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एमपी के संविदा-आउटसोर्स कर्मचारियों को बड़ी राहत:हाईकोर्ट ने कहा- लाभ से वंचित करना तर्कहीन; वर्गीकरण कर वेतन-सेवा संबंधी लाभ दे सरकार

एमपी के संविदा-आउटसोर्स कर्मचारियों को बड़ी राहत:हाईकोर्ट ने कहा- लाभ से वंचित करना तर्कहीन; वर्गीकरण कर वेतन-सेवा संबंधी लाभ दे सरकार

मंगलवार का दिन मध्यप्रदेश के लाखों संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए राहत भरी खबर लेकर आया है। जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिए हैं कि वो संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों को वर्गीकरण कर उन्हें वेतन और सेवा संबंधी लाभ दे। कोर्ट ने 10 साल से ज्यादा सेवा वाले संविदा और आउटसोर्स कर्मियों को राज्य सरकार की साल 2016 की पॉलिसी का लाभ देने का आदेश भी दिया है। हाईकोर्ट ने इस अहम फैसले में कहा है कि लंबे समय से काम कर रहे संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों को लाभ से वंचित रखना तर्कहीन है।
दरअसल इस पॉलिसी का लाभ अब तक सिर्फ दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को दिया जा रहा था, जिसमें उन्हें कुशल, अर्धकुशल और अकुशल कैटेगिरी के मुताबिक वेतन लाभ देने का प्रावधान था। संविदा और आउटसोर्स कर्मियों ने जबलपुर हाईकोर्ट में यह कहते हुए याचिका दायर की थी, कि स्थाई कर्मियों के बराबर काम करने के बाद भी उन्हें कम वेतन दिया जाता है, और संविधान से मिले समानता के अधिकार और सम्मान से जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है। मंगलवार को मामले पर हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट की बैंच ने अपने फैसले में संविदा और आउटसोर्स कर्मियों को 2016 की पॉलिसी का लाभ देने का आदेश सुनाया है, इसके साथ ही कोर्ट ने अपने फैसले में कई अहम टिप्पणियां की हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों को लाभ से वंचित रखना तर्कहीन है। कोर्ट ने कहा कि संविदा कर्मियों को आर्थिक न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी 10 साल से ज्यादा समय तक लगातार काम कर रहा है, तो उसे 7 अक्टूबर 2016 के परिपत्र का लाभ मिलना चाहिए, इसके साथ ही चाहे वह संविदा या आउटसोर्स आधार पर ही क्यों न हो। अदालत ने यह भी माना कि यह नीति संविधान के अनुच्छेद 38, 39 और 43 में बताए गए सामाजिक और आर्थिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है। क्या है पूरा मामला यह मामला उन कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें 2009 में संविदा आधार पर नियुक्त किया गया था, और करीब 16 साल से लगातार सेवाएं ली जा रही थीं, लेकिन उन्हें स्थायी कर्मचारियों जैसे लाभ नहीं दिए गए। मामले की मुख्य बातें सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दलील देते हुए कहा कि 2016 की नीति के तहत दैनिक वेतनभोगियों को कुशल, अर्ध-कुशल और अकुशल श्रेणियों में वर्गीकृत कर लाभ दिए जाते हैं, लेकिन यह लाभ संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों पर लागू नहीं होता। हालांकि कोर्ट ने सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट की अहम टिप्पणी

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दरअसल इस पॉलिसी का लाभ अब तक सिर्फ दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को दिया जा रहा था, जिसमें उन्हें कुशल, अर्धकुशल और अकुशल कैटेगिरी के मुताबिक वेतन लाभ देने का प्रावधान था। संविदा और आउटसोर्स कर्मियों ने जबलपुर हाईकोर्ट में यह कहते हुए याचिका दायर की थी, कि स्थाई कर्मियों के बराबर काम करने के बाद भी उन्हें कम वेतन दिया जाता है, और संविधान से मिले समानता के अधिकार और सम्मान से जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है। मंगलवार को मामले पर हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट की बैंच ने अपने फैसले में संविदा और आउटसोर्स कर्मियों को 2016 की पॉलिसी का लाभ देने का आदेश सुनाया है, इसके साथ ही कोर्ट ने अपने फैसले में कई अहम टिप्पणियां की हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों को लाभ से वंचित रखना तर्कहीन है। कोर्ट ने कहा कि संविदा कर्मियों को आर्थिक न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी 10 साल से ज्यादा समय तक लगातार काम कर रहा है, तो उसे 7 अक्टूबर 2016 के परिपत्र का लाभ मिलना चाहिए, इसके साथ ही चाहे वह संविदा या आउटसोर्स आधार पर ही क्यों न हो। अदालत ने यह भी माना कि यह नीति संविधान के अनुच्छेद 38, 39 और 43 में बताए गए सामाजिक और आर्थिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है। क्या है पूरा मामला यह मामला उन कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें 2009 में संविदा आधार पर नियुक्त किया गया था, और करीब 16 साल से लगातार सेवाएं ली जा रही थीं, लेकिन उन्हें स्थायी कर्मचारियों जैसे लाभ नहीं दिए गए। मामले की मुख्य बातें सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दलील देते हुए कहा कि 2016 की नीति के तहत दैनिक वेतनभोगियों को कुशल, अर्ध-कुशल और अकुशल श्रेणियों में वर्गीकृत कर लाभ दिए जाते हैं, लेकिन यह लाभ संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों पर लागू नहीं होता। हालांकि कोर्ट ने सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट की अहम टिप्पणी

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