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Elon Musk SpaceX Story: Trillionaire on 55th Birthday

Elon Musk SpaceX Story: Trillionaire on 55th Birthday
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  • Elon Musk SpaceX Story: Trillionaire On 55th Birthday | 3 Rocket Failures

वॉशिंगटन14 मिनट पहले

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साल 2008 में जब पूरी दुनिया मंदी की कगार पर खड़ी थी, अमेरिकी शेयर बाजार क्रैश हो चुका था और बड़ी-बड़ी बिलियन डॉलर कंपनियां मिट्टी में मिल रही थीं। तब एक इंसान जिसका नाम इलॉन मस्क था वो अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा जुआ खेल रहा था।

तीन रॉकेट लॉन्च फेल हो चुके थे। दूसरी कंपनी टेस्ला भी डूब रही थी। उसने अपना आखिरी एक-एक पैसा आखिरी रॉकेट लॉन्च पर लगा दिया। अगर ये फेल होता तो वो दिवालिया हो जाते। उनकी पूर्व पत्नी तालुलाह राइली बताती हैं, “मस्क खुद से बातें करने लगे थे, हाथ फैलाकर जोर-जोर से चिल्लाते थे। लगता था कि उन्हें दिल का दौरा न पड़ जाएगा।”

लेकिन आज इसी रॉकेट कंपनी स्पेसएक्स के आईपीओ ने मस्क को दुनिया का पहला ट्रिलियनेयर बना दिया है। यानी उनकी नेटवर्थ 94 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गई। आज 28 जून 2026 को मस्क 55 साल के हो गए हैं। इस मौक पर स्पेसएक्स की कहानी…

12 जून 2026 को इलॉन मस्क दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बने थे। उनकी नेटवर्थ 95 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गई थी। अमेरिकी शेयर बाजार नैस्डैक पर स्पेसएक्स के शेयर की ट्रेडिंग 150 डॉलर प्रति शेयर पर शुरू हुई। जिसके बागद मस्क की कुल नेटवर्थ 1.1 ट्रिलियन डॉलर हो गई।

12 जून 2026 को इलॉन मस्क दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बने थे। उनकी नेटवर्थ 95 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गई थी। अमेरिकी शेयर बाजार नैस्डैक पर स्पेसएक्स के शेयर की ट्रेडिंग 150 डॉलर प्रति शेयर पर शुरू हुई। जिसके बागद मस्क की कुल नेटवर्थ 1.1 ट्रिलियन डॉलर हो गई।

जब मस्क ने अपनी पूरा पैसा रिस्की बिजनेस में दांव पर लगा दिया…

इस कहानी की शुरुआत 1990 के दशक से होती है। उन्होंने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से ड्रॉपआउट कर ‘जिप 2’ नाम की ऑनलाइन सिटी गाइड शुरू की, जिसे कॉम्पेक ने 37 मिलियन डॉलर में खरीदा। इसके बाद उन्होंने ‘x.com’ बनाया जो आगे चलकर पेपाल बना।

जब इसे eBay ने 1.5 बिलियन डॉलर में खरीदा, तो मस्क के हिस्से 180 मिलियन डॉलर आए। मस्क ने इस पूरी रकम को तीन बेहद रिस्की बिजनेस में लगा दिया। 100 मिलियन डॉलर स्पेसेक्स में, 70 मिलियन डॉलर टेस्ला में और 10 मिलियन डॉलर सोलर में।

वो ताना जिसने मस्क को रॉकेट साइंटिस्ट बना दिया…

साल 2001 में मस्क रूस गए थे। वे पुरानी रीफर्बिश्ड इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल खरीदना चाहते थे। रूसियों ने उनका मजाक उड़ाते हुए ताना मारा, “शायद यह इंसान एलियंस को भी पैसे ट्रांसफर करना चाहता है, mars.com। पूरी गैलेक्सी में फ्री मनी ट्रांसफर!”

जब मस्क ने एक रॉकेट के लिए 8 मिलियन डॉलर देने की बात की, तो रूसी अधिकारी ने हंसते हुए कहा, “8 मिलियन डॉलर में मैं तुम्हें रॉकेट्स का ब्रोशर और एक वोदका की बोतल फ्री दे सकता हूं।” रूसियों ने एक रॉकेट की कीमत 18 से 21 मिलियन डॉलर तक बढ़ा दी।

मस्क समझ गए कि इनसे बात करना बेकार है। उन्होंने तय किया कि वे अपना रॉकेट खुद बनाएंगे। उन्होंने कैलकुलेट किया कि रॉकेट बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल जैसे टाइटेनियम, कॉपर और कार्बन फाइबर की असली कीमत रॉकेट की फाइनल प्राइस के 2% से भी कम है। यानी बाकी का 98% हिस्सा सप्लायर्स का मुनाफा था।

नासा एक साधारण लैच यानी दरवाजे की कुंडी भी 1,500 डॉलर में खरीदती थीं क्योंकि वह “एयरोस्पेस ग्रेड” थी। मस्क ने तुरंत एक हार्डवेयर स्टोर से 30 डॉलर का बाथरूम लैच बुलवाया और अपनी टीम से बोला “यह लैच चांद पर भी दरवाजा बंद करेगा और मंगल पर भी।”

इस तरह उन्होंने खर्च को 49 गुना कम कर दिया। उन्होंने 200 डॉलर प्रति किलो में बिकने वाले कार्बन फाइबर की जगह 3 से 4 डॉलर प्रति किलो वाले स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल शुरू किया।

तीन फेलियर के बाद मस्क को कामयाबी मिली…

  • फ्लाइट 1 (24 मार्च, 2006): इसे ओमेलेक आइलैंड लॉन्च साइट से छोड़ा गया था। उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद रॉकेट की फ्यूल लाइन में आग लग गई और यह क्रैश हो गया।
  • फ्लाइट 2 (21 मार्च, 2007): यह दूसरी उड़ान थी। शुरुआती दौर में तो रॉकेट ने अच्छा काम किया, लेकिन बाद में यह अनियंत्रित होकर घूमने लगा और ऑर्बिट तक नहीं पहुंच पाया।
  • फ्लाइट 3 (3 अगस्त, 2008): इस मिशन में रॉकेट का पहला हिस्सा कामयाबी से अलग तो हो गया, लेकिन थोड़ी सी गड़बड़ी हो गई। बचे हुए थ्रस्ट में थोड़ी देरी होने की वजह से पहला और दूसरा हिस्सा आपस में टकरा गए, जिससे रॉकेट तबाह हो गया।
2008 में एक फेल लॉन्च के मलबे को टटोलते हुए इलॉन मस्क। मस्क के तीन रॉकेट लॉन्च लगातार फेल हुए थे, जिसके बाद वह पूरी तरह दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गए थे।

2008 में एक फेल लॉन्च के मलबे को टटोलते हुए इलॉन मस्क। मस्क के तीन रॉकेट लॉन्च लगातार फेल हुए थे, जिसके बाद वह पूरी तरह दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गए थे।

  • फ्लाइट 4 (28 सितंबर, 2008): यह कंपनी के लिए ‘करो या मरो’ जैसी कोशिश थी। इस बार फॉल्कन 1 ने सही उड़ान भरी। डमी पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा में पहुंचा दिया। इसने स्पेसएक्स को ऑर्बिट तक पहुंचने वाली पहली प्राइवेट कंपनी बना दिया।

जब फाल्कन-9 ने रॉकेट साइंस के नियम बदल दिए…

जब मस्क ने रीयूजेबल रॉकेट्स बनाने की बात की थी, तो रूसी एक्सपर्ट्स ने हंसते हुए कहा था, “रॉकेट को दोबारा उड़ाना ऐसा ही है जैसे पानी पीकर वापस बोतल में थूकना और फिर उसे पी लेना! यह बकवास है। लेकिन स्पेसेक्स ने इसे भी सच कर दिखाया।

कंपनी ने 22 दिसंबर 2015 को पहला रीयूजेबल रॉकेट फाल्कन 9 लॉन्च और लैंड कराया। इलॉन मस्क दुनिया का सबसे ताकतवर रॉकेट स्टारशिप भी बना रहे हैं। वे इस पूरी तरह से रीयूजेबल रॉकेट से इंसानों को मंगल ग्रह पर भेजना चाहते हैं।

एक रॉकेट के फर्स्ट स्टेज पर 36 से 48 मिलियन डॉलर का खर्च आता है। पुरानी कंपनियां इसे समंदर में कचरे की तरह गिरा देती थीं, लेकिन स्पेसएक्स का फाल्कन 9 रॉकेट ऊपर जाता है और उसका फर्स्ट स्टेज वापस आकर सीधे जमीन या शिप पर वर्टिकली लैंड कर जाता है।

स्पेसएक्स ने 22 दिसंबर 2015 को पहला रीयूजेबल रॉकेट फाल्कन 9 लॉन्च और लैंड कराया था।

स्पेसएक्स ने 22 दिसंबर 2015 को पहला रीयूजेबल रॉकेट फाल्कन 9 लॉन्च और लैंड कराया था।

सुनीता विलियम्स को भी मस्क का स्पेसक्राफ्ट वापस लाया

आज इलॉन मस्क की इसी कॉस्ट-कटिंग स्ट्रेटजी की बदौलत स्पेसएक्स का ग्लोबल कॉमर्शियल लॉन्च मार्केट के 60% हिस्से पर अकेले इसी का कब्जा है। आज हालत यह है कि जहां बोइंग जैसी सदियों पुरानी कंपनी का स्पेसक्राफ्ट सुनीता विलियम्स को स्पेस स्टेशन से वापस लाने में फेल रहा, तो स्पेसएक्स का ‘ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट उन्हें सुरक्षित वापस लेकर आया।

स्पेसएक्स का चांद पर भी बस्ती बसाने का प्लान

इलॉन मस्क का चांद पर भी AI सैटेलाइट फैक्ट्री लगाने का प्लान है। मस्क ने हाल ही में इसकी घोषणा की थी। उन्होंने बताया था कि वे इसके जरिए सूरज की ऊर्जा कैप्चर करना चाहते हैं।

मस्क का प्लान है कि धरती की सीमित बिजली पर निर्भर रहने के बजाय चांद को एक बड़ी फैक्ट्री बनाई जाए, जहां से लाखों एआई सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में भेजे जा सकें। चांद की कम ग्रेविटी की वजह से इन सैटेलाइट्स को बहुत कम खर्च में तैनात किया जा सकेगा।

इन सैटेलाइट्स में लगे पैनल सूरज की असीमित ऊर्जा को कैप्चर करेंगे। शुरुआत में इस ऊर्जा का इस्तेमाल स्पेस डेटा सेंटर्स को चलाने में होगा, जिससे AI को असीमित सोचने और काम करने की शक्ति मिलेगी। पृथ्वी पर कम ऊर्जा के कारण ऐसा संभव नहीं है।

इसके बाद आने वाले सालों में जब हमारे पास सूरज की असीमित ऊर्जा को कैप्चर करने की टेक्नोलॉजी आ जाएगी तो स्पेसशिप को चलाने के लिए ईंधन की चिंता नहीं जाएगी। ये जहाज हमें दूसरे ग्रहों तक ले जाएंगे। अंतरिक्ष में ही खाने-पीने का इंतजाम हो सकेगा।

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साल 2008 में जब पूरी दुनिया मंदी की कगार पर खड़ी थी, अमेरिकी शेयर बाजार क्रैश हो चुका था और बड़ी-बड़ी बिलियन डॉलर कंपनियां मिट्टी में मिल रही थीं। तब एक इंसान जिसका नाम इलॉन मस्क था वो अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा जुआ खेल रहा था।

तीन रॉकेट लॉन्च फेल हो चुके थे। दूसरी कंपनी टेस्ला भी डूब रही थी। उसने अपना आखिरी एक-एक पैसा आखिरी रॉकेट लॉन्च पर लगा दिया। अगर ये फेल होता तो वो दिवालिया हो जाते। उनकी पूर्व पत्नी तालुलाह राइली बताती हैं, “मस्क खुद से बातें करने लगे थे, हाथ फैलाकर जोर-जोर से चिल्लाते थे। लगता था कि उन्हें दिल का दौरा न पड़ जाएगा।”

लेकिन आज इसी रॉकेट कंपनी स्पेसएक्स के आईपीओ ने मस्क को दुनिया का पहला ट्रिलियनेयर बना दिया है। यानी उनकी नेटवर्थ 94 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो गई। आज 28 जून 2026 को मस्क 55 साल के हो गए हैं। इस मौक पर स्पेसएक्स की कहानी…

12 जून 2026 को इलॉन मस्क दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बने थे। उनकी नेटवर्थ 95 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गई थी। अमेरिकी शेयर बाजार नैस्डैक पर स्पेसएक्स के शेयर की ट्रेडिंग 150 डॉलर प्रति शेयर पर शुरू हुई। जिसके बागद मस्क की कुल नेटवर्थ 1.1 ट्रिलियन डॉलर हो गई।

12 जून 2026 को इलॉन मस्क दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बने थे। उनकी नेटवर्थ 95 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गई थी। अमेरिकी शेयर बाजार नैस्डैक पर स्पेसएक्स के शेयर की ट्रेडिंग 150 डॉलर प्रति शेयर पर शुरू हुई। जिसके बागद मस्क की कुल नेटवर्थ 1.1 ट्रिलियन डॉलर हो गई।

जब मस्क ने अपनी पूरा पैसा रिस्की बिजनेस में दांव पर लगा दिया…

इस कहानी की शुरुआत 1990 के दशक से होती है। उन्होंने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से ड्रॉपआउट कर ‘जिप 2’ नाम की ऑनलाइन सिटी गाइड शुरू की, जिसे कॉम्पेक ने 37 मिलियन डॉलर में खरीदा। इसके बाद उन्होंने ‘x.com’ बनाया जो आगे चलकर पेपाल बना।

जब इसे eBay ने 1.5 बिलियन डॉलर में खरीदा, तो मस्क के हिस्से 180 मिलियन डॉलर आए। मस्क ने इस पूरी रकम को तीन बेहद रिस्की बिजनेस में लगा दिया। 100 मिलियन डॉलर स्पेसेक्स में, 70 मिलियन डॉलर टेस्ला में और 10 मिलियन डॉलर सोलर में।

वो ताना जिसने मस्क को रॉकेट साइंटिस्ट बना दिया…

साल 2001 में मस्क रूस गए थे। वे पुरानी रीफर्बिश्ड इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल खरीदना चाहते थे। रूसियों ने उनका मजाक उड़ाते हुए ताना मारा, “शायद यह इंसान एलियंस को भी पैसे ट्रांसफर करना चाहता है, mars.com। पूरी गैलेक्सी में फ्री मनी ट्रांसफर!”

जब मस्क ने एक रॉकेट के लिए 8 मिलियन डॉलर देने की बात की, तो रूसी अधिकारी ने हंसते हुए कहा, “8 मिलियन डॉलर में मैं तुम्हें रॉकेट्स का ब्रोशर और एक वोदका की बोतल फ्री दे सकता हूं।” रूसियों ने एक रॉकेट की कीमत 18 से 21 मिलियन डॉलर तक बढ़ा दी।

मस्क समझ गए कि इनसे बात करना बेकार है। उन्होंने तय किया कि वे अपना रॉकेट खुद बनाएंगे। उन्होंने कैलकुलेट किया कि रॉकेट बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल जैसे टाइटेनियम, कॉपर और कार्बन फाइबर की असली कीमत रॉकेट की फाइनल प्राइस के 2% से भी कम है। यानी बाकी का 98% हिस्सा सप्लायर्स का मुनाफा था।

नासा एक साधारण लैच यानी दरवाजे की कुंडी भी 1,500 डॉलर में खरीदती थीं क्योंकि वह “एयरोस्पेस ग्रेड” थी। मस्क ने तुरंत एक हार्डवेयर स्टोर से 30 डॉलर का बाथरूम लैच बुलवाया और अपनी टीम से बोला “यह लैच चांद पर भी दरवाजा बंद करेगा और मंगल पर भी।”

इस तरह उन्होंने खर्च को 49 गुना कम कर दिया। उन्होंने 200 डॉलर प्रति किलो में बिकने वाले कार्बन फाइबर की जगह 3 से 4 डॉलर प्रति किलो वाले स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल शुरू किया।

तीन फेलियर के बाद मस्क को कामयाबी मिली…

  • फ्लाइट 1 (24 मार्च, 2006): इसे ओमेलेक आइलैंड लॉन्च साइट से छोड़ा गया था। उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद रॉकेट की फ्यूल लाइन में आग लग गई और यह क्रैश हो गया।
  • फ्लाइट 2 (21 मार्च, 2007): यह दूसरी उड़ान थी। शुरुआती दौर में तो रॉकेट ने अच्छा काम किया, लेकिन बाद में यह अनियंत्रित होकर घूमने लगा और ऑर्बिट तक नहीं पहुंच पाया।
  • फ्लाइट 3 (3 अगस्त, 2008): इस मिशन में रॉकेट का पहला हिस्सा कामयाबी से अलग तो हो गया, लेकिन थोड़ी सी गड़बड़ी हो गई। बचे हुए थ्रस्ट में थोड़ी देरी होने की वजह से पहला और दूसरा हिस्सा आपस में टकरा गए, जिससे रॉकेट तबाह हो गया।
2008 में एक फेल लॉन्च के मलबे को टटोलते हुए इलॉन मस्क। मस्क के तीन रॉकेट लॉन्च लगातार फेल हुए थे, जिसके बाद वह पूरी तरह दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गए थे।

2008 में एक फेल लॉन्च के मलबे को टटोलते हुए इलॉन मस्क। मस्क के तीन रॉकेट लॉन्च लगातार फेल हुए थे, जिसके बाद वह पूरी तरह दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गए थे।

  • फ्लाइट 4 (28 सितंबर, 2008): यह कंपनी के लिए ‘करो या मरो’ जैसी कोशिश थी। इस बार फॉल्कन 1 ने सही उड़ान भरी। डमी पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा में पहुंचा दिया। इसने स्पेसएक्स को ऑर्बिट तक पहुंचने वाली पहली प्राइवेट कंपनी बना दिया।

जब फाल्कन-9 ने रॉकेट साइंस के नियम बदल दिए…

जब मस्क ने रीयूजेबल रॉकेट्स बनाने की बात की थी, तो रूसी एक्सपर्ट्स ने हंसते हुए कहा था, “रॉकेट को दोबारा उड़ाना ऐसा ही है जैसे पानी पीकर वापस बोतल में थूकना और फिर उसे पी लेना! यह बकवास है। लेकिन स्पेसेक्स ने इसे भी सच कर दिखाया।

कंपनी ने 22 दिसंबर 2015 को पहला रीयूजेबल रॉकेट फाल्कन 9 लॉन्च और लैंड कराया। इलॉन मस्क दुनिया का सबसे ताकतवर रॉकेट स्टारशिप भी बना रहे हैं। वे इस पूरी तरह से रीयूजेबल रॉकेट से इंसानों को मंगल ग्रह पर भेजना चाहते हैं।

एक रॉकेट के फर्स्ट स्टेज पर 36 से 48 मिलियन डॉलर का खर्च आता है। पुरानी कंपनियां इसे समंदर में कचरे की तरह गिरा देती थीं, लेकिन स्पेसएक्स का फाल्कन 9 रॉकेट ऊपर जाता है और उसका फर्स्ट स्टेज वापस आकर सीधे जमीन या शिप पर वर्टिकली लैंड कर जाता है।

स्पेसएक्स ने 22 दिसंबर 2015 को पहला रीयूजेबल रॉकेट फाल्कन 9 लॉन्च और लैंड कराया था।

स्पेसएक्स ने 22 दिसंबर 2015 को पहला रीयूजेबल रॉकेट फाल्कन 9 लॉन्च और लैंड कराया था।

सुनीता विलियम्स को भी मस्क का स्पेसक्राफ्ट वापस लाया

आज इलॉन मस्क की इसी कॉस्ट-कटिंग स्ट्रेटजी की बदौलत स्पेसएक्स का ग्लोबल कॉमर्शियल लॉन्च मार्केट के 60% हिस्से पर अकेले इसी का कब्जा है। आज हालत यह है कि जहां बोइंग जैसी सदियों पुरानी कंपनी का स्पेसक्राफ्ट सुनीता विलियम्स को स्पेस स्टेशन से वापस लाने में फेल रहा, तो स्पेसएक्स का ‘ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट उन्हें सुरक्षित वापस लेकर आया।

स्पेसएक्स का चांद पर भी बस्ती बसाने का प्लान

इलॉन मस्क का चांद पर भी AI सैटेलाइट फैक्ट्री लगाने का प्लान है। मस्क ने हाल ही में इसकी घोषणा की थी। उन्होंने बताया था कि वे इसके जरिए सूरज की ऊर्जा कैप्चर करना चाहते हैं।

मस्क का प्लान है कि धरती की सीमित बिजली पर निर्भर रहने के बजाय चांद को एक बड़ी फैक्ट्री बनाई जाए, जहां से लाखों एआई सैटेलाइट्स अंतरिक्ष में भेजे जा सकें। चांद की कम ग्रेविटी की वजह से इन सैटेलाइट्स को बहुत कम खर्च में तैनात किया जा सकेगा।

इन सैटेलाइट्स में लगे पैनल सूरज की असीमित ऊर्जा को कैप्चर करेंगे। शुरुआत में इस ऊर्जा का इस्तेमाल स्पेस डेटा सेंटर्स को चलाने में होगा, जिससे AI को असीमित सोचने और काम करने की शक्ति मिलेगी। पृथ्वी पर कम ऊर्जा के कारण ऐसा संभव नहीं है।

इसके बाद आने वाले सालों में जब हमारे पास सूरज की असीमित ऊर्जा को कैप्चर करने की टेक्नोलॉजी आ जाएगी तो स्पेसशिप को चलाने के लिए ईंधन की चिंता नहीं जाएगी। ये जहाज हमें दूसरे ग्रहों तक ले जाएंगे। अंतरिक्ष में ही खाने-पीने का इंतजाम हो सकेगा।

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