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सबसे घातक कैंसर, 10 में से 9 की हो जाती है मौत, क्या नई वैक्सीन रोक पाएगी इसे

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India’s Most Dangerous Cancer: पैनक्रिएटिक कैंसर दुनिया में सबसे खतरनाक कैंसर है क्योंकि इसमें बहुत बाद में पता चलता है जिसके कारण लगभग 10 में से 9 मरीज की मौत हो जाती है. अमेरिका के ओलयन सेंटर फॉर कैंसर वैक्सीन्स द्वारा मैसेंजर आरएनए पर आधारित नई वैक्सीन तैयार की है जिसके परिणाम सकारात्मक आए हैं. पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस वैक्सीन से भारत के इस सबसे घातक कैंसर पर रोक लग पाएगी.

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अग्नाशय कैंसर के लिए नई वैक्सीन कितनी कारगर.

India’s Most Dangerous Cancer: वैसे तो कैंसर आज भी सबसे खतरनाक बीमारी है जिनमें अधिकांश का इलाज कर पाना मुश्किल होता है लेकिन पैंक्रिएटिक कैंसर या अग्नाशय का कैंसर सबसे खतरनाक है. यह इतना खतरनाक है कि 10 में से लगभग 9 मरीजों की मौत हो जाती है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि इस कैंसर का पता बहुत एडवांस स्टेज में चलता है तब तक यह शरीर के अधिकांश हिस्सों में फैल चुका होता है. अब इस कैंसर के लिए नई वैक्सीन की काफी चर्चा हो रही है. न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोन केटेरिंग कैंसर सेंटर ने जर्मन बायोटेक्नोलॉजी कंपनी बायोटेक के साथ मिलकर पैंक्रिएटिक कैंसर के लिए मैसेंजर RNA पर आधारित जो वैक्सीन तैयार की थी, उसका 18 महीने का ट्रायल पूरा हो गया है. दावा किया जा रहा है कि वैक्सीन का परिणाम बेहद सकारात्मक रहा है.

ट्रायल में 90 फीसदी सफलता
मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर के प्रमुख साइंसटिस्ट और इस अध्ययन के प्रमुख डॉ. विनोद बालचंद्रन का कहना है कि mRNA वैक्सीन का परिणाम बेहद सकारात्मक रहा है. यह वैक्सीन शरीर में उस प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय कर देता है जो पैंक्रियाज में कैंसर कोशिकाओं की पहचान कर उनपर हमला करता है. डॉ. बालचंद्रन ने कहा कि पैंक्रियाज में जब ट्यूमर होता है और अगर उसकी शुरुआत में पहचान भी हो जाती है तो सर्जरी के बाद इसके दोबारा पनपने की बहुत ज्यादा आशंका रहती है. लेकिन इस वैक्सीन को देने के बाद दोबारा सर्जरी की शायद जरूरत न पड़े. एडवांस स्टेज वाले 16 मरीजों पर इस वैक्सीन का पहला परीक्षण किया गया है जिनमें 8 में यह वैक्सीन 90 प्रतिशत तक सफल रही है. डॉ. विनोद बालचंद्रन ने बताया कि शुरुआती रिजल्ट इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में यह वैक्सीन सबसे घातक कैंसरों में से एक के लिए महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है.

भारत में सरवाइवल रेट बहुत कम
टीओआई की खबर में टाटा कैंसर केयर फाउंडेशन के चीफ एग्जक्यूटिव और पैंक्रिएटक गैस्ट्रोइंटेस्टिनल कैंसर सर्जन डॉ. शैलेष श्रीखंडे बताते हैं कि दो दशक पहले तक भारत में प्रति एक लाख में 2.5 से 3 लोगों को अग्नाश्य का कैंसर होता था लेकिन अब यह संख्या 6 से 7 हो गई है. ग्लोबकैन GLOBOCAN 2022 के मुताबिक भारत में हर साल करीब 15 से 17 हजार पैंक्रिएटिक कैंसर के मामले सामने आते हैं. इनमें से 12 से 13 हजार मरीजों की मौत जल्दी हो जाती है. हालांकि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है क्योंकि भारत का कैंसर रजिस्ट्री सिस्टम इस तरह का नहीं है जिसमें कैंसर मरीजों का डेटा सही से दर्ज हो सके. वैसे तो पैंक्रिएटिक कैंसर इतना घातक है कि विकसित देशों में भी इसमें सरवाइवल रेट बहुत कम है लेकिन भारत की स्थिति और भी खराब है. भारत में पैनक्रिएटिक कैंसर का सरवाइवल रेट लगभग 7 से 9 फीसदी है. 80-90 फीसदी मामलों में इसका पता एडवांस स्टेज पर चलता है.

वैक्सीन कितना कारगर
डॉ. शैलेष श्रीखंडे बताते हैं कि वैश्विक रूप से जो डेटा उपलब्ध है उसके अनुसार आज भी अग्नाशय कैंसर से पीड़ित मरीजों में सरवाइवल रेट बहुत कम है. इसके लिए जो परंपरागत इलाज है वह तीसरे स्टेज तक सर्जरी बेहतर विकल्प है. इसके लिए कीमोथेरेपी चलती है. मेडिकल साइंस में इतने एडवांसमेंट आने पर इसका इलाज पहले से जरूर बेहतर हुआ हुआ है पर वैक्सीन से कैंसर का इलाज भी अब भी चुनौतीपूर्ण है. डॉ. शैलेष श्रीखंडे ने बताया कि पिछले साल से इस वैक्सीन की चर्चा काफी जोर-शोर से चल रही है. इस वैक्सीन का इस्तेमाल कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए की जाती है लेकिन वास्तव में वैक्सीन सीधे कैंसर कोशिकाओं को नहीं मारती बल्कि यह शरीर को उकसाती है उस कैंसर को खत्म करने के लिए जो फैल रही है. मैसेंजर आरएनए वैक्सीन सर्जरी और कीमोथेरेपी की जगह नहीं ले सकती है. वैक्सीन का यह पहला ट्रायल है. अगर दूसरा और तीसरा ट्रायल भी सफल हो जाता है तो यह सर्जरी और कीमोथेरेपी के साथ-साथ एक एडीशनल इलाज हो सकता है लेकिन यह वर्तमान सर्जरी या कीमोथेरेपी की जगह नहीं ले सकती.

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Lakshmi Narayan

18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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India’s Most Dangerous Cancer: वैसे तो कैंसर आज भी सबसे खतरनाक बीमारी है जिनमें अधिकांश का इलाज कर पाना मुश्किल होता है लेकिन पैंक्रिएटिक कैंसर या अग्नाशय का कैंसर सबसे खतरनाक है. यह इतना खतरनाक है कि 10 में से लगभग 9 मरीजों की मौत हो जाती है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि इस कैंसर का पता बहुत एडवांस स्टेज में चलता है तब तक यह शरीर के अधिकांश हिस्सों में फैल चुका होता है. अब इस कैंसर के लिए नई वैक्सीन की काफी चर्चा हो रही है. न्यूयॉर्क के मेमोरियल स्लोन केटेरिंग कैंसर सेंटर ने जर्मन बायोटेक्नोलॉजी कंपनी बायोटेक के साथ मिलकर पैंक्रिएटिक कैंसर के लिए मैसेंजर RNA पर आधारित जो वैक्सीन तैयार की थी, उसका 18 महीने का ट्रायल पूरा हो गया है. दावा किया जा रहा है कि वैक्सीन का परिणाम बेहद सकारात्मक रहा है.

ट्रायल में 90 फीसदी सफलता
मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर के प्रमुख साइंसटिस्ट और इस अध्ययन के प्रमुख डॉ. विनोद बालचंद्रन का कहना है कि mRNA वैक्सीन का परिणाम बेहद सकारात्मक रहा है. यह वैक्सीन शरीर में उस प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय कर देता है जो पैंक्रियाज में कैंसर कोशिकाओं की पहचान कर उनपर हमला करता है. डॉ. बालचंद्रन ने कहा कि पैंक्रियाज में जब ट्यूमर होता है और अगर उसकी शुरुआत में पहचान भी हो जाती है तो सर्जरी के बाद इसके दोबारा पनपने की बहुत ज्यादा आशंका रहती है. लेकिन इस वैक्सीन को देने के बाद दोबारा सर्जरी की शायद जरूरत न पड़े. एडवांस स्टेज वाले 16 मरीजों पर इस वैक्सीन का पहला परीक्षण किया गया है जिनमें 8 में यह वैक्सीन 90 प्रतिशत तक सफल रही है. डॉ. विनोद बालचंद्रन ने बताया कि शुरुआती रिजल्ट इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में यह वैक्सीन सबसे घातक कैंसरों में से एक के लिए महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है.

भारत में सरवाइवल रेट बहुत कम
टीओआई की खबर में टाटा कैंसर केयर फाउंडेशन के चीफ एग्जक्यूटिव और पैंक्रिएटक गैस्ट्रोइंटेस्टिनल कैंसर सर्जन डॉ. शैलेष श्रीखंडे बताते हैं कि दो दशक पहले तक भारत में प्रति एक लाख में 2.5 से 3 लोगों को अग्नाश्य का कैंसर होता था लेकिन अब यह संख्या 6 से 7 हो गई है. ग्लोबकैन GLOBOCAN 2022 के मुताबिक भारत में हर साल करीब 15 से 17 हजार पैंक्रिएटिक कैंसर के मामले सामने आते हैं. इनमें से 12 से 13 हजार मरीजों की मौत जल्दी हो जाती है. हालांकि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है क्योंकि भारत का कैंसर रजिस्ट्री सिस्टम इस तरह का नहीं है जिसमें कैंसर मरीजों का डेटा सही से दर्ज हो सके. वैसे तो पैंक्रिएटिक कैंसर इतना घातक है कि विकसित देशों में भी इसमें सरवाइवल रेट बहुत कम है लेकिन भारत की स्थिति और भी खराब है. भारत में पैनक्रिएटिक कैंसर का सरवाइवल रेट लगभग 7 से 9 फीसदी है. 80-90 फीसदी मामलों में इसका पता एडवांस स्टेज पर चलता है.

वैक्सीन कितना कारगर
डॉ. शैलेष श्रीखंडे बताते हैं कि वैश्विक रूप से जो डेटा उपलब्ध है उसके अनुसार आज भी अग्नाशय कैंसर से पीड़ित मरीजों में सरवाइवल रेट बहुत कम है. इसके लिए जो परंपरागत इलाज है वह तीसरे स्टेज तक सर्जरी बेहतर विकल्प है. इसके लिए कीमोथेरेपी चलती है. मेडिकल साइंस में इतने एडवांसमेंट आने पर इसका इलाज पहले से जरूर बेहतर हुआ हुआ है पर वैक्सीन से कैंसर का इलाज भी अब भी चुनौतीपूर्ण है. डॉ. शैलेष श्रीखंडे ने बताया कि पिछले साल से इस वैक्सीन की चर्चा काफी जोर-शोर से चल रही है. इस वैक्सीन का इस्तेमाल कैंसर कोशिकाओं को मारने के लिए की जाती है लेकिन वास्तव में वैक्सीन सीधे कैंसर कोशिकाओं को नहीं मारती बल्कि यह शरीर को उकसाती है उस कैंसर को खत्म करने के लिए जो फैल रही है. मैसेंजर आरएनए वैक्सीन सर्जरी और कीमोथेरेपी की जगह नहीं ले सकती है. वैक्सीन का यह पहला ट्रायल है. अगर दूसरा और तीसरा ट्रायल भी सफल हो जाता है तो यह सर्जरी और कीमोथेरेपी के साथ-साथ एक एडीशनल इलाज हो सकता है लेकिन यह वर्तमान सर्जरी या कीमोथेरेपी की जगह नहीं ले सकती.

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