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गन्ने के रस का देसी सिरका: पेट दर्द और बदहजमी का पारंपरिक इलाज

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गाजीपुर के जमानिया क्षेत्र के किशुनीपुर गांव की 75 वर्षीय इंदिरा सनी आज भी गन्ने के रस से देसी सिरका बनाने की पारंपरिक विधि को जीवित रखे हुए हैं. दो से तीन महीने तक धूप में प्राकृतिक किण्वन से तैयार यह सिरका पाचन संबंधी समस्याओं में असरदार माना जाता है. बिना केमिकल के बनने वाला यह देसी नुस्खा पुराने समय में बदहजमी, पेट दर्द और उल्टी जैसी परेशानियों के लिए घरेलू औषधि के रूप में इस्तेमाल होता था.

गाजीपुर. आज के दौर में जहां सिरदर्द से लेकर पेट दर्द तक के लिए हम तुरंत अंग्रेजी दवाइयों और एंटीबायोटिक्स की ओर भागते हैं, वहीं हमारे गांवों में आज भी सेहत का खजाना रसोई और परंपराओं में छिपा है. गाजीपुर के जमानिया क्षेत्र के किशुनीपुर  गांव की रहने वाली 75 वर्षीय इंदिरा सनी एक ऐसी ही विलुप्त होती परंपरा को बचाती है. गन्ने के रस से बना देसी सिरका, यह सिरका केवल शरबत नहीं, बल्कि पुराने समय की एक अचूक औषधि भी है.
इंदिरासनी बताती हैं कि असली और शुद्ध सिरका बनाना कोई जल्दबाजी का काम नहीं, बल्कि धैर्य की प्रक्रिया है. वह कहती हैं, पहले गन्ने के ताजे रस को मिट्टी के बर्तनों में भरकर 2 से 3 महीने तक कड़ी धूप में रखा जाता था. इस लंबी अवधि के दौरान रस प्राकृतिक रूप से फर्मेंट (किण्वन) होता है. अशुद्धियों को दूर करने के लिए इसे समय-समय पर महीन कपड़े से छाना जाता था, जिससे रस धीरे-धीरे गाढ़ा और तीखा होने लगता था.

कढ़ाई का छौंक और औषधीय गुण
सिरका तैयार होने का अंतिम चरण सबसे महत्वपूर्ण है, जब रस पूरी तरह फर्मेंट हो जाता है, तब इसे लोहे की कढ़ाई में हल्का गर्म किया जाता है. इंदिरासनी के अनुसार, इसे एक खास तरीके से तड़का दिया जाता है, जिससे न केवल इसका स्वाद बढ़ता है, बल्कि इसके औषधीय गुण भी कई गुना बढ़ जाते हैं. यही वह प्रक्रिया है जो इसे बाज़ार में मिलने वाले सिंथेटिक सिरके से कोसों दूर और गुणकारी बनाती है.

पेट की समस्याओं का रामबाण इलाज
यह देसी सिरका पुराने समय में हर घर की फर्स्ट एड किट हुआ करता था, इंदिरासनी साझा करती हैं कि बदहजमी, असहनीय पेट दर्द और उल्टी जैसी समस्याओं में यह किसी चमत्कार की तरह काम करता था. अगर किसी का पेट खराब होता या खाना नहीं पचता, तो बस थोड़ी मात्रा में यह सिरका पिला दिया जाता था और एक-दो दिन में मरीज भला-चंगा हो जाता था. आज के आधुनिक जीवन में हम इन पारंपरिक तरीकों से दूर हो गए हैं, लेकिन किशुनीपुर  जैसे गांवों में यह ज्ञान आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित है.

About the Author

Monali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

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गाजीपुर. आज के दौर में जहां सिरदर्द से लेकर पेट दर्द तक के लिए हम तुरंत अंग्रेजी दवाइयों और एंटीबायोटिक्स की ओर भागते हैं, वहीं हमारे गांवों में आज भी सेहत का खजाना रसोई और परंपराओं में छिपा है. गाजीपुर के जमानिया क्षेत्र के किशुनीपुर  गांव की रहने वाली 75 वर्षीय इंदिरा सनी एक ऐसी ही विलुप्त होती परंपरा को बचाती है. गन्ने के रस से बना देसी सिरका, यह सिरका केवल शरबत नहीं, बल्कि पुराने समय की एक अचूक औषधि भी है.
इंदिरासनी बताती हैं कि असली और शुद्ध सिरका बनाना कोई जल्दबाजी का काम नहीं, बल्कि धैर्य की प्रक्रिया है. वह कहती हैं, पहले गन्ने के ताजे रस को मिट्टी के बर्तनों में भरकर 2 से 3 महीने तक कड़ी धूप में रखा जाता था. इस लंबी अवधि के दौरान रस प्राकृतिक रूप से फर्मेंट (किण्वन) होता है. अशुद्धियों को दूर करने के लिए इसे समय-समय पर महीन कपड़े से छाना जाता था, जिससे रस धीरे-धीरे गाढ़ा और तीखा होने लगता था.

कढ़ाई का छौंक और औषधीय गुण
सिरका तैयार होने का अंतिम चरण सबसे महत्वपूर्ण है, जब रस पूरी तरह फर्मेंट हो जाता है, तब इसे लोहे की कढ़ाई में हल्का गर्म किया जाता है. इंदिरासनी के अनुसार, इसे एक खास तरीके से तड़का दिया जाता है, जिससे न केवल इसका स्वाद बढ़ता है, बल्कि इसके औषधीय गुण भी कई गुना बढ़ जाते हैं. यही वह प्रक्रिया है जो इसे बाज़ार में मिलने वाले सिंथेटिक सिरके से कोसों दूर और गुणकारी बनाती है.

पेट की समस्याओं का रामबाण इलाज
यह देसी सिरका पुराने समय में हर घर की फर्स्ट एड किट हुआ करता था, इंदिरासनी साझा करती हैं कि बदहजमी, असहनीय पेट दर्द और उल्टी जैसी समस्याओं में यह किसी चमत्कार की तरह काम करता था. अगर किसी का पेट खराब होता या खाना नहीं पचता, तो बस थोड़ी मात्रा में यह सिरका पिला दिया जाता था और एक-दो दिन में मरीज भला-चंगा हो जाता था. आज के आधुनिक जीवन में हम इन पारंपरिक तरीकों से दूर हो गए हैं, लेकिन किशुनीपुर  जैसे गांवों में यह ज्ञान आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित है.

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