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दिल्ली के युवाओं में बढ़ रहे कोलोरेक्टल कैंसर के मामले, इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज, जल्द कराएं जांच

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Colon Caner Early Warning Signs: दिल्ली के युवाओं में कोलोरेक्टल कैंसर यानी आंतों के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. पहले इसे बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, लेकिन बदलती लाइफस्टाइल और खान-पान की गलत आदतों के कारण अब 25 से 65 वर्ष की आयु के कामकाजी लोग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं. हालिया गट हेल्थ अवेयरनेस सर्वे से यह साफ हुआ है कि बड़ी संख्या में लोग कोलोरेक्टल कैंसर के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं, जिसके कारण बीमारी का पता अक्सर एडवांस स्टेज में चलता है और इलाज करना मुश्किल हो जाता है.

TOI की रिपोर्ट के मुताबिक इस सर्वे में 14 भारतीय शहरों के 10,000 से अधिक लोगों को शामिल किया गया, जिसमें दिल्ली के आंकड़े सबसे अधिक चिंताजनक सामने आए. यहां 80% से ज्यादा लोग मल में खून आने जैसे गंभीर लक्षण को भी सामान्य समस्या समझते हैं और इसे कैंसर की चेतावनी नहीं मानते. विशेषज्ञ इसे लक्षणों का खतरनाक सामान्यीकरण बताते हैं, जहां लोग शरीर के संकेतों को हल्के में लेकर नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही बीमारी को गंभीर रूप देने में बड़ी भूमिका निभाती है.

डॉक्टर्स के अनुसार इस स्थिति के पीछे सेल्फ-मेडिकेशन की आदत भी एक बड़ी वजह है. सर्वे में पाया गया कि लगभग 90% लोग कब्ज, दस्त या पेट दर्द जैसी समस्याओं के लिए डॉक्टर से सलाह लेने के बजाय घरेलू उपाय, इंटरनेट पर मिली जानकारी या मेडिकल स्टोर से दवाइयां लेना पसंद करते हैं. इससे असली बीमारी छिप जाती है और सही समय पर जांच नहीं हो पाती. केवल 10% लोग ही समय रहते विशेषज्ञ से संपर्क करते हैं, बीमारी को छिपाना एक चिंताजनक संकेत है.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

डॉक्टर्स का कहना है कि भारत में हर साल करीब 65000 कोलोरेक्टल कैंसर के नए मामले सामने आते हैं, जिनमें से 50% से अधिक मामलों में देरी से पहचान के कारण मृत्यु हो जाती है. सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अब यह बीमारी युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है. सर्वे में शामिल करीब 40% युवाओं ने माना कि उन्होंने पाचन से जुड़ी समस्याओं को सामान्य मानकर टाल दिया, जिससे बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती गई और जब तक जांच कराई गई, तब तक यह गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी थी.

इस बढ़ते खतरे के पीछे खराब लाइफस्टाइल एक प्रमुख कारण बनकर उभरी है. सर्वे के अनुसार 86% लोग नियमित रूप से बाहर का या पैकेज्ड फूड खाते हैं, जिसमें फाइबर की कमी और प्रिजर्वेटिव्स की ज्यादा मात्रा होती है. केवल 35.5% लोग नियमित रूप से व्यायाम करते हैं और लगभग 40% लोग तंबाकू का सेवन करते हैं, जो कैंसर के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है. इसके अलावा लंबे समय तक बैठे रहने की आदत, तनाव और अनियमित दिनचर्या भी पाचन तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं.

डॉक्टर्स ने यह भी चेतावनी दी है कि कोलोरेक्टल कैंसर हमेशा दर्द के साथ नहीं होता, जिससे इसकी पहचान और भी कठिन हो जाती है. लगातार पेट फूलना, मल त्याग की आदतों में बदलाव, अधूरा पेट साफ होने का एहसास, वजन कम होना या मल में खून आना जैसे संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. खासकर जिन लोगों के परिवार में कैंसर का इतिहास है, उन्हें अधिक सतर्क रहने की जरूरत है. समय पर जांच, सही जीवनशैली और डॉक्टर की सलाह से इस गंभीर बीमारी को शुरुआती चरण में ही रोका जा सकता है. शुरुआती स्टेज में इस कैंसर का इलाज ज्यादा सफल रहता है.

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TOI की रिपोर्ट के मुताबिक इस सर्वे में 14 भारतीय शहरों के 10,000 से अधिक लोगों को शामिल किया गया, जिसमें दिल्ली के आंकड़े सबसे अधिक चिंताजनक सामने आए. यहां 80% से ज्यादा लोग मल में खून आने जैसे गंभीर लक्षण को भी सामान्य समस्या समझते हैं और इसे कैंसर की चेतावनी नहीं मानते. विशेषज्ञ इसे लक्षणों का खतरनाक सामान्यीकरण बताते हैं, जहां लोग शरीर के संकेतों को हल्के में लेकर नजरअंदाज कर देते हैं. यही लापरवाही बीमारी को गंभीर रूप देने में बड़ी भूमिका निभाती है.

डॉक्टर्स के अनुसार इस स्थिति के पीछे सेल्फ-मेडिकेशन की आदत भी एक बड़ी वजह है. सर्वे में पाया गया कि लगभग 90% लोग कब्ज, दस्त या पेट दर्द जैसी समस्याओं के लिए डॉक्टर से सलाह लेने के बजाय घरेलू उपाय, इंटरनेट पर मिली जानकारी या मेडिकल स्टोर से दवाइयां लेना पसंद करते हैं. इससे असली बीमारी छिप जाती है और सही समय पर जांच नहीं हो पाती. केवल 10% लोग ही समय रहते विशेषज्ञ से संपर्क करते हैं, बीमारी को छिपाना एक चिंताजनक संकेत है.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

डॉक्टर्स का कहना है कि भारत में हर साल करीब 65000 कोलोरेक्टल कैंसर के नए मामले सामने आते हैं, जिनमें से 50% से अधिक मामलों में देरी से पहचान के कारण मृत्यु हो जाती है. सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अब यह बीमारी युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है. सर्वे में शामिल करीब 40% युवाओं ने माना कि उन्होंने पाचन से जुड़ी समस्याओं को सामान्य मानकर टाल दिया, जिससे बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती गई और जब तक जांच कराई गई, तब तक यह गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी थी.

इस बढ़ते खतरे के पीछे खराब लाइफस्टाइल एक प्रमुख कारण बनकर उभरी है. सर्वे के अनुसार 86% लोग नियमित रूप से बाहर का या पैकेज्ड फूड खाते हैं, जिसमें फाइबर की कमी और प्रिजर्वेटिव्स की ज्यादा मात्रा होती है. केवल 35.5% लोग नियमित रूप से व्यायाम करते हैं और लगभग 40% लोग तंबाकू का सेवन करते हैं, जो कैंसर के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है. इसके अलावा लंबे समय तक बैठे रहने की आदत, तनाव और अनियमित दिनचर्या भी पाचन तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं.

डॉक्टर्स ने यह भी चेतावनी दी है कि कोलोरेक्टल कैंसर हमेशा दर्द के साथ नहीं होता, जिससे इसकी पहचान और भी कठिन हो जाती है. लगातार पेट फूलना, मल त्याग की आदतों में बदलाव, अधूरा पेट साफ होने का एहसास, वजन कम होना या मल में खून आना जैसे संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. खासकर जिन लोगों के परिवार में कैंसर का इतिहास है, उन्हें अधिक सतर्क रहने की जरूरत है. समय पर जांच, सही जीवनशैली और डॉक्टर की सलाह से इस गंभीर बीमारी को शुरुआती चरण में ही रोका जा सकता है. शुरुआती स्टेज में इस कैंसर का इलाज ज्यादा सफल रहता है.

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