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उत्तराखंड की बेटी ने जापान में जीता ब्रॉन्ज मेडल:फटे जूतों की कहानी सुन क्रिकेटर स्नेह राणा ने दिए नए स्पाइक्स, बोलीं- हमेशा साथ निभाऊंगी

उत्तराखंड की बेटी ने जापान में जीता ब्रॉन्ज मेडल:फटे जूतों की कहानी सुन क्रिकेटर स्नेह राणा ने दिए नए स्पाइक्स, बोलीं- हमेशा साथ निभाऊंगी

रुड़की के एक छोटे से गांव की रहने वाली एथलीट सोनिया ने जापान के फुकुओका में हुई 18वीं एशियन क्रॉस कंट्री चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया है। बेहद साधारण परिवार से आने वाली सोनिया का यह सफर संघर्षों से भरा रहा, जहां संसाधनों की कमी हर कदम पर चुनौती बनकर सामने आई। बीते दिन इस संघर्ष और उपलब्धि की कहानी जब भारतीय महिला क्रिकेट टीम की स्टार ऑलराउंडर स्नेह राणा तक पहुंची, तो उन्होंने सोनिया को देहरादून स्थित अपने स्पोर्ट्स स्ट्राइव टर्फ पर बुलाया। यहां उन्होंने सोनिया को प्रोफेशनल स्पोर्ट्स शूज और बेहतर न्यूट्रिशन सपोर्ट देकर न सिर्फ मदद की, बल्कि ताउम्र साथ निभाने का भरोसा भी दिया। सोनिया के लिए यह पल भावुक कर देने वाला था। फटे जूतों में दौड़कर मेडल जीतने वाली यह एथलीट जब नए स्पाइक्स हाथ में लिए खड़ी थी, तो उसकी आंखों में सिर्फ आंसू ही नहीं, बल्कि आगे बढ़ने का नया आत्मविश्वास भी साफ दिखाई दे रहा था। टर्फ पर मिला साथ, भावुक हो गई सोनिया देहरादून के सिनोला स्थित टर्फ पर जब सोनिया पहुंचीं, तो उन्हें शायद अंदाजा भी नहीं था कि उनके लिए क्या इंतजार कर रहा है। स्नेह राणा ने उन्हें गले लगाया, हालचाल पूछा और फिर उन्हें प्रोफेशनल स्पोर्ट्स शूज और न्यूट्रिशन सपोर्ट सौंपा। यह वही चीजें थीं, जिनकी कमी सोनिया को सालों से महसूस होती रही थी। जैसे ही उन्होंने नए जूते हाथ में लिए, उनकी आंखें भर आईं। बातचीत के दौरान वह खुद को संभाल नहीं पाईं। परिवार की हालत कमजोर, बहनों ने निभाया मां का रोल सोनिया का संघर्ष सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं था। उनका पूरा बचपन आर्थिक तंगी में बीता। परिवार में चार बहनें और एक भाई हैं। पिता मजदूरी करके घर चलाते हैं और मां का निधन हो चुका है। ऐसे हालात में खेल को करियर बनाना आसान नहीं था। सोनिया बताती हैं कि कई बार ऐसा वक्त आया जब ट्रेनिंग छोड़ने का मन हुआ, लेकिन उनकी बहनों ने उन्हें कभी टूटने नहीं दिया। उन्होंने मां की कमी पूरी की, हिम्मत दी और हर मुश्किल में साथ खड़ी रहीं। यही वजह रही कि सोनिया ने हालातों के आगे घुटने नहीं टेके और अपने सपनों को जिंदा रखा। गांव के ताने, लेकिन इरादे रहे मजबूत सोनिया के सफर में सिर्फ आर्थिक परेशानियां ही नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव भी बड़ी चुनौती रहा। गांव के लोग अक्सर ताने मारते थे और परिवार से कहते थे कि लड़की को वापस बुला लो। लेकिन सोनिया ने इन बातों को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वह कहती हैं कि उन्होंने हमेशा खुद को अंदर से मजबूत रखा और लोगों को जवाब देने के बजाय अपनी मेहनत से साबित करने का रास्ता चुना।। फटे जूतों में जीता नेशनल मेडल सोनिया की असली पहचान 2025 में हुए राष्ट्रीय खेल 2025 के दौरान बनी। 10,000 मीटर की दौड़ में उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीता, लेकिन इस जीत की सबसे बड़ी बात यह थी कि उनके पास दौड़ने के लिए सही स्पाइक्स तक नहीं थे। वह फटे जूतों में ट्रैक पर उतरीं और 35 मिनट 45.19 सेकंड का समय निकालकर पदक अपने नाम किया। यह सिर्फ एक जीत नहीं थी, बल्कि उनके संघर्ष और जज्बे की सबसे बड़ी मिसाल थी। इसी दौरान उन्होंने बताया था कि एक एथलीट के लिए सही डाइट लेना कितना मुश्किल होता है। महंगे सप्लीमेंट्स तो दूर, वह सस्ते मल्टी-विटामिन के सहारे ही अपनी तैयारी कर रही थीं। न्यूट्रिशन की कमी, लेकिन हिम्मत नहीं टूटी सोनिया ने कभी भी प्रोफेशनल लेवल का न्यूट्रिशन नहीं लिया। वह बताती हैं कि उन्होंने आज तक कोई महंगा सप्लीमेंट नहीं खरीदा। ऑनलाइन सस्ते मल्टी-विटामिन खरीदकर ही उन्होंने अपनी ट्रेनिंग जारी रखी। कई बार शरीर साथ नहीं देता था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अब स्नेह राणा के सपोर्ट के बाद उन्हें उम्मीद है कि वह अपनी ट्रेनिंग को और बेहतर बना पाएंगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अच्छे प्रदर्शन कर सकेंगी। स्नेह राणा बोलीं- मैं भी इसी रास्ते से आई हूं स्नेह राणा ने सोनिया से मुलाकात के दौरान अपने संघर्ष भी साझा किए। उन्होंने बताया कि वह भी एक छोटे गांव से आई हैं, जहां महिला क्रिकेट को लेकर जागरूकता नहीं थी। लोगों के ताने, संसाधनों की कमी और सामाजिक सोच- इन सभी का सामना उन्होंने भी किया है। उन्होंने कहा कि जब लोग कहते थे कि तुम यह नहीं कर सकती, तो वह और ज्यादा जिद्दी हो जाती थीं। यही जिद उन्हें यहां तक लेकर आई। अब एशियन गेम्स पर नजर जापान में ब्रॉन्ज जीतने के बाद सोनिया का आत्मविश्वास काफी बढ़ गया है। अब उनका अगला लक्ष्य एशियन गेम्स के लिए क्वालीफाई करना है। स्नेह राणा के सपोर्ट से उन्हें नई ऊर्जा मिली है। बेहतर जूते, सही न्यूट्रिशन और मानसिक सहयोग- ये तीनों चीजें अब उनके पास हैं, जो किसी भी एथलीट के लिए बेहद जरूरी होती हैं। सोनिया की कहानी आज उन हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणा है, जो संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को अधूरा छोड़ देती हैं।

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