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एमपी में विधायकों को सजा के 5 चर्चित मामले:सिर्फ एक महिला विधायक की सदस्यता हुई थी समाप्त, दतिया MLA का केस भी कोर्ट पर निर्भर

एमपी में विधायकों को सजा के 5 चर्चित मामले:सिर्फ एक महिला विधायक की सदस्यता हुई थी समाप्त, दतिया MLA का केस भी कोर्ट पर निर्भर

दतिया सीट से कांग्रेस विधायक राजेन्द्र भारती को फर्जीवाडे़ के मामले में दिल्ली की राउज अवेन्यू कोर्ट ने तीन साल की सजा सुनाई। इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने दतिया सीट रिक्त घोषित करने की सूचना चुनाव आयोग को भेजते हुए गजट नोटिफिकेशन भी कर दिया। अब राजेन्द्र भारती इस सजा और सदस्यता खत्म करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की तैयारी में हैं। सोमवार को उनकी याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हो सकती है। मध्य प्रदेश में विधायकों को आपराधिक मामलों में सजा के ऐसे पांच प्रमुख मामले हैं जिनमें न्यायालय से विधायकों को सजा हुई, विधानसभा सचिवालय ने सीट रिक्त घोषित की लेकिन, उच्च अदालतों से कुछ विधायकों को राहत मिल गई तो उनकी विधायकी बच गई। लेकिन, एक विधायक की सदस्यता चली गई थी। 1. आशा रानी सिंह (विधायक,बिजावर) छतरपुर जिले के बिजावर सीट से भाजपा विधायक आशा रानी सिंह को 2011 में एक नौकरानी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में 10 साल की सजा सुनाई गई थी। उनके पति पर नौकरानी उनकी सजा के बाद विधानसभा सचिवालय ने उनकी सदस्यता समाप्त की और सीट रिक्त घोषित की थी। भाजपा की पूर्व विधायक आशारानी सिंह को उनकी घरेलू सहायिका (तिजिया बाई) को प्रताड़ित करने और उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी पाया गया था। 10 साल की सजा के बाद गई थी विधायकी
31 जनवरी 2011 को छतरपुर की एक अदालत ने उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाने के जुर्म में 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। सजा के तुरंत बाद उनकी सदस्यता खतरे में आ गई थी, लेकिन उस समय ‘लिली थॉमस’ फैसला लागू नहीं था। हालांकि, जेल जाने के कारण और सजा की अवधि लंबी होने के कारण 31 अक्टूबर 2013 को उनकी सीट को रिक्त घोषित कर दिया गया था। आशारानी सिंह ने हाई कोर्ट में अपील की थी, लेकिन उन्हें सजा पर स्टे नहीं मिला, जिसके कारण उनकी सदस्यता नहीं बच सकी और 31 अक्टूबर 2013 को उनकी सीट को रिक्त घोषित कर दिया गया था। 2. प्रहलाद लोधी (विधायक, पवई) भाजपा विधायक प्रहलाद लोधी का मामला मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय और न्यायपालिका के बीच खींचतान का एक बड़ा उदाहरण बना। 31 अक्टूबर 2019 को भोपाल की विशेष अदालत (एमपी-एमएलए कोर्ट) ने लोधी को साल 2014 के एक मामले में 2 साल की जेल और सजा सुनाई थी। उन पर आरोप था कि उन्होंने अवैध रेत उत्खनन पर कार्रवाई करने गए पवई के तत्कालीन तहसीलदार के साथ मारपीट की थी। कोर्ट से मिला स्टे तो बच गई सदस्यता विधानसभा सचिवालय ने इस सजा के आधार पर 2 नवंबर 2019 को उनकी सदस्यता रद्द करने की अधिसूचना जारी कर दी थी। इसके बाद प्रहलाद लोधी हाई कोर्ट पहुंचे और 7 नवंबर 2019 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने उनकी सजा पर स्टे दे दिया। इस स्टे के आधार पर काफी कानूनी विवाद हुआ, लेकिन अंततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और हाई कोर्ट के आदेश के बाद उनकी सदस्यता बहाल हुई और वे विधायक बने रहे। कोर्ट से राहत मिलने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने तत्कालीन स्पीकर के फैसले पर सवाल उठाए थे सत्यमेव जयते! साथी विधायक प्रहलाद लोधी को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत मिली है। स्पीकर ने विधायक को असंवैधानिक तरीके से अयोग्य घोषित किया था। प्रदेश सरकार ने घटिया हरकत की और एक महीने तक क्षेत्र की जनता को अपने जनप्रतिनिधि से वंचित रखने का महापाप किया। #MP_मांगे_जवाब— Shivraj Singh Chouhan (@ChouhanShivraj) December 6, 2019 3. खरगापुर विधायक का निर्वाचन हो गया था शून्य टीकमगढ़ जिले की खरगापुर विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक राहुल सिंह लोधी ने 2018 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी। उनके खिलाफ कांग्रेस प्रत्याशी चंदा सिंह गौर ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दायर की थी। याचिका में दो मुख्य आरोप लगाए गए थे। जिनमें, राहुल सिंह लोधी ने अपने नामांकन पत्र (एफिडेविट) में यह जानकारी छिपाई थी कि उनकी फर्म ‘आरआर कंस्ट्रक्शन’ का सरकार के साथ अनुबंध था, जो कि लाभ के पद के अंतर्गत आता है। उन्होनें चुनाव प्रचार के दौरान निर्धारित सीमाओं और नियमों का उल्लंघन किया गया था। हाई कोर्ट का फैसला और तारीख मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच के जस्टिस नमिन्द्रा सिंह ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए राहुल सिंह लोधी के 2018 के निर्वाचन को शून्य घोषित कर दिया। कोर्ट ने माना कि नामांकन पत्र में महत्वपूर्ण जानकारी छिपाना ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951’ की धारा 100 के तहत चुनाव रद्द करने का ठोस आधार है। विधानसभा सचिवालय की कार्रवाई हाई कोर्ट के आदेश की प्रति मिलने के बाद, नवंबर 2022 में मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय ने अधिसूचना जारी की। इसके तहत राहुल सिंह लोधी की सदस्यता समाप्त कर दी गई और खरगापुर विधानसभा सीट को रिक्त घोषित कर दिया गया। इसकी सूचना तत्काल चुनाव आयोग को भेजी गई थी। सुप्रीम कोर्ट से ‘स्टे’ और सदस्यता की बहाली विधानसभा से सदस्यता रद्द होने के तुरंत बाद राहुल सिंह लोधी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद उनकी सदस्यता बहाल तो हो गई, लेकिन कोर्ट ने उन पर कुछ शर्तें लगाई थीं। वे सदन की कार्यवाही में हिस्सा ले सकते थे, लेकिन अंतिम फैसला आने तक उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं था और वे विधायक के रूप में मिलने वाले कुछ भत्तों के लिए भी पात्र नहीं थे। 4. मुकेश मल्होत्रा (विधायक, विजयपुर) विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा को मार्च 2026 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक मामले में दोषी मानते हुए चुनाव को शून्य घोषित कर दिया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने अपने नामांकन पत्र में अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई थी। कोर्ट ने माना कि मतदाता को उम्मीदवार के आपराधिक इतिहास को जानने का अधिकार है और इसे छिपाना ‘भ्रष्ट आचरण’ की श्रेणी में आता है। राज्यसभा चुनाव में नहीं दे पाएंगे वोट, विधायकी बची रहेगी मुकेश मल्होत्रा ने एमपी हाईकोर्ट की ग्वालियर बैंच के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। जिसपर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राहत देते हुए उन्हें विधायक के तौर पर काम करने की अनुमति दी लेकिन, उन्हें विधायक का वेतन और सुविधाएं नहीं मिलेंगी। वे किसी भी मतदान में भाग भी नहीं ले पाएंगे। अब इस मामले की सुनवाई 23 जुलाई को होगी। यदि सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट के फैसले पर स्टे दे देता है तो उनकी विधायकी बची रहेगी। 5. राजेंद्र भारती (विधायक, दतिया) कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को 2 अप्रैल 2026 को दिल्ली की एक विशेष अदालत ने साल 1998 के एक पुराने बैंक धोखाधड़ी मामले (जब वे दतिया सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष थे) में दोषी पाया और उन्हें 3 साल की जेल की सजा सुनाई। उन पर पद का दुरुपयोग कर अवैध तरीके से ऋण बांटने का आरोप था। सदस्यता समाप्ति: सुप्रीम कोर्ट के ‘लिली थॉमस’ नियम के तहत (2 साल से अधिक सजा), मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय ने 2 अप्रैल 2026 की देर रात को ही राजेंद्र भारती की सदस्यता रद्द कर दतिया विधानसभा सीट को रिक्त घोषित करने की सूचना चुनाव आयोग को भेज दी। वर्तमान में राजेंद्र भारती ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी की है। उन्हें जमानत तो मिल गई है, लेकिन अभी तक सजा पर ‘कनविक्शन स्टे’ नहीं मिला है, इसलिए उनकी सदस्यता फिलहाल बहाल नहीं हुई है। अब वे इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने जा रहे हैं। रात में विधानसभा खुलवाकर आदेश पहली बार जारी हुआ कांग्रेस विधायक और विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष राजेन्द्र कुमार सिंह कहते हैं कोर्ट ने जो किया वो करना न्यायालय का काम है। उस निर्णय के खिलाफ अपर कोर्ट में जाएंगे। लेकिन ये बड़ा अप्रत्याशित है ये मप्र के संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ है। कि आज शाम को आदेश निकलता है और अगले दिन वहां चलकर आता है। यहां रात को विधानसभा खुलती है और आदेश तैयार कर दिया जाता है। रात को ही गवर्नमेंट प्रेस खुलती है और गजट में प्रकाशन कर दिया जाता है। रात को विशेष गजट निकलता है हमारी संसदीय राजनीति और विधानसभा का स्तर इतना नीचे चला जाएगा ये हमने कभी नहीं सोचा था।
राजेन्द्र कुमार सिंह ने कहा तोमर साहब हमारे विधानसभा अध्यक्ष हैं मैं हमेशा मानता था कि वे नियम प्रक्रियाओं का पालन करने वाले व्यक्ति हैं। प्रमुख सचिव भी नए नए हैं। मैं तो इसलिए दुखी हूं क्योंकि मैं पुरानी और नई विधानसभा में करीब 30 साल से हूं। इनको इंतजार करना था क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने अपना जजमेंट 30 दिन के लिए सस्पेंड किया है। ताकि हाईकोर्ट में अपील कर सकें। इतनी जल्दीबाजी क्या थी? राजेन्द्र कुमार सिंह ने कहा- निर्मला सप्रे का मामला अध्यक्ष जी के पास निर्णय के लिए डेढ़ साल से पड़ा हुआ है। और अध्यक्ष जी फाइल रखकर चुपचाप बैठे हुए हैं। और उससे यह वक्तव्य लेते हैं कि मैं तो कांग्रेस में हूं पूरा जमाना झूठा है भाजपा के नेता, अध्यक्ष जी यही लोग सही हैं यह सब हास्यापद बन गया है। और भी कुछ ऐसे उदाहरण हैं जहां जल्दीबाजी की गई तो कोर्ट ने नोटिफिकेशन भी रद्द किया है। संभावना पूरी है कि हाईकोर्ट नोटिफिकेशन रद्द करेगा। और भारती जी को राहत मिलेगी। फिर से गजट में सदस्यता बहाल करने का नोटिफिकेशन आएगा।

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एमपी में विधायकों को सजा के 5 चर्चित मामले:सिर्फ एक महिला विधायक की सदस्यता हुई थी समाप्त, दतिया MLA का केस भी कोर्ट पर निर्भर

दतिया सीट से कांग्रेस विधायक राजेन्द्र भारती को फर्जीवाडे़ के मामले में दिल्ली की राउज अवेन्यू कोर्ट ने तीन साल की सजा सुनाई। इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने दतिया सीट रिक्त घोषित करने की सूचना चुनाव आयोग को भेजते हुए गजट नोटिफिकेशन भी कर दिया। अब राजेन्द्र भारती इस सजा और सदस्यता खत्म करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की तैयारी में हैं। सोमवार को उनकी याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हो सकती है। मध्य प्रदेश में विधायकों को आपराधिक मामलों में सजा के ऐसे पांच प्रमुख मामले हैं जिनमें न्यायालय से विधायकों को सजा हुई, विधानसभा सचिवालय ने सीट रिक्त घोषित की लेकिन, उच्च अदालतों से कुछ विधायकों को राहत मिल गई तो उनकी विधायकी बच गई। लेकिन, एक विधायक की सदस्यता चली गई थी। 1. आशा रानी सिंह (विधायक,बिजावर) छतरपुर जिले के बिजावर सीट से भाजपा विधायक आशा रानी सिंह को 2011 में एक नौकरानी को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में 10 साल की सजा सुनाई गई थी। उनके पति पर नौकरानी उनकी सजा के बाद विधानसभा सचिवालय ने उनकी सदस्यता समाप्त की और सीट रिक्त घोषित की थी। भाजपा की पूर्व विधायक आशारानी सिंह को उनकी घरेलू सहायिका (तिजिया बाई) को प्रताड़ित करने और उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी पाया गया था। 10 साल की सजा के बाद गई थी विधायकी
31 जनवरी 2011 को छतरपुर की एक अदालत ने उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाने के जुर्म में 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। सजा के तुरंत बाद उनकी सदस्यता खतरे में आ गई थी, लेकिन उस समय ‘लिली थॉमस’ फैसला लागू नहीं था। हालांकि, जेल जाने के कारण और सजा की अवधि लंबी होने के कारण 31 अक्टूबर 2013 को उनकी सीट को रिक्त घोषित कर दिया गया था। आशारानी सिंह ने हाई कोर्ट में अपील की थी, लेकिन उन्हें सजा पर स्टे नहीं मिला, जिसके कारण उनकी सदस्यता नहीं बच सकी और 31 अक्टूबर 2013 को उनकी सीट को रिक्त घोषित कर दिया गया था। 2. प्रहलाद लोधी (विधायक, पवई) भाजपा विधायक प्रहलाद लोधी का मामला मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय और न्यायपालिका के बीच खींचतान का एक बड़ा उदाहरण बना। 31 अक्टूबर 2019 को भोपाल की विशेष अदालत (एमपी-एमएलए कोर्ट) ने लोधी को साल 2014 के एक मामले में 2 साल की जेल और सजा सुनाई थी। उन पर आरोप था कि उन्होंने अवैध रेत उत्खनन पर कार्रवाई करने गए पवई के तत्कालीन तहसीलदार के साथ मारपीट की थी। कोर्ट से मिला स्टे तो बच गई सदस्यता विधानसभा सचिवालय ने इस सजा के आधार पर 2 नवंबर 2019 को उनकी सदस्यता रद्द करने की अधिसूचना जारी कर दी थी। इसके बाद प्रहलाद लोधी हाई कोर्ट पहुंचे और 7 नवंबर 2019 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने उनकी सजा पर स्टे दे दिया। इस स्टे के आधार पर काफी कानूनी विवाद हुआ, लेकिन अंततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और हाई कोर्ट के आदेश के बाद उनकी सदस्यता बहाल हुई और वे विधायक बने रहे। कोर्ट से राहत मिलने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने तत्कालीन स्पीकर के फैसले पर सवाल उठाए थे सत्यमेव जयते! साथी विधायक प्रहलाद लोधी को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत मिली है। स्पीकर ने विधायक को असंवैधानिक तरीके से अयोग्य घोषित किया था। प्रदेश सरकार ने घटिया हरकत की और एक महीने तक क्षेत्र की जनता को अपने जनप्रतिनिधि से वंचित रखने का महापाप किया। #MP_मांगे_जवाब— Shivraj Singh Chouhan (@ChouhanShivraj) December 6, 2019 3. खरगापुर विधायक का निर्वाचन हो गया था शून्य टीकमगढ़ जिले की खरगापुर विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक राहुल सिंह लोधी ने 2018 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की थी। उनके खिलाफ कांग्रेस प्रत्याशी चंदा सिंह गौर ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दायर की थी। याचिका में दो मुख्य आरोप लगाए गए थे। जिनमें, राहुल सिंह लोधी ने अपने नामांकन पत्र (एफिडेविट) में यह जानकारी छिपाई थी कि उनकी फर्म ‘आरआर कंस्ट्रक्शन’ का सरकार के साथ अनुबंध था, जो कि लाभ के पद के अंतर्गत आता है। उन्होनें चुनाव प्रचार के दौरान निर्धारित सीमाओं और नियमों का उल्लंघन किया गया था। हाई कोर्ट का फैसला और तारीख मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच के जस्टिस नमिन्द्रा सिंह ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए राहुल सिंह लोधी के 2018 के निर्वाचन को शून्य घोषित कर दिया। कोर्ट ने माना कि नामांकन पत्र में महत्वपूर्ण जानकारी छिपाना ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951’ की धारा 100 के तहत चुनाव रद्द करने का ठोस आधार है। विधानसभा सचिवालय की कार्रवाई हाई कोर्ट के आदेश की प्रति मिलने के बाद, नवंबर 2022 में मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय ने अधिसूचना जारी की। इसके तहत राहुल सिंह लोधी की सदस्यता समाप्त कर दी गई और खरगापुर विधानसभा सीट को रिक्त घोषित कर दिया गया। इसकी सूचना तत्काल चुनाव आयोग को भेजी गई थी। सुप्रीम कोर्ट से ‘स्टे’ और सदस्यता की बहाली विधानसभा से सदस्यता रद्द होने के तुरंत बाद राहुल सिंह लोधी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद उनकी सदस्यता बहाल तो हो गई, लेकिन कोर्ट ने उन पर कुछ शर्तें लगाई थीं। वे सदन की कार्यवाही में हिस्सा ले सकते थे, लेकिन अंतिम फैसला आने तक उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं था और वे विधायक के रूप में मिलने वाले कुछ भत्तों के लिए भी पात्र नहीं थे। 4. मुकेश मल्होत्रा (विधायक, विजयपुर) विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा को मार्च 2026 में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक मामले में दोषी मानते हुए चुनाव को शून्य घोषित कर दिया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने अपने नामांकन पत्र में अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई थी। कोर्ट ने माना कि मतदाता को उम्मीदवार के आपराधिक इतिहास को जानने का अधिकार है और इसे छिपाना ‘भ्रष्ट आचरण’ की श्रेणी में आता है। राज्यसभा चुनाव में नहीं दे पाएंगे वोट, विधायकी बची रहेगी मुकेश मल्होत्रा ने एमपी हाईकोर्ट की ग्वालियर बैंच के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। जिसपर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राहत देते हुए उन्हें विधायक के तौर पर काम करने की अनुमति दी लेकिन, उन्हें विधायक का वेतन और सुविधाएं नहीं मिलेंगी। वे किसी भी मतदान में भाग भी नहीं ले पाएंगे। अब इस मामले की सुनवाई 23 जुलाई को होगी। यदि सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट के फैसले पर स्टे दे देता है तो उनकी विधायकी बची रहेगी। 5. राजेंद्र भारती (विधायक, दतिया) कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को 2 अप्रैल 2026 को दिल्ली की एक विशेष अदालत ने साल 1998 के एक पुराने बैंक धोखाधड़ी मामले (जब वे दतिया सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष थे) में दोषी पाया और उन्हें 3 साल की जेल की सजा सुनाई। उन पर पद का दुरुपयोग कर अवैध तरीके से ऋण बांटने का आरोप था। सदस्यता समाप्ति: सुप्रीम कोर्ट के ‘लिली थॉमस’ नियम के तहत (2 साल से अधिक सजा), मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय ने 2 अप्रैल 2026 की देर रात को ही राजेंद्र भारती की सदस्यता रद्द कर दतिया विधानसभा सीट को रिक्त घोषित करने की सूचना चुनाव आयोग को भेज दी। वर्तमान में राजेंद्र भारती ने इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी की है। उन्हें जमानत तो मिल गई है, लेकिन अभी तक सजा पर ‘कनविक्शन स्टे’ नहीं मिला है, इसलिए उनकी सदस्यता फिलहाल बहाल नहीं हुई है। अब वे इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने जा रहे हैं। रात में विधानसभा खुलवाकर आदेश पहली बार जारी हुआ कांग्रेस विधायक और विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष राजेन्द्र कुमार सिंह कहते हैं कोर्ट ने जो किया वो करना न्यायालय का काम है। उस निर्णय के खिलाफ अपर कोर्ट में जाएंगे। लेकिन ये बड़ा अप्रत्याशित है ये मप्र के संसदीय इतिहास में पहली बार हुआ है। कि आज शाम को आदेश निकलता है और अगले दिन वहां चलकर आता है। यहां रात को विधानसभा खुलती है और आदेश तैयार कर दिया जाता है। रात को ही गवर्नमेंट प्रेस खुलती है और गजट में प्रकाशन कर दिया जाता है। रात को विशेष गजट निकलता है हमारी संसदीय राजनीति और विधानसभा का स्तर इतना नीचे चला जाएगा ये हमने कभी नहीं सोचा था।
राजेन्द्र कुमार सिंह ने कहा तोमर साहब हमारे विधानसभा अध्यक्ष हैं मैं हमेशा मानता था कि वे नियम प्रक्रियाओं का पालन करने वाले व्यक्ति हैं। प्रमुख सचिव भी नए नए हैं। मैं तो इसलिए दुखी हूं क्योंकि मैं पुरानी और नई विधानसभा में करीब 30 साल से हूं। इनको इंतजार करना था क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने अपना जजमेंट 30 दिन के लिए सस्पेंड किया है। ताकि हाईकोर्ट में अपील कर सकें। इतनी जल्दीबाजी क्या थी? राजेन्द्र कुमार सिंह ने कहा- निर्मला सप्रे का मामला अध्यक्ष जी के पास निर्णय के लिए डेढ़ साल से पड़ा हुआ है। और अध्यक्ष जी फाइल रखकर चुपचाप बैठे हुए हैं। और उससे यह वक्तव्य लेते हैं कि मैं तो कांग्रेस में हूं पूरा जमाना झूठा है भाजपा के नेता, अध्यक्ष जी यही लोग सही हैं यह सब हास्यापद बन गया है। और भी कुछ ऐसे उदाहरण हैं जहां जल्दीबाजी की गई तो कोर्ट ने नोटिफिकेशन भी रद्द किया है। संभावना पूरी है कि हाईकोर्ट नोटिफिकेशन रद्द करेगा। और भारती जी को राहत मिलेगी। फिर से गजट में सदस्यता बहाल करने का नोटिफिकेशन आएगा।

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