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पिता की मौत का दर्द कैमरे पर उतरा:युवराज पाराशर ने बताया कैसे निजी दर्द फिल्म का सबसे भावुक दृश्य बना

पिता की मौत का दर्द कैमरे पर उतरा:युवराज पाराशर ने बताया कैसे निजी दर्द फिल्म का सबसे भावुक दृश्य बना

रिश्तों, माता-पिता के सम्मान और बदलते पारिवारिक मूल्यों पर आधारित फिल्म ‘गुड़हल’ इन दिनों चर्चा में है। फिल्म के राइटर, डायरेक्टर प्रोड्यूसर और एक्टर युवराज पाराशर, एक्ट्रेस मोना अंबेगांवकर और पूजा सिंह ने दैनिक भास्कर से फिल्म, अपने किरदारों और इंडस्ट्री के बदलते दौर पर बात की। युवराज ने अपने दिवंगत पिता से जुड़ा भावुक किस्सा साझा करते हुए बताया कि उसी निजी दर्द ने फिल्म के सबसे इमोशनल सीन को जन्म दिया। मोना ने कलाकारों के लिए आलोचना की अहमियत बताई, जबकि पूजा ने फिल्म से जुड़ने का अनुभव साझा किया। सवाल: इस फिल्म की कहानी में क्या खास लगा कि आपको लगा, इसे कहने का यही सही समय है? जवाब/युवराज पाराशर: मेरी शुरुआत एक शॉर्ट फिल्म से हुई थी, जिसमें ऐसी महिला की कहानी थी जिसे मां न बन पाने पर ‘बांझ’ कहा जाता है। तभी मैंने तय किया था कि मैं ऐसी फिल्में बनाऊंगा जो समाज को सोचने पर मजबूर करें। ‘गुड़हल’ लिखने में करीब दो साल लगे। इस पर काफी रिसर्च की, क्योंकि यह माता-पिता और रिश्तों पर आधारित फिल्म है। मेरा मानना है कि आज हम कई बार अपने माता-पिता को नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि हमारी पहचान उन्हीं की वजह से है। इसी सोच से ‘गुड़हल’ की शुरुआत हुई। सवाल: इस फिल्म में आप राइटर, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और एक्टर भी हैं। इन चारों जिम्मेदारियों में सबसे ज्यादा संतुष्टि किस भूमिका ने दी? जवाब/युवराज पाराशर: सभी जिम्मेदारियां मुश्किल हैं, लेकिन सबसे ज्यादा सुकून डायरेक्शन में मिला। जो सीन मैंने लिखे थे, उन्हें कलाकारों की मदद से स्क्रीन पर उसी तरह जीवंत होते देखना सबसे खास अनुभव था। सवाल: मोना, पहली बार ‘गुड़हल’ की कहानी सुनकर किस बात ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया? जवाब/मोना अंबेगांवकर: मैं शुरुआत से इस फिल्म से जुड़ी हूं। पहले यह वृद्धाश्रम की कहानी थी, फिर समझ आया कि यह सिर्फ एक बुजुर्ग महिला नहीं, बल्कि हर उम्र की महिलाओं की कहानी है। मुझे किरदार की उम्र से कभी फर्क नहीं पड़ा। अच्छा रोल हो तो मैं 70-75 साल की महिला का किरदार भी खुशी से निभाऊंगी। आज भी ऐसे लेखक-निर्देशक हैं जो मुझे मुख्य भूमिका में सोचकर स्क्रिप्ट लिखते हैं। यह मेरे लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं है। सवाल: ‘स्नेहा’ के किरदार तक आपका सफर कैसे पहुंचा? ऑडिशन से सिलेक्शन तक का अनुभव कैसा रहा? जवाब/पूजा सिंह: मैं योग कर रही थी, तभी फिल्म के लिए कॉल आया। पहले मुझे लगा कि यह सामान्य ऑडिशन कॉल है, इसलिए मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन स्क्रिप्ट पढ़ते ही कहानी ने मुझे भीतर तक छू लिया और मैं तुरंत युवराज सर से मिलने पहुंच गई। सर ऐसी लड़की की तलाश में थे, जिसके चेहरे पर मासूमियत हो और जो निगेटिव न लगे। उन्होंने मुझमें ‘स्नेहा’ को देखा और मुझे यह किरदार मिल गया। इतने अनुभवी कलाकारों के साथ काम करना मेरे लिए सीखने का शानदार मौका और सपने के सच होने जैसा अनुभव रहा। सवाल: फिल्म का कौन-सा सीन आपके लिए सबसे ज्यादा भावुक और चुनौतीपूर्ण था? जवाब/युवराज पाराशर: एक भावुक सीन शूट करते समय मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसे कैसे फिल्माऊं। तभी मुझे अपने पिता की याद आई। 10 साल पहले मेरे पिता का निधन हुआ था। मैंने उसी दर्द को फिर से महसूस किया और मोना मैम को घर का माहौल व अपनी भावनाएं विस्तार से बताईं। उन्होंने उस दर्द को पूरी तरह अपने अंदर उतार लिया। शॉट खत्म होते ही पूरा सेट खामोश था। मेरी बहन रोते हुए मेरे गले लग गई थी। उस पल हमें लगा कि हमने उस सीन को सचमुच जी लिया। सवाल: मोना, अपने किरदार को निभाने के लिए आपने खुद को मानसिक और भावनात्मक रूप से कैसे तैयार किया? जवाब/मोना अंबेगांवकर: मेरा किरदार ऐसी महिला का है जिसकी पूरी दुनिया उसका पति था। पति के जाने के बाद वह बिल्कुल टूट जाती है। निजी जिंदगी में मैं ऐसी नहीं हूं, इसलिए इस किरदार को समझना आसान नहीं था। लेकिन मैं चाहती थी कि आखिर में यह महिला सिर्फ बेबस न दिखे, बल्कि अपनी ताकत भी दिखाए। यही बात मुझे इस किरदार में सबसे ज्यादा पसंद आई। सवाल: पूजा, जब आपके परिवार ने फिल्म देखी तो उनका रिएक्शन कैसा था? जवाब/पूजा सिंह: मेरी मां ने पहली बार फिल्म देखी तो रोते हुए मुझे वीडियो कॉल किया। मैंने तुरंत युवराज सर को भी फोन पर जोड़ दिया। मां लगातार रो रही थीं। उनका कहना था कि ऐसी फिल्में बननी चाहिए, क्योंकि इनमें हमारे आसपास की असली जिंदगी दिखाई देती है। उनके आंसू हमारे लिए सबसे बड़ा सम्मान थे। सवाल: आज सोशल मीडिया के दौर में क्या फॉलोअर्स एक्टिंग टैलेंट पर भारी पड़ रहे हैं? जवाब/मोना अंबेगांवकर: देश में बहुत अच्छे कलाकार घर बैठे हैं। एक्टर को एक्टिंग करने दीजिए और इन्फ्लुएंसर को इन्फ्लुएंसिंग। दोनों की अपनी जगह है। सिर्फ फॉलोअर्स देखकर कास्टिंग नहीं होनी चाहिए। युवराज पाराशर: एक्टर बनने में सालों की मेहनत लगती है। सिर्फ सोशल मीडिया फॉलोअर्स के आधार पर फैसले होंगे तो कई अच्छे कलाकारों के साथ अन्याय होगा।

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