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मूवी रिव्यू:मुद्दे बड़े, स्टार्स दमदार… फिर भी अधूरी रह गई ‘कर्तव्य’, सैफ की मेहनत भी नहीं बचा पाई फिल्म

मूवी रिव्यू:मुद्दे बड़े, स्टार्स दमदार… फिर भी अधूरी रह गई ‘कर्तव्य’, सैफ की मेहनत भी नहीं बचा पाई फिल्म

ओटीटी के दौर में ऐसी फिल्मों की कमी नहीं है जो समाज के कड़वे सच को सामने लाने का दावा करती हैं। कर्तव्य भी उसी रास्ते पर चलती नजर आती है। फिल्म जातिवाद, ऑनर किलिंग, पाखंडी बाबाओं का नेटवर्क, सिस्टम की सड़ांध और इंसानियत जैसे कई गंभीर मुद्दों को एक साथ छूने की कोशिश करती है। ऊपर से सैफ अली खान, रसिका दुग्गल और संजय मिश्रा जैसे मजबूत कलाकार भी हैं। सुनने में सब कुछ दमदार लगता है, लेकिन दिक्कत यह है कि फिल्म अपने इरादों जितनी मजबूत बन नहीं पाती। कहना बहुत कुछ चाहती है, मगर असर उतना नहीं छोड़ पाती। इस फिल्म की लेंथ एक घंटा 49 मिनट है। इस फिल्म को दैनिक भास्कर ने 5 में से 2 स्टार की रेटिंग दी है। फिल्म की कहानी क्या है? कहानी हरियाणा के काल्पनिक कस्बे झामली में सेट है, जहां ईमानदार पुलिस अफसर पवन (सैफ अली खान) अपनी नौकरी को सिर्फ वर्दी नहीं, जिम्मेदारी मानता है। मामला तब उलझता है जब एक पत्रकार, जो इलाके के प्रभावशाली बाबा आनंद श्री के काले राज खोलने में जुटी होती है, झामली पहुंचती है। लेकिन सच सामने आने से पहले ही उसकी हत्या हो जाती है। यहीं से कहानी एक ऐसे जाल में उतरती है, जहां गायब हो रहे बच्चे, ऑनर किलिंग, जातिगत दबाव और सत्ता का डरावना खेल एक एक कर सामने आने लगता है। दूसरी तरफ पवन के घर में भी उथल पुथल मच जाती है, जब उसका छोटा भाई समाज की तय सीमाओं के खिलाफ जाकर दूसरी जाति में शादी कर लेता है। फिल्म कई जगह यह सवाल पूछती है कि इंसान का असली कर्तव्य क्या है। परिवार के प्रति जिम्मेदारी, नौकरी का फर्ज या सच के साथ खड़े रहने की हिम्मत? मुद्दे मजबूत हैं, लेकिन कहानी कई बार खुद अपनी धार खो देती है। जहां जोरदार टकराव चाहिए होता है, वहां फिल्म खुद को थोड़ा संभाल लेती है। कई ट्विस्ट पहले से समझ आने लगते हैं और थ्रिलर वाला रोमांच लगातार नहीं बन पाता। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? सैफ अली खान इस फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं। लंबे समय बाद पुलिस अफसर के किरदार में वह जमे हुए लगते हैं। उनके चेहरे पर जिम्मेदारी का बोझ, भीतर का गुस्सा और सिस्टम से लड़ने की बेचैनी साफ दिखती है। अच्छी बात यह है कि उनका किरदार सिर्फ एक ‘हीरो पुलिसवाला’ बनकर नहीं रह जाता, बल्कि इंसानी कमजोरी भी दिखाता है। संजय मिश्रा अपनी मौजूदगी महसूस कराते हैं, लेकिन उनका किरदार जितना असर छोड़ सकता था, उतना मौका उसे मिला नहीं। रसिका दुग्गल कम स्क्रीन टाइम में भी अपनी छाप छोड़ती हैं, लेकिन उनके हिस्से में ज्यादा कुछ आता नहीं। फिल्म में सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं युधवीर अहलावत। दबाव, डर और मजबूरी के बीच पिसते एक लड़के के किरदार में वह कई जगह बेहद सच्चे लगते हैं और भावनात्मक असर छोड़ते हैं। हालांकि, फिल्म का सबसे कमजोर हिस्सा उसका विलेन साबित होता है। सौरभ द्विवेदी, बाबा आनंद श्री के रोल में, उतना डर या रहस्य पैदा नहीं कर पाते जिसकी कहानी को जरूरत थी। उनका किरदार कई जगह खतरनाक कम और सतही ज्यादा लगता है, जिससे फिल्म का बड़ा संघर्ष कमजोर पड़ जाता है। फिल्म का डायरेक्शन और तकनीकी पहलू कैसा है? डायरेक्टर पुलकित की मंशा अच्छी नजर आती है। फिल्म अपनी गति बनाए रखती है और लगातार कुछ न कुछ होता रहता है, इसलिए बोरियत महसूस नहीं होती। लेकिन सिर्फ तेज रफ्तार से कहानी असरदार नहीं बनती, उसके लिए गहराई भी चाहिए और वही यहां थोड़ी कम महसूस होती है। सबसे ज्यादा खटकती है फिल्म की विजुअल ट्रीटमेंट। कहानी जिस कच्चे, धूल भरे और बेचैन माहौल की मांग करती है, स्क्रीन पर वह पूरी तरह नजर नहीं आता। हरियाणा की कठोर दुनिया जरूरत से ज्यादा साफ और चमकदार दिखती है। नतीजा यह होता है कि कहानी की गंदगी और डर दर्शक तक पूरी ताकत से पहुंच ही नहीं पाता। डायलॉग्स कुछ जगह अच्छे हैं और हरियाणवी टोन भी पकड़ते हैं। बैकग्राउंड स्कोर कहानी पर हावी नहीं होता, जो अच्छी बात है। लेकिन थ्रिलर वाला तनाव और सस्पेंस कई जगह फीका पड़ जाता है। फिल्म की कमियां फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी राइटिंग है। कर्तव्य बहुत सारे मुद्दों को छूती जरूर है, लेकिन किसी एक पर पूरी ताकत से चोट नहीं कर पाती। ऑनर किलिंग का दर्द हो, जातिगत राजनीति का डर या सिस्टम की सड़ांध, सब कुछ थोड़ा थोड़ा दिखता है लेकिन पूरी गहराई से नहीं। कई किरदार आधे अधूरे लगते हैं और कहानी कई बार पहले से देखी हुई सी महसूस होती है। फिल्म हर मुश्किल मोड़ पर रिस्क लेने के बजाय सुरक्षित रास्ता चुनती दिखती है, और यही इसकी धार को कमजोर कर देता है। फाइनल वर्डिक्ट, देखें या नहीं? कर्तव्य बुरी फिल्म बिल्कुल नहीं है। इसके पास जरूरी मुद्दे हैं, अच्छे कलाकार हैं और कुछ असरदार पल भी हैं। लेकिन यह हर बार उस मुकाम पर पहुंचकर रुक जाती है, जहां इसे और ज्यादा तीखा, गुस्से वाला और बेखौफ होना चाहिए था। सैफ अली खान की ईमानदार परफॉर्मेंस फिल्म को संभालने की पूरी कोशिश करती है, लेकिन कमजोर लेखन और सुरक्षित कहानी इसे ऊपर उठने नहीं देती। यह फिल्म कई जरूरी सवाल उठाती है, लेकिन जवाब देने से पहले ही धीरे से पीछे हट जाती है।

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