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पायरिया और दांत दर्द होगा छूमंतर! रामबाण इलाज चिरचिटा का पौधा, जानें दातुन का चमत्कार

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मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में बड़ी मात्रा में उगने वाला चिरचिटा पौधा आयुर्वेद में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. आमतौर पर लोग इसे एक सामान्य घास समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन आयुर्वेदिक दृष्टि से यह पौधा कई गंभीर बीमारियों के उपचार में उपयोगी औषधि है. आयुर्वेद में इसे अपामार्ग कहा जाता है और ग्रामीण क्षेत्रों में इसे लटजीरा या चिरचिटा नाम से भी जाना जाता है.

आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी डॉ. विपिन सिंह ने लोकल 18 को जानकारी देते हुए बताया कि यह पौधा मानव जीवन के साथ-साथ पशुओं के लिए भी बेहद लाभकारी माना जाता है. यह पौधा खासकर बारिश के मौसम में घास के साथ खेतों और आसपास के इलाकों में आसानी से उग आता है. यदि इसका सही तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह कई रोगों के उपचार में कारगर साबित होता है. आयुर्वेद में इसका उपयोग पाचन तंत्र को मजबूत करने, रक्त को शुद्ध करने और कई प्रकार की बीमारियों के उपचार में किया जाता है.

डायरिया और अस्थमा में चिरचिटा की राख का होता है उपयोग
डॉ. विपिन सिंह ने बताया कि चिरचिटा की राख का उपयोग डायरिया और अस्थमा जैसे रोगों में किया जाता है. इसकी प्रकृति क्षारीय होती है, जिससे यह शरीर में कई तरह के विकारों को दूर करने में मदद करता है. आयुर्वेद में यह भी उल्लेख मिलता है कि फेफड़ों से जुड़े रोग जैसे टीबी और कैंसर में भी यह औषधि लाभकारी हो सकती है.

अपामार्ग की टहनी से दातुन करने का बताया फायदा
डॉ. विपिन सिंह ने कहा कि वास्तु और परंपरागत मान्यताओं में भी अपामार्ग का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि लाल अपामार्ग की टहनी से दातुन करने पर वाक सिद्धि प्राप्त होती है, यानी व्यक्ति की इच्छाएं पूरी होने की शक्ति मिलती है. वहीं अगहन महीने की पूर्णिमा के दिन इसकी जड़ का विधिपूर्वक पूजन कर हाथ में बांधने से जीवन की कई समस्याओं से मुक्ति मिलने की बात भी कही जाती है.

पशुओं की बीमारियों में भी उपयोग किया जाता है यह पौधा
डॉ. विपिन सिंह ने बताया कि औषधीय दृष्टि से यह पौधा चर्म रोग, फोड़े-फुंसी, सूजन, गठिया, मुंह के छाले, भूख न लगना, आंखों की बीमारी, रक्तस्राव रोकने, घाव, खुजली, खांसी, बुखार, पेट के रोग, बवासीर और कुष्ठ रोग जैसी कई समस्याओं में उपयोगी माना जाता है. इतना ही नहीं, पशुओं में चोट या सूजन होने पर भी इसका उपयोग पारंपरिक रूप से किया जाता है, जो काफी असरदार माना जाता है.

हालांकि चिकित्सकों का कहना है कि अपामार्ग कई बीमारियों में उपयोगी है, लेकिन इसका प्रयोग विशेषज्ञ की सलाह से ही करना चाहिए. किसी भी रोग में इसकी मात्रा और उपयोग की विधि व्यक्ति की उम्र और बीमारी की स्थिति के अनुसार आयुर्वेद चिकित्सक ही तय करते हैं, इसलिए बिना परामर्श इसके उपयोग से बचना चाहिए.

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आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी डॉ. विपिन सिंह ने लोकल 18 को जानकारी देते हुए बताया कि यह पौधा मानव जीवन के साथ-साथ पशुओं के लिए भी बेहद लाभकारी माना जाता है. यह पौधा खासकर बारिश के मौसम में घास के साथ खेतों और आसपास के इलाकों में आसानी से उग आता है. यदि इसका सही तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह कई रोगों के उपचार में कारगर साबित होता है. आयुर्वेद में इसका उपयोग पाचन तंत्र को मजबूत करने, रक्त को शुद्ध करने और कई प्रकार की बीमारियों के उपचार में किया जाता है.

डायरिया और अस्थमा में चिरचिटा की राख का होता है उपयोग
डॉ. विपिन सिंह ने बताया कि चिरचिटा की राख का उपयोग डायरिया और अस्थमा जैसे रोगों में किया जाता है. इसकी प्रकृति क्षारीय होती है, जिससे यह शरीर में कई तरह के विकारों को दूर करने में मदद करता है. आयुर्वेद में यह भी उल्लेख मिलता है कि फेफड़ों से जुड़े रोग जैसे टीबी और कैंसर में भी यह औषधि लाभकारी हो सकती है.

अपामार्ग की टहनी से दातुन करने का बताया फायदा
डॉ. विपिन सिंह ने कहा कि वास्तु और परंपरागत मान्यताओं में भी अपामार्ग का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि लाल अपामार्ग की टहनी से दातुन करने पर वाक सिद्धि प्राप्त होती है, यानी व्यक्ति की इच्छाएं पूरी होने की शक्ति मिलती है. वहीं अगहन महीने की पूर्णिमा के दिन इसकी जड़ का विधिपूर्वक पूजन कर हाथ में बांधने से जीवन की कई समस्याओं से मुक्ति मिलने की बात भी कही जाती है.

पशुओं की बीमारियों में भी उपयोग किया जाता है यह पौधा
डॉ. विपिन सिंह ने बताया कि औषधीय दृष्टि से यह पौधा चर्म रोग, फोड़े-फुंसी, सूजन, गठिया, मुंह के छाले, भूख न लगना, आंखों की बीमारी, रक्तस्राव रोकने, घाव, खुजली, खांसी, बुखार, पेट के रोग, बवासीर और कुष्ठ रोग जैसी कई समस्याओं में उपयोगी माना जाता है. इतना ही नहीं, पशुओं में चोट या सूजन होने पर भी इसका उपयोग पारंपरिक रूप से किया जाता है, जो काफी असरदार माना जाता है.

हालांकि चिकित्सकों का कहना है कि अपामार्ग कई बीमारियों में उपयोगी है, लेकिन इसका प्रयोग विशेषज्ञ की सलाह से ही करना चाहिए. किसी भी रोग में इसकी मात्रा और उपयोग की विधि व्यक्ति की उम्र और बीमारी की स्थिति के अनुसार आयुर्वेद चिकित्सक ही तय करते हैं, इसलिए बिना परामर्श इसके उपयोग से बचना चाहिए.

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