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First euthanasia in India Ghaziabad Harish Rana case Delhi AIIMS

First euthanasia in India Ghaziabad Harish Rana case Delhi AIIMS

31 साल के हरीश 13 साल से कोमा में थे। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी।

हरीश राणा ने मंगलवार को दिल्ली एम्स में अंतिम सांस ली। PTI ने सूत्रों के हवाले से इसकी पुष्टि की है। 31 साल के हरीश 13 साल से कोमा में थे। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी।

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ये देश का पहला मामला है, जिसमें किसी को इच्छामृत्यु दी गई है। 14 मार्च को हरीश को दिल्ली एम्स में शिफ्ट किया गया था। एम्स प्रशासन ने 16 मार्च को हरीश राणा की फीडिंग ट्यूब हटा दी थी।

एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया दिया गया। इसका मतलब होता है कि किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज को जिंदा रखने के लिए जो बाहरी लाइफ सपोर्ट या इलाज दिया जा रहा है, उसे रोक दिया जाए या हटा लिया जाए, ताकि मरीज की प्राकृतिक रूप से मौत हो सके।

हरीश राणा की ये तस्वीर उस दौरान की है जब उन्हें एम्स शिफ्ट नहीं किया गया था।

11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इच्छामृत्यु मामले में फैसला सुनाया था। कोर्ट ने 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दी थी।

फैसले के बाद मां निर्मला देवी ने कहा था कि ‘बेटे के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किए। बड़े-बड़े अस्पतालों में दिखाया और कई डॉक्टरों से इलाज भी कराया, लेकिन उम्मीदें लगभग खत्म हो गई हैं। अब तो बस भगवान से यही प्रार्थना है कि उसे इस पीड़ा से जल्द मुक्ति मिल जाए।’

हरीश हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरे थे, तब से बिस्तर पर

दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यू्निवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। 2013 में वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। इसकी वजह से उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और वह कोमा में चले गए। वह न कुछ बोल सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं।

डॉक्टर्स ने हरीश को क्वाड्रिप्लेजिया बीमारी से पीड़ित करार दिया। इसमें मरीज पूरी तरह से फीडिंग ट्यूब यानी खाने-पीने की नली और वेंटिलेटर सपोर्ट पर निर्भर रहता है। इसमें रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं होती। 13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। उनकी हालत लगातार खराब होती जा रही है।

यह स्थिति हरीश के लिए बहुत दर्दनाक है। परिवार के लिए उन्हें ऐसे देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन हो गया है। वेंटिलेटर, दवाइयों, नर्सिंग और देखभाल पर कई साल से इतना खर्च हो चुका है कि परिवार आर्थिक रूप से टूट चुका है।

इच्छामृत्यु के 2 तरीके होते हैं…

पैसिव यूथेनेशिया: इसमें मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां रोक दी जाती हैं, ताकि उसकी मौत प्राकृतिक रूप से हो सके। इसमें डॉक्टर कोई नया काम नहीं करते, सिर्फ इलाज बंद कर देते हैं। मौत का कारण बीमारी ही रहती है।

कोर्ट ने हरीश राणा के लिए पैशिव यूथेनेशिया देने के निर्देश दिए थे।

कोर्ट ने हरीश राणा के लिए पैशिव यूथेनेशिया देने के निर्देश दिए थे।

एक्टिव यूथेनेशिया: इसमें मरीज को मौत देने के लिए डॉक्टर दवाई या इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। भारत में यह गैर-कानूनी है। अगर कोई जान-बूझकर किसी मरीज को दवाई देकर मारता है, तो इसे BNS की धारा के तहत हत्या या के तहत आत्महत्या में मदद माना जाता है।

भारत के संविधान में इच्छामृत्यु का क्या कानून है

2005 में कॉमन कॉज नाम की एक NGO ने पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु के अधिकार की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर 9 मार्च 2018 को CJI दीपक मिश्रा की अगुआई वाली 5 जजों की बेंच ने इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी।

तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,

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अगर किसी मरीज को लाइलाज बीमारी हो या वेजिटेटिव स्टेट में यानी लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर ही जिंदा हो, तो प्राकृतिक तरीके से मृत्यु के लिए उसका इलाज बंद किया जा सकता है। इसे इच्छामृत्यु नहीं, बल्कि सम्मान के साथ मृत्यु का अधिकार माना जाएगा।

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यह अधिकार संविधान के आर्टिकल 21 का हिस्सा है, जिसमें सम्मान से जीने के साथ सम्मान से मरने का अधिकार है।

13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। -फाइल फोटो

13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। -फाइल फोटो

इच्छामृत्यु को लेकर क्या नियम है

2018 में पैसिव यूथेनेशिया को वैधता देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए 2 तरह के नियम बनाए…

1. जब मरीज ने पहले ही ‘लिविंग विल’ लिख रखी हो: जब मरीज ने मेंटली फिट रहते हुए अपनी इच्छा से लिविंग विल लिखी हो। इस लिविंग विल में साफ तौर पर लिखा जाता है कि मरीज की बीमारी अगर लाइलाज हो जाए यानी अगर वह अब कभी ठीक होने लायक न बचे तो उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटा दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए भी कुछ नियम बनाए हैं…

18 साल से ज्यादा उम्र और स्वस्थ व्यक्ति ही लिविंग विल लिख सकता है। मरीज ने 2 गवाहों के सामने लिविंग विल साइन की हो। डॉक्यूमेंट्स को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने वेरिफाई किया हो।

इलाज करने वाले डॉक्टर, हॉस्पिटल के मेडिकल बोर्ड और जिला स्तर के एक बाहरी मेडिकल बोर्ड की मंजूरी ली गई हो। दोनों बोर्डों की मंजूरी मिलने के बाद वेंटिलेटर जैसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम को बंद किया जा सकता हो।

इस पूरी प्रक्रिया के बारे में परिवार को जानकारी दी जाती है। किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है।

2. जब कोई लिविंग विल न हो: जब मरीज अपने होश में रहते हुए लिविंग विल नहीं बनाता तो उसका परिवार या करीबी ये फैसला ले सकते हैं। हालांकि, ये इतना आसान नहीं है। इसके लिए 2018 में सुप्रीम कोर्ट के बनाए गए इन नियमों का पालन करना होता है…

अस्पताल के डॉक्टरों का एक बोर्ड मरीज की कंडीशन चेक कर रिपोर्ट बनाता है। कलेक्टर 3-5 एक्सपर्ट्स का दूसरा मेडिकल बोर्ड बनाते हैं, जो ये रिपोर्ट चेक करता है। दोनों बोर्ड के सहमत होने पर इस फैसले को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाता है। मजिस्ट्रेट मरीज से मिलकर आखिरी निर्णय लेते हैं। अगर इसमें किसी तरह की विवाद की स्थिति होती है, तो हाइकोर्ट में अपील की जा सकती है।

क्या इससे पहले ऐसा किसी मामले में हुआ है

हरीश राणा का मामला भारत में पैसिव यूथेनेशिया का ऐसा पहला मामला है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के बनाए नियम फॉलो हो रहे हैं। दरअसल, 2018 के कॉमन कॉज फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने नियम बनाए थे, जो अब तक किसी मामले पर लागू नहीं हुए हैं। हरीश का केस पहला मामला है, जिसमें इन्हें लागू किया जा रहा है।

11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली AIIMS को आदेश दिया है कि वो एक दूसरी मेडिकल बोर्ड बनाए जो हरीश राणा की कंडीशन की जांच करे। इस केस में प्राइमरी और सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया कोर्ट की निगरानी में चल रही है।

हालांकि, 2011 के अरुणा शानबाग केस ने पैसिव यूथेनेशिया को पहली बार लीगल बनाया, जो 2018 के कॉमन कॉज केस का आधार बना।

अरुणा शानबाग केस: 1973 में मुंबई के KEM अस्पताल में 42 साल की नर्स अरुणा शानबाग पर एक वार्ड अटेंडेंट ने हमला किया और फिर रेप किया। हमले में लगी गंभीर दिमागी चोटों की वजह से अरूणा कोमा में चली गईं। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए साल 2009 में एक पत्रकार पिंकी विरानी ने अरुणा की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका में अरुणा की लाइफ सपोर्ट मशीनें हटाने की मांग की गई, ताकि उनकी प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो सके।

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु को कानूनी अधिकार बताया था, लेकिन अरुणा को इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी। क्योंकि वह तब कुछ हद तक बिना मशीनों के सांस ले रही थीं। इसके बाद 2015 में अरुणा शानबाग की प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो गई।

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ये खबर भी पढ़ें…

‘बेसुध बेटे को घर की हर बात बताती थी’:हरीश राणा की मां बोली- उम्मीद थी कि पलक झपकाकर बता देगा कि सुन लिया

गाजियाबाद के राज एंपायर सोसाइटी की 13वीं मंजिल। साधारण से फ्लैट के कमरे में मेडिकल बेड पर हरीश (31) बेसुध लेटा है। पेट में पैग सेट पाइप और नाक में ऑक्सीजन पाइप लगा है। घर में परिजन, जानने वाले, अनजान, सरकारी अधिकारी व मीडियावालों का तांता लगा है। पिता अशोक राणा भरे गले से बता रहे हैं कि हमारी साढ़े बारह साल की सेवाओं का हिसाब-किताब अब पूरा हो रहा है, इसलिए यह फैसला आ गया। पढ़ें पूरी खबर

बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांगने वाले पिता का दर्द:बोले- बेटे को तड़पते हुए नहीं देख सकता था, पड़ोसी बोले- 13 साल से मुश्किल में परिवार

‘मैं बेटे के दर्द को बता नहीं सकता। उसकी पीड़ा और तड़प को देख नहीं सकता था। मैंने बेटे के लिए 13 साल में क्या-क्या कष्ट सहे, मैं बता नहीं सकता। मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया। बेटा ठीक हो जाए, इसके लिए मैंने अपना घर तक बेच दिया। सब कह रहे हैं कि मैंने बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांगी और मुझे यह मिली। लेकिन लोग यह नहीं जानते कि मेरा बेटा मेरा सबकुछ है। मेरी दुनिया, मेरा भविष्य। मैं कितनी पीड़ा में हूं, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता।’ पढ़ें पूरी खबर

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First euthanasia in India Ghaziabad Harish Rana case Delhi AIIMS

First euthanasia in India Ghaziabad Harish Rana case Delhi AIIMS

31 साल के हरीश 13 साल से कोमा में थे। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी।

हरीश राणा ने मंगलवार को दिल्ली एम्स में अंतिम सांस ली। PTI ने सूत्रों के हवाले से इसकी पुष्टि की है। 31 साल के हरीश 13 साल से कोमा में थे। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी।

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ये देश का पहला मामला है, जिसमें किसी को इच्छामृत्यु दी गई है। 14 मार्च को हरीश को दिल्ली एम्स में शिफ्ट किया गया था। एम्स प्रशासन ने 16 मार्च को हरीश राणा की फीडिंग ट्यूब हटा दी थी।

एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया दिया गया। इसका मतलब होता है कि किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज को जिंदा रखने के लिए जो बाहरी लाइफ सपोर्ट या इलाज दिया जा रहा है, उसे रोक दिया जाए या हटा लिया जाए, ताकि मरीज की प्राकृतिक रूप से मौत हो सके।

हरीश राणा की ये तस्वीर उस दौरान की है जब उन्हें एम्स शिफ्ट नहीं किया गया था।

11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इच्छामृत्यु मामले में फैसला सुनाया था। कोर्ट ने 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दी थी।

फैसले के बाद मां निर्मला देवी ने कहा था कि ‘बेटे के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किए। बड़े-बड़े अस्पतालों में दिखाया और कई डॉक्टरों से इलाज भी कराया, लेकिन उम्मीदें लगभग खत्म हो गई हैं। अब तो बस भगवान से यही प्रार्थना है कि उसे इस पीड़ा से जल्द मुक्ति मिल जाए।’

हरीश हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरे थे, तब से बिस्तर पर

दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यू्निवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। 2013 में वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। इसकी वजह से उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और वह कोमा में चले गए। वह न कुछ बोल सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं।

डॉक्टर्स ने हरीश को क्वाड्रिप्लेजिया बीमारी से पीड़ित करार दिया। इसमें मरीज पूरी तरह से फीडिंग ट्यूब यानी खाने-पीने की नली और वेंटिलेटर सपोर्ट पर निर्भर रहता है। इसमें रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं होती। 13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। उनकी हालत लगातार खराब होती जा रही है।

यह स्थिति हरीश के लिए बहुत दर्दनाक है। परिवार के लिए उन्हें ऐसे देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन हो गया है। वेंटिलेटर, दवाइयों, नर्सिंग और देखभाल पर कई साल से इतना खर्च हो चुका है कि परिवार आर्थिक रूप से टूट चुका है।

इच्छामृत्यु के 2 तरीके होते हैं…

पैसिव यूथेनेशिया: इसमें मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां रोक दी जाती हैं, ताकि उसकी मौत प्राकृतिक रूप से हो सके। इसमें डॉक्टर कोई नया काम नहीं करते, सिर्फ इलाज बंद कर देते हैं। मौत का कारण बीमारी ही रहती है।

कोर्ट ने हरीश राणा के लिए पैशिव यूथेनेशिया देने के निर्देश दिए थे।

कोर्ट ने हरीश राणा के लिए पैशिव यूथेनेशिया देने के निर्देश दिए थे।

एक्टिव यूथेनेशिया: इसमें मरीज को मौत देने के लिए डॉक्टर दवाई या इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। भारत में यह गैर-कानूनी है। अगर कोई जान-बूझकर किसी मरीज को दवाई देकर मारता है, तो इसे BNS की धारा के तहत हत्या या के तहत आत्महत्या में मदद माना जाता है।

भारत के संविधान में इच्छामृत्यु का क्या कानून है

2005 में कॉमन कॉज नाम की एक NGO ने पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु के अधिकार की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर 9 मार्च 2018 को CJI दीपक मिश्रा की अगुआई वाली 5 जजों की बेंच ने इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी।

तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था,

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अगर किसी मरीज को लाइलाज बीमारी हो या वेजिटेटिव स्टेट में यानी लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर ही जिंदा हो, तो प्राकृतिक तरीके से मृत्यु के लिए उसका इलाज बंद किया जा सकता है। इसे इच्छामृत्यु नहीं, बल्कि सम्मान के साथ मृत्यु का अधिकार माना जाएगा।

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यह अधिकार संविधान के आर्टिकल 21 का हिस्सा है, जिसमें सम्मान से जीने के साथ सम्मान से मरने का अधिकार है।

13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। -फाइल फोटो

13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। -फाइल फोटो

इच्छामृत्यु को लेकर क्या नियम है

2018 में पैसिव यूथेनेशिया को वैधता देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए 2 तरह के नियम बनाए…

1. जब मरीज ने पहले ही ‘लिविंग विल’ लिख रखी हो: जब मरीज ने मेंटली फिट रहते हुए अपनी इच्छा से लिविंग विल लिखी हो। इस लिविंग विल में साफ तौर पर लिखा जाता है कि मरीज की बीमारी अगर लाइलाज हो जाए यानी अगर वह अब कभी ठीक होने लायक न बचे तो उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटा दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए भी कुछ नियम बनाए हैं…

18 साल से ज्यादा उम्र और स्वस्थ व्यक्ति ही लिविंग विल लिख सकता है। मरीज ने 2 गवाहों के सामने लिविंग विल साइन की हो। डॉक्यूमेंट्स को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने वेरिफाई किया हो।

इलाज करने वाले डॉक्टर, हॉस्पिटल के मेडिकल बोर्ड और जिला स्तर के एक बाहरी मेडिकल बोर्ड की मंजूरी ली गई हो। दोनों बोर्डों की मंजूरी मिलने के बाद वेंटिलेटर जैसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम को बंद किया जा सकता हो।

इस पूरी प्रक्रिया के बारे में परिवार को जानकारी दी जाती है। किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है।

2. जब कोई लिविंग विल न हो: जब मरीज अपने होश में रहते हुए लिविंग विल नहीं बनाता तो उसका परिवार या करीबी ये फैसला ले सकते हैं। हालांकि, ये इतना आसान नहीं है। इसके लिए 2018 में सुप्रीम कोर्ट के बनाए गए इन नियमों का पालन करना होता है…

अस्पताल के डॉक्टरों का एक बोर्ड मरीज की कंडीशन चेक कर रिपोर्ट बनाता है। कलेक्टर 3-5 एक्सपर्ट्स का दूसरा मेडिकल बोर्ड बनाते हैं, जो ये रिपोर्ट चेक करता है। दोनों बोर्ड के सहमत होने पर इस फैसले को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाता है। मजिस्ट्रेट मरीज से मिलकर आखिरी निर्णय लेते हैं। अगर इसमें किसी तरह की विवाद की स्थिति होती है, तो हाइकोर्ट में अपील की जा सकती है।

क्या इससे पहले ऐसा किसी मामले में हुआ है

हरीश राणा का मामला भारत में पैसिव यूथेनेशिया का ऐसा पहला मामला है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के बनाए नियम फॉलो हो रहे हैं। दरअसल, 2018 के कॉमन कॉज फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने नियम बनाए थे, जो अब तक किसी मामले पर लागू नहीं हुए हैं। हरीश का केस पहला मामला है, जिसमें इन्हें लागू किया जा रहा है।

11 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली AIIMS को आदेश दिया है कि वो एक दूसरी मेडिकल बोर्ड बनाए जो हरीश राणा की कंडीशन की जांच करे। इस केस में प्राइमरी और सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया कोर्ट की निगरानी में चल रही है।

हालांकि, 2011 के अरुणा शानबाग केस ने पैसिव यूथेनेशिया को पहली बार लीगल बनाया, जो 2018 के कॉमन कॉज केस का आधार बना।

अरुणा शानबाग केस: 1973 में मुंबई के KEM अस्पताल में 42 साल की नर्स अरुणा शानबाग पर एक वार्ड अटेंडेंट ने हमला किया और फिर रेप किया। हमले में लगी गंभीर दिमागी चोटों की वजह से अरूणा कोमा में चली गईं। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए साल 2009 में एक पत्रकार पिंकी विरानी ने अरुणा की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। याचिका में अरुणा की लाइफ सपोर्ट मशीनें हटाने की मांग की गई, ताकि उनकी प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो सके।

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु को कानूनी अधिकार बताया था, लेकिन अरुणा को इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी। क्योंकि वह तब कुछ हद तक बिना मशीनों के सांस ले रही थीं। इसके बाद 2015 में अरुणा शानबाग की प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो गई।

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ये खबर भी पढ़ें…

‘बेसुध बेटे को घर की हर बात बताती थी’:हरीश राणा की मां बोली- उम्मीद थी कि पलक झपकाकर बता देगा कि सुन लिया

गाजियाबाद के राज एंपायर सोसाइटी की 13वीं मंजिल। साधारण से फ्लैट के कमरे में मेडिकल बेड पर हरीश (31) बेसुध लेटा है। पेट में पैग सेट पाइप और नाक में ऑक्सीजन पाइप लगा है। घर में परिजन, जानने वाले, अनजान, सरकारी अधिकारी व मीडियावालों का तांता लगा है। पिता अशोक राणा भरे गले से बता रहे हैं कि हमारी साढ़े बारह साल की सेवाओं का हिसाब-किताब अब पूरा हो रहा है, इसलिए यह फैसला आ गया। पढ़ें पूरी खबर

बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांगने वाले पिता का दर्द:बोले- बेटे को तड़पते हुए नहीं देख सकता था, पड़ोसी बोले- 13 साल से मुश्किल में परिवार

‘मैं बेटे के दर्द को बता नहीं सकता। उसकी पीड़ा और तड़प को देख नहीं सकता था। मैंने बेटे के लिए 13 साल में क्या-क्या कष्ट सहे, मैं बता नहीं सकता। मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया। बेटा ठीक हो जाए, इसके लिए मैंने अपना घर तक बेच दिया। सब कह रहे हैं कि मैंने बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांगी और मुझे यह मिली। लेकिन लोग यह नहीं जानते कि मेरा बेटा मेरा सबकुछ है। मेरी दुनिया, मेरा भविष्य। मैं कितनी पीड़ा में हूं, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता।’ पढ़ें पूरी खबर

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