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Yorkshire boy Martin drives 1280 km to play cricket

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द न्यूयॉर्क टाइम्स8 मिनट पहले

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मार्टिन कहते हैं, ‘उम्र सिर्फ एक नंबर है। खेल के लिए जुनून हो तो इंसान कभी बूढ़ा नहीं होता।’- फाइल फोटो

कभी इंग्लैंड के लिए फुटबॉल वर्ल्ड कप खेलने वाला एक गोलकीपर अब 59 साल की उम्र में फिर से देश की जर्सी पहनने जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार वह फुटबॉल के गोलपोस्ट के सामने नहीं, बल्कि क्रिकेट की विकेट के पीछे नजर आएगा।

इंग्लैंड के पूर्व गोलकीपर नाइजल मार्टिन की यह कहानी बताती है कि खेल के प्रति जुनून उम्र का मोहताज नहीं होता। मार्टिन ने इंग्लैंड के क्रिस्टल पैलेस, लीड्स यूनाइटेड, एवर्टन जैसे बड़े क्लबों के लिए 666 मैच खेले। 1998 और 2002 फीफा वर्ल्ड कप में इंग्लैंड टीम का हिस्सा रहे और अपने दौर के पहले गोलकीपर बने, जिनकी ट्रांसफर फीस एक मिलियन पाउंड थी। लेकिन फुटबॉल के साथ-साथ क्रिकेट उनका पहला प्यार रहा है। कॉर्नवाल के छोटे से शहर सेंट ऑस्टेल में बड़े हुए मार्टिन बचपन से विकेटकीपर बनना चाहते थे। स्कूल में वह फुटबॉल के गोलपोस्ट के बजाय क्रिकेट की विकेट के पीछे ज्यादा खुश रहते थे। हालांकि फुटबॉल में उनका करियर तेजी से आगे बढ़ा और क्रिकेट पीछे छूट गया।

उस समय प्रोफेशनल फुटबॉल क्लब उन्हें क्रिकेट खेलने की इजाजत नहीं देते थे, क्योंकि चोट का खतरा रहता था। 2006 में फुटबॉल से रिटायर होने के बाद मार्टिन की जिंदगी में खालीपन आ गया। टखने में स्ट्रेस फ्रैक्चर के कारण उन्हें लगा था कि शायद अब कभी खेल नहीं पाएंगे। लेकिन कुछ साल बाद जब डॉक्टरों ने फिटनेस की अनुमति दी, तो उन्होंने फिर क्रिकेट का बल्ला और ग्लव्स उठा लिए। धीरे-धीरे वे यॉर्कशायर काउंटी टीम का बड़ा नाम बन गए। अब भी मार्टिन हर हफ्ते सैकड़ों किलोमीटर का सफर सिर्फ क्रिकेट खेलने के लिए करते हैं। वे यॉर्कशायर में क्लब मैच खेलते हैं और फिर करीब 1280 किमी ड्राइव कर कॉर्नवाल की ओवर-50 टीम में खेलने जाते हैं। उनकी मेहनत रंग लाई और अब इंग्लैंड की 60+ क्रिकेट टीम ‘लायंस’ में उनका चयन हो गया है। अगले हफ्ते वे स्कॉटलैंड के खिलाफ डेब्यू कर सकते हैं।

उनकी फिटनेस के पीछे बेटी का भी बड़ा हाथ है, जो पेशे से फिजियोथेरेपिस्ट हैं। क्रिकेट सीजन खत्म होने के बाद जब मार्टिन जिम छोड़ने की बात करते हैं, तो बेटी उन्हें फिर ट्रेनिंग पर भेज देती है। मार्टिन का सपना अब एक और वर्ल्ड कप खेलने का है। इस बार फुटबॉल नहीं, बल्कि सीनियर क्रिकेट वर्ल्ड कप। वे कहते हैं, ‘अगर मौका मिला तो इंग्लैंड के लिए फिर खेलना मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा।’ नाइजल मार्टिन की कहानी सिर्फ खेल की नहीं, बल्कि जुनून, फिटनेस और कभी हार न मानने की मिसाल है। उन्होंने साबित कर दिया कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती।

खेल के लिए जुनून हो तो इंसान बूढ़ा नहीं होता

मार्टिन कहते हैं, ‘उम्र सिर्फ एक नंबर है। खेल के लिए जुनून हो तो इंसान कभी बूढ़ा नहीं होता।’ वे मानते हैं कि गोलकीपिंग और विकेटकीपिंग में काफी समानता है। दोनों में तेज नजर, हाथों का तालमेल और डाइव लगाने की कला जरूरी होती है। यही वजह है कि फुटबॉल के अनुभव ने उन्हें क्रिकेट में भी मदद की।

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मार्टिन कहते हैं, ‘उम्र सिर्फ एक नंबर है। खेल के लिए जुनून हो तो इंसान कभी बूढ़ा नहीं होता।’- फाइल फोटो

कभी इंग्लैंड के लिए फुटबॉल वर्ल्ड कप खेलने वाला एक गोलकीपर अब 59 साल की उम्र में फिर से देश की जर्सी पहनने जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार वह फुटबॉल के गोलपोस्ट के सामने नहीं, बल्कि क्रिकेट की विकेट के पीछे नजर आएगा।

इंग्लैंड के पूर्व गोलकीपर नाइजल मार्टिन की यह कहानी बताती है कि खेल के प्रति जुनून उम्र का मोहताज नहीं होता। मार्टिन ने इंग्लैंड के क्रिस्टल पैलेस, लीड्स यूनाइटेड, एवर्टन जैसे बड़े क्लबों के लिए 666 मैच खेले। 1998 और 2002 फीफा वर्ल्ड कप में इंग्लैंड टीम का हिस्सा रहे और अपने दौर के पहले गोलकीपर बने, जिनकी ट्रांसफर फीस एक मिलियन पाउंड थी। लेकिन फुटबॉल के साथ-साथ क्रिकेट उनका पहला प्यार रहा है। कॉर्नवाल के छोटे से शहर सेंट ऑस्टेल में बड़े हुए मार्टिन बचपन से विकेटकीपर बनना चाहते थे। स्कूल में वह फुटबॉल के गोलपोस्ट के बजाय क्रिकेट की विकेट के पीछे ज्यादा खुश रहते थे। हालांकि फुटबॉल में उनका करियर तेजी से आगे बढ़ा और क्रिकेट पीछे छूट गया।

उस समय प्रोफेशनल फुटबॉल क्लब उन्हें क्रिकेट खेलने की इजाजत नहीं देते थे, क्योंकि चोट का खतरा रहता था। 2006 में फुटबॉल से रिटायर होने के बाद मार्टिन की जिंदगी में खालीपन आ गया। टखने में स्ट्रेस फ्रैक्चर के कारण उन्हें लगा था कि शायद अब कभी खेल नहीं पाएंगे। लेकिन कुछ साल बाद जब डॉक्टरों ने फिटनेस की अनुमति दी, तो उन्होंने फिर क्रिकेट का बल्ला और ग्लव्स उठा लिए। धीरे-धीरे वे यॉर्कशायर काउंटी टीम का बड़ा नाम बन गए। अब भी मार्टिन हर हफ्ते सैकड़ों किलोमीटर का सफर सिर्फ क्रिकेट खेलने के लिए करते हैं। वे यॉर्कशायर में क्लब मैच खेलते हैं और फिर करीब 1280 किमी ड्राइव कर कॉर्नवाल की ओवर-50 टीम में खेलने जाते हैं। उनकी मेहनत रंग लाई और अब इंग्लैंड की 60+ क्रिकेट टीम ‘लायंस’ में उनका चयन हो गया है। अगले हफ्ते वे स्कॉटलैंड के खिलाफ डेब्यू कर सकते हैं।

उनकी फिटनेस के पीछे बेटी का भी बड़ा हाथ है, जो पेशे से फिजियोथेरेपिस्ट हैं। क्रिकेट सीजन खत्म होने के बाद जब मार्टिन जिम छोड़ने की बात करते हैं, तो बेटी उन्हें फिर ट्रेनिंग पर भेज देती है। मार्टिन का सपना अब एक और वर्ल्ड कप खेलने का है। इस बार फुटबॉल नहीं, बल्कि सीनियर क्रिकेट वर्ल्ड कप। वे कहते हैं, ‘अगर मौका मिला तो इंग्लैंड के लिए फिर खेलना मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा।’ नाइजल मार्टिन की कहानी सिर्फ खेल की नहीं, बल्कि जुनून, फिटनेस और कभी हार न मानने की मिसाल है। उन्होंने साबित कर दिया कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती।

खेल के लिए जुनून हो तो इंसान बूढ़ा नहीं होता

मार्टिन कहते हैं, ‘उम्र सिर्फ एक नंबर है। खेल के लिए जुनून हो तो इंसान कभी बूढ़ा नहीं होता।’ वे मानते हैं कि गोलकीपिंग और विकेटकीपिंग में काफी समानता है। दोनों में तेज नजर, हाथों का तालमेल और डाइव लगाने की कला जरूरी होती है। यही वजह है कि फुटबॉल के अनुभव ने उन्हें क्रिकेट में भी मदद की।

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