पश्चिम बंगाल की राजनीति 2026 में एक बड़ा भूचाल आया, जिसने ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी के 15 साल पुराने किले को ढहा दिया। एक ऐसे नेता जो कभी अपने दम पर वाम मोर्चे के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंकते थे। आज उनकी पार्टी मोरचा 80 पार्टी की पार्टी बनी और वे खुद अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से चुनाव हार गये। यह अचानक नहीं हुआ, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में कई भयानक घटनाएं हुईं और गहरी शासन विफलताओं का नतीजा निकला, ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ को खत्म कर दिया गया।
1. महिला सुरक्षा एवं आर.जी. कर कांड: वोट बैंक में बड़ा संदेश
ममता बनर्जी की नामांकित सूची का एक बड़ा आधार हमेशा के लिए महिला नाम रखने वाली थीं, जिनमें ‘लक्ष्मीर भंडार’ जैसी सूची में शामिल आवास शामिल थे। लेकिन आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में एक महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या कांड ने इस पूरे स्कूल को बर्बाद कर दिया। इस घटना ने न सिर्फ राज्य में महिला सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा की, बल्कि एक बड़े जनाक्रोश को जन्म दिया।
नागरिक समाज ने लैंडिंग पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया। प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे। इस घटना ने ममता सरकार के लिए महिलाओं के बीच एक विश्वास का संकट खड़ा कर दिया। अविश्वास संकेत मिला कि महिलाओं की मताधिकार पात्रता से हटकर अब आपकी सुरक्षा पर ध्यान दिया गया था।
2. कारीगरों के कई घोटाले: पार्टी और सरकार के सिस्टम पर सवाल
ममता बनर्जी के 15 साल के शासनकाल में कलाकारों के तीन आरोप लगे कि यह उनकी सरकार की ‘पहचान’ बन गई, जिसे ममता बनर्जी ने ‘भ्रष्टाचार उद्योग’ का नाम दे दिया। शुरूआती दौर में सारदा चिट फंड घोटालेबाज और नारदा स्टिंग ऑपरेशन ने अपनी छवि को झटका दिया, लेकिन इसके बाद शिक्षक भर्ती घोटाला (एस.एस.सी. घोटाला) सामने आया। इस फैकल्टी ने हजारों पढ़े-लिखे युवाओं के सपनों को तोड़ दिया, इनमें से एक को मिलाकर पास करने के बाद भी बचपन नहीं मिला।
सरेआम की थोक वसूली से यह बात घर-घर तक पहुंच गई कि थोक बिक्री हो रही है। इसके अलावा, राशन वितरण गोदाम, नगरपालिका भर्ती गोदाम, कोयला और कारखाने के सामानों को एक प्रणाली के रूप में स्थापित किया गया। पार्टी के कई बड़े नेताओं और विधायकों के समर्थकों ने आम जनता में यह धारणा पक्की कर दी है कि सरकार पूरी तरह से नष्ट हो गयी है.
3. ध्रुवीकरण और तुष्टिकरण के आरोप: सामाजिक ताने-बाने में दरार
ममता बनर्जी की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा अल्पसंख्यक समुदाय के कल्याण पर केंद्रित है, लेकिन धीरे-धीरे इसे ‘तुष्टिकरण’ के रूप में देखा जाने लगा। 2019 में उन्होंने बयान देते हुए कहा था कि ‘वे ‘उस गाय की कॉकटेल खाने को तैयार कर रहे हैं जो दूध वाले हैं’, उन्होंने आग में घी का काम किया और बीजेपी ने इसे बहुत अलग तरीके से पेश किया। इसके बाद आसनसोल, मालदा, मुर्शिदाबाद और बशीरहाट जैसे अपवित्र में हुई सांप्रदायिक हिंसा और संदेशखाली जैसी घटनाओं ने हिंदू बहुल एशिया में इस धारणा को और मजबूत किया कि प्रशासन सिर्फ एक तरफा कार्रवाई करता है।
2026 में ममता बनर्जी ने कहा था कि उनकी सरकार के बिना एक समुदाय ‘कुछ ही सेकंड में’ बहुसंख्यकों को खत्म कर सकता है। इस बयान ने स्थिति को और आकर्षक बना दिया। नतीजा बहुसांख्यिक सीट का भारी ध्रुवीकरण हुआ और टीएमसी के लिए मुस्लिम सीट में भी दरार आई।
4. शासन की विफलता और पलायन: दर्शनशास्त्र पर खरी नहीं उतरी सरकार
विकास के वादे पर ममता सरकार पूरी तरह से विफल रही। राज्य में आम लोगों की कमी और ‘सिंडिकेट राज’ (बाहुबलियों और स्थानीय गुंडों का शासन) के बड़े पैमाने पर साम्राज्य ने बंगाल से दूरी बना ली। इससे रोजगार के अवसर कम हुए और कुशल युवाओं की संख्या राज्य से बाहर बढ़ी। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की समरूप स्थिति ने मध्यम वर्ग में जन्म लिया, जिसका प्रभाव साक्षात दर्शन को मिला। खासतौर पर कोलकाता की वेबसाइट पर जहां बीजेपी ने सफाया कर दिया।
इसके अलावा, लगातार 15 संतों की सत्ता से उपजी एंटी-इंकंबेंसी ने जनता की विचारधारा को और हवा दी। पार्टी के अंदर की बेहतर कलह और कई बड़े नेता बीजेपी में शामिल होकर भी संगठन के मजबूत होने की बड़ी वजह बने।
5. सर ने तोड़ी कमर: 91 लाख वोटर्स का बड़ा झटका
2026 के चुनाव से ठीक पहले, चुनाव आयोग ने सूची से 91 लाख से अधिक नाम हटाये, जो कुल का लगभग 12% था। इन निकाले गए बस्तियों में बड़ी संख्या में उन लोगों की संख्या बताई गई है जो या तो मृत हो गए हैं या राज्य से बाहर पलायन कर गए हैं, लेकिन टीएमसी ने ‘अवैध द्वीप समूह’ यानी अल्पसंख्यक मतदाताओं को लक्षित करने वाला कदम बताया।
इस विवाद ने एक ऐसा माहौल बना दिया जिसमें टीएमसी के समर्थकों में भ्रम और अविश्वास फैल गया, जबकि बीजेपी के पक्ष में 93 फीसदी की रिकॉर्ड वोटिंग हुई. वोट प्रतिशत में यह ताकतवर उछाल ही वह अंतिम झटका साबित हुआ, जिसने 15 साल पुराने किले को 15 साल पुराने किले को तोड़ दिया।
ये सभी घटनाएं और मुद्दा संयोजन एक ऐसे राजनीतिक तूफ़ान में बदल गया, जिसने ममता बनर्जी के 15 साल पुराने किले को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया और पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार बनने की राह तैयार की।










































