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मूवी रिव्यू: मैक्स, मिन एंड म्याऊजाकी:रिश्तों, अकेलेपन और हीलिंग की संवेदनशील कहानी, लेकिन लंबी लेंथ और धीमी रफ्तार दर्शकों की सब्र की परीक्षा लेती है

मूवी रिव्यू: मैक्स, मिन एंड म्याऊजाकी:रिश्तों, अकेलेपन और हीलिंग की संवेदनशील कहानी, लेकिन लंबी लेंथ और धीमी रफ्तार दर्शकों की सब्र की परीक्षा लेती है

निर्देशक पद्मकुमार नरसिम्हामूर्ति की ‘मैक्स, मिन एंड म्याऊजाकी’ परिवार, रिश्तों, मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक हीलिंग पर आधारित धीमी रफ्तार लेकिन दिल छू लेने वाली कहानी पेश करती है। फिल्म में हायाओ म्याऊजाकी की फिल्मों की गर्मजोशी और बिल्लियों के प्रति प्रेम की झलक महसूस होती है। इसकी लेंथ 2 घंटे 18 मिनट है। दैनिक भास्कर डिजिटल फिल्म को 5 में से 3 स्टार देता है। फिल्म की कहानी कैसी है? फिल्म की शुरुआत मैक्स (सिद्धार्थ मेनन) और उसकी गर्लफ्रेंड मिन (मेधा शंकर) के ब्रेकअप से होती है। कभी दोनों को हायाओ मियाज़ाकी की फिल्में जोड़ती थीं, लेकिन अब उनका रिश्ता खत्म हो चुका है। अब उनके बीच सिर्फ उनकी पालतू बिल्ली म्याऊजाकी का रिश्ता बचा है। मिन कुछ समय के लिए बिल्ली को मैक्स के पास छोड़ देती है। जानवरों के बालों से एलर्जी के कारण मैक्स उसे रखने के लिए तैयार नहीं होता। धीरे-धीरे यही बिल्ली दोनों की जिंदगी में फिर से भावनात्मक जुड़ाव की वजह बनती है। यह सिर्फ ब्रेकअप की कहानी नहीं है। मैक्स मां वसुधा की कैंसर से हुई मौत के सदमे से उबरने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर पिता रमेश पत्नी के जाने के बाद अकेलेपन, अपराधबोध और अंदरूनी संघर्ष से जूझ रहे हैं। कहानी तीन पीढ़ियों की भावनात्मक उलझनों को जोड़ती है। मैक्स के दादा श्रीधर महादेवन नर्सिंग होम में जीवन को नए नजरिए से देखते हैं। जेनिफर सेक्वेरा और कैरोल जैसे किरदार दिखाते हैं कि उम्र चाहे कोई भी हो, इंसान को अपनापन और प्यार की जरूरत हमेशा रहती है। फिल्म रिश्तों के टूटने, माता-पिता और बच्चों की बढ़ती दूरियों, मानसिक स्वास्थ्य, थेरेपी, अकेलेपन, इस्लामोफोबिया, लैंगिक भूमिकाओं और पारिवारिक जिम्मेदारियों जैसे कई सामाजिक मुद्दों को बिना भाषण दिए स्वाभाविक ढंग से कहानी में पिरोती है। हालांकि कई सब-प्लॉट के कारण फिल्म कुछ जगहों पर बिखरी हुई और जरूरत से ज्यादा लंबी महसूस होती है। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? सिद्धार्थ मेनन ने मैक्स के किरदार में टूटे इंसान की भावनाओं को ईमानदारी से निभाया है। मां की मौत और रिश्ते के खत्म होने के बाद की उथल-पुथल को वह प्रभावी ढंग से स्क्रीन पर लाते हैं। मेधा शंकर ने मिन के किरदार में संयमित अभिनय किया है। ज्यादा ड्रामेटिक दृश्य नहीं होने के बावजूद वह किरदार को सहज बनाए रखती हैं। फिल्म की सबसे मजबूत परफॉर्मेंस आदिल हुसैन की है। रमेश महादेवन के रूप में उन्होंने अपराधबोध, अकेलेपन और आत्मस्वीकृति के संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से निभाया है। खासकर थेरेपी वाले दृश्य और बेटे मैक्स के साथ उनके भावुक संवाद याद रहते हैं। नासर ने श्रीधर महादेवन का किरदार निभाया है। वह सीमित स्क्रीन टाइम में भी असर छोड़ते हैं। उनकी मौजूदगी फिल्म में अनुभव और भावनात्मक गहराई जोड़ती है। नफीसा अली जेनिफर सेक्वेरा के रूप में गरिमा और संवेदनशीलता लेकर आती हैं। विदात्री बंदी कैरोल के किरदार में सहजता और जीवन से थकी लेकिन सकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित करती हैं। मंदिरा बेदी धारा के किरदार में कहानी को संतुलन देती हैं। हालांकि उनका रोल छोटा है, लेकिन वह प्रभाव छोड़ती हैं। डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष कैसा है? निर्देशक पद्मकुमार नरसिम्हामूर्ति ने भावनात्मक विषयों को संवेदनशीलता से पेश किया है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके किरदार हैं, जिन्हें पर्याप्त समय मिला है। हालांकि इसी वजह से फिल्म कई जगह जरूरत से ज्यादा फैली हुई महसूस होती है। सिनेमैटोग्राफी साधारण लेकिन प्रभावी है। कैमरा पात्रों की भावनाओं पर फोकस करता है। प्रोडक्शन डिजाइन मजबूत है। मैक्स का आधुनिक अपार्टमेंट, स्टूडियो घिबली के पोस्टर और कैरोल का बोहेमियन घर किरदारों की मानसिक दुनिया को दर्शाते हैं। कॉस्ट्यूम डिजाइन किरदारों के व्यक्तित्व के अनुरूप है और छोटे-छोटे विजुअल डिटेल्स फिल्म को वास्तविक बनाते हैं। म्यूजिक कैसा है? फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर शांत और भावनात्मक है। संगीत कहानी पर हावी होने की बजाय उसका मूड बेहतर बनाता है। कहीं भी जरूरत से ज्यादा शोर या मेलोड्रामा नहीं है। हालांकि कोई गाना लंबे समय तक याद नहीं रह जाता। फिल्म की कमियां फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी 2 घंटे 18 मिनट की लंबी अवधि है। कई दृश्य और सब-प्लॉट छोटे किए जा सकते थे। कुछ जगहों पर भावुक संवाद लंबे लगते हैं और फिल्म की गति धीमी पड़ जाती है। कुछ कलाकारों का अभिनय निर्देशक की सोच के अनुरूप पूरा प्रभाव नहीं छोड़ पाता। कई गंभीर विषयों को एक साथ शामिल करने से कहानी कुछ हिस्सों में बिखरी हुई लगती है। फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं? अगर आपको तेज रफ्तार मसाला फिल्में पसंद हैं तो ‘मैक्स, मिन एंड म्याऊजाकी’ धीमी लग सकती है। लेकिन रिश्तों, परिवार, मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक हीलिंग पर आधारित संवेदनशील कहानियां पसंद हैं तो यह फिल्म पसंद आ सकती है। यह फिल्म मनोरंजन से ज्यादा इंसानी भावनाओं को समझने और महसूस करने का अनुभव देती है। लंबी लेंथ इसकी कमजोरी है, लेकिन ईमानदार कहानी और आदिल हुसैन का दमदार अभिनय इसे एक बार देखने लायक बनाते हैं।

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मूवी रिव्यू: मैक्स, मिन एंड म्याऊजाकी:रिश्तों, अकेलेपन और हीलिंग की संवेदनशील कहानी, लेकिन लंबी लेंथ और धीमी रफ्तार दर्शकों की सब्र की परीक्षा लेती है

निर्देशक पद्मकुमार नरसिम्हामूर्ति की ‘मैक्स, मिन एंड म्याऊजाकी’ परिवार, रिश्तों, मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक हीलिंग पर आधारित धीमी रफ्तार लेकिन दिल छू लेने वाली कहानी पेश करती है। फिल्म में हायाओ म्याऊजाकी की फिल्मों की गर्मजोशी और बिल्लियों के प्रति प्रेम की झलक महसूस होती है। इसकी लेंथ 2 घंटे 18 मिनट है। दैनिक भास्कर डिजिटल फिल्म को 5 में से 3 स्टार देता है। फिल्म की कहानी कैसी है? फिल्म की शुरुआत मैक्स (सिद्धार्थ मेनन) और उसकी गर्लफ्रेंड मिन (मेधा शंकर) के ब्रेकअप से होती है। कभी दोनों को हायाओ मियाज़ाकी की फिल्में जोड़ती थीं, लेकिन अब उनका रिश्ता खत्म हो चुका है। अब उनके बीच सिर्फ उनकी पालतू बिल्ली म्याऊजाकी का रिश्ता बचा है। मिन कुछ समय के लिए बिल्ली को मैक्स के पास छोड़ देती है। जानवरों के बालों से एलर्जी के कारण मैक्स उसे रखने के लिए तैयार नहीं होता। धीरे-धीरे यही बिल्ली दोनों की जिंदगी में फिर से भावनात्मक जुड़ाव की वजह बनती है। यह सिर्फ ब्रेकअप की कहानी नहीं है। मैक्स मां वसुधा की कैंसर से हुई मौत के सदमे से उबरने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर पिता रमेश पत्नी के जाने के बाद अकेलेपन, अपराधबोध और अंदरूनी संघर्ष से जूझ रहे हैं। कहानी तीन पीढ़ियों की भावनात्मक उलझनों को जोड़ती है। मैक्स के दादा श्रीधर महादेवन नर्सिंग होम में जीवन को नए नजरिए से देखते हैं। जेनिफर सेक्वेरा और कैरोल जैसे किरदार दिखाते हैं कि उम्र चाहे कोई भी हो, इंसान को अपनापन और प्यार की जरूरत हमेशा रहती है। फिल्म रिश्तों के टूटने, माता-पिता और बच्चों की बढ़ती दूरियों, मानसिक स्वास्थ्य, थेरेपी, अकेलेपन, इस्लामोफोबिया, लैंगिक भूमिकाओं और पारिवारिक जिम्मेदारियों जैसे कई सामाजिक मुद्दों को बिना भाषण दिए स्वाभाविक ढंग से कहानी में पिरोती है। हालांकि कई सब-प्लॉट के कारण फिल्म कुछ जगहों पर बिखरी हुई और जरूरत से ज्यादा लंबी महसूस होती है। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? सिद्धार्थ मेनन ने मैक्स के किरदार में टूटे इंसान की भावनाओं को ईमानदारी से निभाया है। मां की मौत और रिश्ते के खत्म होने के बाद की उथल-पुथल को वह प्रभावी ढंग से स्क्रीन पर लाते हैं। मेधा शंकर ने मिन के किरदार में संयमित अभिनय किया है। ज्यादा ड्रामेटिक दृश्य नहीं होने के बावजूद वह किरदार को सहज बनाए रखती हैं। फिल्म की सबसे मजबूत परफॉर्मेंस आदिल हुसैन की है। रमेश महादेवन के रूप में उन्होंने अपराधबोध, अकेलेपन और आत्मस्वीकृति के संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से निभाया है। खासकर थेरेपी वाले दृश्य और बेटे मैक्स के साथ उनके भावुक संवाद याद रहते हैं। नासर ने श्रीधर महादेवन का किरदार निभाया है। वह सीमित स्क्रीन टाइम में भी असर छोड़ते हैं। उनकी मौजूदगी फिल्म में अनुभव और भावनात्मक गहराई जोड़ती है। नफीसा अली जेनिफर सेक्वेरा के रूप में गरिमा और संवेदनशीलता लेकर आती हैं। विदात्री बंदी कैरोल के किरदार में सहजता और जीवन से थकी लेकिन सकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित करती हैं। मंदिरा बेदी धारा के किरदार में कहानी को संतुलन देती हैं। हालांकि उनका रोल छोटा है, लेकिन वह प्रभाव छोड़ती हैं। डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष कैसा है? निर्देशक पद्मकुमार नरसिम्हामूर्ति ने भावनात्मक विषयों को संवेदनशीलता से पेश किया है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके किरदार हैं, जिन्हें पर्याप्त समय मिला है। हालांकि इसी वजह से फिल्म कई जगह जरूरत से ज्यादा फैली हुई महसूस होती है। सिनेमैटोग्राफी साधारण लेकिन प्रभावी है। कैमरा पात्रों की भावनाओं पर फोकस करता है। प्रोडक्शन डिजाइन मजबूत है। मैक्स का आधुनिक अपार्टमेंट, स्टूडियो घिबली के पोस्टर और कैरोल का बोहेमियन घर किरदारों की मानसिक दुनिया को दर्शाते हैं। कॉस्ट्यूम डिजाइन किरदारों के व्यक्तित्व के अनुरूप है और छोटे-छोटे विजुअल डिटेल्स फिल्म को वास्तविक बनाते हैं। म्यूजिक कैसा है? फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर शांत और भावनात्मक है। संगीत कहानी पर हावी होने की बजाय उसका मूड बेहतर बनाता है। कहीं भी जरूरत से ज्यादा शोर या मेलोड्रामा नहीं है। हालांकि कोई गाना लंबे समय तक याद नहीं रह जाता। फिल्म की कमियां फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी 2 घंटे 18 मिनट की लंबी अवधि है। कई दृश्य और सब-प्लॉट छोटे किए जा सकते थे। कुछ जगहों पर भावुक संवाद लंबे लगते हैं और फिल्म की गति धीमी पड़ जाती है। कुछ कलाकारों का अभिनय निर्देशक की सोच के अनुरूप पूरा प्रभाव नहीं छोड़ पाता। कई गंभीर विषयों को एक साथ शामिल करने से कहानी कुछ हिस्सों में बिखरी हुई लगती है। फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं? अगर आपको तेज रफ्तार मसाला फिल्में पसंद हैं तो ‘मैक्स, मिन एंड म्याऊजाकी’ धीमी लग सकती है। लेकिन रिश्तों, परिवार, मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक हीलिंग पर आधारित संवेदनशील कहानियां पसंद हैं तो यह फिल्म पसंद आ सकती है। यह फिल्म मनोरंजन से ज्यादा इंसानी भावनाओं को समझने और महसूस करने का अनुभव देती है। लंबी लेंथ इसकी कमजोरी है, लेकिन ईमानदार कहानी और आदिल हुसैन का दमदार अभिनय इसे एक बार देखने लायक बनाते हैं।

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