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मजदूरों के बिना सुस्त पड़ा दक्षिण भारत का उद्योग:फ्री फ्लाइट टिकट, बसें; फिर भी बंगाल, असम से लौट नहीं रहे लेबर

मजदूरों के बिना सुस्त पड़ा दक्षिण भारत का उद्योग:फ्री फ्लाइट टिकट, बसें; फिर भी बंगाल, असम से लौट नहीं रहे लेबर

केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों के नियोक्ता इन दिनों एक अजीब जद्दोजहद में हैं। वे मजदूरों को वापस बुलाने के लिए फ्री हवाई टिकट दे रहे हैं, लग्जरी बसें भेज रहे हैं और तनख्वाह बढ़ाने के वादे कर रहे हैं। फिर भी पश्चिम बंगाल और असम से काम करने आने वाले लाखों प्रवासी मजदूर घर पर ही हैं। वजह साफ है। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में वोट डालने गए ज्यादातर मजदूर लौटने में आनाकानी कर रहे हैं। ‘सेंटर फॉर माइग्रेशन एंड इनक्लूसिव डेवलपमेंट’ के ईडी बेनॉय पीटर कहते हैं, ‘इस बार लगभग सभी मजदूर वोट डालने घर गए, खास तौर पर इलेक्टोरल रोल के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चिंताओं की वजह से। दोनों राज्यों के रिकॉर्ड मतदान इसी का नतीजा है।’ वापसी में देरी के कई अन्य कारण भी हैं, मसलन केरल में मानसून की दस्तक, स्कूलों की छुट्टियां, बकरीद का त्योहार और खेतों की बुवाई का सीजन। पश्चिम एशिया में संकट के चलते टाइल्स और प्लाईवुड रेजिन जैसी सामग्रियों की किल्लत से कुछ सेक्टर में काम वैसे भी धीमा है। केरल इस संकट का सबसे बड़ा शिकार है। राज्य में करीब 40 लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं। इनमें से 70% बंगाल और असम से हैं। ‘बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ के डायरेक्टर जनरल राजू जॉन कहते हैं कि नियोक्ताओं ने हर हथकंडा अपनाया। फ्लाइट उड़ान टिकट, वेतन वृद्धि, बसें इनमें शामिल हैं। फिर भी ज्यादातर मजदूर आने के लिए तैयार नहीं हैं। तिरुपुर में हालत और भी चिंताजनक है। देश के इस सबसे बड़े निटवियर निर्यात केंद्र में उत्पादन क्षमता घटकर करीब 70% रह गई है। पश्चिम एशिया संकट से ऑर्डर पहले ही कम हैं, अब मजदूरों की कमी ने मुश्किल और बढ़ा दी है। संकट की एक गहरी परत और भी है। बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में कुछ वर्षों में औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के तेज निर्माण ने वहीं रोजगार के दरवाजे खोल दिए हैं। लेयम ग्रुप के चेयरमैन जी. रमेश चेताते हैं कि अगर पूर्वी और उत्तरी राज्यों में यह रफ्तार बनी रही तो भविष्य में दक्षिण भारत के लिए मजदूर जुटाना और मुश्किल हो जाएगा। इस बीच वेतन को लेकर उम्मीदें भी बढ़ रही हैं। वेल्डिंग जैसे कामों के लिए मजदूर अब 20,000 की जगह 30,000-33,000 मांग रहे हैं। मौके का फायदा – अभी के मुकाबले डेढ़ गुना वेतन की मांग कर रहे प्रवासी श्रमिक – केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में 1.3 करोड़ प्रवासी मजदूर काम करते हैं। ये मुख्यतः यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे उत्तर और पूर्वी भारत से आते हैं। – केरल में करीब 40 लाख प्रवासी श्रमिकों में से 70% पश्चिम बंगाल और असम के हैं। इन्होंने चुनाव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, पर वे वापसी के मूड में नहीं हैं। – तिरुपुर के निटवियर इंडस्ट्री की उत्पादन क्षमता घटकर 70% रह गई है। श्रमिकों की किल्लत के बीच मजदूर डेढ़ गुना वेतन की मांग करने लगे हैं।

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