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भोजशाला-केस;हाई कोर्ट में हिंदू पक्ष ने दिया हदीस का हवाला:दलील- ब्रिटिश म्यूजियम की वाग्देवी प्रतिमा भी मंदिर होने का बड़ा प्रमाण

भोजशाला-केस;हाई कोर्ट में हिंदू पक्ष ने दिया हदीस का हवाला:दलील- ब्रिटिश म्यूजियम की वाग्देवी प्रतिमा भी मंदिर होने का बड़ा प्रमाण

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में धार की ऐतिहासिक भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर बुधवार को एक बार फिर नियमित सुनवाई शुरू हुई। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ के समक्ष याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से एडवोकेट मनीष गुप्ता ने विस्तार से अपनी दलीलें पेश कीं। इस दौरान उन्होंने धार्मिक ग्रंथों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर भोजशाला को पूर्णतः मंदिर सिद्ध करने का प्रयास किया। सुनवाई के दौरान एडवोकेट गुप्ता ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु उठाते हुए इस्लामिक कानून (हदीस) का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि इस्लामिक सिद्धांतों के अनुसार किसी की जमीन पर जबरन कब्जा कर मस्जिद का निर्माण करना गलत है और इस्लाम में ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं जहाँ विवादित जमीन को उसके वास्तविक स्वरूप में लौटाया गया है। इसके साथ ही उन्होंने हिंदू कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि कोई स्थान एक बार मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित हो जाए, तो वह सदैव मंदिर ही रहता है। उन्होंने कहा कि ये दोनों कानूनी पक्ष इस बात की ओर इशारा करते हैं कि भोजशाला मूल रूप से वाग्देवी का मंदिर ही है। अपनी बहस को आगे बढ़ाते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने वर्ष 1908 के राजपत्र (गजट) और राजा भोज द्वारा रचित ग्रंथों का संदर्भ दिया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि भोजशाला के पत्थरों पर अंकित शिलालेख स्पष्ट करते हैं कि वहां राजा भोज द्वारा रचित नाटकों का मंचन वसंत पंचमी के अवसर पर किया जाता था। राजा भोज ने अपने ग्रंथों में हवन कुंड के क्षेत्रफल और देवी की मूर्ति की मुद्रा व आकार के जो मानक तय किए थे, वर्तमान भोजशाला में स्थित हवन कुंड और साक्ष्य ठीक उसी माप और स्वरूप के पाए गए हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों की कड़ी में ब्रिटिश संग्रहालय में रखी वाग्देवी की प्रतिमा का भी उल्लेख किया गया। वकील ने कहा कि उस मूर्ति पर स्पष्ट रूप से अंकित है कि इसकी स्थापना राजा भोज ने की थी और यह प्रतिमा भोजशाला से ही वहां पहुंची थी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एएसआई के अब तक के सर्वे में यहां से 150 से अधिक देवी-देवताओं की मूर्तियां और चित्र प्राप्त हुए हैं, जो किसी भी मस्जिद में नहीं हो सकते क्योंकि वहां ऐसी आकृतियों की अनुमति नहीं होती। इन तर्कों के आधार पर याचिकाकर्ता ने मांग की है कि उन्हें भोजशाला में 24 घंटे पूजा का अधिकार दिया जाना चाहिए। बुधवार को कुलदीप तिवारी की ओर से बहस पूरी हो गई है, जिसके बाद अब गुरुवार को अन्य याचिकाकर्ता अंतरसिंह की ओर से कोर्ट में दलीलें पेश की जाएंगी।

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