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श्रीनगर की सड़कों पर ​फिर दौड़ लगा रहा तांगा:बुजुर्गों को याद आए बीते दिन, जेन-जी ले रहे सेल्फी और बना रहे रील्स

श्रीनगर की सड़कों पर ​फिर दौड़ लगा रहा तांगा:बुजुर्गों को याद आए बीते दिन, जेन-जी ले रहे सेल्फी और बना रहे रील्स

जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर की सड़कों पर एक पुरानी याद फिर से ‘दौड़ती’ नजर आने लगी है। आसपास के इलाकों में कुछ लोगों ने आजीविका के लिए फिर तांगा चलाना शुरू कर दिया है। ऐसे ही एक 70 साल के बुजुर्ग शख्स गुलाम रसूल कुमार भी 40 साल बाद फिर से श्रीनगर के पुराने इलाकों की सड़कों पर तांगा (घोड़ा-गाड़ी) दौड़ाते नजर आ रहे हैं। गुलाम रसूल 1967 से 1985 के बीच अपना गुजारा चलाने के लिए तांगा चलाते थे। हालांकि, 1985 के बाद स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उन्हें यह काम छोड़ना पड़ा और बाद में उन्होंने मजदूरी का काम शुरू कर दिया। पेट्रोल डीजल संकट के बीच उन्होंने हाल ही में एक घोड़ा खरीदा और उसे घोड़ा गाड़ी में बदल दिया। श्रीनगर की सड़कों पर तांगा शान से दौड़ रहा है, कुमार कहते हैं कि यह प्रदूषणमुक्त है, हादसे का डर भी नहीं और घोड़े का रखरखाव भी ज्यादा महंगा नहीं।’ तांगे में एक साथ 6 लोग बैठ सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि कुमार ने कोई रेट फिक्स नहीं किया है। सवारी अपनी इच्छा से 20 या 30 रुपए अधिक ही दे देती है। वे रोजाना 700 से 1000 रुपए तक कमा लेते हैं। ’ सड़क पर तांगा दौड़ते देख शहर के बुजुर्गों को आज भी वो समय याद आता है, जब तांगा सिर्फ सवारी नहीं बल्कि शान की पहचान होता था। मंत्री, बड़े अफसर और अमीर लोग तांगे में ही सफर करते थे। 30 साल के तांगा चालक मोहम्मद अशरफ के अनुसार, युवा इसे एक अनोखे अनुभव की तरह देखते हैं। वे इसके साथ सेल्फी खिंचवाते हैं और वीडियो बनाते हैं। तांगे की सवारी से विरासत और संस्कृति के दर्शन वर्तमान में आगरा में ताजमहल के आसपास और कर्नाटक में मैसूर की विरासत और संस्कृति के दर्शन के लिए इस शहर के कुछ इलाकों में तांगा प्रचलन में है। राजस्थान में उदयपुर में पर्यटकों को तांगे से शहर का भ्रमण कराया जाता है। वहीं, बीकानेर के पुराने शहरी इलाकों में हवेलियों व ऐतिहासिक स्थलों की सैर तांगे से कराई जाती है। चार दशक पहले सजा-धजा तांगा मालिक का रसूख दिखाता था 1985 से पहले शहरों में तांगा आम और खास दोनों की पसंद था। सजा-धजा तांगा और ताकतवर घोड़ा मालिक का रसूख दिखाता था। हालांकि नियम भी सख्त हुआ करते थे। ज्यादा सवारी बैठाने पर या घोड़े के साथ सख्त व्यवहार करने पर पुलिस तुरंत कार्रवाई करती थी। लेकिन वक्त बदला। कारों और ऑटो-रिक्शा का दबदबा बढ़ गया। ऐसे समय में दूसरे चंद तांगा चालकों के साथ ही बुजुर्ग गुलाम रसूल का तांगा पुरानी यादों को फिर जीवंत कर रहा है।

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