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लंबी उम्र के ‘जेनेटिक ब्लूप्रिंट’ पर काम:लॉन्जिविटी इंडिया बना रहा है भारतीयों के लिए सेहत का ‘स्वदेशी पैमाना’

लंबी उम्र के ‘जेनेटिक ब्लूप्रिंट’ पर काम:लॉन्जिविटी इंडिया बना रहा है भारतीयों के लिए सेहत का ‘स्वदेशी पैमाना’

जब आप ब्लड टेस्ट करवाते हैं और रिपोर्ट में आपकी वैल्यू नॉर्मल आती है, तो क्या आप वाकई सुरक्षित हैं? अब तक भारत में इस्तेमाल होने वाले स्वास्थ्य के मानक या तो पश्चिमी देशों की नकल हैं या बहुत पुराने डेटा पर आधारित हैं। लेकिन अब भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) बेंगलुरु इस विसंगति को दूर करने के लिए एक मिशन चला रहा है-लॉन्जिविटी इंडिया प्रोजेक्ट। भारतीयों का शरीर, जेनेटिक्स, खान-पान और प्रदूषण पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है। इसलिए, हमारे स्वास्थ्य को नापने का पैमाना भी अलग होना चाहिए। वर्तमान में हम जिन नॉर्मल वैल्यू को आधार मानकर इलाज करते हैं, वे भारतीयों के लिए सटीक नहीं हैं। उदाहरण, भारत में महिलाओं का हीमोग्लोबिन स्तर अक्सर कम पाया जाता है। अगर हम 20 हजार स्वस्थ भारतीयों के सैंपल का वैज्ञानिक विश्लेषण करें, तो मुमकिन है कि भारत के लिए एक नई और ज्यादा सटीक नॉर्मल वैल्यू सामने आए। यह प्रोजेक्ट स्वदेशी बेसलाइन तैयार करने की कोशिश है। रिसर्चर खोज रहे हैं उम्र बढ़ने के साथ इम्यून सिस्टम में क्या बदलाव आते हैं इस मिशन के तहत दो प्रमुख रिसर्च चल रही हैं। एक है – BHARAT स्टडी। इसका मतलब है बायोमार्कर्स ऑफ हेल्दी एजिंग, रेजिलिएंस, एडवर्सिटी एंड ट्रांजिशन। इसके जरिए स्वस्थ भारतीयों के मॉलिक्यूलर डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है ताकि यह समझा जा सके कि उम्र बढ़ने के साथ हमारे इम्यून सिस्टम में क्या बदलाव आते हैं। दूसरी रिसर्च है – ऑर्गन एजिंग प्रोजेक्ट: इसके तहत शोध चल रहा है कि शरीर के अलग-अलग अंग किस रफ्तार से बूढ़े होते हैं। इन प्रोजेक्ट्स के लिए 2030 तक 10,000 स्वस्थ भारतीयों के सैंपल इकट्ठा करना (आदर्श लक्ष्य 1 लाख का)है। इस प्रोजेक्ट में आईआईएससी के साथ-साथ आईआईटी दिल्ली, एम्स और आईआईटी हैदराबाद जैसे संस्थान भी जुड़ रहे हैं। हालांकि अभी यह डेटा कलेक्शन के चरण में है, लेकिन वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि 2027 से 2030 के बीच इसके ऐसे परिणाम आएंगे, जो चिकित्सा जगत की दिशा बदल देंगे। यह कोई ‘अमृत’ खोजने का दावा नहीं है। उम्र को रोका नहीं जा सकता, लेकिन बुढ़ापे में लाचारी को कम किया जा सकता है। इस रिसर्च का अंतिम लक्ष्य भारतीयों के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है, ताकि हम उम्र के आखिरी पड़ाव तक सक्रिय और स्वस्थ रहें। इन रिसर्च से होगा यह फायदा – कैंसर के पैटर्न को समझना आसान होगा – ऑर्गन फेल्योर की दर को कम किया जा सकेगा। – भारतीयों की औसत उम्र में इजाफा हो सकेगा।

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लंबी उम्र के ‘जेनेटिक ब्लूप्रिंट’ पर काम:लॉन्जिविटी इंडिया बना रहा है भारतीयों के लिए सेहत का ‘स्वदेशी पैमाना’

जब आप ब्लड टेस्ट करवाते हैं और रिपोर्ट में आपकी वैल्यू नॉर्मल आती है, तो क्या आप वाकई सुरक्षित हैं? अब तक भारत में इस्तेमाल होने वाले स्वास्थ्य के मानक या तो पश्चिमी देशों की नकल हैं या बहुत पुराने डेटा पर आधारित हैं। लेकिन अब भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) बेंगलुरु इस विसंगति को दूर करने के लिए एक मिशन चला रहा है-लॉन्जिविटी इंडिया प्रोजेक्ट। भारतीयों का शरीर, जेनेटिक्स, खान-पान और प्रदूषण पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है। इसलिए, हमारे स्वास्थ्य को नापने का पैमाना भी अलग होना चाहिए। वर्तमान में हम जिन नॉर्मल वैल्यू को आधार मानकर इलाज करते हैं, वे भारतीयों के लिए सटीक नहीं हैं। उदाहरण, भारत में महिलाओं का हीमोग्लोबिन स्तर अक्सर कम पाया जाता है। अगर हम 20 हजार स्वस्थ भारतीयों के सैंपल का वैज्ञानिक विश्लेषण करें, तो मुमकिन है कि भारत के लिए एक नई और ज्यादा सटीक नॉर्मल वैल्यू सामने आए। यह प्रोजेक्ट स्वदेशी बेसलाइन तैयार करने की कोशिश है। रिसर्चर खोज रहे हैं उम्र बढ़ने के साथ इम्यून सिस्टम में क्या बदलाव आते हैं इस मिशन के तहत दो प्रमुख रिसर्च चल रही हैं। एक है – BHARAT स्टडी। इसका मतलब है बायोमार्कर्स ऑफ हेल्दी एजिंग, रेजिलिएंस, एडवर्सिटी एंड ट्रांजिशन। इसके जरिए स्वस्थ भारतीयों के मॉलिक्यूलर डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है ताकि यह समझा जा सके कि उम्र बढ़ने के साथ हमारे इम्यून सिस्टम में क्या बदलाव आते हैं। दूसरी रिसर्च है – ऑर्गन एजिंग प्रोजेक्ट: इसके तहत शोध चल रहा है कि शरीर के अलग-अलग अंग किस रफ्तार से बूढ़े होते हैं। इन प्रोजेक्ट्स के लिए 2030 तक 10,000 स्वस्थ भारतीयों के सैंपल इकट्ठा करना (आदर्श लक्ष्य 1 लाख का)है। इस प्रोजेक्ट में आईआईएससी के साथ-साथ आईआईटी दिल्ली, एम्स और आईआईटी हैदराबाद जैसे संस्थान भी जुड़ रहे हैं। हालांकि अभी यह डेटा कलेक्शन के चरण में है, लेकिन वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि 2027 से 2030 के बीच इसके ऐसे परिणाम आएंगे, जो चिकित्सा जगत की दिशा बदल देंगे। यह कोई ‘अमृत’ खोजने का दावा नहीं है। उम्र को रोका नहीं जा सकता, लेकिन बुढ़ापे में लाचारी को कम किया जा सकता है। इस रिसर्च का अंतिम लक्ष्य भारतीयों के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना है, ताकि हम उम्र के आखिरी पड़ाव तक सक्रिय और स्वस्थ रहें। इन रिसर्च से होगा यह फायदा – कैंसर के पैटर्न को समझना आसान होगा – ऑर्गन फेल्योर की दर को कम किया जा सकेगा। – भारतीयों की औसत उम्र में इजाफा हो सकेगा।

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