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फीफा में दम दिखाएंगे भारतवंशी तहसीन:कतर की ओर से खेलेंगे मलयाली तहसीन मोहम्मद; फीफा के इतिहास में दूसरे भारतीय प्लेयर

फीफा में दम दिखाएंगे भारतवंशी तहसीन:कतर की ओर से खेलेंगे मलयाली तहसीन मोहम्मद; फीफा के इतिहास में दूसरे भारतीय प्लेयर

इस फीफा विश्व कप में भारत के लिए गर्व का क्षण आने वाला है। इतिहास में दूसरी बार ऐसा होने जा रहा है, जब भारतीय मूल का कोई खिलाड़ी विश्व कप के मैदान पर फुटबॉल खेलता नजर आएगा। यह इतिहास दोहराने जा रहे हैं 19 वर्षीय भारतवंशी तहसीन मोहम्मद जमशेद, जो कतर की ओर से मैदान पर उतरेंगे। इससे पहले 2006 के वर्ल्ड कप में आंध्र प्रदेश मूल के विकास धोरासू ने फ्रांस की टीम से खेलकर यह उपलब्धि हासिल की थी। तहसीन को फुटबॉल से लगाव कैसे हुआ और वे संघर्ष करते हुए शीर्ष तक कैसे पहुंचे, पढ़िए… तहसीन की फुटबॉल के प्रति दीवानगी कोई इत्तेफाक नहीं थी, बल्कि यह उन्हें विरासत में मिली थी। उनके पिता जमशेद केरल की कालीकट यूनिवर्सिटी के बेहतरीन फुटबॉलर थे, वे बड़े स्तर पर देश के लिए खेलना चाहते थे। लेकिन आर्थिक परिस्थितियों और भविष्य की चिंताओं के कारण उन्हें कतर में साधारण अकाउंटेंट की नौकरी करनी पड़ी। 2006 में कतर में तहसीन का जन्म हुआ तो पिता ने अपने अधूरे सपने को बेटे की आंखों में देखा। पढ़ाई के सख्त माहौल के बीच खेल के लिए समय निकालना बेहद मुश्किल था। पर, तहसीन ने ठान लिया था। जब बाकी बच्चे स्कूल की छुट्टियों में आराम करते थे, तब तहसीन अल सुबह ही ग्राउंड पर पहुंच जाते थे। वे चिलचिलाती धूप में भी दिनभर प्रैक्टिस करते थे। रात को पढ़ने बैठते थे। पिता द्वारा सिखाई गई फुटबॉल की बारीकियां और कड़े अनुशासन की बदौलत वे सबसे अलग बन पाए। दुनिया की सबसे आधुनिक व कठिन अकादमियों में शामिल कतर की एस्पायर फुटबॉल अकादमी में चुनिंदा खिलाड़ियों को ही एंट्री मिलती है। भारतीय मूल के लड़के के लिए स्थानीयव अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के बीच जगह बनाना संघर्ष था। शुरुआती दिनों में भाषा, संस्कृति और कठोर फिजिकल टेस्ट तहसीन के लिए चुनौती बने। कई साथी खिलाड़ियों का मनोबल टूट गया, पर तहसीन ने अपनी रफ्तार व ड्रिबलिंग को इतना निखारा कि स्पेनिश कोच जुलेन लोपेटेगुई भी प्रतिभा के कायल हो गए। उन्होंने कतर के दिग्गज खिलाड़ी सेबेस्टियन सोरिया को ड्रॉप कर तहसीन पर भरोसा जताया। यही तहसीन के संघर्ष की सबसे बड़ी जीत थी। तहसीन ने सीनियर कॅरियर की शुरुआत कतर स्टार्स लीग में अल दुहैल क्लब से की। वे कतर की अंडर-16 व अंडर-17 टीमों का हिस्सा भी रहे। अल दुहैल के लिए उनके प्रदर्शन ने कॅरियर को ऊंचाई दी और 19 साल में वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के पेशेवर खिलाड़ी बन गए। स्पेनिश फुटबॉल विश्लेषक और पूर्व प्लेयर अल्फोंसो पेरेज कहते हैं, तहसीन को मैदान पर देखना विजुअल ट्रीट है। लेफ्ट-विंगर के तौर पर उनके पास जो ‘रॉ-पेस’ (अंधाधुंध रफ्तार) है, वह उन्हें खतरनाक बनाती है। वे इसी तरह सीखते रहे, तो जल्द हम उन्हें बड़े यूरोपीय क्लब की जर्सी में देखेंगे।’ इन तीन फुटबॉलर्स का भी इंडिया कनेक्शन सरप्रीत सिंह (न्यूजीलैंड), निशान वेलुपिल्ले (ऑस्ट्रेलिया) और सैमुअल मुतुसामी (डीआर कांगो) भी वर्ल्ड कप में खेल सकते हैं। सरप्रीत पंजाब मूल के और बाकी दोनों का जुड़ाव तमिलनाडु से है।

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इस फीफा विश्व कप में भारत के लिए गर्व का क्षण आने वाला है। इतिहास में दूसरी बार ऐसा होने जा रहा है, जब भारतीय मूल का कोई खिलाड़ी विश्व कप के मैदान पर फुटबॉल खेलता नजर आएगा। यह इतिहास दोहराने जा रहे हैं 19 वर्षीय भारतवंशी तहसीन मोहम्मद जमशेद, जो कतर की ओर से मैदान पर उतरेंगे। इससे पहले 2006 के वर्ल्ड कप में आंध्र प्रदेश मूल के विकास धोरासू ने फ्रांस की टीम से खेलकर यह उपलब्धि हासिल की थी। तहसीन को फुटबॉल से लगाव कैसे हुआ और वे संघर्ष करते हुए शीर्ष तक कैसे पहुंचे, पढ़िए… तहसीन की फुटबॉल के प्रति दीवानगी कोई इत्तेफाक नहीं थी, बल्कि यह उन्हें विरासत में मिली थी। उनके पिता जमशेद केरल की कालीकट यूनिवर्सिटी के बेहतरीन फुटबॉलर थे, वे बड़े स्तर पर देश के लिए खेलना चाहते थे। लेकिन आर्थिक परिस्थितियों और भविष्य की चिंताओं के कारण उन्हें कतर में साधारण अकाउंटेंट की नौकरी करनी पड़ी। 2006 में कतर में तहसीन का जन्म हुआ तो पिता ने अपने अधूरे सपने को बेटे की आंखों में देखा। पढ़ाई के सख्त माहौल के बीच खेल के लिए समय निकालना बेहद मुश्किल था। पर, तहसीन ने ठान लिया था। जब बाकी बच्चे स्कूल की छुट्टियों में आराम करते थे, तब तहसीन अल सुबह ही ग्राउंड पर पहुंच जाते थे। वे चिलचिलाती धूप में भी दिनभर प्रैक्टिस करते थे। रात को पढ़ने बैठते थे। पिता द्वारा सिखाई गई फुटबॉल की बारीकियां और कड़े अनुशासन की बदौलत वे सबसे अलग बन पाए। दुनिया की सबसे आधुनिक व कठिन अकादमियों में शामिल कतर की एस्पायर फुटबॉल अकादमी में चुनिंदा खिलाड़ियों को ही एंट्री मिलती है। भारतीय मूल के लड़के के लिए स्थानीयव अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के बीच जगह बनाना संघर्ष था। शुरुआती दिनों में भाषा, संस्कृति और कठोर फिजिकल टेस्ट तहसीन के लिए चुनौती बने। कई साथी खिलाड़ियों का मनोबल टूट गया, पर तहसीन ने अपनी रफ्तार व ड्रिबलिंग को इतना निखारा कि स्पेनिश कोच जुलेन लोपेटेगुई भी प्रतिभा के कायल हो गए। उन्होंने कतर के दिग्गज खिलाड़ी सेबेस्टियन सोरिया को ड्रॉप कर तहसीन पर भरोसा जताया। यही तहसीन के संघर्ष की सबसे बड़ी जीत थी। तहसीन ने सीनियर कॅरियर की शुरुआत कतर स्टार्स लीग में अल दुहैल क्लब से की। वे कतर की अंडर-16 व अंडर-17 टीमों का हिस्सा भी रहे। अल दुहैल के लिए उनके प्रदर्शन ने कॅरियर को ऊंचाई दी और 19 साल में वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के पेशेवर खिलाड़ी बन गए। स्पेनिश फुटबॉल विश्लेषक और पूर्व प्लेयर अल्फोंसो पेरेज कहते हैं, तहसीन को मैदान पर देखना विजुअल ट्रीट है। लेफ्ट-विंगर के तौर पर उनके पास जो ‘रॉ-पेस’ (अंधाधुंध रफ्तार) है, वह उन्हें खतरनाक बनाती है। वे इसी तरह सीखते रहे, तो जल्द हम उन्हें बड़े यूरोपीय क्लब की जर्सी में देखेंगे।’ इन तीन फुटबॉलर्स का भी इंडिया कनेक्शन सरप्रीत सिंह (न्यूजीलैंड), निशान वेलुपिल्ले (ऑस्ट्रेलिया) और सैमुअल मुतुसामी (डीआर कांगो) भी वर्ल्ड कप में खेल सकते हैं। सरप्रीत पंजाब मूल के और बाकी दोनों का जुड़ाव तमिलनाडु से है।

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