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नेशनल टेक्नोनॉली-डे स्पेशल:AI सिर्फ चैटबॉट नहीं, खेत-स्कूल-अस्पताल तक पहुंच रहा, IIT डायरेक्टर्स और भाषिनी CEO ने बताए भारत के टेक्नोलॉजी मिशन

नेशनल टेक्नोनॉली-डे स्पेशल:AI सिर्फ चैटबॉट नहीं, खेत-स्कूल-अस्पताल तक पहुंच रहा, IIT डायरेक्टर्स और भाषिनी CEO ने बताए भारत के टेक्नोलॉजी मिशन

भारत में 11 मई को नेशनल टेक्नोलॉजी डे मनाया जा रहा है। इस मौके पर IIT खड़गपुर, IIT दिल्ली, IIT मद्रास के डायरेक्टर्स और भारत सरकार के AI-बेस्ड ट्रांसलेशन प्लेटपॉर्म, भाषिनी के CEO ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में एडवांस होती टेक्वनोलॉजी और आम लोगों तक पहुंच पर अपने आइडियाज और प्रयोगों के बारे में बताया। IIT खड़गपुर के डायरेक्टर प्रो. सुमन चक्रवर्ती ने कहा कि AI सिर्फ लैपटॉप और चैटबॉट तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसका इस्तेमाल खेत, क्लिनिक, फैक्ट्री और गांव तक है। IIT दिल्ली के डायरेक्टर डॉ. रंगन बनर्जी ने कहा कि उनके संस्थान के करीब 100 फैकल्टी मेंबर्स हेल्थकेयर से जुड़े AI प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। IIT मद्रास के डायरेक्टर प्रो. वी कामकोटी ने कहा कि देश के 30 करोड़ छात्रों को समान गुणवत्ता की शिक्षा देने में AI बड़ी भूमिका निभा सकता है। भाषिनी AI के CEO अमिताभ नाग ने कहा कि भारत में टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी चुनौती इंटरनेट नहीं, बल्कि भाषा है। चारों शख्सियत की राय सिलसिलेवार पढ़िए… AI सिर्फ लैपटॉप या चैटबॉट तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसका असली काम है खेत, क्लिनिक, फैक्ट्री और गांव तक पहुंचना। IIT खड़गपुर में हम इसी दिशा में काम कर रहे हैं। AI को जमीन पर उतारने का काम। हमारा प्लेटफॉर्म है AI4ICPS (टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब)। इसका लक्ष्य है AI को सीधे रोजाना की समस्याओं से जोड़ना। हमने हेल्थकेयर के क्षेत्र में कई बड़े इनाेवेशन किए हैं और डिवाइस बनाएं हैं। AI हेल्थकेयर के क्षेत्र में बना रहे ये 4 जरूरी डिवाइस हमने खेती के लिए AI रोबोट बनाए हैं, जो खेत में जाकर खुद फसल देख सकते हैं, बीमारी पहचान सकते हैं और जरूरत के हिसाब से दवा डाल सकते हैं। हेल्थ सेक्टर में भी हमने कई लो-कॉस्ट डायग्नोस्टिक टूल्स बनाए हैं। यह एक पेपर-आधारित स्ट्रिप और मोबाइल फोन से चलने वाला सिस्टम है। मरीज की एक छोटी-सी ब्लड सैंपल ड्रॉप स्ट्रिप पर डाली जाती है, फिर मोबाइल कैमरा उसकी रीडिंग लेता है। AI उस डेटा को समझकर तुरंत बता देता है कि खून की कमी है या नहीं। इसका फायदा यह है कि लैब, मशीन या बड़े सेटअप की जरूरत नहीं पड़ती। आंगनवाड़ी, स्कूल या गांव के हेल्थ कैंप में भी जांच हो सकती है। यह एक हैंडहेल्ड डिवाइस है, जो दिखने में टॉर्च जैसा है। इसे मुंह के अंदर लाइट डालकर इस्तेमाल किया जाता है, जहां AI की मदद से शुरुआती कैंसर के संकेत पहचाने जा सकते हैं। हमारा पूरा फोकस लागत कम करने पर है। ओरल कैंसर डिवाइस की कीमत 500 डॉलर (लगभग 40 हजार रुपये) से कम होगी। इसे चलाने के लिए ज्यादा ट्रेनिंग या इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होगी। यह महिलाओं के लिए एक प्राइवेट और आसान स्क्रीनिंग टूल है, खासकर सर्वाइकल हेल्थ के लिए। यह भी स्ट्रिप और मोबाइल आधारित सिस्टम है, जिसमें महिला खुद सैंपल लेकर टेस्ट कर सकती है। सबसे बड़ा फायदा है- प्राइवेसी और सुविधा। बिना अस्पताल गए शुरुआती जांच हो जाती है, जिससे बीमारी जल्दी पकड़ में आ सकती है। यह एक छोटा डिवाइस है, जो टीबी जैसी संक्रामक बीमारियों की जांच कर सकता है। आम तौर पर ऐसे टेस्ट के लिए बड़े लैब सेटअप और समय लगता है, लेकिन यह डिवाइस कम संसाधनों में, तेजी से रिजल्ट देने के लिए डिजाइन किया गया है। इससे गांवों और मोबाइल हेल्थ कैंप में टीबी की जल्दी पहचान संभव हो जाती है। IIT खड़गपुर में खेतों के लिए ‘रोबोफॉर्म’ तैयार किया है। इसमें फसल की बीमारी पहचानने से लेकर सही मात्रा में कीटनाशक छिड़कने तक के काम ऑटोमेशन से किए जा रहे हैं। इसमें कैमरा आधारित एनालिसिस से फसल में बीमारी पहचान सकते हैं। IIT खड़गपुर ने AI-आधारित अनमेम्ड ग्राउंड व्हीकल (यूजीवी) पेश किया, जिसे उसके इनक्यूबेटेड स्टार्टअप एजफोर्स सोल्यूशंस ने विकसित किया है। इसे बिना ड्राइवर के ऑपरेट किया जा सकता है। इसकी सामान्य ऑपरेटिंग रेंज 5 किलोमीटर तक है। यह 500 किलोग्राम तक वजन ले जा सकता है। 2. प्रोफेसर वी.कामकोटी, IIT मद्रास के डायरेक्टर मैं अक्सर एक बात सोचता हूं, क्या हमारे देश के हर बच्चे तक अच्छी शिक्षा पहुंच रही है? और अगर नहीं, तो टेक्नोलॉजी इसमें क्या बदल सकती है? हमारे देश में करीब 25 करोड़ बच्चे स्कूल सिस्टम में हैं और 5 करोड़ छात्र उच्च शिक्षा में। इतने बड़े स्तर पर हर बच्चे को बराबर क्वालिटी की पढ़ाई देना आसान नहीं है। लेकिन AI इसे संभव बना सकता है। इसमें IIT मद्रास 4 बड़े मोर्चों पर भूमिका निभा रहा है- हमने हाल ही में बोधन AI शुरू किया है। इसका मकसद है कि देश के हर बच्चे को बेहतर पढ़ाई मिल सके। इसके तहत हर छात्र को एक AI साथी मिलेगा, जो पढ़ते समय उसके सवालों का जवाब देगा, जहां समझ नहीं आएगा वहां समझाएगा और उसकी कमजोरी पहचानकर उसी हिसाब से पढ़ने में मदद करेगा। हमने 10 लाख शिक्षकों को AI ट्रेनिंग देने की योजना शुरू की है, ताकि वे टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल कर सकें। इससे टीचर्स बेहतर लेसन प्लान बना पाएंगे, कॉपियां जल्दी और सटीक जांच सकेंगे और हर बच्चे की प्रगति को डेटा के जरिए समझ पाएंगे। हम लंबे समय से शक्ति माइक्रोप्रोसेसर प्रोग्राम पर काम कर रहे हैं, जिसका मकसद है भारत का अपना प्रोसेसर बनाना। आज भारत डिजाइन के मामले में बहुत मजबूत है। IIT मद्रास और दूसरे संस्थान हर साल सैकड़ों चिप डिजाइन तैयार कर रहे हैं। अब अगला कदम है देश में ही चिप बनाना। गुजरात में 28 नैनोमीटर टेक्नोलॉजी वाला प्लांट बन रहा है। इसके शुरू होने के बाद अगले 1–2 साल में भारत अपनी करीब 90% जरूरतें खुद पूरी कर सकता है। IIT मद्रास फोटोनिक्स और डिस्प्ले टेक्नोलॉजी पर भी काम कर रहा है, जो आने वाले समय में हमारे रोजमर्रा के गैजेट्स को बदल सकती है। फोटोनिक्स का मतलब है कि डेटा को रोशनी के जरिए तेजी से ट्रांसफर करना। इससे इंटरनेट स्पीड बढ़ेगी और नेटवर्क ज्यादा एफिशिएंट होगा। वहीं एमोलेड डिस्प्ले टेक्नोलॉजी मोबाइल स्क्रीन को बेहतर बनाती है… कम बैटरी में ज्यादा ब्राइट और क्लियर डिस्प्ले। 3. डॉ. रंगन बनर्जी, IIT दिल्ली के डायरेक्टर हम चाहते हैं कि जो सुविधा आज बड़े अस्पतालों और विशेषज्ञ डॉक्टरों तक सीमित है, वह गांव के प्राइमरी हेल्थ सेंटर तक पहुंचे। IIT दिल्ली में हमारे करीब 600–650 फैकल्टी मेंबर्स हैं, जिनमें से लगभग 100 हेल्थकेयर से जुड़े अलग-अलग प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। AIIMS और अन्य अस्पतालों के साथ मिलकर हम ऐसे 4 समाधान बना रहे हैं, जो सीधे लोगों के काम आएं। हम एम्स के साथ मिलकर AI आधारित कैंसर डिटेक्शन सिस्टम पर काम कर रहे हैं। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें हर बार रेडियोलॉजिस्ट की जरूरत नहीं होती। सटीकता विशेषज्ञ डॉक्टरों के करीब है और बड़े स्तर पर स्क्रीनिंग संभव हो सकती है। हम ‘कोबोटिक्स’ यानी कोलैबोरेटिव रोबोटिक्स पर काम कर रहे हैं, जहां मशीन और इंसान साथ मिलकर काम करते हैं। इसमें मेडिकल रोबोटिक्स, दवाइयों की डिलीवरी, रोबोटिक सर्जरी जैसी तकनीकों पर रिसर्च हो रही है। इसका मकसद है इलाज को ज्यादा सटीक, सुरक्षित और सुलभ बनाना। पर्यावरण के क्षेत्र में हमने LC3 ग्रीन सीमेंट विकसित किया है, जिसमें पारंपरिक सीमेंट के मुकाबले करीब 50% कम कार्बन उत्सर्जन होता है। लेकिन मजबूती और उपयोग लगभग समान रहता है। इस टेक्नोलॉजी का 25 देशों में ट्रायल हो चुका है, यानी यह ग्लोबल स्तर पर भी स्वीकार की जा रही है। इसके अलावा ‘कोल टू मेथेनॉल’ प्रोजेक्ट में कोयले को ग्रीन मेथेनॉल में बदला जा रहा है, साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर किया जा रहा है। IIT दिल्ली ने रेलवे और मेट्रो नेटवर्क के लिए AI आधारित SCADA (सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा एक्विजिशन) विकसित किया है। यह ट्रेन संचालन में उपयोगी है। इस प्रणाली के तहत AI पटरियों, पहियों और ओवरहेड तारों के डेटा का विश्लेषण करके खराब होने से पहले ही उसकी भविष्यवाणी कर सकता है। 4. अमिताभ नाग, भाषिनी के CEO भारत में टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी चुनौती इंटरनेट नहीं, भाषा है। अगर कोई व्यक्ति अपनी भाषा में सिस्टम समझ ही नहीं पा रहा, तो वह डिजिटल सेवाओं का फायदा कैसे लेगा? इसी सोच के साथ हम भाषिनी पर काम कर रहे हैं। भाषिनी भारत की भाषाओं और बोली के हिसाब से बना है। लोकल कॉन्टेक्स्ट और शब्दों को बेहतर समझता है। सरकारी सिस्टम में सीधे जुड़ा हुआ है। भाषिनी का सबसे बड़ा फोकस है कि लोग अपनी भाषा में सेवाओं का इस्तेमाल कर सकें। आज पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में 79.8 करोड़ लोग हैं और हर महीने करीब 20 लाख इंटरैक्शन अपनी भाषा में हो रहे हैं। गांव स्तर पर ई–ग्राम स्वराज और सभासार जैसे प्लेटफॉर्म हैं। 3 लाख से ज्यादा ग्राम सभा मीटिंग्स रिकॉर्ड व 1.28 लाख पंचायतों में इस्तेमाल हो रहा है। भाषिनी के टूल्स आज सिर्फ एक एप तक सीमित नहीं हैं। 800 से ज्यादा सरकारी प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल। रोजाना 1.5 से 2 करोड़ एआई प्रोसेसिंग। 36 टेक्स्ट भाषाएं सपोर्ट करता है। 23 वॉइस भाषाएं हैं और 35+ अंतरराष्ट्रीय भाषाएं भी हैं। इसका असर है कि किसान अपनी भाषा में सलाह ले पा रहे हैं। मरीज डॉक्टर से बेहतर बात कर पा रहे हैं। छात्र अपनी भाषा में पढ़ाई समझ पा रहे हैं अब हम अगले फेज पर काम कर रहे हैं। हम मल्टीलिंगुअल ऑडियोबुक्स व रियल-टाइम ट्रांसक्रिप्शन और ट्रांसलेशन टूल्स बना रहे हैं। इससे छात्र अपनी भाषा में कंटेंट सुन सकेंगे… मीटिंग, क्लास या सरकारी बातचीत तुरंत समझ आएगी व अलग-अलग भाषाओं के लोग बिना रुकावट बात कर पाएंगे। यह रोलआउट फेज में शुरू होगा, यानी आने वाले समय में धीरे-धीरे ये टूल्स आम लोगों तक पहुंचेंगे। हम ऐसे टूल्स बना रहे हैं जहां लोग बोलकर सवाल पूछ सकें… टेक्स्ट पढ़ने-लिखने की जरूरत कम हो। कम इंटरनेट में भी काम कर सके। इसका फायदा है कि किसान सीधे अपनी भाषा में सलाह ले सकता है। कोई व्यक्ति सरकारी योजना समझ सकता है तो डिजिटल सिस्टम ज्यादा आसान बन जाते हैं।

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नेशनल टेक्नोनॉली-डे स्पेशल:AI सिर्फ चैटबॉट नहीं, खेत-स्कूल-अस्पताल तक पहुंच रहा, IIT डायरेक्टर्स और भाषिनी CEO ने बताए भारत के टेक्नोलॉजी मिशन

नेशनल टेक्नोनॉली-डे स्पेशल:AI सिर्फ चैटबॉट नहीं, खेत-स्कूल-अस्पताल तक पहुंच रहा, IIT डायरेक्टर्स और भाषिनी CEO ने बताए भारत के टेक्नोलॉजी मिशन

भारत में 11 मई को नेशनल टेक्नोलॉजी डे मनाया जा रहा है। इस मौके पर IIT खड़गपुर, IIT दिल्ली, IIT मद्रास के डायरेक्टर्स और भारत सरकार के AI-बेस्ड ट्रांसलेशन प्लेटपॉर्म, भाषिनी के CEO ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में एडवांस होती टेक्वनोलॉजी और आम लोगों तक पहुंच पर अपने आइडियाज और प्रयोगों के बारे में बताया। IIT खड़गपुर के डायरेक्टर प्रो. सुमन चक्रवर्ती ने कहा कि AI सिर्फ लैपटॉप और चैटबॉट तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसका इस्तेमाल खेत, क्लिनिक, फैक्ट्री और गांव तक है। IIT दिल्ली के डायरेक्टर डॉ. रंगन बनर्जी ने कहा कि उनके संस्थान के करीब 100 फैकल्टी मेंबर्स हेल्थकेयर से जुड़े AI प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। IIT मद्रास के डायरेक्टर प्रो. वी कामकोटी ने कहा कि देश के 30 करोड़ छात्रों को समान गुणवत्ता की शिक्षा देने में AI बड़ी भूमिका निभा सकता है। भाषिनी AI के CEO अमिताभ नाग ने कहा कि भारत में टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी चुनौती इंटरनेट नहीं, बल्कि भाषा है। चारों शख्सियत की राय सिलसिलेवार पढ़िए… AI सिर्फ लैपटॉप या चैटबॉट तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसका असली काम है खेत, क्लिनिक, फैक्ट्री और गांव तक पहुंचना। IIT खड़गपुर में हम इसी दिशा में काम कर रहे हैं। AI को जमीन पर उतारने का काम। हमारा प्लेटफॉर्म है AI4ICPS (टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब)। इसका लक्ष्य है AI को सीधे रोजाना की समस्याओं से जोड़ना। हमने हेल्थकेयर के क्षेत्र में कई बड़े इनाेवेशन किए हैं और डिवाइस बनाएं हैं। AI हेल्थकेयर के क्षेत्र में बना रहे ये 4 जरूरी डिवाइस हमने खेती के लिए AI रोबोट बनाए हैं, जो खेत में जाकर खुद फसल देख सकते हैं, बीमारी पहचान सकते हैं और जरूरत के हिसाब से दवा डाल सकते हैं। हेल्थ सेक्टर में भी हमने कई लो-कॉस्ट डायग्नोस्टिक टूल्स बनाए हैं। यह एक पेपर-आधारित स्ट्रिप और मोबाइल फोन से चलने वाला सिस्टम है। मरीज की एक छोटी-सी ब्लड सैंपल ड्रॉप स्ट्रिप पर डाली जाती है, फिर मोबाइल कैमरा उसकी रीडिंग लेता है। AI उस डेटा को समझकर तुरंत बता देता है कि खून की कमी है या नहीं। इसका फायदा यह है कि लैब, मशीन या बड़े सेटअप की जरूरत नहीं पड़ती। आंगनवाड़ी, स्कूल या गांव के हेल्थ कैंप में भी जांच हो सकती है। यह एक हैंडहेल्ड डिवाइस है, जो दिखने में टॉर्च जैसा है। इसे मुंह के अंदर लाइट डालकर इस्तेमाल किया जाता है, जहां AI की मदद से शुरुआती कैंसर के संकेत पहचाने जा सकते हैं। हमारा पूरा फोकस लागत कम करने पर है। ओरल कैंसर डिवाइस की कीमत 500 डॉलर (लगभग 40 हजार रुपये) से कम होगी। इसे चलाने के लिए ज्यादा ट्रेनिंग या इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होगी। यह महिलाओं के लिए एक प्राइवेट और आसान स्क्रीनिंग टूल है, खासकर सर्वाइकल हेल्थ के लिए। यह भी स्ट्रिप और मोबाइल आधारित सिस्टम है, जिसमें महिला खुद सैंपल लेकर टेस्ट कर सकती है। सबसे बड़ा फायदा है- प्राइवेसी और सुविधा। बिना अस्पताल गए शुरुआती जांच हो जाती है, जिससे बीमारी जल्दी पकड़ में आ सकती है। यह एक छोटा डिवाइस है, जो टीबी जैसी संक्रामक बीमारियों की जांच कर सकता है। आम तौर पर ऐसे टेस्ट के लिए बड़े लैब सेटअप और समय लगता है, लेकिन यह डिवाइस कम संसाधनों में, तेजी से रिजल्ट देने के लिए डिजाइन किया गया है। इससे गांवों और मोबाइल हेल्थ कैंप में टीबी की जल्दी पहचान संभव हो जाती है। IIT खड़गपुर में खेतों के लिए ‘रोबोफॉर्म’ तैयार किया है। इसमें फसल की बीमारी पहचानने से लेकर सही मात्रा में कीटनाशक छिड़कने तक के काम ऑटोमेशन से किए जा रहे हैं। इसमें कैमरा आधारित एनालिसिस से फसल में बीमारी पहचान सकते हैं। IIT खड़गपुर ने AI-आधारित अनमेम्ड ग्राउंड व्हीकल (यूजीवी) पेश किया, जिसे उसके इनक्यूबेटेड स्टार्टअप एजफोर्स सोल्यूशंस ने विकसित किया है। इसे बिना ड्राइवर के ऑपरेट किया जा सकता है। इसकी सामान्य ऑपरेटिंग रेंज 5 किलोमीटर तक है। यह 500 किलोग्राम तक वजन ले जा सकता है। 2. प्रोफेसर वी.कामकोटी, IIT मद्रास के डायरेक्टर मैं अक्सर एक बात सोचता हूं, क्या हमारे देश के हर बच्चे तक अच्छी शिक्षा पहुंच रही है? और अगर नहीं, तो टेक्नोलॉजी इसमें क्या बदल सकती है? हमारे देश में करीब 25 करोड़ बच्चे स्कूल सिस्टम में हैं और 5 करोड़ छात्र उच्च शिक्षा में। इतने बड़े स्तर पर हर बच्चे को बराबर क्वालिटी की पढ़ाई देना आसान नहीं है। लेकिन AI इसे संभव बना सकता है। इसमें IIT मद्रास 4 बड़े मोर्चों पर भूमिका निभा रहा है- हमने हाल ही में बोधन AI शुरू किया है। इसका मकसद है कि देश के हर बच्चे को बेहतर पढ़ाई मिल सके। इसके तहत हर छात्र को एक AI साथी मिलेगा, जो पढ़ते समय उसके सवालों का जवाब देगा, जहां समझ नहीं आएगा वहां समझाएगा और उसकी कमजोरी पहचानकर उसी हिसाब से पढ़ने में मदद करेगा। हमने 10 लाख शिक्षकों को AI ट्रेनिंग देने की योजना शुरू की है, ताकि वे टेक्नोलॉजी का सही इस्तेमाल कर सकें। इससे टीचर्स बेहतर लेसन प्लान बना पाएंगे, कॉपियां जल्दी और सटीक जांच सकेंगे और हर बच्चे की प्रगति को डेटा के जरिए समझ पाएंगे। हम लंबे समय से शक्ति माइक्रोप्रोसेसर प्रोग्राम पर काम कर रहे हैं, जिसका मकसद है भारत का अपना प्रोसेसर बनाना। आज भारत डिजाइन के मामले में बहुत मजबूत है। IIT मद्रास और दूसरे संस्थान हर साल सैकड़ों चिप डिजाइन तैयार कर रहे हैं। अब अगला कदम है देश में ही चिप बनाना। गुजरात में 28 नैनोमीटर टेक्नोलॉजी वाला प्लांट बन रहा है। इसके शुरू होने के बाद अगले 1–2 साल में भारत अपनी करीब 90% जरूरतें खुद पूरी कर सकता है। IIT मद्रास फोटोनिक्स और डिस्प्ले टेक्नोलॉजी पर भी काम कर रहा है, जो आने वाले समय में हमारे रोजमर्रा के गैजेट्स को बदल सकती है। फोटोनिक्स का मतलब है कि डेटा को रोशनी के जरिए तेजी से ट्रांसफर करना। इससे इंटरनेट स्पीड बढ़ेगी और नेटवर्क ज्यादा एफिशिएंट होगा। वहीं एमोलेड डिस्प्ले टेक्नोलॉजी मोबाइल स्क्रीन को बेहतर बनाती है… कम बैटरी में ज्यादा ब्राइट और क्लियर डिस्प्ले। 3. डॉ. रंगन बनर्जी, IIT दिल्ली के डायरेक्टर हम चाहते हैं कि जो सुविधा आज बड़े अस्पतालों और विशेषज्ञ डॉक्टरों तक सीमित है, वह गांव के प्राइमरी हेल्थ सेंटर तक पहुंचे। IIT दिल्ली में हमारे करीब 600–650 फैकल्टी मेंबर्स हैं, जिनमें से लगभग 100 हेल्थकेयर से जुड़े अलग-अलग प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। AIIMS और अन्य अस्पतालों के साथ मिलकर हम ऐसे 4 समाधान बना रहे हैं, जो सीधे लोगों के काम आएं। हम एम्स के साथ मिलकर AI आधारित कैंसर डिटेक्शन सिस्टम पर काम कर रहे हैं। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें हर बार रेडियोलॉजिस्ट की जरूरत नहीं होती। सटीकता विशेषज्ञ डॉक्टरों के करीब है और बड़े स्तर पर स्क्रीनिंग संभव हो सकती है। हम ‘कोबोटिक्स’ यानी कोलैबोरेटिव रोबोटिक्स पर काम कर रहे हैं, जहां मशीन और इंसान साथ मिलकर काम करते हैं। इसमें मेडिकल रोबोटिक्स, दवाइयों की डिलीवरी, रोबोटिक सर्जरी जैसी तकनीकों पर रिसर्च हो रही है। इसका मकसद है इलाज को ज्यादा सटीक, सुरक्षित और सुलभ बनाना। पर्यावरण के क्षेत्र में हमने LC3 ग्रीन सीमेंट विकसित किया है, जिसमें पारंपरिक सीमेंट के मुकाबले करीब 50% कम कार्बन उत्सर्जन होता है। लेकिन मजबूती और उपयोग लगभग समान रहता है। इस टेक्नोलॉजी का 25 देशों में ट्रायल हो चुका है, यानी यह ग्लोबल स्तर पर भी स्वीकार की जा रही है। इसके अलावा ‘कोल टू मेथेनॉल’ प्रोजेक्ट में कोयले को ग्रीन मेथेनॉल में बदला जा रहा है, साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर किया जा रहा है। IIT दिल्ली ने रेलवे और मेट्रो नेटवर्क के लिए AI आधारित SCADA (सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा एक्विजिशन) विकसित किया है। यह ट्रेन संचालन में उपयोगी है। इस प्रणाली के तहत AI पटरियों, पहियों और ओवरहेड तारों के डेटा का विश्लेषण करके खराब होने से पहले ही उसकी भविष्यवाणी कर सकता है। 4. अमिताभ नाग, भाषिनी के CEO भारत में टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी चुनौती इंटरनेट नहीं, भाषा है। अगर कोई व्यक्ति अपनी भाषा में सिस्टम समझ ही नहीं पा रहा, तो वह डिजिटल सेवाओं का फायदा कैसे लेगा? इसी सोच के साथ हम भाषिनी पर काम कर रहे हैं। भाषिनी भारत की भाषाओं और बोली के हिसाब से बना है। लोकल कॉन्टेक्स्ट और शब्दों को बेहतर समझता है। सरकारी सिस्टम में सीधे जुड़ा हुआ है। भाषिनी का सबसे बड़ा फोकस है कि लोग अपनी भाषा में सेवाओं का इस्तेमाल कर सकें। आज पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में 79.8 करोड़ लोग हैं और हर महीने करीब 20 लाख इंटरैक्शन अपनी भाषा में हो रहे हैं। गांव स्तर पर ई–ग्राम स्वराज और सभासार जैसे प्लेटफॉर्म हैं। 3 लाख से ज्यादा ग्राम सभा मीटिंग्स रिकॉर्ड व 1.28 लाख पंचायतों में इस्तेमाल हो रहा है। भाषिनी के टूल्स आज सिर्फ एक एप तक सीमित नहीं हैं। 800 से ज्यादा सरकारी प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल। रोजाना 1.5 से 2 करोड़ एआई प्रोसेसिंग। 36 टेक्स्ट भाषाएं सपोर्ट करता है। 23 वॉइस भाषाएं हैं और 35+ अंतरराष्ट्रीय भाषाएं भी हैं। इसका असर है कि किसान अपनी भाषा में सलाह ले पा रहे हैं। मरीज डॉक्टर से बेहतर बात कर पा रहे हैं। छात्र अपनी भाषा में पढ़ाई समझ पा रहे हैं अब हम अगले फेज पर काम कर रहे हैं। हम मल्टीलिंगुअल ऑडियोबुक्स व रियल-टाइम ट्रांसक्रिप्शन और ट्रांसलेशन टूल्स बना रहे हैं। इससे छात्र अपनी भाषा में कंटेंट सुन सकेंगे… मीटिंग, क्लास या सरकारी बातचीत तुरंत समझ आएगी व अलग-अलग भाषाओं के लोग बिना रुकावट बात कर पाएंगे। यह रोलआउट फेज में शुरू होगा, यानी आने वाले समय में धीरे-धीरे ये टूल्स आम लोगों तक पहुंचेंगे। हम ऐसे टूल्स बना रहे हैं जहां लोग बोलकर सवाल पूछ सकें… टेक्स्ट पढ़ने-लिखने की जरूरत कम हो। कम इंटरनेट में भी काम कर सके। इसका फायदा है कि किसान सीधे अपनी भाषा में सलाह ले सकता है। कोई व्यक्ति सरकारी योजना समझ सकता है तो डिजिटल सिस्टम ज्यादा आसान बन जाते हैं।

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