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तीसरी तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8% रही:ट्रम्प के 50% टैरिफ के बावजूद इकोनॉमी मजबूत; कुक-ड्राइवर की कमाई भी अब GDP में शामिल

तीसरी तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8% रही:ट्रम्प के 50% टैरिफ के बावजूद इकोनॉमी मजबूत; कुक-ड्राइवर की कमाई भी अब GDP में शामिल

वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में GDP ग्रोथ 7.8% रही है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने 27 फरवरी को ये आंकड़े जारी किए। इस बार GDP की गणना बेस ईयर 2011-12 के बजाय 2022-23 के आधार पर की गई है। इस नई सीरीज के हिसाब से तिमाही में रियल जीडीपी 84.54 लाख करोड़ रुपए रही, जो पिछले साल इसी तिमाही में 78.41 लाख करोड़ रुपए थी। सरकार ने पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान भी बढ़ाकर 7.6% कर दिया है, जो पिछले साल 7.1% था। GDP ग्रोथ की मुख्य बातें ट्रम्प के टैरिफ और ग्लोबल दबाव के बीच राहत यह आंकड़े इसलिए भी अहम हैं क्योंकि यह डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ के बाद की पहली पूरी तिमाही है। ग्लोबल अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की 7.8% की ग्रोथ रेट यह बताती है कि घरेलू मांग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मजबूती बनी हुई है। नौकरों, ड्राइवर और ई-वाहन डेटा भी शामिल किया GDP की नई सीरीज में 2022-23 को बेस ईयर बनाया गया है। आर्थिक अनुमानों को ज्यादा सटीक बनाने के लिए इसमें अब जीएसटी नेटवर्क, ई-वाहन डेटाबेस और घरों में काम करने वाले कुक, ड्राइवर और घरेलू नौकरों की सेवाओं से जुड़ा डेटा भी शामिल किया गया है। आमतौर पर हर 5 साल में बदला जाता है बेस-ईयर समय के साथ अर्थव्यवस्था में आने वाले बड़े बदलावों को दर्ज करने के लिए समय-समय पर बेस ईयर बदला जाता है। आमतौर पर मंत्रालय हर पांच साल में डेटा सीरीज को अपडेट करता है, लेकिन कोविड महामारी और जीएसटी लागू होने की वजह से इस काम में देरी हुई। 1950 तक के नए आंकड़े दिसंबर 2026 तक आएंगे सरकार सिर्फ नए आंकड़े ही नहीं जारी करेगी, बल्कि पुराने आंकड़ों को भी नए बेस ईयर के हिसाब से दोबारा कैलकुलेट करेगी। मंत्रालय ने संकेत दिया है कि इस नए फ्रेमवर्क के तहत ‘बैक-सीरीज’ डेटा (1950-51 तक के आंकड़े) दिसंबर 2026 तक आने की उम्मीद है। नॉलेज पार्ट: क्या होता है बेस ईयर बेस ईयर वह साल है जिसकी कीमतों को ‘फिक्स’ मानकर आज की आर्थिक तरक्की को मापा जाता है। यह महंगाई के असर को हटाकर देश की ‘असली’ ग्रोथ दिखाने में मदद करता है। उदाहरण: अगर 2011 में एक पेन 5 रुपए का था और आज 10 रुपए का है। अगर हम आज भी 100 पेन बना रहे हैं, तो 2011 के हिसाब से जीडीपी 500 रुपए दिखेगी। वहीं ये आज के हिसाब से 1000 रुपए होगी। बेस ईयर हमें यह समझने में मदद करता है कि हम पेन ज्यादा बना रहे हैं या सिर्फ पेन महंगा हो गया है। इकोनॉमी की सेहत बताती है GDP GDP यानी देश के भीतर एक तय समय में कितनी वैल्यू का सामान बना और कितनी सर्विसेज दी गईं। इसे देश की आर्थिक सेहत का ‘रिपोर्ट कार्ड’ भी कह सकते हैं। इसमें भारतीय कंपनियां ही नहीं, बल्कि देश में काम करने वाली विदेशी कंपनियों का प्रोडक्शन भी जोड़ा जाता है। दो तरह की GDP: रियल और नॉमिनल कैसे की जाती है जीडीपी की गिनती? जीडीपी निकालने के लिए एक खास फॉर्मूले का इस्तेमाल होता है: $GDP = C + G + I + NX$ C (कंजम्प्शन): यानी हम और आप जो अपनी जरूरतों पर खर्च करते हैं। G (गवर्नमेंट): सरकार द्वारा देश के विकास और सुविधाओं पर किया गया खर्च। I (इन्वेस्टमेंट): कंपनियों द्वारा बिजनेस को बढ़ाने के लिए किया गया निवेश। NX (नेट एक्सपोर्ट): दूसरे देशों को बेचे गए सामान में से खरीदे गए सामान को घटाना।

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तीसरी तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8% रही:ट्रम्प के 50% टैरिफ के बावजूद इकोनॉमी मजबूत; कुक-ड्राइवर की कमाई भी अब GDP में शामिल

तीसरी तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8% रही:ट्रम्प के 50% टैरिफ के बावजूद इकोनॉमी मजबूत; कुक-ड्राइवर की कमाई भी अब GDP में शामिल

वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में GDP ग्रोथ 7.8% रही है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने 27 फरवरी को ये आंकड़े जारी किए। इस बार GDP की गणना बेस ईयर 2011-12 के बजाय 2022-23 के आधार पर की गई है। इस नई सीरीज के हिसाब से तिमाही में रियल जीडीपी 84.54 लाख करोड़ रुपए रही, जो पिछले साल इसी तिमाही में 78.41 लाख करोड़ रुपए थी। सरकार ने पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान भी बढ़ाकर 7.6% कर दिया है, जो पिछले साल 7.1% था। GDP ग्रोथ की मुख्य बातें ट्रम्प के टैरिफ और ग्लोबल दबाव के बीच राहत यह आंकड़े इसलिए भी अहम हैं क्योंकि यह डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ के बाद की पहली पूरी तिमाही है। ग्लोबल अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की 7.8% की ग्रोथ रेट यह बताती है कि घरेलू मांग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मजबूती बनी हुई है। नौकरों, ड्राइवर और ई-वाहन डेटा भी शामिल किया GDP की नई सीरीज में 2022-23 को बेस ईयर बनाया गया है। आर्थिक अनुमानों को ज्यादा सटीक बनाने के लिए इसमें अब जीएसटी नेटवर्क, ई-वाहन डेटाबेस और घरों में काम करने वाले कुक, ड्राइवर और घरेलू नौकरों की सेवाओं से जुड़ा डेटा भी शामिल किया गया है। आमतौर पर हर 5 साल में बदला जाता है बेस-ईयर समय के साथ अर्थव्यवस्था में आने वाले बड़े बदलावों को दर्ज करने के लिए समय-समय पर बेस ईयर बदला जाता है। आमतौर पर मंत्रालय हर पांच साल में डेटा सीरीज को अपडेट करता है, लेकिन कोविड महामारी और जीएसटी लागू होने की वजह से इस काम में देरी हुई। 1950 तक के नए आंकड़े दिसंबर 2026 तक आएंगे सरकार सिर्फ नए आंकड़े ही नहीं जारी करेगी, बल्कि पुराने आंकड़ों को भी नए बेस ईयर के हिसाब से दोबारा कैलकुलेट करेगी। मंत्रालय ने संकेत दिया है कि इस नए फ्रेमवर्क के तहत ‘बैक-सीरीज’ डेटा (1950-51 तक के आंकड़े) दिसंबर 2026 तक आने की उम्मीद है। नॉलेज पार्ट: क्या होता है बेस ईयर बेस ईयर वह साल है जिसकी कीमतों को ‘फिक्स’ मानकर आज की आर्थिक तरक्की को मापा जाता है। यह महंगाई के असर को हटाकर देश की ‘असली’ ग्रोथ दिखाने में मदद करता है। उदाहरण: अगर 2011 में एक पेन 5 रुपए का था और आज 10 रुपए का है। अगर हम आज भी 100 पेन बना रहे हैं, तो 2011 के हिसाब से जीडीपी 500 रुपए दिखेगी। वहीं ये आज के हिसाब से 1000 रुपए होगी। बेस ईयर हमें यह समझने में मदद करता है कि हम पेन ज्यादा बना रहे हैं या सिर्फ पेन महंगा हो गया है। इकोनॉमी की सेहत बताती है GDP GDP यानी देश के भीतर एक तय समय में कितनी वैल्यू का सामान बना और कितनी सर्विसेज दी गईं। इसे देश की आर्थिक सेहत का ‘रिपोर्ट कार्ड’ भी कह सकते हैं। इसमें भारतीय कंपनियां ही नहीं, बल्कि देश में काम करने वाली विदेशी कंपनियों का प्रोडक्शन भी जोड़ा जाता है। दो तरह की GDP: रियल और नॉमिनल कैसे की जाती है जीडीपी की गिनती? जीडीपी निकालने के लिए एक खास फॉर्मूले का इस्तेमाल होता है: $GDP = C + G + I + NX$ C (कंजम्प्शन): यानी हम और आप जो अपनी जरूरतों पर खर्च करते हैं। G (गवर्नमेंट): सरकार द्वारा देश के विकास और सुविधाओं पर किया गया खर्च। I (इन्वेस्टमेंट): कंपनियों द्वारा बिजनेस को बढ़ाने के लिए किया गया निवेश। NX (नेट एक्सपोर्ट): दूसरे देशों को बेचे गए सामान में से खरीदे गए सामान को घटाना।

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