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Family Court Judges, Lawyers No Uniform? Kids Scared

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नई दिल्ली28 मिनट पहले

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फाइल फोटो।

भारत के मुख्य न्यायाधीश(CJI) सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि यह बहुत जरूरी है कि फ़ैमिली कोर्ट बच्चों के मन से मनोवैज्ञानिक डर को खत्म करें, और इसके लिए कोर्ट के पारंपरिक कामकाज में कुछ बदलाव किए जाएं। उन्होंने पूछा कि क्या फ़ैमिली कोर्ट में ये काले चोगे होने चाहिए?

CJI ने कहा कि जब हम फ़ैमिली कोर्ट के लिए एक नई सोच और अवधारणा बना रहे हैं, तो क्या इससे बच्चे के मन में कोई मनोवैज्ञानिक डर पैदा नहीं होगा? उन्होंने सुझाव दिया कि फैमिली कोर्ट में पीठासीन जज और वकील यूनिफॉर्म में नहीं आने चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत ने ये बातें दिल्ली के रोहिणी में एक फैमिली कोर्ट की आधारशिला रखने जाने के कार्यक्रम में कहीं।

उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट में आप सभी के लिए, हमारे पीठासीन अधिकारी कोर्ट की पोशाक में नहीं बैठेंगे। बार के सदस्य भी काले और सफेद चोगे में नहीं आएंगे। उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारी भी पुलिस की वर्दी में नहीं आएंगे, क्योंकि यह पूरा माहौल बच्चों के मन में डर पैदा करता है, खासकर तब जब वे किसी भी व्यवस्था के सबसे ज्यादा पीड़ित होते हैं।

जस्टिस सूर्यकांत ने ये भी कहा…

  • हर कोई कोर्ट आना नहीं चाहता। जब हम सुधारों की बात करते हैं और जब हम फैमिली कोर्ट की अवधारणा को विवादों को सुलझाने के एक मंच के रूप में देखते हैं, तो यह सिविल संपत्ति विवादों जैसा नहीं है।
  • इसका मकसद मानवीय रिश्तों को सुधारना, उन पर विचार करना और उन्हें ठीक करना है। क्या हम इन्हें ‘पारिवारिक समाधान केंद्र’ नहीं कह सकते?
  • फैमिली कोर्ट में अन्य कोर्ट के मुकाबले ज्यादार मुकदमों और विवादों के विपरीत, ये दूर के पक्षों या बेजान संस्थाओं के बीच नहीं होते हैं। ये मामले परिवारों के भीतर से ही उठते हैं।
  • ऐसे व्यक्तियों के बीच, जो कभी एक साझा जीवन में साथी थे, वे माता-पिता, देखभाल करने वालों या एक ही घर के सदस्यों के रूप में आपसी जिम्मेदारियों को साझा करना जारी रख सकते हैं।
  • इसलिए, परिवार न्यायालय के समक्ष आने वाले विवादों के भारी भावनात्मक, सामाजिक और वित्तीय परिणाम होते हैं, जो तात्कालिक कानूनी विवाद से कहीं आगे तक जाते हैं।

कार्यक्रम में दिल्ली सीएम, सुप्रीम कोर्ट के अन्य जज भी शामिल

इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनमोहन ने कहा कि दिल्ली में, जिला न्यायपालिका को जिन निरंतर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, वे तीन प्रकार की हैं। पहली है बजट, दूसरी है कर्मचारी और तीसरी है जगह। उन्होंने कहा कि जगह का अर्थ है अदालत के कमरे, साथ ही रहने की व्यवस्था (आवासीय आवास) भी।

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय ने भी इस कार्यक्रम में अपने विचार रखे।

———–

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CJI ने कहा कि जब हम फ़ैमिली कोर्ट के लिए एक नई सोच और अवधारणा बना रहे हैं, तो क्या इससे बच्चे के मन में कोई मनोवैज्ञानिक डर पैदा नहीं होगा? उन्होंने सुझाव दिया कि फैमिली कोर्ट में पीठासीन जज और वकील यूनिफॉर्म में नहीं आने चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत ने ये बातें दिल्ली के रोहिणी में एक फैमिली कोर्ट की आधारशिला रखने जाने के कार्यक्रम में कहीं।

उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट में आप सभी के लिए, हमारे पीठासीन अधिकारी कोर्ट की पोशाक में नहीं बैठेंगे। बार के सदस्य भी काले और सफेद चोगे में नहीं आएंगे। उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारी भी पुलिस की वर्दी में नहीं आएंगे, क्योंकि यह पूरा माहौल बच्चों के मन में डर पैदा करता है, खासकर तब जब वे किसी भी व्यवस्था के सबसे ज्यादा पीड़ित होते हैं।

जस्टिस सूर्यकांत ने ये भी कहा…

  • हर कोई कोर्ट आना नहीं चाहता। जब हम सुधारों की बात करते हैं और जब हम फैमिली कोर्ट की अवधारणा को विवादों को सुलझाने के एक मंच के रूप में देखते हैं, तो यह सिविल संपत्ति विवादों जैसा नहीं है।
  • इसका मकसद मानवीय रिश्तों को सुधारना, उन पर विचार करना और उन्हें ठीक करना है। क्या हम इन्हें ‘पारिवारिक समाधान केंद्र’ नहीं कह सकते?
  • फैमिली कोर्ट में अन्य कोर्ट के मुकाबले ज्यादार मुकदमों और विवादों के विपरीत, ये दूर के पक्षों या बेजान संस्थाओं के बीच नहीं होते हैं। ये मामले परिवारों के भीतर से ही उठते हैं।
  • ऐसे व्यक्तियों के बीच, जो कभी एक साझा जीवन में साथी थे, वे माता-पिता, देखभाल करने वालों या एक ही घर के सदस्यों के रूप में आपसी जिम्मेदारियों को साझा करना जारी रख सकते हैं।
  • इसलिए, परिवार न्यायालय के समक्ष आने वाले विवादों के भारी भावनात्मक, सामाजिक और वित्तीय परिणाम होते हैं, जो तात्कालिक कानूनी विवाद से कहीं आगे तक जाते हैं।

कार्यक्रम में दिल्ली सीएम, सुप्रीम कोर्ट के अन्य जज भी शामिल

इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनमोहन ने कहा कि दिल्ली में, जिला न्यायपालिका को जिन निरंतर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, वे तीन प्रकार की हैं। पहली है बजट, दूसरी है कर्मचारी और तीसरी है जगह। उन्होंने कहा कि जगह का अर्थ है अदालत के कमरे, साथ ही रहने की व्यवस्था (आवासीय आवास) भी।

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