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Donald Trump Tariff Collection Crisis; IEEPA Law Vs US Supreme Court

Donald Trump Tariff Collection Crisis; IEEPA Law Vs US Supreme Court

वॉशिंगटन डीसी52 मिनट पहले

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अमेरिकी सरकार आज से राष्ट्रपति ट्रम्प की तरफ से लगाए गए इमरजेंसी टैरिफ की वसूली बंद कर देगी। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 3 दिन पहले इन टैरिफ को गैरकानूनी बताया गया था।

अमेरिकी US कस्टम एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CPB) ने एक बयान में कहा-

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1977 के कानून इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए गए टैरिफ की वसूली मंगलवार रात 12 बजकर 1 मिनट (भारतीय समयानुसार सुबह 10:30 बजे) से बंद कर दी जाएगी। एजेंसी ने इम्पोर्ट्स को निर्देश दिया है कि इन टैरिफ से जुड़े सभी कोड उसके कार्गो सिस्टम से हटा दिए जाएंगे।

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पेन व्हार्टन बजट मॉडल के अर्थशास्त्रियों के मुताबिक कोर्ट से इस फैसले से अमेरिकी सरकार को 175 अरब डॉलर (15.75 लाख करोड़ रुपए) से ज्यादा की कमाई वापस करनी पड़ सकती है।

रॉयटर्स के मुताबिक, IEEPA के तहत लगाए गए टैरिफ से अमेरिका की हर दिन 50 करोड़ डॉलर (4,500 करोड़ रुपए) से ज्यादा की कमाई हो रही थी। अब इन्हें रद्द किए जाने के बाद कंपनियां रिफंड की मांग कर सकती हैं।

ट्रम्प बोले- सुप्रीम कोर्ट ने मुझे पहले से ज्यादा अधिकार दे दिए

राष्ट्रपति ट्रम्प ने ग्लोबल टैरिफ को रद्द किए जाने के बाद सोमवार को कहा कि इस फैसले से उल्टा उनकी ताकत और बढ़ गई है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने अनजाने में उन्हें पहले से ज्यादा अधिकार दे दिए हैं।

ट्रम्प ने कहा कि वह कुछ समय तक ‘सुप्रीम कोर्ट’ स्माल लेट में लिखेंगे क्योंकि उन्हें इस फैसले से सम्मान नहीं रहा। उन्होंने फैसले को बेवकूफाना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांटने वाला बताया।

इसके बावजूद ट्रम्प का कहना है कि इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि वह दूसरे कानूनों के तहत टैरिफ लगाने की अपनी ताकत का और ज्यादा इस्तेमाल कर सकते हैं। कोर्ट ने बाकी बचे टैरिफ को कानूनी तौर पर मजबूत कर दिया है और अब वह उन्हें और ज्यादा सख्त तरीके से लागू कर सकते हैं।

ट्रम्प ने यह भी कहा कि वह लाइसेंस जैसे तरीकों का इस्तेमाल करके देशों के खिलाफ कड़े कदम उठा सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि कोर्ट ने बाकी सभी टैरिफ को मंजूरी दे दी है और ऐसे टैरिफ की संख्या काफी ज्यादा है।

वसूला गया टैरिफ वापस होगा या नहीं इसकी जानकारी नहीं

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के तीन दिन से ज्यादा समय बाद लागू किया जा रहा है। एजेंसी ने यह नहीं बताया कि इन तीन दिनों में टैरिफ क्यों वसूले जाते रहे। यह भी साफ नहीं किया गया है कि जिन लोगों से पैसा लिया गया है, उन्हें वह वापस मिलेगा या नहीं।

यह आदेश सिर्फ IEEPA कानून के तहत लगाए गए टैरिफ पर लागू होगा। जबकि नेशनल सिक्टोरिटी के नाम पर ‘सेक्शन 232’ के तहत और अनफेयर ट्रेड केस के ‘सेक्शन 301’ के तहत लगाए गए टैरिफ जारी रहेंगे और उन पर इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा।

CBP ने कहा है कि वह व्यापार से जुड़े लोगों को आगे की जानकारी आधिकारिक संदेशों के जरिए देती रहेगी।

अमेरिकी कानून के सेक्शन 232 और सेक्शन 301 को जानिए

अमेरिका के व्यापार कानून में सेक्शन 232 और सेक्शन 301 ऐसे नियम हैं, जिनके जरिए सरकार दूसरे देशों से आने वाले सामान पर टैरिफ लगा सकती है।

सेक्शन 232- यह 1962 के कानून का हिस्सा है। अगर अमेरिकी सरकार को लगे कि किसी देश से ज्यादा सामान आने से देश की राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा हो सकता है, तो राष्ट्रपति उस सामान पर टैरिफ लगा सकते हैं। मतलब, अगर इम्पोर्ट से सेना, डिफेंस इंडस्ट्री या जरूरी घरेलू इंडस्ट्री कमजोर पड़ते दिखें, तो इस नियम का इस्तेमाल किया जाता है।

ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में स्टील और एल्युमिनियम पर इसी सेक्शन के तहत टैरिफ लगाए थे। उनका कहना था कि ज्यादा इम्पोर्ट से अमेरिकी इंडस्ट्री कमजोर हो रही है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है।

सेक्शन 301- यह 1974 के कानून का हिस्सा है। अगर अमेरिका को लगे कि कोई देश उसके साथ गलत तरीके से व्यापार कर रहा है, जैसे नियमों का उल्लंघन, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) की चोरी या भेदभाव तो वह उस देश के सामान पर टैरिफ लगा सकता है।

चीन के खिलाफ लगाए गए कई टैरिफ इसी सेक्शन 301 के तहत लगाए गए थे।

ट्रम्प ने दुनिया भर पर 15% ग्लोबल टैरिफ लगाया

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को ने 6-3 के बहुमत से फैसला दिया कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने IEEPA कानून का इस्तेमाल करते हुए अपनी हद से ज्यादा ताकत ले ली थी। कोर्ट ने साफ कहा कि इस कानून में राष्ट्रपति को इतने बड़े स्तर पर इंपोर्ट पर टैरिफ लगाने की इजाजत नहीं है।

कोर्ट का फैसला आते ही कुछ ही घंटों में ट्रम्प ने नए ग्लोबल टैरिफ ऐलान कर दिया। उन्होंने कहा कि मंगलवार से अमेरिका में आने वाले हर सामान पर एक जैसा टैरिफ लगेगा। पहले यह 10% बताया गया, लेकिन बाद में अचानक इसे बढ़ाकर 15% कर दिया गया। इस अचानक बदलाव से कुछ अधिकारी भी हैरान रह गए।

यह नया टैरिफ अमेरिकी व्यापार कानून के सेक्शन 122 के तहत लगाया गया है। इस नियम के तहत सरकार 15% तक टैरिफ लगा सकती है, लेकिन अगर इसे 150 दिनों से ज्यादा जारी रखना है तो कांग्रेस (संसद) की मंजूरी लेनी पड़ेगी।

भारत भी 15% वाले टैरिफ के दायरे में

इस फैसले का असर भारत पर भी पड़ेगा। पिछले एक साल में अमेरिका ने भारतीय सामान पर लगने वाला टैक्स कई बार बदला है। पहले करीब 26% था, फिर बढ़ाकर 50% तक कर दिया गया। उसके बाद इसे घटाकर 18% किया गया और अब कोर्ट के फैसले के बाद यह 15% वाले ग्लोबल टैरिफ में आ गया है।

अब आगे भारतीय सामान पर असली असर क्या होगा, यह कुछ बातों पर टिका है। जैसे कि क्या अमेरिका की संसद 150 दिन की इस व्यवस्था को आगे बढ़ाती है या नहीं, भारत और अमेरिका के बीच जो अस्थायी व्यापार समझौता चल रहा है वह कब लागू होता है।

इसके अलावा क्या अमेरिकी सरकार आगे कोई दूसरा कानूनी रास्ता अपनाती है या नहीं। मतलब साफ है कि अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है आगे और बदलाव हो सकते हैं।

1974 के कानून का हिस्सा है सेक्शन 122

सेक्शन 122 अमेरिका के एक कानून का हिस्सा है, जिसे ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 कहा जाता है। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि अगर देश को अचानक व्यापार घाटे या आर्थिक संकट का खतरा हो, तो वे तुरंत आयात पर टैरिफ लगा सकते हैं।

इसके तहत राष्ट्रपति बिना लंबी जांच प्रक्रिया के अस्थायी तौर पर टैरिफ लगा सकते हैं। आमतौर पर यह टैरिफ 150 दिनों तक लागू रह सकता है। इस दौरान सरकार स्थिति की समीक्षा करती है और आगे का फैसला लेती है।

NBC न्यूज के मुताबिक दुनिया के सभी व्यापारिक साझेदार देशों पर 15% का एक जैसा ग्लोबल टैरिफ लगाने का मतलब होगा कि जिन देशों पर ज्यादा टैरिफ लगा है वह खुद घट जाएगा।

कुछ उत्पादों को छूट दी गई है, जैसे कुछ कृषि उत्पाद (बीफ, टमाटर, संतरा), महत्वपूर्ण खनिज, दवाइयां, कुछ इलेक्ट्रॉनिक्स और पैसेंजर वाहन। ट्रम्प प्रशासन ने कहा कि यह टैरिफ पुराने वाले की जगह लेगा और वे अधिक पैसा कमाने की कोशिश जारी रखेंगे।

निक्सन ने 55 साल पहले लगाया था 10% ग्लोबल टैरिफ

साल 1971 में अमेरिका और दुनिया के बीच व्यापार और भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट) में भारी असंतुलन हो गया था। अमेरिका लगातार ज्यादा आयात कर रहा था और निर्यात कम कर पा रहा था, जिससे डॉलर पर दबाव बढ़ रहा था।

इसके बाद निक्सन ने दुनियाभर के देशों पर 10% का ग्लोबल टैरिफ लगा दिया था। इसके बाद यह महसूस किया गया कि भविष्य में अगर ऐसी आर्थिक आपात स्थिति आती है, तो राष्ट्रपति के पास ऐसी चीजों से निपटने के लिए कानूनी अधिकार होने चाहिए। इसी मकसद से 1974 में “ट्रेड एक्ट 1974” पारित किया गया था।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक सेक्शन 122 का पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसलिए यह भी साफ नहीं है कि अगर इसे अदालत में चुनौती दी गई, तो अदालतें इसकी व्याख्या किस तरह करेंगी।

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यह खबर भी पढ़ें…

टैरिफ में बदलाव से भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर बैठक टली:इसमें भारत पर 18% टैरिफ लगना था, अब ट्रम्प ने खुद ही ग्लोबल टैरिफ 15% किया

भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते (ITA) को लेकर होने वाली बैठक टल गई है। यह जानकारी न्यूज एजेंसी PTI ने सरकारी सूत्रों के हवाले से दी। बैठक 23-26 फरवरी को वॉशिंगटन में होनी थी। पढ़ें पूरी खबर…

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रॉयटर्स के मुताबिक, IEEPA के तहत लगाए गए टैरिफ से अमेरिका की हर दिन 50 करोड़ डॉलर (4,500 करोड़ रुपए) से ज्यादा की कमाई हो रही थी। अब इन्हें रद्द किए जाने के बाद कंपनियां रिफंड की मांग कर सकती हैं।

ट्रम्प बोले- सुप्रीम कोर्ट ने मुझे पहले से ज्यादा अधिकार दे दिए

राष्ट्रपति ट्रम्प ने ग्लोबल टैरिफ को रद्द किए जाने के बाद सोमवार को कहा कि इस फैसले से उल्टा उनकी ताकत और बढ़ गई है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने अनजाने में उन्हें पहले से ज्यादा अधिकार दे दिए हैं।

ट्रम्प ने कहा कि वह कुछ समय तक ‘सुप्रीम कोर्ट’ स्माल लेट में लिखेंगे क्योंकि उन्हें इस फैसले से सम्मान नहीं रहा। उन्होंने फैसले को बेवकूफाना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांटने वाला बताया।

इसके बावजूद ट्रम्प का कहना है कि इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि वह दूसरे कानूनों के तहत टैरिफ लगाने की अपनी ताकत का और ज्यादा इस्तेमाल कर सकते हैं। कोर्ट ने बाकी बचे टैरिफ को कानूनी तौर पर मजबूत कर दिया है और अब वह उन्हें और ज्यादा सख्त तरीके से लागू कर सकते हैं।

ट्रम्प ने यह भी कहा कि वह लाइसेंस जैसे तरीकों का इस्तेमाल करके देशों के खिलाफ कड़े कदम उठा सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि कोर्ट ने बाकी सभी टैरिफ को मंजूरी दे दी है और ऐसे टैरिफ की संख्या काफी ज्यादा है।

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यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के तीन दिन से ज्यादा समय बाद लागू किया जा रहा है। एजेंसी ने यह नहीं बताया कि इन तीन दिनों में टैरिफ क्यों वसूले जाते रहे। यह भी साफ नहीं किया गया है कि जिन लोगों से पैसा लिया गया है, उन्हें वह वापस मिलेगा या नहीं।

यह आदेश सिर्फ IEEPA कानून के तहत लगाए गए टैरिफ पर लागू होगा। जबकि नेशनल सिक्टोरिटी के नाम पर ‘सेक्शन 232’ के तहत और अनफेयर ट्रेड केस के ‘सेक्शन 301’ के तहत लगाए गए टैरिफ जारी रहेंगे और उन पर इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा।

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सेक्शन 232- यह 1962 के कानून का हिस्सा है। अगर अमेरिकी सरकार को लगे कि किसी देश से ज्यादा सामान आने से देश की राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा हो सकता है, तो राष्ट्रपति उस सामान पर टैरिफ लगा सकते हैं। मतलब, अगर इम्पोर्ट से सेना, डिफेंस इंडस्ट्री या जरूरी घरेलू इंडस्ट्री कमजोर पड़ते दिखें, तो इस नियम का इस्तेमाल किया जाता है।

ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में स्टील और एल्युमिनियम पर इसी सेक्शन के तहत टैरिफ लगाए थे। उनका कहना था कि ज्यादा इम्पोर्ट से अमेरिकी इंडस्ट्री कमजोर हो रही है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है।

सेक्शन 301- यह 1974 के कानून का हिस्सा है। अगर अमेरिका को लगे कि कोई देश उसके साथ गलत तरीके से व्यापार कर रहा है, जैसे नियमों का उल्लंघन, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) की चोरी या भेदभाव तो वह उस देश के सामान पर टैरिफ लगा सकता है।

चीन के खिलाफ लगाए गए कई टैरिफ इसी सेक्शन 301 के तहत लगाए गए थे।

ट्रम्प ने दुनिया भर पर 15% ग्लोबल टैरिफ लगाया

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को ने 6-3 के बहुमत से फैसला दिया कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने IEEPA कानून का इस्तेमाल करते हुए अपनी हद से ज्यादा ताकत ले ली थी। कोर्ट ने साफ कहा कि इस कानून में राष्ट्रपति को इतने बड़े स्तर पर इंपोर्ट पर टैरिफ लगाने की इजाजत नहीं है।

कोर्ट का फैसला आते ही कुछ ही घंटों में ट्रम्प ने नए ग्लोबल टैरिफ ऐलान कर दिया। उन्होंने कहा कि मंगलवार से अमेरिका में आने वाले हर सामान पर एक जैसा टैरिफ लगेगा। पहले यह 10% बताया गया, लेकिन बाद में अचानक इसे बढ़ाकर 15% कर दिया गया। इस अचानक बदलाव से कुछ अधिकारी भी हैरान रह गए।

यह नया टैरिफ अमेरिकी व्यापार कानून के सेक्शन 122 के तहत लगाया गया है। इस नियम के तहत सरकार 15% तक टैरिफ लगा सकती है, लेकिन अगर इसे 150 दिनों से ज्यादा जारी रखना है तो कांग्रेस (संसद) की मंजूरी लेनी पड़ेगी।

भारत भी 15% वाले टैरिफ के दायरे में

इस फैसले का असर भारत पर भी पड़ेगा। पिछले एक साल में अमेरिका ने भारतीय सामान पर लगने वाला टैक्स कई बार बदला है। पहले करीब 26% था, फिर बढ़ाकर 50% तक कर दिया गया। उसके बाद इसे घटाकर 18% किया गया और अब कोर्ट के फैसले के बाद यह 15% वाले ग्लोबल टैरिफ में आ गया है।

अब आगे भारतीय सामान पर असली असर क्या होगा, यह कुछ बातों पर टिका है। जैसे कि क्या अमेरिका की संसद 150 दिन की इस व्यवस्था को आगे बढ़ाती है या नहीं, भारत और अमेरिका के बीच जो अस्थायी व्यापार समझौता चल रहा है वह कब लागू होता है।

इसके अलावा क्या अमेरिकी सरकार आगे कोई दूसरा कानूनी रास्ता अपनाती है या नहीं। मतलब साफ है कि अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है आगे और बदलाव हो सकते हैं।

1974 के कानून का हिस्सा है सेक्शन 122

सेक्शन 122 अमेरिका के एक कानून का हिस्सा है, जिसे ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 कहा जाता है। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि अगर देश को अचानक व्यापार घाटे या आर्थिक संकट का खतरा हो, तो वे तुरंत आयात पर टैरिफ लगा सकते हैं।

इसके तहत राष्ट्रपति बिना लंबी जांच प्रक्रिया के अस्थायी तौर पर टैरिफ लगा सकते हैं। आमतौर पर यह टैरिफ 150 दिनों तक लागू रह सकता है। इस दौरान सरकार स्थिति की समीक्षा करती है और आगे का फैसला लेती है।

NBC न्यूज के मुताबिक दुनिया के सभी व्यापारिक साझेदार देशों पर 15% का एक जैसा ग्लोबल टैरिफ लगाने का मतलब होगा कि जिन देशों पर ज्यादा टैरिफ लगा है वह खुद घट जाएगा।

कुछ उत्पादों को छूट दी गई है, जैसे कुछ कृषि उत्पाद (बीफ, टमाटर, संतरा), महत्वपूर्ण खनिज, दवाइयां, कुछ इलेक्ट्रॉनिक्स और पैसेंजर वाहन। ट्रम्प प्रशासन ने कहा कि यह टैरिफ पुराने वाले की जगह लेगा और वे अधिक पैसा कमाने की कोशिश जारी रखेंगे।

निक्सन ने 55 साल पहले लगाया था 10% ग्लोबल टैरिफ

साल 1971 में अमेरिका और दुनिया के बीच व्यापार और भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट) में भारी असंतुलन हो गया था। अमेरिका लगातार ज्यादा आयात कर रहा था और निर्यात कम कर पा रहा था, जिससे डॉलर पर दबाव बढ़ रहा था।

इसके बाद निक्सन ने दुनियाभर के देशों पर 10% का ग्लोबल टैरिफ लगा दिया था। इसके बाद यह महसूस किया गया कि भविष्य में अगर ऐसी आर्थिक आपात स्थिति आती है, तो राष्ट्रपति के पास ऐसी चीजों से निपटने के लिए कानूनी अधिकार होने चाहिए। इसी मकसद से 1974 में “ट्रेड एक्ट 1974” पारित किया गया था।

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक सेक्शन 122 का पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसलिए यह भी साफ नहीं है कि अगर इसे अदालत में चुनौती दी गई, तो अदालतें इसकी व्याख्या किस तरह करेंगी।

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