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'बुलेट बाबा' पर फिल्म, अंधविश्वास या आस्था की कहानी?:डायरेक्टर बोले-सोच कैसे हकीकत बनती है, यही दिखाया; बताया-क्यों नहीं ली ओम बन्ना के परिवार से परमिशन?

'बुलेट बाबा' पर फिल्म, अंधविश्वास या आस्था की कहानी?:डायरेक्टर बोले-सोच कैसे हकीकत बनती है, यही दिखाया; बताया-क्यों नहीं ली ओम बन्ना के परिवार से परमिशन?

हिंदी फिल्म ‘डुग डुग’ का ट्रेलर राजस्थान में चर्चा में बना हुआ है। ट्रेलर में दिखाई गई बाइक (लूना), आस्था और चमत्कार वाली कहानी सीधे ओम बन्ना धाम (बुलेट बाबा) से मेल खाती नजर आ रही है। राजस्थान की लोक आस्था के बड़े प्रतीक पर बनी इस फिल्म को लेकर लोगों में कई सवाल हैं। कोई इसे अंधविश्वास पर तंज कह रहा है तो कोई हास्य व्यंग्य की कहानी मान रहा है। फिल्म के लेखक-निर्देशक ऋत्विक पारीक ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत में इन्हीं सवालों के खुलकर जवाब दिए… सवाल : ट्रेलर रिलीज के बाद राजस्थान के दर्शकों से क्या रिएक्शन मिला है? जवाब : ट्रेलर से हमें अच्छा ही रेस्पॉन्स मिला है। हालांकि लोगों के मन में थोड़े सवाल भी हैं कि क्या आप सही चीज तो दिखा रहे हो न? अब ये तो आप जब फिल्म देखोगे तो अपने आप समझ में आ जाएगा कि सब कुछ सही है। इसमें हमने ऐसा कुछ दिखाया नहीं है जो सही नहीं हो। सवाल : डुग डुग फिल्म से बतौर लेखक और डायरेक्टर आप क्या कहना चाहते हैं? जवाब : लोगों को ट्रेलर देखकर लग रहा है कि ये अंधविश्वास पर है या धर्म पर सवाल कर रही है। पर यह फिल्म पूरी तरह से इस बात पर आधारित है कि आपके विचार ही आपकी वास्तविकता को आकार देते हैं। ये ठीक उसी तरह है कि जब आप किसी चीज में बहुत ज्यादा विश्वास करते हैं तो वो मैनिफेस्ट हो जाती है। ऐसे में इस बिलीफ और मैनिफेस्टेशन का जरिया कुछ भी हो सकता है- ये एक बाइक भी हो सकती है, एक मूर्ति भी हो सकती है और बिना किसी माध्यम के भी हो सकता है। आपकी सोच ही आपका यूनिवर्स बनाती है, हम इस फिल्म में यही एक्सप्लेन करना चाहते हैं। सवाल : इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखते समय आपने ओम बन्ना धाम की घटना को कितना फॉलो किया और कितना फिक्शन बनाया? जवाब : ये मिक्स है। हमने डायरेक्ट उन पर नहीं रखा है। हमें सरकार ने भी कहा था कि आप ये बताओ कि आपने नाम, कास्ट और कुछ भी ऐसा मेंशन नहीं किया है। इसीलिए हमने बाइक बदल दी और बाकी सब चीजें भी बदली हैं। हालांकि ये थोड़ा उनसे सिमिलर ही है, जितना हम कर सकते थे। बाकी कुछ फिक्शन भी हैं, जैसे नाट्य रूपांतरण। हमने ये भी सुनिश्चित किया है कि किसी को कुछ बुरा न लगे। ऐसा कुछ इस फिल्म में रखा ही नहीं है तो सेंसर भी ये देखकर हैरान था कि अब इसमें कट कहां लगाएं। हमने फिल्म में रंग भी लिए तो इसका भी पूरा ध्यान रखा कि ये ऐसे हों कि अलग दिखें। क्योंकि हमारे यहां लाल रंग दुर्गा माता का हो गया, शिव जी के लिए कुछ लोग काला रंग मानते हैं और हरा रंग इस्लाम का हो गया। ऐसे में हमारे सामने ये भी चैलेंज था कि इनके लिए रंग क्या काम में लें। तो बाद में ये आइडिया आया कि इनकी गाड़ी का ही रंग काम में लेंगे। सीट का रंग गुलाबी और बॉडी नीली है तो मुख्य किरदार ठाकुर साहब के जाने के बाद लोगों ने यही कलर उठा लिए और वो कलर ही उनकी आइडेंटिटी बन जाते हैं। सवाल : ओम बन्ना (बुलेट बाबा) की सच्ची घटना आपको पहली बार कब और कैसे पता चली? जवाब : मेरी दादी मां ने इसके बारे में मुझे बताया था। मैं खुद जयपुर से हूं तो पूरा बचपन यहीं मालवीय नगर के आस-पास ही बीता है। दादी मां मुझे खाटू श्याम जी, सालासर और कई मंदिरों में ले जाती थीं तो ये सब देखा हुआ ही है। अब ये याद नहीं है कि वहां पहली बार कब गया था। आप जयपुर में हैं तो गोविंददेव जी कैसे पता हैं? बस यही मामला है। शायद मैं नौवीं क्लास में था जब हम जोधपुर गए थे, तब की बात होगी। तब लगा था कि कमाल है भाई, ये क्या चीज है! बाद में इसी इंस्पिरेशन को लेकर फिल्म बनाई है। सवाल : फिल्म में मुख्य किरदार की मौत के बाद बाइक (लूना) का ‘चमत्कार’ दिखाया गया है? क्या आपने असली ओम बन्ना घटना के गवाहों या स्थानीय लोगों से बात की थी? जवाब : हां, उनकी कहानी तो हमने सुनी हुई है। मैं सीधा जोधपुर और पाली के अपने रिश्तेदारों को फोन लगाता था और वो बताते थे। इसके अलावा न्यूज पर भी काफी मटेरियल था। फिल्म में एक सीन है कि जब रिपोर्टर आता है तो वो भी एंड तक बुलेट पर ही दिखता है। ये आइडिया हमें एक न्यूज से ही मिला था। स्टोरी की रिसर्च तो ऐसी है कि सब देखा हुआ है, पर जो मेन रिसर्च थी वो आर्ट और डिजाइनिंग में थी। इसके लिए हमने पेंटिंग्स का सहारा लिया था। हमने पिक्चर में काफी चीजें लोगों को पेंटिंग्स के जरिए भी समझाने का प्रयास किया है। ये लोकल हैंड पेंटर ने किया और इसमें काफी मेहनत लगी है। सवाल: फिल्म में कॉमेडी-सटायर के रूप में क्यों चुना गया? जवाब : मैं इस फिल्म से दोनों पॉइंट ऑफ व्यू बताना चाह रहा था। लोग देखें तो उन्हें लगे कि ये क्या है? इसीलिए हमने जब इसे ग्लोबली दिखाया तो फिल्म के बीच में इंटरवल के समय डिस्क्लेमर डाला कि ये रियल घटना पर बनाई गई फिल्म है। अगर हम ये स्टार्टिंग में डाल देते तो उन्हें लगता कि ऐसे ही लिख रखा है। अब ज्यादा मैं आपको बता नहीं सकता, लेकिन फिल्म के अंत में आप मानेंगे कि सटायर तो है, पर इसके साथ ही वो पहलू भी समझेंगे कि कुछ ऊपरी ताकतें हैं, जिन्हें डिस्क्राइब नहीं किया जा सकता, पर वो हैं। इंसान का काम ही यही है कि ऐसी चीजों के लिए सवाल करो। सवाल: क्या आपको लगता है कि फिल्म रिलीज के बाद कुछ लोग इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस मान सकते हैं? आप ऐसे विवाद को कैसे हैंडल करते हैं? जवाब : अब जब कोई फिल्म देखेगा तो उसे पता चल जाएगा कि कुछ पावर तो है। बाकी जिसने नहीं देखी है, उसे तो क्या ही कह पाऊंगा। आप फिल्म देखेंगे तो समझ ही जाएंगे कि मैंने अपना काम सही से कर दिया है। बाकी मैं इस बारे में ज्यादा सोचता नहीं हूं। मेरा क्लियर फंडा है, जिसे मैंने अपने कमरे की दीवार पर भी लिख रखा है कि अगर आप निडर हैं तो ज्यादा सोचते नहीं हैं और जो सच्ची सोच है वो निडरता से ही आती है। मेरा तो काम ही सोचना और लिखना है। ये बिल्कुल ईमानदारी वाली बात है। अब जो होगा, वो देखा जाएगा। एंटी-सिपेट (पूर्वानुमान) नहीं करना है। आज आप कुछ भी सच्चाई दिखाओगे तो ये तो होगा ही। अगर ज्यादा सोचेंगे तो फिर सच्ची घटनाओं को आप लिख ही नहीं पाओगे। सवाल: मुख्य किरदार को 40 साल का शराबी ठाकुर बनाया गया है और बाकी भी शराब का काफी कनेक्शन है, यह क्या है? जवाब : ये सब फिल्म में मैंने बता रखा है और फिल्म देखने पर ज्यादा क्लियर भी हो ही जाएगा। ये भी उसी थॉट शेपिंग रियलिटी का ही असर है कि आप कुछ भी प्रसाद चढ़ा रहे हो। पुराने जमाने में बलि देकर उसे चढ़ाया जाता था। आपके अंदर आपने जो बिलीफ बैठा लिया है तो वो काम करता है। ये तो मैं भी मानता हूं और शायद यूनिवर्स का नियम है। सवाल : क्या आपने ओम बन्ना परिवार से अनुमति लेने के लिए प्रयास किया…उनसे कोई बात हुई थी? जवाब : जब फिल्म का आइडिया आया और मैंने इसे बनाने का काम शुरू किया था तो मैं बच्चा ही था। मतलब 27 साल का था और जोश-जोश में ही ये फिल्म बना दी थी। वहां मंदिर भी गया था और पूछताछ की, पंडित जी से भी बात हुई थी। लेकिन वो ही था कि आप इंस्पिरेशन तो ले ही सकते हो। अब फिल्म डायरेक्टली बनाओ तो ही पूछोगे। सवाल: अगर ओम बन्ना परिवार या स्थानीय लोग फिल्म देखने आएं तो आप उनसे क्या कहना चाहेंगे? क्या उन्हें फिल्म देखने बुलाया है? जवाब : अभी ये मैंने सोचा नहीं है। वो भी फिल्म देखने के बाद समझ जाएंगे और उन्हें फिल्म देखने के लिए बुलाने के बारे में तो प्रोड्यूसर ही कुछ बता सकते हैं। मैं तो बस फिल्म कंप्लीट करने में लगा हुआ हूं। बाकी इसके बारे में देखते हैं। सवाल: आपने राजस्थान के कितने मंदिरों (बुलेट बाबा सहित) का दौरा किया? इसमें सबसे हैरान करने वाली बात क्या थी? जवाब : मेहंदीपुर बालाजी, करणी माता मंदिर आदि कई मंदिर गया। मेहंदीपुर बालाजी हमेशा से मेरे लिए कुछ खास रहा है। वहां हमेशा लगता है कि बाप रे इधर मत जाओ, उधर मत जाओ, ये मत खाओ। लेकिन अब अगली फिल्म कोई हॉरर सटायर तो नहीं आ रही है, बल्कि कॉस्मिक हॉरर है। दूसरी बिल्कुल जयपुर की ही स्टोरी है। हालांकि अभी इन दोनों के बारे में ज्यादा नहीं बता सकता। दुनिया में इधर-उधर देखते हैं तो कई फनी एलिमेंट्स सामने आते हैं लेकिन अब धार्मिक और आस्था के टॉपिक को शायद ही दोबारा फिल्म में रखूं। जो कहना था वो इसी फिल्म से कह दिया है। सवाल : राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति, बोली और लोक-परंपराओं को फिल्म में कितनी जगह दी गई है? जवाब : ये पूरी फिल्म ही करीब-करीब राजस्थानी भाषा में ही है। क्योंकि सब कुछ जयपुर के आस-पास में ही फिल्माया गया है तो इसमें जयपुर की ही लोकल लैंग्वेज है। आर्टिस्ट भी यहीं के हैं। एक आर्टिस्ट जो भरतपुर से ट्रांसफर होकर आता है वो अपने भरतपुरी स्टाइल में बोलता है। बाकी कुछ-कुछ हिंदी भी है। सवाल : TIFF (टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ) 2021 में प्रीमियर के बाद 5 साल इंतजार और अब 8 मई 2026 को फिल्म रिलीज हो रही है, इतना गैप क्यों रहा? जवाब : पहले दिन से यही था कि हमें ये थिएटर में ही रिलीज करनी है। ये फिल्म भी इसी तरह से थिएटर के अंदाज में ही डिजाइन की गई है। टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में इसका पहला प्रीमियर IMAX में हुआ था, जो दुनिया की सबसे बड़ी स्क्रीन्स में से एक है। इसके बाद हमें कॉन्फिडेंस आया और बाद में इसे थिएटर में लाने के लिए ही इतना समय लगा। सवाल: पहली फिल्म होने के नाते अनुराग कश्यप, निखिल आडवाणी, विक्रमादित्य मोटवानी और वासन बाला जैसे नामों को एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में पाना कैसा लगा? जवाब : एक और नाम है रंजन सिंह, जो बतौर एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर बैक एंड पर सब कुछ देख रहे थे। इनके अलावा भी जो बाकी लोग फिल्म से जुड़े हैं, उनसे फिल्म को बहुत सपोर्ट मिलता है। ये सब बहुत बड़े नाम हैं। जाहिर सी बात है कि उन्हें इसमें कुछ अच्छा लगा होगा। इन सभी का जुड़ना बहुत ही अच्छी बात है और मैं तो बेहद ग्रेटफुल फील कर रहा हूं। मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि इस फिल्म से इतने सारे लोग जुड़ेंगे। सब कहते हैं कि धैर्य का फल मीठा होता है तो हमें इन सबके साथ थोड़ा ज्यादा ही मीठा फल मिल गया है। अब देखते हैं आगे क्या होता है। जयपुर के रहने वाले हैं फिल्ममेकर जयपुर में जन्मे और पले-बढ़े ऋत्विक पारीक एक फिल्ममेकर, लेखक और इलस्ट्रेटर हैं, जो वर्तमान में मुंबई में रहते हैं। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने एक विज्ञापन एजेंसी में आर्ट डायरेक्टर के रूप में की थी। वहां उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले विज्ञापन अभियानों पर काम किया। एक साल बाद उन्होंने ये एजेंसी छोड़ दी और फिल्म मेकिंग में करियर बना लिया। ‘डुग डुग’ एक सटायर और कॉमेडी फिल्म है। इस फिल्म को ऋत्विक पारीक ने ही लिखा है। इस फिल्म को अनुराग कश्यप, निखिल आडवाणी, विक्रमादित्य मोटवानी और वसन बाला जैसे फिल्ममेकर बतौर एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर सपोर्ट कर रहे हैं। क्या है ओम बन्ना की कहानी
ओम बन्ना का पूरा नाम ओम सिंह राठौड़ था। वे राजस्थान के पाली जिले के चोटिला गांव के ठाकुर जोग सिंह राठौड़ के पुत्र थे। 1988 में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई थी। दुर्घटना के बाद पुलिस ने बाइक को रोहट थाने में रख दिया। दावा किया जाता है कि इसके अगले दिन वो बाइक थाने से गायब होकर दुर्घटना स्थल पर पहुंच गई। पुलिस ने फिर बाइक ले जाकर तेल खाली किया, चेन से बांधा और सुरक्षा बढ़ाई। फिर भी बाइक बार-बार थाने से भागकर उसी जगह पर लौट आती। इसी चमत्कार के दावे के चलते बाद में उन्हें बुलेट बाबा कहा जाने लगा। धीरे-धीरे वहां ओम बन्ना धाम बन गया, जहां बाइक को फूल-माला चढ़ाकर पूजा जाता है।

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जवाब : ये मिक्स है। हमने डायरेक्ट उन पर नहीं रखा है। हमें सरकार ने भी कहा था कि आप ये बताओ कि आपने नाम, कास्ट और कुछ भी ऐसा मेंशन नहीं किया है। इसीलिए हमने बाइक बदल दी और बाकी सब चीजें भी बदली हैं। हालांकि ये थोड़ा उनसे सिमिलर ही है, जितना हम कर सकते थे। बाकी कुछ फिक्शन भी हैं, जैसे नाट्य रूपांतरण। हमने ये भी सुनिश्चित किया है कि किसी को कुछ बुरा न लगे। ऐसा कुछ इस फिल्म में रखा ही नहीं है तो सेंसर भी ये देखकर हैरान था कि अब इसमें कट कहां लगाएं। हमने फिल्म में रंग भी लिए तो इसका भी पूरा ध्यान रखा कि ये ऐसे हों कि अलग दिखें। क्योंकि हमारे यहां लाल रंग दुर्गा माता का हो गया, शिव जी के लिए कुछ लोग काला रंग मानते हैं और हरा रंग इस्लाम का हो गया। ऐसे में हमारे सामने ये भी चैलेंज था कि इनके लिए रंग क्या काम में लें। तो बाद में ये आइडिया आया कि इनकी गाड़ी का ही रंग काम में लेंगे। सीट का रंग गुलाबी और बॉडी नीली है तो मुख्य किरदार ठाकुर साहब के जाने के बाद लोगों ने यही कलर उठा लिए और वो कलर ही उनकी आइडेंटिटी बन जाते हैं। सवाल : ओम बन्ना (बुलेट बाबा) की सच्ची घटना आपको पहली बार कब और कैसे पता चली? जवाब : मेरी दादी मां ने इसके बारे में मुझे बताया था। मैं खुद जयपुर से हूं तो पूरा बचपन यहीं मालवीय नगर के आस-पास ही बीता है। दादी मां मुझे खाटू श्याम जी, सालासर और कई मंदिरों में ले जाती थीं तो ये सब देखा हुआ ही है। अब ये याद नहीं है कि वहां पहली बार कब गया था। आप जयपुर में हैं तो गोविंददेव जी कैसे पता हैं? बस यही मामला है। शायद मैं नौवीं क्लास में था जब हम जोधपुर गए थे, तब की बात होगी। तब लगा था कि कमाल है भाई, ये क्या चीज है! बाद में इसी इंस्पिरेशन को लेकर फिल्म बनाई है। सवाल : फिल्म में मुख्य किरदार की मौत के बाद बाइक (लूना) का ‘चमत्कार’ दिखाया गया है? क्या आपने असली ओम बन्ना घटना के गवाहों या स्थानीय लोगों से बात की थी? जवाब : हां, उनकी कहानी तो हमने सुनी हुई है। मैं सीधा जोधपुर और पाली के अपने रिश्तेदारों को फोन लगाता था और वो बताते थे। इसके अलावा न्यूज पर भी काफी मटेरियल था। फिल्म में एक सीन है कि जब रिपोर्टर आता है तो वो भी एंड तक बुलेट पर ही दिखता है। ये आइडिया हमें एक न्यूज से ही मिला था। स्टोरी की रिसर्च तो ऐसी है कि सब देखा हुआ है, पर जो मेन रिसर्च थी वो आर्ट और डिजाइनिंग में थी। इसके लिए हमने पेंटिंग्स का सहारा लिया था। हमने पिक्चर में काफी चीजें लोगों को पेंटिंग्स के जरिए भी समझाने का प्रयास किया है। ये लोकल हैंड पेंटर ने किया और इसमें काफी मेहनत लगी है। सवाल: फिल्म में कॉमेडी-सटायर के रूप में क्यों चुना गया? जवाब : मैं इस फिल्म से दोनों पॉइंट ऑफ व्यू बताना चाह रहा था। लोग देखें तो उन्हें लगे कि ये क्या है? इसीलिए हमने जब इसे ग्लोबली दिखाया तो फिल्म के बीच में इंटरवल के समय डिस्क्लेमर डाला कि ये रियल घटना पर बनाई गई फिल्म है। अगर हम ये स्टार्टिंग में डाल देते तो उन्हें लगता कि ऐसे ही लिख रखा है। अब ज्यादा मैं आपको बता नहीं सकता, लेकिन फिल्म के अंत में आप मानेंगे कि सटायर तो है, पर इसके साथ ही वो पहलू भी समझेंगे कि कुछ ऊपरी ताकतें हैं, जिन्हें डिस्क्राइब नहीं किया जा सकता, पर वो हैं। इंसान का काम ही यही है कि ऐसी चीजों के लिए सवाल करो। सवाल: क्या आपको लगता है कि फिल्म रिलीज के बाद कुछ लोग इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस मान सकते हैं? आप ऐसे विवाद को कैसे हैंडल करते हैं? जवाब : अब जब कोई फिल्म देखेगा तो उसे पता चल जाएगा कि कुछ पावर तो है। बाकी जिसने नहीं देखी है, उसे तो क्या ही कह पाऊंगा। आप फिल्म देखेंगे तो समझ ही जाएंगे कि मैंने अपना काम सही से कर दिया है। बाकी मैं इस बारे में ज्यादा सोचता नहीं हूं। मेरा क्लियर फंडा है, जिसे मैंने अपने कमरे की दीवार पर भी लिख रखा है कि अगर आप निडर हैं तो ज्यादा सोचते नहीं हैं और जो सच्ची सोच है वो निडरता से ही आती है। मेरा तो काम ही सोचना और लिखना है। ये बिल्कुल ईमानदारी वाली बात है। अब जो होगा, वो देखा जाएगा। एंटी-सिपेट (पूर्वानुमान) नहीं करना है। आज आप कुछ भी सच्चाई दिखाओगे तो ये तो होगा ही। अगर ज्यादा सोचेंगे तो फिर सच्ची घटनाओं को आप लिख ही नहीं पाओगे। सवाल: मुख्य किरदार को 40 साल का शराबी ठाकुर बनाया गया है और बाकी भी शराब का काफी कनेक्शन है, यह क्या है? जवाब : ये सब फिल्म में मैंने बता रखा है और फिल्म देखने पर ज्यादा क्लियर भी हो ही जाएगा। ये भी उसी थॉट शेपिंग रियलिटी का ही असर है कि आप कुछ भी प्रसाद चढ़ा रहे हो। पुराने जमाने में बलि देकर उसे चढ़ाया जाता था। आपके अंदर आपने जो बिलीफ बैठा लिया है तो वो काम करता है। ये तो मैं भी मानता हूं और शायद यूनिवर्स का नियम है। सवाल : क्या आपने ओम बन्ना परिवार से अनुमति लेने के लिए प्रयास किया…उनसे कोई बात हुई थी? जवाब : जब फिल्म का आइडिया आया और मैंने इसे बनाने का काम शुरू किया था तो मैं बच्चा ही था। मतलब 27 साल का था और जोश-जोश में ही ये फिल्म बना दी थी। वहां मंदिर भी गया था और पूछताछ की, पंडित जी से भी बात हुई थी। लेकिन वो ही था कि आप इंस्पिरेशन तो ले ही सकते हो। अब फिल्म डायरेक्टली बनाओ तो ही पूछोगे। सवाल: अगर ओम बन्ना परिवार या स्थानीय लोग फिल्म देखने आएं तो आप उनसे क्या कहना चाहेंगे? क्या उन्हें फिल्म देखने बुलाया है? जवाब : अभी ये मैंने सोचा नहीं है। वो भी फिल्म देखने के बाद समझ जाएंगे और उन्हें फिल्म देखने के लिए बुलाने के बारे में तो प्रोड्यूसर ही कुछ बता सकते हैं। मैं तो बस फिल्म कंप्लीट करने में लगा हुआ हूं। बाकी इसके बारे में देखते हैं। सवाल: आपने राजस्थान के कितने मंदिरों (बुलेट बाबा सहित) का दौरा किया? इसमें सबसे हैरान करने वाली बात क्या थी? जवाब : मेहंदीपुर बालाजी, करणी माता मंदिर आदि कई मंदिर गया। मेहंदीपुर बालाजी हमेशा से मेरे लिए कुछ खास रहा है। वहां हमेशा लगता है कि बाप रे इधर मत जाओ, उधर मत जाओ, ये मत खाओ। लेकिन अब अगली फिल्म कोई हॉरर सटायर तो नहीं आ रही है, बल्कि कॉस्मिक हॉरर है। दूसरी बिल्कुल जयपुर की ही स्टोरी है। हालांकि अभी इन दोनों के बारे में ज्यादा नहीं बता सकता। दुनिया में इधर-उधर देखते हैं तो कई फनी एलिमेंट्स सामने आते हैं लेकिन अब धार्मिक और आस्था के टॉपिक को शायद ही दोबारा फिल्म में रखूं। जो कहना था वो इसी फिल्म से कह दिया है। सवाल : राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति, बोली और लोक-परंपराओं को फिल्म में कितनी जगह दी गई है? जवाब : ये पूरी फिल्म ही करीब-करीब राजस्थानी भाषा में ही है। क्योंकि सब कुछ जयपुर के आस-पास में ही फिल्माया गया है तो इसमें जयपुर की ही लोकल लैंग्वेज है। आर्टिस्ट भी यहीं के हैं। एक आर्टिस्ट जो भरतपुर से ट्रांसफर होकर आता है वो अपने भरतपुरी स्टाइल में बोलता है। बाकी कुछ-कुछ हिंदी भी है। सवाल : TIFF (टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ) 2021 में प्रीमियर के बाद 5 साल इंतजार और अब 8 मई 2026 को फिल्म रिलीज हो रही है, इतना गैप क्यों रहा? जवाब : पहले दिन से यही था कि हमें ये थिएटर में ही रिलीज करनी है। ये फिल्म भी इसी तरह से थिएटर के अंदाज में ही डिजाइन की गई है। टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में इसका पहला प्रीमियर IMAX में हुआ था, जो दुनिया की सबसे बड़ी स्क्रीन्स में से एक है। इसके बाद हमें कॉन्फिडेंस आया और बाद में इसे थिएटर में लाने के लिए ही इतना समय लगा। सवाल: पहली फिल्म होने के नाते अनुराग कश्यप, निखिल आडवाणी, विक्रमादित्य मोटवानी और वासन बाला जैसे नामों को एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में पाना कैसा लगा? जवाब : एक और नाम है रंजन सिंह, जो बतौर एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर बैक एंड पर सब कुछ देख रहे थे। इनके अलावा भी जो बाकी लोग फिल्म से जुड़े हैं, उनसे फिल्म को बहुत सपोर्ट मिलता है। ये सब बहुत बड़े नाम हैं। जाहिर सी बात है कि उन्हें इसमें कुछ अच्छा लगा होगा। इन सभी का जुड़ना बहुत ही अच्छी बात है और मैं तो बेहद ग्रेटफुल फील कर रहा हूं। मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि इस फिल्म से इतने सारे लोग जुड़ेंगे। सब कहते हैं कि धैर्य का फल मीठा होता है तो हमें इन सबके साथ थोड़ा ज्यादा ही मीठा फल मिल गया है। अब देखते हैं आगे क्या होता है। जयपुर के रहने वाले हैं फिल्ममेकर जयपुर में जन्मे और पले-बढ़े ऋत्विक पारीक एक फिल्ममेकर, लेखक और इलस्ट्रेटर हैं, जो वर्तमान में मुंबई में रहते हैं। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने एक विज्ञापन एजेंसी में आर्ट डायरेक्टर के रूप में की थी। वहां उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले विज्ञापन अभियानों पर काम किया। एक साल बाद उन्होंने ये एजेंसी छोड़ दी और फिल्म मेकिंग में करियर बना लिया। ‘डुग डुग’ एक सटायर और कॉमेडी फिल्म है। इस फिल्म को ऋत्विक पारीक ने ही लिखा है। इस फिल्म को अनुराग कश्यप, निखिल आडवाणी, विक्रमादित्य मोटवानी और वसन बाला जैसे फिल्ममेकर बतौर एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर सपोर्ट कर रहे हैं। क्या है ओम बन्ना की कहानी
ओम बन्ना का पूरा नाम ओम सिंह राठौड़ था। वे राजस्थान के पाली जिले के चोटिला गांव के ठाकुर जोग सिंह राठौड़ के पुत्र थे। 1988 में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई थी। दुर्घटना के बाद पुलिस ने बाइक को रोहट थाने में रख दिया। दावा किया जाता है कि इसके अगले दिन वो बाइक थाने से गायब होकर दुर्घटना स्थल पर पहुंच गई। पुलिस ने फिर बाइक ले जाकर तेल खाली किया, चेन से बांधा और सुरक्षा बढ़ाई। फिर भी बाइक बार-बार थाने से भागकर उसी जगह पर लौट आती। इसी चमत्कार के दावे के चलते बाद में उन्हें बुलेट बाबा कहा जाने लगा। धीरे-धीरे वहां ओम बन्ना धाम बन गया, जहां बाइक को फूल-माला चढ़ाकर पूजा जाता है।

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