता जा रहा है। यह मार्ग कहीं सड़क निर्माण में कट गया तो कहीं जंगलों में गुम हो गया है। यात्रियों और व्यापारियों के ठहरने के लिए बनी करीब 500 धर्मशालाएं भी खंडहर में बदल रही हैं। (पढ़ें पूरी खबर)

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उत्तराखंड में आदि कैलाश यात्रा 1 मई से शुरू करने की तैयारी है। मौसम अनुकूल रहा तो प्रशासन अप्रैल के आखिरी सप्ताह से इनर लाइन परमिट जारी कर सकता है। पिछले साल यहां 30 हजार से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचे थे, ऐसे में इस बार और बड़ी संख्या में यात्रियों के आ

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आदि कैलाश पिथौरागढ़ जिले के धारचूला क्षेत्र की व्यास घाटी में स्थित है। नवंबर से मार्च तक यहां भारी बर्फबारी के कारण आवागमन बंद रहता है। सुरक्षा कारणों के चलते व्यास घाटी में छियालेख से आगे जाने के लिए इनर लाइन परमिट अनिवार्य होता है, जिसे तहसील प्रशासन जारी करता है। पिथौरागढ़ के डीएम आशीष भटगांई ने बताया,

यात्रा को लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। जल्द ही आधिकारिक सूचना जारी की जाएगी।

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आदि कैलाश यात्रा में भारी संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु।

आदि कैलाश यात्रा में भारी संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु।

परमिट के लिए ऑनलाइन-ऑफलाइन दोनों सुविधा

आदि कैलाश और ओम पर्वत की यात्रा के लिए इनर लाइन परमिट धारचूला स्थित एसडीएम कार्यालय से ऑफलाइन लिया जा सकता है। आवेदन के लिए आधार कार्ड, मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट और पासपोर्ट साइज फोटो जरूरी होते हैं। यात्रा के लिए ऑनलाइन आवेदन की भी सुविधा है।

पिछले पांच साल में तेजी से बढ़े श्रद्धालु आदि कैलाश और ओम पर्वत के दर्शन के लिए आने वाले पर्यटकों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। साल 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के बाद इस धार्मिक स्थल को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पहचान मिली। इसके बाद यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।

आदि कैलाश यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने ध्यान लगाया था।

आदि कैलाश यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने ध्यान लगाया था।

2023 में पीएम मोदी ने की थी आदि कैलाश यात्रा

साल 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड दौरे के दौरान आदि कैलाश क्षेत्र का भ्रमण किया था। तब उन्होंने पिथौरागढ़ जिले में स्थित आदि कैलाश और पार्वती कुंड में पूजा-अर्चना की, साथ ही कुमाऊं के प्रसिद्ध जागेश्वर धाम में भी दर्शन किए थे।

यात्रा के बाद प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपने अनुभव साझा करते हुए लिखा था,

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यदि कोई मुझसे पूछे कि उत्तराखंड में एक जगह जरूर देखनी चाहिए तो मैं कहूंगा कि कुमाऊं क्षेत्र में पार्वती कुंड और जागेश्वर मंदिर अवश्य जाएं। यहां की प्राकृतिक सुंदरता और दिव्यता आपको मंत्रमुग्ध कर देगी।

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पीएम मोदी की दो साल पुरानी एक्स पोस्ट।

पीएम मोदी की दो साल पुरानी एक्स पोस्ट।

अब 5 पॉइंट्स में आदि कैलाश के बारे में जानिए…

1. भारत में स्थित ‘छोटा कैलाश’ आदि कैलाश उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की व्यास घाटी में भारत-तिब्बत सीमा के पास स्थित है। इसे छोटा कैलाश भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार विवाह के बाद भगवान शिव माता पार्वती के साथ कैलाश जाते समय यहां कुछ समय तक रुके थे और अपने पुत्रों कार्तिकेय व गणेश के साथ यहीं निवास किया था।

2. पार्वती सरोवर, गौरी कुंड और शिव-पार्वती मंदिर आदि कैलाश पर्वत के नीचे गौरी कुंड और सामने की पहाड़ी पर पार्वती सरोवर स्थित है, जहां से पर्वत के भव्य दर्शन होते हैं। पार्वती सरोवर के किनारे शिव-पार्वती मंदिर और ध्यान स्थल बने हैं। करीब 14,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर 1971 में कुटी गांव के लोगों ने बनवाया था।

3. जोलिंगकोंग से होते हैं आदि कैलाश के दर्शन धारचूला से करीब 70 किमी दूर गुंजी (3200 मीटर) और वहां से लगभग 25 किमी आगे जोलिंगकोंग (4400 मीटर) स्थित है। यहीं से आदि कैलाश के सबसे भव्य दर्शन होते हैं। जोलिंगकोंग से करीब 2 किमी दूर पार्वती सरोवर और लगभग 2–3 किमी दूर गौरी कुंड झील स्थित है।

4. ओम पर्वत और लिपुलेख मार्ग का महत्व गुंजी से लिपुलेख पास की ओर जाते समय नाभीढांग से 6191 मीटर ऊंचे ओम पर्वत के दर्शन होते हैं, जिसके शिखर पर बर्फ से ‘ॐ’ की आकृति दिखाई देती है। इसी मार्ग से कैलाश मानसरोवर के यात्री भी लिपुलेख पास के जरिए तिब्बत की ओर जाते हैं।

5. सीमावर्ती क्षेत्र, परमिट और यात्रा मार्ग आदि कैलाश सीमावर्ती और ऊंचाई वाला क्षेत्र है, इसलिए यहां जाने के लिए इनर लाइन परमिट, मेडिकल जांच और पुलिस सत्यापन जरूरी होता है। यात्रा के लिए हल्द्वानी, काठगोदाम या टनकपुर से पिथौरागढ़ होते हुए धारचूला पहुंचना पड़ता है। टनकपुर से धारचूला करीब 240 किमी और हल्द्वानी से करीब 280 किमी दूर है, यहां से आगे स्थानीय वाहनों से यात्रा की जाती है।

आदि कैलाश और कैलाश पर्वत में अंतर भी समझिए…

आदि कैलाश उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की व्यास घाटी में भारत की सीमा के भीतर स्थित है, इसलिए यहां की यात्रा अपेक्षाकृत आसान मानी जाती है। इसके लिए केवल इनर लाइन परमिट, मेडिकल जांच और स्थानीय प्रशासन की अनुमति जरूरी होती है। सड़क बनने के बाद अब श्रद्धालु धारचूला, गुंजी और जोलिंगकोंग तक वाहनों से पहुंचकर पार्वती सरोवर और गौरी कुंड के साथ आदि कैलाश के दर्शन कर सकते हैं।

वहीं, कैलाश पर्वत तिब्बत (चीन) में स्थित है और उसके पास पवित्र मानसरोवर झील है। वहां की यात्रा अंतरराष्ट्रीय होने के कारण पासपोर्ट-वीजा और भारत सरकार की आधिकारिक प्रक्रिया से होकर गुजरती है। यह यात्रा अधिक कठिन मानी जाती है, जिसमें ऊंचाई वाले इलाके में ट्रेकिंग और कैलाश पर्वत की परिक्रमा करनी पड़ती है। धार्मिक दृष्टि से कैलाश पर्वत को भगवान शिव का मुख्य धाम माना जाता है, जबकि आदि कैलाश को उसका प्रतीकात्मक स्वरूप या ‘छोटा कैलाश’ कहा जाता है।

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ये खबर भी पढ़ें :

कैलाश मानसरोवर का पुराना पैदल मार्ग हो रहा विलुप्त: यात्री विश्राम के लिए बनी धर्मशालाएं खंडहर; एक्सपर्ट बोले- धरोहर का हो संरक्षण

कैलाश मानसरोवर यात्रा का 400 किलोमीटर लंबा मार्ग, जिस पर कभी भक्तों के कदमों की आहट और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे गूंजते थे, अब सिमटता जा रहा है। यह मार्ग कहीं सड़क निर्माण में कट गया तो कहीं जंगलों में गुम हो गया है। यात्रियों और व्यापारियों के ठहरने के लिए बनी करीब 500 धर्मशालाएं भी खंडहर में बदल रही हैं। (पढ़ें पूरी खबर)

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