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Iran War: बम से ज्यादा कहीं दवाई के बगैर मर न जाए खाड़ी देशों की जनता! सप्लाई चेन टूटने से त्राहिमाम

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Iran War Disrupt Drug Supply Chain: ईरान युद्ध ने बम, गोला-बारूद से जितनी तबाही मचा रही है, वह तो हम सबके सामने है लेकिन इस जंग की वजह से कहीं ऐसा न हो जाए कि खाड़ी देशों के लोग दवाई के बगैर मरने लगे. दरअसल, जब से अमेरिका-इजरायल का ईरान पर हमला हुआ है तब से खाड़ी देशों में हवाई और जल मार्ग बुरी तरह प्रभावित हुई है. इस कारण जरूरी दवाइयां इन देशों तक नहीं पहुंच रही है.

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ईरान-इजरायल, अमेरिका युद्ध के बाद ड्रग सप्लाई चेन बाधित. सांकेतिक तस्वीर.

Iran War impact: ईरान युद्ध को करीब दो सप्ताह होने को है. दनदनाती मिसाइलों की गर्जना और कलस्टर बमों के शोर से जन-जीवन तो अस्त-व्यस्त हो ही चुका लेकिन आम लोगों के जीवन की डोर हिचकोले खाने लगे हैं. ऐसे में इस युद्ध में बम-बारूद से लोग मरे या न मरें दवाइयों की किल्लत से शायद जरूर मर जाएंगे. युद्ध ने जिस तरह से हवाई सेवा को प्रभावित किया है, उसमें आवश्यक दवाइयों की खेप आनी बंद हो गई. इस कारण दवाइयों का सप्लाई चेन टूट गया है. यह सिर्फ एक देश की बात नहीं है बल्कि पूरे खाड़ी देशों में दवाइयों का सप्लाई चेन प्रभावित हो रहा है. कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज के लिए जरूरी ‘कोल्ड-चेन’ दवाओं की सप्लाई भी बाधित हुई है.

मेडिकल उपकरण में देरी जानलेवा
रायटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक एक अधिकारी ने बताया कि अगर किसी मरीज की तुरंत सर्जरी होनी है और वह इलाज का इंतजार कर रहा है, तो आपको मजबूरी में हवाई मार्ग ही चुनना पड़ता है. इमरजेंसी सामान जैसे दवाइयां या मेडिकल उपकरण के लिए देरी जानलेवा हो सकती है. इसलिए महंगा और लंबा होने के बावजूद हवाई रास्ता ही चुना जा रहा है. एक्सपर्ट के मुताबिक कैंसर जैसी संवेदनशील दवाओं का स्टॉक आमतौर पर केवल तीन महीने का होता है. काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के प्रशांत यादव कहते हैं कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज जैसी दवाओं पर सबसे बड़ा खतरा है. कुछ ग्राहकों ने चेतावनी दी है कि अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो अगले 4 से 6 हफ्तों में उनके पास दवाओं की भारी कमी हो जाएगी. मूडिस के डेविड वीक्स ने चिंता जताते हुए कहा है कि कभी-कभी दवा की कमी नहीं होती, बल्कि उसे पैक करने या इस्तेमाल करने वाली चीजों की कमी हो जाती है. जैसे दवा की शीशियों के ढक्कन, आईवी बैग के प्लास्टिक और पैकेजिंग का सामान. अगर ये छोटी चीजें भी कम पड़ीं, तो दवाओं की पूरी सप्लाई चेन रुक सकती है.

कैंसर मरीजों के लिए मुसीबत
खाड़ी देश दवाइयों के लिए मुख्य रूप पश्चिमी देशों पर निर्भर है. बहुत सारी ऐसी दवाइयां होती है जिसकी एक्सपायरी डेट बहुत कम होती है. ऐसी दवाइयां जीवन रक्षक कैटगरी में ज्यादा आती है. यानी अगर ये दवाइयां कम होगी तो जो इन दवाइयों पर निर्भर मरीज हैं, उनके लिए भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है. इंडस्टी के अधिकारियों का कहना है कि मध्य पूर्व में जारी युद्ध की वजह से खाड़ी देशों तक जरूरी दवाओं की पहुंच में बाधा आ रही है. सबसे ज्यादा कैंसर के इलाज की दवाओं और अन्य ऐसी दवाओं के लिए खतरा पैदा हो गया है, जिन्हें फ्रीजिंग की जरूरत होती है. अधिकारियों का कहना है कि वे खाड़ी देशों तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाश रहे हैं.

रास्ते बदलने पर विचार
इस संकट के कारण कंपनियों को अपनी उड़ानों के रास्ते बदलने पड़ रहे हैं और क्षेत्र में सामान पहुंचाने के लिए जमीन के रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं. वे सऊदी अरब के जेद्दा और रियाद जैसे हवाई अड्डों से ट्रकों के जरिए दवाएं भेज रहे हैं. खाड़ी देशों से सटी है तुर्की जो इस युद्ध में शामिल नहीं है. इसलिए अधिकारी इस्तांबुल और ओमान के विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं. हालांकि इससे केवल दवाएं ही नहीं, बल्कि भोजन और ईंधन की सप्लाई भी इस युद्ध की चपेट में है. कुछ अधिकारियों का कहना है कि हालांकि अभी तक दवाओं की कोई बड़ी किल्लत नहीं दिखी है, लेकिन अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है तो स्थिति बदल सकती है. खाड़ी देश आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं और कुछ दवाओं की ‘एक्सपायरी डेट’ बहुत कम होती है, साथ ही उन्हें सख्त ‘कोल्ड-चेन स्टोरेज’ (ठंडे तापमान) की जरूरत होती है. ऐसे में जमीन के लंबे रास्तों से शिपिंग करना व्यावहारिक नहीं रह जाता.

20 प्रतिशत सप्लाई चेन प्रभावित
हमले के बाद दुबई, अबू धाबी और दोहा जैसे इस क्षेत्र के प्रमुख हवाई अड्डे बंद कर दिए गए हैं. दुबई और दोहा यूरोप को एशिया और अफ्रीका से जोड़ने वाले बड़े कार्गो हब हैं. एमिरेट्स, एतिहाद जैसी एयरलाइंस और डीएचएल जैसी कंपनियां उन दवाओं को लाने-ले जाने का काम करती हैं, जिन्हें सुरक्षित और असरदार बनाए रखने के लिए एक निश्चित तापमान के भीतर रखना अनिवार्य होता है. एंटवर्प मैनेजमेंट स्कूल के प्रोफेसर वाउटर ड्यूल्फ ने उद्योग के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि दुनिया के कुल हवाई माल ढुलाई का 20% से अधिक हिस्सा मध्य पूर्व के इस तनाव की वजह से प्रभावित हो रहा है. गौर करने वाली बात यह है कि जीवन रक्षक दवाओं और टीकों की सप्लाई के लिए हवाई मार्ग ही सबसे मुख्य रास्ता होता है.

चीन, सिंगापुर रास्तों की तलाश
एक अधिकारी ने रायटर्स से बात करते हुए चेतावनी दी कि संवेदनशील दवाओं के लिए कोल्ड-चेन कॉरिडोर को रातों-रात तैयार नहीं किए जा सकते और ये हर जगह उपलब्ध भी नहीं होते. एक दवा कंपनी के कार्यकारी अधिकारी ने बताया कि उन्होंने कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं की सप्लाई को प्राथमिकता देने के लिए आंतरिक टीमें बनाई हैं. इसके साथ ही आगाह किया कि यदि सही स्टोरेज और हैंडलिंग सुनिश्चित नहीं की गई, तो तापमान-संवेदनशील दवाओं की खेप खराब हो सकती है. वहीं एक मेडिकल डिवाइस कंपनी के अधिकारी कहते हैं कि उनकी प्राथमिकता अभी उन शिपमेंट की पहचान करना है जो रास्ते में हैं या निकलने के लिए तैयार हैं. इसके बाद ही यह तय किया जाएगा कि किन दवाओं का रास्ता बदलना है और किनके लिए नई योजना बनानी है. एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यूरोप और एशिया के बीच जाने वाला सामान, जो आमतौर पर दुबई या दोहा के हवाई अड्डों से होकर जाता था, अब उसे चीन या सिंगापुर के रास्ते भेजा जा रहा है. समुद्री रास्ते का इस्तेमाल करना मुमकिन नहीं है क्योंकि इसमें बहुत समय लगता है और ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को भी बंद कर दिया है. इनपुट -रॉयटर्स

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Lakshmi Narayan

18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने अपने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, स…और पढ़ें

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मेडिकल उपकरण में देरी जानलेवा
रायटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक एक अधिकारी ने बताया कि अगर किसी मरीज की तुरंत सर्जरी होनी है और वह इलाज का इंतजार कर रहा है, तो आपको मजबूरी में हवाई मार्ग ही चुनना पड़ता है. इमरजेंसी सामान जैसे दवाइयां या मेडिकल उपकरण के लिए देरी जानलेवा हो सकती है. इसलिए महंगा और लंबा होने के बावजूद हवाई रास्ता ही चुना जा रहा है. एक्सपर्ट के मुताबिक कैंसर जैसी संवेदनशील दवाओं का स्टॉक आमतौर पर केवल तीन महीने का होता है. काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के प्रशांत यादव कहते हैं कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज जैसी दवाओं पर सबसे बड़ा खतरा है. कुछ ग्राहकों ने चेतावनी दी है कि अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो अगले 4 से 6 हफ्तों में उनके पास दवाओं की भारी कमी हो जाएगी. मूडिस के डेविड वीक्स ने चिंता जताते हुए कहा है कि कभी-कभी दवा की कमी नहीं होती, बल्कि उसे पैक करने या इस्तेमाल करने वाली चीजों की कमी हो जाती है. जैसे दवा की शीशियों के ढक्कन, आईवी बैग के प्लास्टिक और पैकेजिंग का सामान. अगर ये छोटी चीजें भी कम पड़ीं, तो दवाओं की पूरी सप्लाई चेन रुक सकती है.

कैंसर मरीजों के लिए मुसीबत
खाड़ी देश दवाइयों के लिए मुख्य रूप पश्चिमी देशों पर निर्भर है. बहुत सारी ऐसी दवाइयां होती है जिसकी एक्सपायरी डेट बहुत कम होती है. ऐसी दवाइयां जीवन रक्षक कैटगरी में ज्यादा आती है. यानी अगर ये दवाइयां कम होगी तो जो इन दवाइयों पर निर्भर मरीज हैं, उनके लिए भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है. इंडस्टी के अधिकारियों का कहना है कि मध्य पूर्व में जारी युद्ध की वजह से खाड़ी देशों तक जरूरी दवाओं की पहुंच में बाधा आ रही है. सबसे ज्यादा कैंसर के इलाज की दवाओं और अन्य ऐसी दवाओं के लिए खतरा पैदा हो गया है, जिन्हें फ्रीजिंग की जरूरत होती है. अधिकारियों का कहना है कि वे खाड़ी देशों तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाश रहे हैं.

रास्ते बदलने पर विचार
इस संकट के कारण कंपनियों को अपनी उड़ानों के रास्ते बदलने पड़ रहे हैं और क्षेत्र में सामान पहुंचाने के लिए जमीन के रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं. वे सऊदी अरब के जेद्दा और रियाद जैसे हवाई अड्डों से ट्रकों के जरिए दवाएं भेज रहे हैं. खाड़ी देशों से सटी है तुर्की जो इस युद्ध में शामिल नहीं है. इसलिए अधिकारी इस्तांबुल और ओमान के विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं. हालांकि इससे केवल दवाएं ही नहीं, बल्कि भोजन और ईंधन की सप्लाई भी इस युद्ध की चपेट में है. कुछ अधिकारियों का कहना है कि हालांकि अभी तक दवाओं की कोई बड़ी किल्लत नहीं दिखी है, लेकिन अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है तो स्थिति बदल सकती है. खाड़ी देश आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं और कुछ दवाओं की ‘एक्सपायरी डेट’ बहुत कम होती है, साथ ही उन्हें सख्त ‘कोल्ड-चेन स्टोरेज’ (ठंडे तापमान) की जरूरत होती है. ऐसे में जमीन के लंबे रास्तों से शिपिंग करना व्यावहारिक नहीं रह जाता.

20 प्रतिशत सप्लाई चेन प्रभावित
हमले के बाद दुबई, अबू धाबी और दोहा जैसे इस क्षेत्र के प्रमुख हवाई अड्डे बंद कर दिए गए हैं. दुबई और दोहा यूरोप को एशिया और अफ्रीका से जोड़ने वाले बड़े कार्गो हब हैं. एमिरेट्स, एतिहाद जैसी एयरलाइंस और डीएचएल जैसी कंपनियां उन दवाओं को लाने-ले जाने का काम करती हैं, जिन्हें सुरक्षित और असरदार बनाए रखने के लिए एक निश्चित तापमान के भीतर रखना अनिवार्य होता है. एंटवर्प मैनेजमेंट स्कूल के प्रोफेसर वाउटर ड्यूल्फ ने उद्योग के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि दुनिया के कुल हवाई माल ढुलाई का 20% से अधिक हिस्सा मध्य पूर्व के इस तनाव की वजह से प्रभावित हो रहा है. गौर करने वाली बात यह है कि जीवन रक्षक दवाओं और टीकों की सप्लाई के लिए हवाई मार्ग ही सबसे मुख्य रास्ता होता है.

चीन, सिंगापुर रास्तों की तलाश
एक अधिकारी ने रायटर्स से बात करते हुए चेतावनी दी कि संवेदनशील दवाओं के लिए कोल्ड-चेन कॉरिडोर को रातों-रात तैयार नहीं किए जा सकते और ये हर जगह उपलब्ध भी नहीं होते. एक दवा कंपनी के कार्यकारी अधिकारी ने बताया कि उन्होंने कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं की सप्लाई को प्राथमिकता देने के लिए आंतरिक टीमें बनाई हैं. इसके साथ ही आगाह किया कि यदि सही स्टोरेज और हैंडलिंग सुनिश्चित नहीं की गई, तो तापमान-संवेदनशील दवाओं की खेप खराब हो सकती है. वहीं एक मेडिकल डिवाइस कंपनी के अधिकारी कहते हैं कि उनकी प्राथमिकता अभी उन शिपमेंट की पहचान करना है जो रास्ते में हैं या निकलने के लिए तैयार हैं. इसके बाद ही यह तय किया जाएगा कि किन दवाओं का रास्ता बदलना है और किनके लिए नई योजना बनानी है. एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यूरोप और एशिया के बीच जाने वाला सामान, जो आमतौर पर दुबई या दोहा के हवाई अड्डों से होकर जाता था, अब उसे चीन या सिंगापुर के रास्ते भेजा जा रहा है. समुद्री रास्ते का इस्तेमाल करना मुमकिन नहीं है क्योंकि इसमें बहुत समय लगता है और ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को भी बंद कर दिया है. इनपुट -रॉयटर्स

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