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धुरंधर जैसी फिल्मों पर राजनीतिक दबाव दिखता है:नफीसा बोलीं- युवा बदलते सिनेमा की राजनीति समझें, नासर बोले- ब्रेकअप जिंदगी का अंत नहीं

धुरंधर जैसी फिल्मों पर राजनीतिक दबाव दिखता है:नफीसा बोलीं- युवा बदलते सिनेमा की राजनीति समझें, नासर बोले- ब्रेकअप जिंदगी का अंत नहीं

क्या ब्रेकअप के बाद जिंदगी खत्म हो जाती है? क्या हिंसक रिश्ते को सिर्फ इसलिए निभाते रहना चाहिए क्योंकि वह रिश्ता है? ऐसे सवालों पर अभिनेता नासर और अभिनेत्री व सामाजिक कार्यकर्ता नफीसा अली ने फिल्म ‘मैक्स, मिन और म्याउजाकी’ के प्रमोशन के दौरान दैनिक भास्कर से बात की। नासर ने कहा कि रिश्ता टूटने का मतलब जिंदगी खत्म होना नहीं है। कमिटमेंट की अहमियत समझनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर थेरेपी लेने में झिझक नहीं करनी चाहिए। नफीसा अली ने युवाओं को खुद से प्यार करना सीखने, हिंसक रिश्तों से बाहर निकलने और हर परिवार के लिए हेल्थ व लाइफ इंश्योरेंस की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज फिल्मों में रोमांस और संगीत की जगह एक्शन और हिंसा हावी है, जबकि ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों पर राजनीतिक दबाव का असर भी साफ दिखाई देता है, जिसे युवाओं को समझना चाहिए। सवाल: नासर सर, जब आपने फिल्म ‘मैक्स, मिन और म्याउजाकी’ की कहानी सुनी तो ऐसी कौन-सी बात थी जिसने आपको तुरंत हां कहने पर मजबूर कर दिया? जवाब/नासर: कहानी सुनकर लगा कि यह किसी फिल्म की नहीं, बल्कि उन लोगों की कहानी है जिन्हें मैं अपनी जिंदगी में जानता हूं। हर किरदार असली लगा। कहीं भी बनावटीपन या ड्रामा नहीं था। सब कुछ जिंदगी की तरह स्वाभाविक था। मुझे लगा कि मैं खुद को और अपने बेटे की झलक भी इस कहानी में देख सकता हूं। इसलिए मैंने तुरंत फिल्म के लिए हां कह दी। सवाल: नफीसा जी, आपने यह फिल्म क्यों चुनी? जवाब/नफीसा अली: मेरी पहली प्रतिक्रिया थी कि मैं फिल्म नहीं कर पाऊंगी, क्योंकि उस समय मैं कैंसर से लड़ रही थी। लेकिन पद्मकुमार ने मुझ पर भरोसा जताया और पूरी कहानी सुनाई। कहानी सुनने के बाद लगा कि यह आज की सच्चाई है। भारत की ज्यादातर आबादी 28 साल से कम उम्र की है। युवाओं को यह समझना जरूरी है कि उनके ऊपर माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति भी जिम्मेदारी है। माता-पिता पूरी जिंदगी बच्चों के लिए सब कुछ करते हैं, लेकिन आज कई बच्चे पढ़ाई, नौकरी और दूसरे कारणों से दूर चले जाते हैं। कई बार उनके पास माता-पिता के लिए समय भी नहीं होता। यह फिल्म दिल, आत्मा और एक-दूसरे की परवाह करने की कहानी है। मुझे लगा कि यह मेरे जीवन की भी कहानी हो सकती है। इसलिए मैंने यह फिल्म की। सवाल: आज की युवा पीढ़ी में रिश्ते जल्दी बनते हैं और जल्दी टूट भी जाते हैं। कम्युनिकेशन गैप, धैर्य की कमी और बदलती सोच को आप किस तरह देखते हैं? युवाओं को क्या सलाह देना चाहेंगे? जवाब/नफीसा अली: मुझे अपना बचपन याद आता है। मैंने भी बहुत प्यार किया है और कई बार दिल टूटा है। लेकिन युवाओं से कहना चाहूंगी कि अगर दिल टूट जाए तो यह मत सोचिए कि जिंदगी खत्म हो गई है या दोबारा प्यार नहीं मिलेगा। ब्रेकअप की वजह से खुद को खत्म मत कीजिए। नशे की तरफ मत जाइए, अपनी सेहत खराब मत कीजिए और परिवार से दूर मत होइए। जिंदगी बहुत खूबसूरत है और हर इंसान के लिए सही साथी जरूर होता है। सबसे पहले खुद से प्यार करना सीखिए। अगर आप खुद से प्यार करेंगे तो किसी के जाने से जिंदगी नहीं रुकेगी। जो लोग आपका दिल तोड़कर चले जाते हैं, उन्हें जाने दीजिए। आप खुद अपने लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। सवाल: नासर सर, आज के रिश्तों और पहले के रिश्तों में आपको क्या सबसे बड़ा फर्क दिखाई देता है? जवाब/नासर: मैं नफीसा जी की बात से सहमत हूं। हर दौर में रिश्तों का स्वरूप बदलता रहा है। 1960 के दशक की प्रेम कहानियों और आज की फिल्मों में बड़ा अंतर है। पहले महिलाओं को जिस तरह दिखाया जाता था, अब उनकी भूमिका ज्यादा मजबूत और स्वतंत्र है। यह अच्छा बदलाव है। आज की युवा पीढ़ी के पास पहले से ज्यादा आजादी है। लेकिन अब ब्रेकअप को बहुत हल्के में लिया जाने लगा है। पहले उसका दर्द लंबे समय तक महसूस होता था, लेकिन अब कई लोग जल्दी आगे बढ़ जाते हैं। आगे बढ़ना गलत नहीं है, लेकिन बार-बार रिश्ते बनाना और तोड़ना आदत बन जाए तो यह चिंता की बात है। रिश्ता खत्म हो जाए तो भी जिंदगी नहीं रुकती। अपने सपनों और करियर पर ध्यान दीजिए, लेकिन कमिटमेंट की अहमियत कभी मत भूलिए। सवाल: आज फिल्मों में रोमांस और संगीत की जगह एक्शन और हिंसा ज्यादा देखने को मिल रही है। आपको क्या लगता है, इसकी वजह क्या है? जवाब/नफीसा अली: हमारी फिल्मों की पहचान कभी प्यार, रिश्ते और संगीत थी। लेकिन अब एक्शन और हिंसा का असर ज्यादा दिखाई देता है। लोग बार-बार ऐसी फिल्में देख रहे हैं, लेकिन सवाल है कि हिंसा को आखिर कितनी बार देखा जा सकता है? मैं फिल्म बनाने वालों को पूरी तरह दोष नहीं देती, लेकिन समाज के प्रति उनका भी दायित्व है। उन्हें सोचना चाहिए कि वे दर्शकों तक कैसा संदेश पहुंचा रहे हैं। सवाल: क्या आपको लगता है कि फिल्मों और समाज के माहौल का एक-दूसरे पर असर पड़ता है? जवाब/नफीसा अली: बिल्कुल पड़ता है। आज देश में कई तरह की राजनीतिक सोच और प्रभाव फिल्मों तक पहुंच रहे हैं। ऐसे माहौल में युवाओं के लिए यह समझना जरूरी है कि उनके दिमाग पर किस तरह का असर डाला जा रहा है। हर इंसान को अपने विवेक से सोचना चाहिए। किसी भी मानसिक प्रभाव या भटकाव से बचना जरूरी है। यह भी समझना चाहिए कि हमारी सोच किस दिशा में जा रही है और वह सही है या नहीं। सवाल: रिश्ते टूटने के बाद बढ़ती घरेलू हिंसा और आक्रामक व्यवहार पर आप क्या कहना चाहेंगी? जवाब/नफीसा अली: वरिष्ठ होने के नाते मैं यह जरूर कहना चाहूंगी कि हमारे देश में शादी और रिश्तों के नाम पर बंद दरवाजों के पीछे बहुत हिंसा हो रही है। सरकार ने कई हेल्पलाइन और सहायता व्यवस्थाएं शुरू की हैं। अगर कोई व्यक्ति रिश्ते में हिंसा झेल रहा है, तो उसे चुप नहीं रहना चाहिए। उसे अपनी आवाज उठानी चाहिए। जो इंसान आपके साथ हिंसक व्यवहार करता है, वह आपके साथ रहने के लायक नहीं है। ऐसे रिश्ते से बाहर निकलना ही बेहतर है। किसी को भी हिंसा सहने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। सवाल: नासर सर, फिल्म में पिता और बेटे का रिश्ता बहुत भावुक है। क्या इसने आपको अपने पिता की याद दिलाई? जवाब/नासर: बिल्कुल। मैं कभी अभिनेता नहीं बनना चाहता था। मैं साधारण परिवार से था और उस समय मेरे लिए छोटी-सी नौकरी ही सबसे बड़ा सपना थी। लेकिन मेरे पिता चाहते थे कि मैं अभिनय करूं। आज मैं जो कुछ भी हूं, उसमें उनका सबसे बड़ा योगदान है। एक बार मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने मुझे अभिनेता बनने के लिए क्यों कहा था? उन्होंने हंसते हुए कहा कि उन्हें खुद भी नहीं पता। अगर वे मुझे कोई और काम करने को कहते, तो मैं वही पूरी ईमानदारी और लगन से करता। सवाल: क्या फिल्म में पिता-पुत्र का रिश्ता निभाते समय आपको अपने बेटे की भी याद आई? जवाब/नासर: हां। फिल्म के कई दृश्यों में मुझे अपना बेटा दिखाई देता था। इसलिए यह रिश्ता निभाना मेरे लिए अभिनय नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी को फिर से जीने जैसा था। सवाल: नफीसा जी, आपने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ाई लड़ी। ऐसे समय में परिवार का साथ कितना जरूरी होता है? जवाब/नफीसा अली: परिवार का साथ बहुत जरूरी होता है। मैं सभी लोगों से कहना चाहूंगी कि हर व्यक्ति के पास हेल्थ इंश्योरेंस और लाइफ इंश्योरेंस जरूर होना चाहिए। हर महीने थोड़ी-सी बचत से परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। जिंदगी का कोई भरोसा नहीं होता। कब कौन-सी मुश्किल आ जाए, कोई नहीं जानता। हमारे देश में इलाज बहुत महंगा है। सरकार मदद करती है, लेकिन कई बार वह पर्याप्त नहीं होती। इसलिए हर परिवार को पहले से तैयारी रखनी चाहिए, ताकि बीमारी आने पर आर्थिक परेशानी सबसे बड़ी चिंता न बने। सवाल: नासर सर, आपने दोस्ती और थेरेपी की भी बात की। इसे आप कितना जरूरी मानते हैं? जवाब/नासर: जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, एक सच्चे दोस्त की अहमियत बढ़ जाती है। ऐसा दोस्त, जिसके सामने आप बिना डर के अपने मन की हर बात कह सकें, चाहे वह रिश्तों की परेशानी हो, परिवार का तनाव हो या कोई और तकलीफ। लेकिन जरूरत पड़ने पर थेरेपी भी बहुत जरूरी है। मेरी पत्नी मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिस्ट) हैं, इसलिए मैं इसे अच्छी तरह समझता हूं। मानसिक परेशानी हो तो किसी विशेषज्ञ से मदद लेने में बिल्कुल झिझक नहीं होनी चाहिए। यह कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है।

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क्या ब्रेकअप के बाद जिंदगी खत्म हो जाती है? क्या हिंसक रिश्ते को सिर्फ इसलिए निभाते रहना चाहिए क्योंकि वह रिश्ता है? ऐसे सवालों पर अभिनेता नासर और अभिनेत्री व सामाजिक कार्यकर्ता नफीसा अली ने फिल्म ‘मैक्स, मिन और म्याउजाकी’ के प्रमोशन के दौरान दैनिक भास्कर से बात की। नासर ने कहा कि रिश्ता टूटने का मतलब जिंदगी खत्म होना नहीं है। कमिटमेंट की अहमियत समझनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर थेरेपी लेने में झिझक नहीं करनी चाहिए। नफीसा अली ने युवाओं को खुद से प्यार करना सीखने, हिंसक रिश्तों से बाहर निकलने और हर परिवार के लिए हेल्थ व लाइफ इंश्योरेंस की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज फिल्मों में रोमांस और संगीत की जगह एक्शन और हिंसा हावी है, जबकि ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों पर राजनीतिक दबाव का असर भी साफ दिखाई देता है, जिसे युवाओं को समझना चाहिए। सवाल: नासर सर, जब आपने फिल्म ‘मैक्स, मिन और म्याउजाकी’ की कहानी सुनी तो ऐसी कौन-सी बात थी जिसने आपको तुरंत हां कहने पर मजबूर कर दिया? जवाब/नासर: कहानी सुनकर लगा कि यह किसी फिल्म की नहीं, बल्कि उन लोगों की कहानी है जिन्हें मैं अपनी जिंदगी में जानता हूं। हर किरदार असली लगा। कहीं भी बनावटीपन या ड्रामा नहीं था। सब कुछ जिंदगी की तरह स्वाभाविक था। मुझे लगा कि मैं खुद को और अपने बेटे की झलक भी इस कहानी में देख सकता हूं। इसलिए मैंने तुरंत फिल्म के लिए हां कह दी। सवाल: नफीसा जी, आपने यह फिल्म क्यों चुनी? जवाब/नफीसा अली: मेरी पहली प्रतिक्रिया थी कि मैं फिल्म नहीं कर पाऊंगी, क्योंकि उस समय मैं कैंसर से लड़ रही थी। लेकिन पद्मकुमार ने मुझ पर भरोसा जताया और पूरी कहानी सुनाई। कहानी सुनने के बाद लगा कि यह आज की सच्चाई है। भारत की ज्यादातर आबादी 28 साल से कम उम्र की है। युवाओं को यह समझना जरूरी है कि उनके ऊपर माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति भी जिम्मेदारी है। माता-पिता पूरी जिंदगी बच्चों के लिए सब कुछ करते हैं, लेकिन आज कई बच्चे पढ़ाई, नौकरी और दूसरे कारणों से दूर चले जाते हैं। कई बार उनके पास माता-पिता के लिए समय भी नहीं होता। यह फिल्म दिल, आत्मा और एक-दूसरे की परवाह करने की कहानी है। मुझे लगा कि यह मेरे जीवन की भी कहानी हो सकती है। इसलिए मैंने यह फिल्म की। सवाल: आज की युवा पीढ़ी में रिश्ते जल्दी बनते हैं और जल्दी टूट भी जाते हैं। कम्युनिकेशन गैप, धैर्य की कमी और बदलती सोच को आप किस तरह देखते हैं? युवाओं को क्या सलाह देना चाहेंगे? जवाब/नफीसा अली: मुझे अपना बचपन याद आता है। मैंने भी बहुत प्यार किया है और कई बार दिल टूटा है। लेकिन युवाओं से कहना चाहूंगी कि अगर दिल टूट जाए तो यह मत सोचिए कि जिंदगी खत्म हो गई है या दोबारा प्यार नहीं मिलेगा। ब्रेकअप की वजह से खुद को खत्म मत कीजिए। नशे की तरफ मत जाइए, अपनी सेहत खराब मत कीजिए और परिवार से दूर मत होइए। जिंदगी बहुत खूबसूरत है और हर इंसान के लिए सही साथी जरूर होता है। सबसे पहले खुद से प्यार करना सीखिए। अगर आप खुद से प्यार करेंगे तो किसी के जाने से जिंदगी नहीं रुकेगी। जो लोग आपका दिल तोड़कर चले जाते हैं, उन्हें जाने दीजिए। आप खुद अपने लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। सवाल: नासर सर, आज के रिश्तों और पहले के रिश्तों में आपको क्या सबसे बड़ा फर्क दिखाई देता है? जवाब/नासर: मैं नफीसा जी की बात से सहमत हूं। हर दौर में रिश्तों का स्वरूप बदलता रहा है। 1960 के दशक की प्रेम कहानियों और आज की फिल्मों में बड़ा अंतर है। पहले महिलाओं को जिस तरह दिखाया जाता था, अब उनकी भूमिका ज्यादा मजबूत और स्वतंत्र है। यह अच्छा बदलाव है। आज की युवा पीढ़ी के पास पहले से ज्यादा आजादी है। लेकिन अब ब्रेकअप को बहुत हल्के में लिया जाने लगा है। पहले उसका दर्द लंबे समय तक महसूस होता था, लेकिन अब कई लोग जल्दी आगे बढ़ जाते हैं। आगे बढ़ना गलत नहीं है, लेकिन बार-बार रिश्ते बनाना और तोड़ना आदत बन जाए तो यह चिंता की बात है। रिश्ता खत्म हो जाए तो भी जिंदगी नहीं रुकती। अपने सपनों और करियर पर ध्यान दीजिए, लेकिन कमिटमेंट की अहमियत कभी मत भूलिए। सवाल: आज फिल्मों में रोमांस और संगीत की जगह एक्शन और हिंसा ज्यादा देखने को मिल रही है। आपको क्या लगता है, इसकी वजह क्या है? जवाब/नफीसा अली: हमारी फिल्मों की पहचान कभी प्यार, रिश्ते और संगीत थी। लेकिन अब एक्शन और हिंसा का असर ज्यादा दिखाई देता है। लोग बार-बार ऐसी फिल्में देख रहे हैं, लेकिन सवाल है कि हिंसा को आखिर कितनी बार देखा जा सकता है? मैं फिल्म बनाने वालों को पूरी तरह दोष नहीं देती, लेकिन समाज के प्रति उनका भी दायित्व है। उन्हें सोचना चाहिए कि वे दर्शकों तक कैसा संदेश पहुंचा रहे हैं। सवाल: क्या आपको लगता है कि फिल्मों और समाज के माहौल का एक-दूसरे पर असर पड़ता है? जवाब/नफीसा अली: बिल्कुल पड़ता है। आज देश में कई तरह की राजनीतिक सोच और प्रभाव फिल्मों तक पहुंच रहे हैं। ऐसे माहौल में युवाओं के लिए यह समझना जरूरी है कि उनके दिमाग पर किस तरह का असर डाला जा रहा है। हर इंसान को अपने विवेक से सोचना चाहिए। किसी भी मानसिक प्रभाव या भटकाव से बचना जरूरी है। यह भी समझना चाहिए कि हमारी सोच किस दिशा में जा रही है और वह सही है या नहीं। सवाल: रिश्ते टूटने के बाद बढ़ती घरेलू हिंसा और आक्रामक व्यवहार पर आप क्या कहना चाहेंगी? जवाब/नफीसा अली: वरिष्ठ होने के नाते मैं यह जरूर कहना चाहूंगी कि हमारे देश में शादी और रिश्तों के नाम पर बंद दरवाजों के पीछे बहुत हिंसा हो रही है। सरकार ने कई हेल्पलाइन और सहायता व्यवस्थाएं शुरू की हैं। अगर कोई व्यक्ति रिश्ते में हिंसा झेल रहा है, तो उसे चुप नहीं रहना चाहिए। उसे अपनी आवाज उठानी चाहिए। जो इंसान आपके साथ हिंसक व्यवहार करता है, वह आपके साथ रहने के लायक नहीं है। ऐसे रिश्ते से बाहर निकलना ही बेहतर है। किसी को भी हिंसा सहने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। सवाल: नासर सर, फिल्म में पिता और बेटे का रिश्ता बहुत भावुक है। क्या इसने आपको अपने पिता की याद दिलाई? जवाब/नासर: बिल्कुल। मैं कभी अभिनेता नहीं बनना चाहता था। मैं साधारण परिवार से था और उस समय मेरे लिए छोटी-सी नौकरी ही सबसे बड़ा सपना थी। लेकिन मेरे पिता चाहते थे कि मैं अभिनय करूं। आज मैं जो कुछ भी हूं, उसमें उनका सबसे बड़ा योगदान है। एक बार मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने मुझे अभिनेता बनने के लिए क्यों कहा था? उन्होंने हंसते हुए कहा कि उन्हें खुद भी नहीं पता। अगर वे मुझे कोई और काम करने को कहते, तो मैं वही पूरी ईमानदारी और लगन से करता। सवाल: क्या फिल्म में पिता-पुत्र का रिश्ता निभाते समय आपको अपने बेटे की भी याद आई? जवाब/नासर: हां। फिल्म के कई दृश्यों में मुझे अपना बेटा दिखाई देता था। इसलिए यह रिश्ता निभाना मेरे लिए अभिनय नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी को फिर से जीने जैसा था। सवाल: नफीसा जी, आपने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ाई लड़ी। ऐसे समय में परिवार का साथ कितना जरूरी होता है? जवाब/नफीसा अली: परिवार का साथ बहुत जरूरी होता है। मैं सभी लोगों से कहना चाहूंगी कि हर व्यक्ति के पास हेल्थ इंश्योरेंस और लाइफ इंश्योरेंस जरूर होना चाहिए। हर महीने थोड़ी-सी बचत से परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। जिंदगी का कोई भरोसा नहीं होता। कब कौन-सी मुश्किल आ जाए, कोई नहीं जानता। हमारे देश में इलाज बहुत महंगा है। सरकार मदद करती है, लेकिन कई बार वह पर्याप्त नहीं होती। इसलिए हर परिवार को पहले से तैयारी रखनी चाहिए, ताकि बीमारी आने पर आर्थिक परेशानी सबसे बड़ी चिंता न बने। सवाल: नासर सर, आपने दोस्ती और थेरेपी की भी बात की। इसे आप कितना जरूरी मानते हैं? जवाब/नासर: जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, एक सच्चे दोस्त की अहमियत बढ़ जाती है। ऐसा दोस्त, जिसके सामने आप बिना डर के अपने मन की हर बात कह सकें, चाहे वह रिश्तों की परेशानी हो, परिवार का तनाव हो या कोई और तकलीफ। लेकिन जरूरत पड़ने पर थेरेपी भी बहुत जरूरी है। मेरी पत्नी मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिस्ट) हैं, इसलिए मैं इसे अच्छी तरह समझता हूं। मानसिक परेशानी हो तो किसी विशेषज्ञ से मदद लेने में बिल्कुल झिझक नहीं होनी चाहिए। यह कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है।

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