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भारत में नेपाल जैसी तबाही को उफन रहीं 88 झीलें:खतरे में 6 प्रदेश, आखिर ग्लेशियल लेक अचानक कैसे फट जाती हैं

भारत में नेपाल जैसी तबाही को उफन रहीं 88 झीलें:खतरे में 6 प्रदेश, आखिर ग्लेशियल लेक अचानक कैसे फट जाती हैं

26 सुबह करीब 9 बजे। ग्लेशियर से टूटकर गिरे बर्फ और चट्टानों ने भोटेकोशी नदी में अचानक बाढ़ ला दी, जिससे नेपाल के रसुवा जिले में तबाही मच गई। गांव, सड़कें और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बह गए। सैकड़ों लोग लापता हैं, जिनमें भारत, अमेरिका और ब्रिटेन के टूरिस्ट भी शामिल हैं। करीब एक साल पहले, जुलाई 2025 में भी इसी इलाके में तिब्बत की एक ग्लेशियर झील तापमान बढ़ने से फट गई थी, जिसमें 9 लोगों की जान गई थी। ये एक पैटर्न-सा बनता जा रहा है, जिसकी जद में भारत के भी कई राज्य हैं। 5 गुना बढ़ गईं ग्लेशियर झीलें, खतरे में भारत के 6 प्रदेश IIT रोपड़ और सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी ने एक साझा स्टडी की। इसी महीने जारी रिपोर्ट के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में 1990 में सिर्फ 107 ग्लेशियर झीलें थीं। 2024 तक यह संख्या बढ़कर 669 हो गई, यानी 525% की बढ़ोत्तरी। 669 में से 88 झीलों पर नेपाल जैसी ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ का खतरा मंडरा रहा है। 9 झीलों को ‘बेहद ज्यादा खतरनाक’, 18 को ‘ज्यादा खतरनाक’ और 26 को ‘मध्यम खतरनाक’ श्रेणी में रखा गया है। रिसर्चर्स ने दो झीलों पर खास मॉडलिंग की- ब्यास बेसिन की हिमसू झील और सतलुज बेसिन की एक बेनाम झील। अगर ब्यास झील का नेचुरल डैम टूट जाए, तो 1,385 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड की बाढ़ आएगी। यानी हर सेकेंड करीब 14 लाख लीटर पानी बहेगा। इससे हर सेकेंड ओलंपिक साइज के 6 स्विमिंग पूल भरे जा सकते हैं। इसी तरह सतलुज झील से 3,507 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड पानी का सैलाब आएगा। यानी हर सेकेंड करीब 35 लाख लीटर पानी बहेगा। इससे डैम और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट समेत 588 इमारतों को खतरा है। हिमालय का बढ़ता तामपान इस खतरे को और बढ़ा रहा है। जुलाई 2026 में आई IIT खड़गपुर की एक स्टडी बताती है कि ऊंचाई वाले इलाकों का तापमान पिछले 20 सालों में करीब 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि इससे ग्लेशियर पिघलने और नदियों के बहाव में बड़ा बदलाव आ सकता है। ग्लेशियर झीलें अचानक कैसे फट जाती हैं? पहाड़ों पर ऊंचाई पर मौजूद ग्लेशियर जब पिघलते हैं, तो उनका पानी आसपास के निचले इलाके या किसी चट्टानी दीवार के सहारे इकट्ठा होने लगता है। ये धीरे-धीरे एक झील का रूप ले लेता है, जिसे ‘ग्लेशियल लेक’ कहते हैं। ये झील ग्लेशियर के सामने या उसकी निचली सतह पर भी बन सकती है। इन झीलों को बर्फ, पहाड़ का मलबा या चट्टान की एक नैचुरल दीवार यानी ‘डैम’ रोककर रखती है। जब ये दीवार किसी वजह से अचानक टूट जाती है, तो झील में जमा लाखों-करोड़ों क्यूबिक मीटर पानी बहुत तेज रफ्तार से बेकाबू होकर नीचे की तरफ बहता है। इसी को ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड, GLOF या ग्लेशियर की झील फटना कहते हैं। GLOF में पानी के बहाव की रफ्तार आम बारिश से आई बाढ़ के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती है, जिससे यह रास्ते में आने वाली हर चीज को बहुत तेजी से काटती-छांटती और बहाती चली जाती है। ग्लेशियर झील 3 वजहों से फट सकती हैं… 1. ग्लोबल वॉर्मिंग से ग्लेशियर का तेजी से पिघलना 2. बर्फ या चट्टान का झील में गिरना भारी बारिश से झील का ओवरफ्लो होना GLOF की तबाही कैसे रोकी जा सकती है? नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, NDMA और नेशनल GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम के मुताबिक, क्या नेपाल की बाढ़ से भारत में फौरन कोई खतरा? इसलिए भोटेकोशी में अधिक पानी आने पर उसका पानी सुनकोशी और फिर कोसी नदी तंत्र में शामिल हो सकता है। इससे सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जिले काफी प्रभावित हो सकते हैं। 2008 में नेपाल के कुसहा में कोसी नदी का तटबंध टूट गया था। इसके बाद कोसी नदी अपने नए/प्राकृतिक रास्ते को छोड़कर सैकड़ों साल पुराने पूर्व की ओर वाले रास्ते पर बहने लगी। इससे अचानक नदी का रुख घनी आबादी और नए इलाकों की तरफ मुड़ गया, जिससे बिहार के 34 लाख से अधिक लोग बिना किसी पूर्व चेतावनी के भीषण बाढ़ की चपेट में आ गए। हालांकि, इस बार रसुवा में लैंडस्लाइड, भूस्खलन या हिम झील टूटने से अचानक नदी में भारी मात्रा में पानी आ गया है। लेकिन नदी ने अपना रास्ता नहीं बदला है। वह अपने तय रास्ते पर बह रही है। इस कारण एक्सपर्ट तटबंध टूटने की संभावना व्यक्त नहीं कर रहे हैं। ————

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26 सुबह करीब 9 बजे। ग्लेशियर से टूटकर गिरे बर्फ और चट्टानों ने भोटेकोशी नदी में अचानक बाढ़ ला दी, जिससे नेपाल के रसुवा जिले में तबाही मच गई। गांव, सड़कें और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बह गए। सैकड़ों लोग लापता हैं, जिनमें भारत, अमेरिका और ब्रिटेन के टूरिस्ट भी शामिल हैं। करीब एक साल पहले, जुलाई 2025 में भी इसी इलाके में तिब्बत की एक ग्लेशियर झील तापमान बढ़ने से फट गई थी, जिसमें 9 लोगों की जान गई थी। ये एक पैटर्न-सा बनता जा रहा है, जिसकी जद में भारत के भी कई राज्य हैं। 5 गुना बढ़ गईं ग्लेशियर झीलें, खतरे में भारत के 6 प्रदेश IIT रोपड़ और सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी ने एक साझा स्टडी की। इसी महीने जारी रिपोर्ट के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में 1990 में सिर्फ 107 ग्लेशियर झीलें थीं। 2024 तक यह संख्या बढ़कर 669 हो गई, यानी 525% की बढ़ोत्तरी। 669 में से 88 झीलों पर नेपाल जैसी ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ का खतरा मंडरा रहा है। 9 झीलों को ‘बेहद ज्यादा खतरनाक’, 18 को ‘ज्यादा खतरनाक’ और 26 को ‘मध्यम खतरनाक’ श्रेणी में रखा गया है। रिसर्चर्स ने दो झीलों पर खास मॉडलिंग की- ब्यास बेसिन की हिमसू झील और सतलुज बेसिन की एक बेनाम झील। अगर ब्यास झील का नेचुरल डैम टूट जाए, तो 1,385 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड की बाढ़ आएगी। यानी हर सेकेंड करीब 14 लाख लीटर पानी बहेगा। इससे हर सेकेंड ओलंपिक साइज के 6 स्विमिंग पूल भरे जा सकते हैं। इसी तरह सतलुज झील से 3,507 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड पानी का सैलाब आएगा। यानी हर सेकेंड करीब 35 लाख लीटर पानी बहेगा। इससे डैम और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट समेत 588 इमारतों को खतरा है। हिमालय का बढ़ता तामपान इस खतरे को और बढ़ा रहा है। जुलाई 2026 में आई IIT खड़गपुर की एक स्टडी बताती है कि ऊंचाई वाले इलाकों का तापमान पिछले 20 सालों में करीब 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि इससे ग्लेशियर पिघलने और नदियों के बहाव में बड़ा बदलाव आ सकता है। ग्लेशियर झीलें अचानक कैसे फट जाती हैं? पहाड़ों पर ऊंचाई पर मौजूद ग्लेशियर जब पिघलते हैं, तो उनका पानी आसपास के निचले इलाके या किसी चट्टानी दीवार के सहारे इकट्ठा होने लगता है। ये धीरे-धीरे एक झील का रूप ले लेता है, जिसे ‘ग्लेशियल लेक’ कहते हैं। ये झील ग्लेशियर के सामने या उसकी निचली सतह पर भी बन सकती है। इन झीलों को बर्फ, पहाड़ का मलबा या चट्टान की एक नैचुरल दीवार यानी ‘डैम’ रोककर रखती है। जब ये दीवार किसी वजह से अचानक टूट जाती है, तो झील में जमा लाखों-करोड़ों क्यूबिक मीटर पानी बहुत तेज रफ्तार से बेकाबू होकर नीचे की तरफ बहता है। इसी को ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड, GLOF या ग्लेशियर की झील फटना कहते हैं। GLOF में पानी के बहाव की रफ्तार आम बारिश से आई बाढ़ के मुकाबले कई गुना ज्यादा होती है, जिससे यह रास्ते में आने वाली हर चीज को बहुत तेजी से काटती-छांटती और बहाती चली जाती है। ग्लेशियर झील 3 वजहों से फट सकती हैं… 1. ग्लोबल वॉर्मिंग से ग्लेशियर का तेजी से पिघलना 2. बर्फ या चट्टान का झील में गिरना भारी बारिश से झील का ओवरफ्लो होना GLOF की तबाही कैसे रोकी जा सकती है? नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, NDMA और नेशनल GLOF रिस्क मिटिगेशन प्रोग्राम के मुताबिक, क्या नेपाल की बाढ़ से भारत में फौरन कोई खतरा? इसलिए भोटेकोशी में अधिक पानी आने पर उसका पानी सुनकोशी और फिर कोसी नदी तंत्र में शामिल हो सकता है। इससे सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जिले काफी प्रभावित हो सकते हैं। 2008 में नेपाल के कुसहा में कोसी नदी का तटबंध टूट गया था। इसके बाद कोसी नदी अपने नए/प्राकृतिक रास्ते को छोड़कर सैकड़ों साल पुराने पूर्व की ओर वाले रास्ते पर बहने लगी। इससे अचानक नदी का रुख घनी आबादी और नए इलाकों की तरफ मुड़ गया, जिससे बिहार के 34 लाख से अधिक लोग बिना किसी पूर्व चेतावनी के भीषण बाढ़ की चपेट में आ गए। हालांकि, इस बार रसुवा में लैंडस्लाइड, भूस्खलन या हिम झील टूटने से अचानक नदी में भारी मात्रा में पानी आ गया है। लेकिन नदी ने अपना रास्ता नहीं बदला है। वह अपने तय रास्ते पर बह रही है। इस कारण एक्सपर्ट तटबंध टूटने की संभावना व्यक्त नहीं कर रहे हैं। ————

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