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Supreme Court Packaged Food Warning; FSSAI Mandatory FOPL Update; Front-of-Package Nutrition Labeling

Supreme Court Packaged Food Warning; FSSAI Mandatory FOPL Update; Front-of-Package Nutrition Labeling
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3 दिन पहलेलेखक: अदिति ओझा

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हम अक्सर चिप्स, कुकीज या नमकीन का पैकेट खरीदते हैं और खा लेते हैं। बहुत कम लोग पैकेट को पलटकर उसके पीछे देखते हैं कि जो फूड वो खा रहे हैं, उसकी न्यूट्रिशनल वैल्यू क्या है। उसमें कितना शुगर, नमक या फैट है। पैकेट पर लिखी ये इंफॉर्मेशन ही बताती है कि फूड कितना हेल्दी है या कितना अनहेल्दी।

लेकिन अगर यह जानकारी पैकेट के फ्रंट पर रंगों और ग्राफिक्स के साथ आसान तरीके से लिखी हो तो एक ही नजर में बहुत आसानी से ये जानकारी हमें मिल जाएगी। हमारे लिए हेल्दी फूड का चुनाव भी आसान हो जाएगा। इसे ‘फ्रंट‑ऑफ‑पैक लेबलिंग’ कहते हैं।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) और केंद्र सरकार को एक जरूरी निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि पैकेज्ड फूड पर “फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल” लगाने पर विचार किया जाए।

यह लेबल पैकेट के सामने ही जरूरी जानकारी दिखाएगा ताकि कंज्यूमर खरीदने से पहले ही जान सकें कि उसमें कितना शुगर, नमक और फैट है।

इसलिए आज जरूरत की खबर में जानेंगे कि-

  • फ्रंट‑ऑफ‑पैक लेबलिंग क्या है?
  • फ्रंट‑ऑफ‑पैक लेबलिंग क्यों जरूरी है?
  • कैसे यह गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है?

एक्सपर्ट: डॉ. नरेंद्र कुमार सिंगला, प्रिंसिपल कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट, दिल्ली

सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ क्या है?

जवाब- फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL) वह लेबल है, जो किसी फूड प्रोडक्ट के पैकेट के आगे के हिस्से में लिखा रहता है। इसमें खाने के मेन इंग्रीडिएंट्स जैसे शुगर, नमक और फैट की जानकारी को आसान और जल्दी समझ आने वाले तरीके से दिखाया जाता है।

इसका मकसद ये है कि ग्राहक तुरंत समझ सके कि वो जो फूड खरीद रहा है, वह स्वास्थ्य के लिए कितना सही है। ये जानकारी पैकेट के बैक पर लिखे लंबे‑चौड़े न्यूट्रिशनल फैक्ट्स से अलग होती है। इसमें सिर्फ जरूरी जानकारी को सरल ग्राफिक्स या रंगों के जरिए दिखाया जाता है।

सवाल- मौजूदा पैकेज्ड फूड पर फूड से जुड़ी न्यूट्रिशनल जानकारी कहां लिखी होती है?

जवाब- यह आमतौर पर पैकेज्ड फूड के पीछे या किनारे पर एक टेबल के फॉर्म में लिखी होती है। यह जानकारी प्रोडक्ट के 100 ग्राम, 100 मिलीलीटर या हर सर्विंग में मौजूद न्यूट्रिशनल वैल्यू जैसे- कैलोरी, फैट, प्रोटीन, शुगर और सोडियम की मात्रा बताती है।

सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से क्या पता चलता है?

जवाब- फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग से पता चलता है कि फूड हेल्दी है या अनहेल्दी। उसमें कितनी कैलोरी, शुगर, नमक और फैट है और क्या वह स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें–

सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ क्यों जरूरी है?

जवाब- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ इसलिए जरूरी है ताकि लोग पैकेज्ड फूड खरीदते समय जल्दी और स्पष्ट रूप से उसके हेल्थ इम्पैक्ट को समझ सकें। इससे उनके लिए हेल्दी ऑप्शन्स चुनना आसान हो जाएगा और अनहेल्दी फूड के अधिक सेवन को रोका जा सकेगा।

सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से हमें क्या फायदा होगा?

जवाब- फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग का मकसद न्यूट्रिशन की जटिल जानकारी को सरल बनाना है, ताकि ग्राहक खरीदते समय ही बेहतर फैसला ले सकें और अनहेल्दी विकल्पों से बच सकें। नीचे दिए ग्राफिक से इसके फायदे समझिए-

सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से लोगों की सेहत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

जवाब- न्यूट्रिशनल वैल्यू पढ़कर लोग तय कर पाएंगे कि उनके लिए वो फूड कितना हेल्दी है। साथ ही इससे कई गंभीर बीमारियों का रिस्क कम हो सकेगा, जैसेकि मोटापा, डायबिटीज, हार्ट डिजीज। यह हेल्दी ईटिंग हैबिट्स को भी बढ़ावा देगा। नीचे दिए ग्राफिक से सेहत पर इसका प्रभाव समझिए-

सवाल- सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) को यह निर्देश क्यों दिया है कि वह हरेक पैकेज्ड खाद्य पदार्थ पर ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ लगाने पर विचार करें?

जवाब- देश में लाइफस्टाइल बीमारियां तेजी से बढ़ रही है। इसकी बड़ी वजह अनहेल्दी खान-पान है। पैकेज्ड और अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड में मौजूद अधिक शुगर, नमक और फैट की मात्रा इन बीमारियों का बड़ा कारण बन रही है।

इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से कहा है कि वह पैकेज्ड फूड पर ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ लागू करने पर गंभीरता से विचार करे, ताकि लोग खरीदते समय ही संभावित हेल्थ रिस्क समझ सकें। ग्राफिक से समझते हैं कि भारत में लाइफस्टाइल बीमारियों की स्थिति कितनी गंभीर है-

सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से ये पता लगाने में कैसे मदद मिलेगी कि कोई पैकेज्ड फूड कितना हेल्दी है?

जवाब- फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग फूड की हेल्थ ग्रेडिंग की तरह काम करती है। जैसे ‘हाई शुगर’ वाला लेबल आपको चेतावनी देता है कि यह फूड बार-बार खाने के लिए हेल्दी नहीं है।

वहीं ‘लो फैट/लो सॉल्ट’ वाला संकेत हेल्दी विकल्प चुनने में मदद करता है। इस तरह ग्राहक को एक नजर में ही यह समझ आता है कि कोई पैकेज्ड फूड हेल्थ के लिए सुरक्षित, संतुलित या जोखिम भरा है।

साथ ही कई देशों में ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ को तीन अलग रंगों से दिखाया जाता है। जिस फूड में सॉल्ट, शुगर फैट की मात्रा ज्यादा होती है, उस पर रेड लेबल होता है और जिसमें कम होती है, उस पर ग्रीन लेबल होता है।

ऐसे में लोग बिना न्यूट्रिशन डिटेल्स पढ़े सिर्फ रंग देखकर यह जान सकते हैं कि फूड हेल्दी है या अनहेल्दी। आंख मूंदकर वे ग्रीन लेबल वाले फूड खरीद सकते हैं या ये तय कर सकते हैं कि रेड लेबल वाले फूड महीने में एक–दो बार ही खाना है।

सवाल- क्या यह लेबलिंग मोटापा, डायबिटीज और हाई BP जैसी बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है?

जवाब- लेबलिंग हमें सिर्फ जागरूक करने में मदद करती है। ये इस बात की गारंटी नहीं है कि अब गंभीर बीमारियां नहीं होंगी। लेबलिंग सिर्फ हमें यह बताएगी कि फूड अनहेल्दी है, लेकिन अगर फिर भी हम उसे खाते हैं तो हम बीमारियों का रिस्क बढ़ा रहे होंगे। ये जरूर कहा जा सकता है कि लोग जो भी फैसला करें, वह एक इंफॉर्म्ड फैसला होगा।

सवाल- पैकेज्ड फूड में वो कौन से तत्व होते हैं, जो सेहत के लिए सबसे ज्यादा हानिकारक हैं?

जवाब- हर पैकेज्ड फूड हानिकारक नहीं होता, लेकिन कुछ तत्व ऐसे हैं, जिनका ज्यादा सेवन शरीर के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। डिटेल नीचे ग्राफिक से समझिए-

सवाल- कितनी मात्रा में पैकेज्ड फूड लेना सेफ है?

जवाब- पैकेज्ड फूड को सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए। महीने में एक बार या विशेष अवसरों पर ले सकते हैं।

सवाल- पैकेज्ड फूड के हेल्दी ऑप्शन क्या हैं?

जवाब- पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड के बजाय ऐसे विकल्प चुनना बेहतर है, जो कम प्रोसेस्ड, प्राकृतिक और पोषक तत्वों से भरपूर हों। पॉइंटर्स से समझते हैं-

  • ताजे फल, हरी सब्जियां खाएं।
  • बिना नमक वाले नट्स और बीज खाएं।
  • साबुत अनाज खाएं।
  • घर का बना खाना खाएं।

ये ऑप्शन शरीर को जरूरी विटामिन, फाइबर और मिनरल देते हैं। साथ ही अतिरिक्त शुगर, सोडियम और ट्रांस फैट से बचाते हैं।

…………………………

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लेकिन अगर यह जानकारी पैकेट के फ्रंट पर रंगों और ग्राफिक्स के साथ आसान तरीके से लिखी हो तो एक ही नजर में बहुत आसानी से ये जानकारी हमें मिल जाएगी। हमारे लिए हेल्दी फूड का चुनाव भी आसान हो जाएगा। इसे ‘फ्रंट‑ऑफ‑पैक लेबलिंग’ कहते हैं।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) और केंद्र सरकार को एक जरूरी निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि पैकेज्ड फूड पर “फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल” लगाने पर विचार किया जाए।

यह लेबल पैकेट के सामने ही जरूरी जानकारी दिखाएगा ताकि कंज्यूमर खरीदने से पहले ही जान सकें कि उसमें कितना शुगर, नमक और फैट है।

इसलिए आज जरूरत की खबर में जानेंगे कि-

  • फ्रंट‑ऑफ‑पैक लेबलिंग क्या है?
  • फ्रंट‑ऑफ‑पैक लेबलिंग क्यों जरूरी है?
  • कैसे यह गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है?

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सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ क्या है?

जवाब- फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL) वह लेबल है, जो किसी फूड प्रोडक्ट के पैकेट के आगे के हिस्से में लिखा रहता है। इसमें खाने के मेन इंग्रीडिएंट्स जैसे शुगर, नमक और फैट की जानकारी को आसान और जल्दी समझ आने वाले तरीके से दिखाया जाता है।

इसका मकसद ये है कि ग्राहक तुरंत समझ सके कि वो जो फूड खरीद रहा है, वह स्वास्थ्य के लिए कितना सही है। ये जानकारी पैकेट के बैक पर लिखे लंबे‑चौड़े न्यूट्रिशनल फैक्ट्स से अलग होती है। इसमें सिर्फ जरूरी जानकारी को सरल ग्राफिक्स या रंगों के जरिए दिखाया जाता है।

सवाल- मौजूदा पैकेज्ड फूड पर फूड से जुड़ी न्यूट्रिशनल जानकारी कहां लिखी होती है?

जवाब- यह आमतौर पर पैकेज्ड फूड के पीछे या किनारे पर एक टेबल के फॉर्म में लिखी होती है। यह जानकारी प्रोडक्ट के 100 ग्राम, 100 मिलीलीटर या हर सर्विंग में मौजूद न्यूट्रिशनल वैल्यू जैसे- कैलोरी, फैट, प्रोटीन, शुगर और सोडियम की मात्रा बताती है।

सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से क्या पता चलता है?

जवाब- फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग से पता चलता है कि फूड हेल्दी है या अनहेल्दी। उसमें कितनी कैलोरी, शुगर, नमक और फैट है और क्या वह स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें–

सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ क्यों जरूरी है?

जवाब- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ इसलिए जरूरी है ताकि लोग पैकेज्ड फूड खरीदते समय जल्दी और स्पष्ट रूप से उसके हेल्थ इम्पैक्ट को समझ सकें। इससे उनके लिए हेल्दी ऑप्शन्स चुनना आसान हो जाएगा और अनहेल्दी फूड के अधिक सेवन को रोका जा सकेगा।

सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से हमें क्या फायदा होगा?

जवाब- फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग का मकसद न्यूट्रिशन की जटिल जानकारी को सरल बनाना है, ताकि ग्राहक खरीदते समय ही बेहतर फैसला ले सकें और अनहेल्दी विकल्पों से बच सकें। नीचे दिए ग्राफिक से इसके फायदे समझिए-

सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से लोगों की सेहत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

जवाब- न्यूट्रिशनल वैल्यू पढ़कर लोग तय कर पाएंगे कि उनके लिए वो फूड कितना हेल्दी है। साथ ही इससे कई गंभीर बीमारियों का रिस्क कम हो सकेगा, जैसेकि मोटापा, डायबिटीज, हार्ट डिजीज। यह हेल्दी ईटिंग हैबिट्स को भी बढ़ावा देगा। नीचे दिए ग्राफिक से सेहत पर इसका प्रभाव समझिए-

सवाल- सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) को यह निर्देश क्यों दिया है कि वह हरेक पैकेज्ड खाद्य पदार्थ पर ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ लगाने पर विचार करें?

जवाब- देश में लाइफस्टाइल बीमारियां तेजी से बढ़ रही है। इसकी बड़ी वजह अनहेल्दी खान-पान है। पैकेज्ड और अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड में मौजूद अधिक शुगर, नमक और फैट की मात्रा इन बीमारियों का बड़ा कारण बन रही है।

इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से कहा है कि वह पैकेज्ड फूड पर ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ लागू करने पर गंभीरता से विचार करे, ताकि लोग खरीदते समय ही संभावित हेल्थ रिस्क समझ सकें। ग्राफिक से समझते हैं कि भारत में लाइफस्टाइल बीमारियों की स्थिति कितनी गंभीर है-

सवाल- ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से ये पता लगाने में कैसे मदद मिलेगी कि कोई पैकेज्ड फूड कितना हेल्दी है?

जवाब- फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग फूड की हेल्थ ग्रेडिंग की तरह काम करती है। जैसे ‘हाई शुगर’ वाला लेबल आपको चेतावनी देता है कि यह फूड बार-बार खाने के लिए हेल्दी नहीं है।

वहीं ‘लो फैट/लो सॉल्ट’ वाला संकेत हेल्दी विकल्प चुनने में मदद करता है। इस तरह ग्राहक को एक नजर में ही यह समझ आता है कि कोई पैकेज्ड फूड हेल्थ के लिए सुरक्षित, संतुलित या जोखिम भरा है।

साथ ही कई देशों में ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ को तीन अलग रंगों से दिखाया जाता है। जिस फूड में सॉल्ट, शुगर फैट की मात्रा ज्यादा होती है, उस पर रेड लेबल होता है और जिसमें कम होती है, उस पर ग्रीन लेबल होता है।

ऐसे में लोग बिना न्यूट्रिशन डिटेल्स पढ़े सिर्फ रंग देखकर यह जान सकते हैं कि फूड हेल्दी है या अनहेल्दी। आंख मूंदकर वे ग्रीन लेबल वाले फूड खरीद सकते हैं या ये तय कर सकते हैं कि रेड लेबल वाले फूड महीने में एक–दो बार ही खाना है।

सवाल- क्या यह लेबलिंग मोटापा, डायबिटीज और हाई BP जैसी बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है?

जवाब- लेबलिंग हमें सिर्फ जागरूक करने में मदद करती है। ये इस बात की गारंटी नहीं है कि अब गंभीर बीमारियां नहीं होंगी। लेबलिंग सिर्फ हमें यह बताएगी कि फूड अनहेल्दी है, लेकिन अगर फिर भी हम उसे खाते हैं तो हम बीमारियों का रिस्क बढ़ा रहे होंगे। ये जरूर कहा जा सकता है कि लोग जो भी फैसला करें, वह एक इंफॉर्म्ड फैसला होगा।

सवाल- पैकेज्ड फूड में वो कौन से तत्व होते हैं, जो सेहत के लिए सबसे ज्यादा हानिकारक हैं?

जवाब- हर पैकेज्ड फूड हानिकारक नहीं होता, लेकिन कुछ तत्व ऐसे हैं, जिनका ज्यादा सेवन शरीर के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। डिटेल नीचे ग्राफिक से समझिए-

सवाल- कितनी मात्रा में पैकेज्ड फूड लेना सेफ है?

जवाब- पैकेज्ड फूड को सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए। महीने में एक बार या विशेष अवसरों पर ले सकते हैं।

सवाल- पैकेज्ड फूड के हेल्दी ऑप्शन क्या हैं?

जवाब- पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड के बजाय ऐसे विकल्प चुनना बेहतर है, जो कम प्रोसेस्ड, प्राकृतिक और पोषक तत्वों से भरपूर हों। पॉइंटर्स से समझते हैं-

  • ताजे फल, हरी सब्जियां खाएं।
  • बिना नमक वाले नट्स और बीज खाएं।
  • साबुत अनाज खाएं।
  • घर का बना खाना खाएं।

ये ऑप्शन शरीर को जरूरी विटामिन, फाइबर और मिनरल देते हैं। साथ ही अतिरिक्त शुगर, सोडियम और ट्रांस फैट से बचाते हैं।

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