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उत्तराखंड के बैंड 'PANDVAS' को नहीं मिल रही फंडिंग:बोले- पहाड़ में चाहते हैं 'काफल फेस्टिवल', हमें कहा गया देहरादून में करो

उत्तराखंड के बैंड 'PANDVAS' को नहीं मिल रही फंडिंग:बोले- पहाड़ में चाहते हैं 'काफल फेस्टिवल', हमें कहा गया देहरादून में करो

उत्तराखंड की लोक संस्कृति और लोकगीतों को देश-दुनिया में पहचान दिलाने वाला पांडवाज बैंड अब अपने ही पहाड़ में आयोजन के लिए संघर्ष कर रहा है। रुद्रप्रयाग के सारी गांव में 20 से 22 मार्च 2026 तक होने वाले काफल फेस्टिवल के लिए टीम को अब तक कोई स्पॉन्सर नहीं मिला है, जबकि कई महीनों से सरकारी विभागों और निजी संस्थानों से संपर्क किया गया। पांडवाज ने इसे लेकर एक ओपन लेटर भी जारी किया है, जिसमें आर्थिक सहयोग न मिलने की बात कही गई है। टीम का कहना है कि कई जगहों से फेस्टिवल की तारीफ तो मिली, लेकिन किसी ने साथ नहीं दिया। कुछ लोगों ने इसे देहरादून जैसे शहर में करने की सलाह दी, जिस पर टीम ने सवाल उठाया कि अगर आयोजन शहरों में ही होंगे तो पहाड़ और गांवों को इसका क्या फायदा मिलेगा। इसी मुद्दे पर दैनिक भास्कर ने पांडवाज टीम के सदस्य कुणाल डोभाल से खास बातचीत की। उन्होंने फेस्टिवल के उद्देश्य, फंडिंग की दिक्कत, जीरो प्लास्टिक मॉडल और पहाड़ में संस्कृति बचाने की चुनौतियों पर खुलकर बात की। सवाल-जवाब में पढ़िए पूरी बातचीत… सवाल- आपने लेटर जारी करके बताया कि स्पॉन्सर नहीं है?
जवाब- यह काफल फेस्टिवल का हमारा दूसरा साल है। हमने लद्दाख और अरुणाचल जैसे इलाकों के फेस्टिवल देखे, जहां लोग अपनी संस्कृति, पर्यावरण और भाषा को लेकर बहुत सजग हैं। वहीं से हमें लगा कि उत्तराखंड में भी ऐसा होना चाहिए। 2025 में हमने पहला काफल फेस्टिवल किया, जो सफल रहा। उस समय स्पॉन्सर कम थे, लेकिन मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) ने सहयोग किया था। उन्होंने इसलिए मदद की क्योंकि फेस्टिवल ज़ीरो प्लास्टिक सोच पर आधारित था। इस बार हमने सरकारी विभागों, विश्वविद्यालयों और कंपनियों से बात की। सबने कहा कि आइडिया अच्छा है, लेकिन किसी ने पैसा नहीं दिया। कुछ ने कहा कि इसे देहरादून में कर लो, लेकिन हम मानते हैं कि इससे गांव को कोई फायदा नहीं होगा। सवाल- आयोजन में कितना खर्च आता है और इस बार पैसा कहां से आ रहा है?
जवाब- पिछले साल करीब 15 लाख रुपए खर्च हुए थे। इस बार तीन दिन का फेस्टिवल है, तो लगभग 35 लाख रुपए का खर्च है। अभी हम ज्यादातर अपनी जेब से ही खर्च कर रहे हैं। कुछ दोस्त मदद करते हैं, लेकिन कोई बड़ा स्पॉन्सर नहीं है। हम रुकने वाले नहीं हैं, लेकिन हमें इसे आगे चलाने के लिए टिकाऊ मॉडल बनाना होगा। सवाल- जीरो प्लास्टिक को लेकर आपने क्या किया?
जवाब- हमने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पूरी तरह बंद किया। पानी बोतलों में नहीं दिया, बल्कि मटकों में रखा। हर प्रतिभागी को एक ऐसा गिलास दिया जिसे बार-बार इस्तेमाल किया जा सके। हमारा मानना है कि 20 रुपए की बोतल में हम पानी नहीं, प्लास्टिक खरीदते हैं। पहाड़ों में पानी तो मुफ्त है, तो उसे प्लास्टिक में क्यों बेचें। सवाल- इस फेस्टिवल के लिए सारी गांव को ही क्यों चुना?
जवाब- सारी गांव रुद्रप्रयाग में है और यहीं से देवरिया ताल ट्रेक शुरू होता है। यह बहुत संवेदनशील इलाका है और आने वाले समय में यहां कचरे की समस्या बढ़ सकती है। हमने सोचा कि काम वहीं किया जाए, जहां जरूरत ज्यादा है। यह हमारा होम डिस्ट्रिक्ट भी है, इसलिए लोगों को समझाना आसान रहा। सवाल- पिछले साल आयोजन कैसा रहा और इस बार क्या नया है?
जवाब- पिछले साल हमने बिना मंच के आयोजन किया। प्राकृतिक चट्टान को ही स्टेज बनाया। कोई टेंट या ढांचा नहीं लगाया। यह पूरी तरह प्रकृति के साथ किया गया आयोजन था। हमने फोटोग्राफी वर्कशॉप भी कराई, जिसमें निकॉन ने उपकरण दिए। स्थानीय युवाओं को पक्षियों और वन्यजीवों की फोटोग्राफी सिखाई गई। सवाल- स्थानीय कलाकारों के लिए आपका क्या संदेश है?
जवाब- अकेले काम मत कीजिए, टीम बनाइए। शुरुआत में पैसे नहीं मिलते, लेकिन अगर काम सच्चा है तो लोग जुड़ते हैं। हमारे फेस्टिवल में आज भी कई लोग बिना पैसे के काम कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह अच्छा काम है। ———————— ये खबर भी पढ़ें : उत्तराखंड के 8 डिजिटल ‘ब्रांड एंबेसडर्स’: पांडवास-हल्द्वानी की आंटी को पसंद कर रहे लोग, विदेशों में भी अपने कल्चर को प्रमोट कर हे पवन पहाड़ी उत्तराखंड के पहाड़ों में युवाओं के सामने रोजगार और अवसरों की कमी बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। कई युवा अपने सपनों को पूरा करने के लिए शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस स्थिति में नई उम्मीद पैदा की है। व्लॉग्स और यूट्यूब चैनल्स के जरिए युवा न सिर्फ अपनी प्रतिभा और रचनात्मकता दिखा रहे हैं, बल्कि पहाड़ों में बने रहने और अपनी संस्कृति को जीवित रखने का रास्ता भी तलाश रहे हैं। (पढ़ें पूरी खबर)

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जवाब- यह काफल फेस्टिवल का हमारा दूसरा साल है। हमने लद्दाख और अरुणाचल जैसे इलाकों के फेस्टिवल देखे, जहां लोग अपनी संस्कृति, पर्यावरण और भाषा को लेकर बहुत सजग हैं। वहीं से हमें लगा कि उत्तराखंड में भी ऐसा होना चाहिए। 2025 में हमने पहला काफल फेस्टिवल किया, जो सफल रहा। उस समय स्पॉन्सर कम थे, लेकिन मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) ने सहयोग किया था। उन्होंने इसलिए मदद की क्योंकि फेस्टिवल ज़ीरो प्लास्टिक सोच पर आधारित था। इस बार हमने सरकारी विभागों, विश्वविद्यालयों और कंपनियों से बात की। सबने कहा कि आइडिया अच्छा है, लेकिन किसी ने पैसा नहीं दिया। कुछ ने कहा कि इसे देहरादून में कर लो, लेकिन हम मानते हैं कि इससे गांव को कोई फायदा नहीं होगा। सवाल- आयोजन में कितना खर्च आता है और इस बार पैसा कहां से आ रहा है?
जवाब- पिछले साल करीब 15 लाख रुपए खर्च हुए थे। इस बार तीन दिन का फेस्टिवल है, तो लगभग 35 लाख रुपए का खर्च है। अभी हम ज्यादातर अपनी जेब से ही खर्च कर रहे हैं। कुछ दोस्त मदद करते हैं, लेकिन कोई बड़ा स्पॉन्सर नहीं है। हम रुकने वाले नहीं हैं, लेकिन हमें इसे आगे चलाने के लिए टिकाऊ मॉडल बनाना होगा। सवाल- जीरो प्लास्टिक को लेकर आपने क्या किया?
जवाब- हमने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पूरी तरह बंद किया। पानी बोतलों में नहीं दिया, बल्कि मटकों में रखा। हर प्रतिभागी को एक ऐसा गिलास दिया जिसे बार-बार इस्तेमाल किया जा सके। हमारा मानना है कि 20 रुपए की बोतल में हम पानी नहीं, प्लास्टिक खरीदते हैं। पहाड़ों में पानी तो मुफ्त है, तो उसे प्लास्टिक में क्यों बेचें। सवाल- इस फेस्टिवल के लिए सारी गांव को ही क्यों चुना?
जवाब- सारी गांव रुद्रप्रयाग में है और यहीं से देवरिया ताल ट्रेक शुरू होता है। यह बहुत संवेदनशील इलाका है और आने वाले समय में यहां कचरे की समस्या बढ़ सकती है। हमने सोचा कि काम वहीं किया जाए, जहां जरूरत ज्यादा है। यह हमारा होम डिस्ट्रिक्ट भी है, इसलिए लोगों को समझाना आसान रहा। सवाल- पिछले साल आयोजन कैसा रहा और इस बार क्या नया है?
जवाब- पिछले साल हमने बिना मंच के आयोजन किया। प्राकृतिक चट्टान को ही स्टेज बनाया। कोई टेंट या ढांचा नहीं लगाया। यह पूरी तरह प्रकृति के साथ किया गया आयोजन था। हमने फोटोग्राफी वर्कशॉप भी कराई, जिसमें निकॉन ने उपकरण दिए। स्थानीय युवाओं को पक्षियों और वन्यजीवों की फोटोग्राफी सिखाई गई। सवाल- स्थानीय कलाकारों के लिए आपका क्या संदेश है?
जवाब- अकेले काम मत कीजिए, टीम बनाइए। शुरुआत में पैसे नहीं मिलते, लेकिन अगर काम सच्चा है तो लोग जुड़ते हैं। हमारे फेस्टिवल में आज भी कई लोग बिना पैसे के काम कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह अच्छा काम है। ———————— ये खबर भी पढ़ें : उत्तराखंड के 8 डिजिटल ‘ब्रांड एंबेसडर्स’: पांडवास-हल्द्वानी की आंटी को पसंद कर रहे लोग, विदेशों में भी अपने कल्चर को प्रमोट कर हे पवन पहाड़ी उत्तराखंड के पहाड़ों में युवाओं के सामने रोजगार और अवसरों की कमी बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। कई युवा अपने सपनों को पूरा करने के लिए शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस स्थिति में नई उम्मीद पैदा की है। व्लॉग्स और यूट्यूब चैनल्स के जरिए युवा न सिर्फ अपनी प्रतिभा और रचनात्मकता दिखा रहे हैं, बल्कि पहाड़ों में बने रहने और अपनी संस्कृति को जीवित रखने का रास्ता भी तलाश रहे हैं। (पढ़ें पूरी खबर)

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