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Skyroot Vikram-1 Launch | Sriharikota Space Mission Update

Skyroot Vikram-1 Launch | Sriharikota Space Mission Update

6 मिनट पहले

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भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 लॉन्चपैड पर लान्चिंग के लिए तैयार।

हैदराबाद की स्काईरूट एयरोस्पेस आज शनिवार 18 जुलाई को भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च करेगी। यह लॉन्चिंग आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से सुबह 11:30 बजे होगी। कंपनी ने 2022 में विक्रम-S सबऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया था, जो 89.5 km की ऊंचाई तक गया था। अब विक्रम-1 450 km की पृथ्वी की निचली कक्षा तक पेलोड भेजेगा।

सोने के कलाम, साराभाई और सीवी रमन भी जाएंगे

इस लॉन्चिंग को ‘मिशन आगमन’ नाम दिया गया है। इसके तहत विक्रम-1 रॉकेट अपने साथ टेक्नोलॉजी से लेकर कला से जुड़े पेलोड्स अंतरिक्ष में ले जा रहा है:

कॉमर्शियल और टेक्नोलॉजी पेलोड्स:

  • ग्रह स्पेस का टेक्नोलॉजी पेलोड।
  • कॉस्मोसर्व स्पेस का पेलोड।
  • डीक्यूब्ड का स्पेस रिसर्च से जुड़ा पेलोड।
  • खुद स्काईरूट एयरोस्पेस का अपना इन-हाउस स्कोप पेलोड।

18 कैरेट सोने से बना आर्ट पीस भी स्पेस में जाएगा

कॉस्मोस डायमंड्स की कलाकृति “कॉस्मिक ब्लूम” और एक खास माइक्रो-आर्ट पीस भी रॉकेट में भेजा जा रहा है। यह माइक्रो-आर्ट पीस 18 कैरेट सोने से बना छोटा सा रॉकेट है। इस पर वैज्ञानिक सर सी वी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. कलाम की सूक्ष्म मूर्तियां उकेरी गई हैं।

हल्के कार्बन-कंपोजिट से बना है पूरा रॉकेट

विक्रम-1 पूरी तरह से हल्के और मजबूत कार्बन-कंपोजिट स्ट्रक्चर से बना पहला ऑर्बिटल रॉकेट है। कार्बन फाइबर स्टील की तुलना में पांच गुना हल्का होता है। इससे रॉकेट का वजन कम हो जाता है, जिससे इसकी ईंधन दक्षता बढ़ जाती है। रॉकेट को ऊर्जा देने के लिए इसमें तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल दिया गया है।

1. तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज:

इसे आप रॉकेट के नीचे लगे तीन बेहद ताकतवर ‘बूस्टर्स’ की तरह समझ सकते हैं, जिनमें ठोस ईंधन जैसे बारूद की तरह का ठोस केमिकल भरा होता है.

रॉकेट को जमीन से उठाकर आसमान की तरफ धकेलने के लिए शुरुआत में बहुत भारी ताकत की जरूरत होती है। ये तीनों सॉलिड स्टेज एक-एक करके जलते हैं और रॉकेट को शुरुआती धक्का देकर अंतरिक्ष की सीमा लो अर्थ ऑर्बिट के पास पहुंचा देते हैं।

2. लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल

यह रॉकेट के ऊपरी हिस्से में लगा एक बेहद बारीक और स्मार्ट तरल ईंधन वाला छोटा इंजन होता है। जब रॉकेट अंतरिक्ष में पहुंच जाता है, तो वहां ठोस ईंधन काम नहीं आता क्योंकि उसे अपनी मर्जी से ऑन या ऑफ नहीं किया जा सकता। यहां ‘लिक्विड मॉड्यूल’ काम आता है।

यह अंतरिक्ष में सैटेलाइट को सही दिशा देने, रॉकेट की रफ्तार कम-ज्यादा करने और सैटेलाइट को उसकी तय की गई कक्षा में ‘एडजस्ट’ यानी स्थापित करने का काम करता है।

अब 5 जरूरी सवालों के जवाब…

सवाल 1: ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ की शुरुआत कब और किस उद्देश्य से हुई थी?

जवाब: स्काईरूट की शुरुआत करीब 8 साल पहले 2018 में हुई थी। इसे शुरू करने का मुख्य उद्देश्य भारत में ही बेहद किफायती और भरोसेमंद रॉकेट्स का निर्माण करना है, ताकि दुनिया भर के सैटेलाइट ऑपरेटर्स को ऑन-डिमांड और बजट-फ्रेंडली लॉन्चिंग सॉल्यूशंस दिए जा सकें।

सवाल 2: इस रॉकेट का नाम ‘विक्रम-1’ क्यों रखा गया है और इसका क्या महत्व है?

जवाब: इस रॉकेट का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में ‘विक्रम-1’ रखा गया है। डॉ. साराभाई ने ही देश के स्पेस सेक्टर की मजबूत नींव रखी थी। स्काईरूट अपने सभी रॉकेट्स के नाम उनके सम्मान में इसी सीरीज पर रखती है। साल 2022 में लॉन्च किया गया पहला सबऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-एस’ भी इसी सम्मान श्रृंखला का हिस्सा था।

सवाल 3: इस लॉन्चिंग से भारत के स्पेस सेक्टर को क्या फायदे होंगे?

जवाब: यह लॉन्चिंग भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए गेम चेंजर हो सकती है:

  • एकाधिकार खत्म होगा: अब तक सैटेलाइट लॉन्च करने का काम केवल सरकारी एजेंसी ‘इसरो’ ही करती थी, लेकिन अब प्राइवेट कंपनियां भी इसमें हिस्सेदार बन रही हैं।
  • ग्लोबल बिजनेस: स्काईरूट जैसी घरेलू प्राइवेट कंपनियों के आने से विदेशी सैटेलाइट कंपनियों को भारत में बेहद सस्ते, भरोसेमंद और ऑन-डिमांड लॉन्चिंग विकल्प मिलेंगे।
  • आर्थिक विकास: इससे देश की स्पेस इकोनॉमी मजबूत होगी। नए स्टार्टअप्स को बढ़ावा मिलेगा और स्पेस सेक्टर में बड़े पैमाने पर निवेश और रोजगार के मौके पैदा होंगे।

सवाल 4: स्काईरूट के फाउंडर्स कौन हैं और उनका क्या कहना है?

जवाब: स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना पवन कुमार चंदना (फाउंडर और सीईओ) और नागा भरत डाका (को-फाउंडर और सीओओ) ने मिलकर की है।

सीईओ पवन कुमार चंदना ने कहा कि यह हमारी पहली टेस्ट फ्लाइट है और इससे हमें अंतरिक्ष की कक्षा में रॉकेट के व्यवहार का बेहद कीमती डेटा मिलेगा।

सीओओ नागा भरत डाका ने कहा कि हमारा और हमारी पूरी टीम का आठ वर्षों का कठोर प्रयास आज इस ऐतिहासिक मील के पत्थर के रूप में साकार हो रहा है।

सवाल 5: साल 2022 में लॉन्च हुए ‘विक्रम-एस’ और इस नए ‘विक्रम-1’ रॉकेट में क्या अंतर है?

जवाब: इन दोनों रॉकेट्स में तकनीक और क्षमता के स्तर पर बड़ा अंतर है:

  • विक्रम-एस: यह साल 2022 में लॉन्च हुआ देश का पहला प्राइवेट सबऑर्बिटल रॉकेट था। यह केवल 89.5 किमी की ऊंचाई तक गया और वापस आ गया। यह पृथ्वी की कक्षा के चक्कर लगाने के लिए नहीं बना था, केवल टेस्टिंग के लिए था।
  • विक्रम-1: यह एक ‘ऑर्बिटल-क्लास’ रॉकेट है। इसका काम सैटेलाइट्स को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करना है। यह 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर जाकर करीब 350 किलोग्राम वजनी पेलोड्स को कक्षा में स्थापित करने की ताकत रखता है।

विक्रम S और विक्रम-1 में अंतर

विशेषता विक्रम-एस (2022) विक्रम-1 (2026)
मिशन का प्रकार सबऑर्बिटल ऑर्बिटल
अधिकतम ऊंचाई/कक्षा 89.5 किलोमीटर 450 किलोमीटर (LEO)
वजन क्षमता (पेलोड) केवल टेस्ट पेलोड 350 किलोग्राम तक
मुख्य संरचना सिंगल-स्टेज 3 सॉलिड स्टेज + लिक्विड मॉड्यूल
मटेरियल सामान्य कंपोजिट पूर्ण कार्बन-कंपोजिट

नॉलेज पार्ट: क्या होता है लो अर्थ ऑर्बिट

यह पृथ्वी की सबसे निचली कक्षा होती है जो जमीन से लगभग 160 से 2,000 किमी की ऊंचाई पर स्थित होती है। ज्यादातर कॉमर्शियल और मौसम संबंधी सैटेलाइट इसी ऑर्बिट में चक्कर लगाते हैं। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन भी इसी ऑर्बिट में 450 किमी की ऊंचाई पर स्थित है।

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भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 लॉन्चपैड पर लान्चिंग के लिए तैयार।

हैदराबाद की स्काईरूट एयरोस्पेस आज शनिवार 18 जुलाई को भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च करेगी। यह लॉन्चिंग आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से सुबह 11:30 बजे होगी। कंपनी ने 2022 में विक्रम-S सबऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया था, जो 89.5 km की ऊंचाई तक गया था। अब विक्रम-1 450 km की पृथ्वी की निचली कक्षा तक पेलोड भेजेगा।

सोने के कलाम, साराभाई और सीवी रमन भी जाएंगे

इस लॉन्चिंग को ‘मिशन आगमन’ नाम दिया गया है। इसके तहत विक्रम-1 रॉकेट अपने साथ टेक्नोलॉजी से लेकर कला से जुड़े पेलोड्स अंतरिक्ष में ले जा रहा है:

कॉमर्शियल और टेक्नोलॉजी पेलोड्स:

  • ग्रह स्पेस का टेक्नोलॉजी पेलोड।
  • कॉस्मोसर्व स्पेस का पेलोड।
  • डीक्यूब्ड का स्पेस रिसर्च से जुड़ा पेलोड।
  • खुद स्काईरूट एयरोस्पेस का अपना इन-हाउस स्कोप पेलोड।

18 कैरेट सोने से बना आर्ट पीस भी स्पेस में जाएगा

कॉस्मोस डायमंड्स की कलाकृति “कॉस्मिक ब्लूम” और एक खास माइक्रो-आर्ट पीस भी रॉकेट में भेजा जा रहा है। यह माइक्रो-आर्ट पीस 18 कैरेट सोने से बना छोटा सा रॉकेट है। इस पर वैज्ञानिक सर सी वी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. कलाम की सूक्ष्म मूर्तियां उकेरी गई हैं।

हल्के कार्बन-कंपोजिट से बना है पूरा रॉकेट

विक्रम-1 पूरी तरह से हल्के और मजबूत कार्बन-कंपोजिट स्ट्रक्चर से बना पहला ऑर्बिटल रॉकेट है। कार्बन फाइबर स्टील की तुलना में पांच गुना हल्का होता है। इससे रॉकेट का वजन कम हो जाता है, जिससे इसकी ईंधन दक्षता बढ़ जाती है। रॉकेट को ऊर्जा देने के लिए इसमें तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज और एक लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल दिया गया है।

1. तीन सॉलिड-फ्यूल स्टेज:

इसे आप रॉकेट के नीचे लगे तीन बेहद ताकतवर ‘बूस्टर्स’ की तरह समझ सकते हैं, जिनमें ठोस ईंधन जैसे बारूद की तरह का ठोस केमिकल भरा होता है.

रॉकेट को जमीन से उठाकर आसमान की तरफ धकेलने के लिए शुरुआत में बहुत भारी ताकत की जरूरत होती है। ये तीनों सॉलिड स्टेज एक-एक करके जलते हैं और रॉकेट को शुरुआती धक्का देकर अंतरिक्ष की सीमा लो अर्थ ऑर्बिट के पास पहुंचा देते हैं।

2. लिक्विड ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल

यह रॉकेट के ऊपरी हिस्से में लगा एक बेहद बारीक और स्मार्ट तरल ईंधन वाला छोटा इंजन होता है। जब रॉकेट अंतरिक्ष में पहुंच जाता है, तो वहां ठोस ईंधन काम नहीं आता क्योंकि उसे अपनी मर्जी से ऑन या ऑफ नहीं किया जा सकता। यहां ‘लिक्विड मॉड्यूल’ काम आता है।

यह अंतरिक्ष में सैटेलाइट को सही दिशा देने, रॉकेट की रफ्तार कम-ज्यादा करने और सैटेलाइट को उसकी तय की गई कक्षा में ‘एडजस्ट’ यानी स्थापित करने का काम करता है।

अब 5 जरूरी सवालों के जवाब…

सवाल 1: ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ की शुरुआत कब और किस उद्देश्य से हुई थी?

जवाब: स्काईरूट की शुरुआत करीब 8 साल पहले 2018 में हुई थी। इसे शुरू करने का मुख्य उद्देश्य भारत में ही बेहद किफायती और भरोसेमंद रॉकेट्स का निर्माण करना है, ताकि दुनिया भर के सैटेलाइट ऑपरेटर्स को ऑन-डिमांड और बजट-फ्रेंडली लॉन्चिंग सॉल्यूशंस दिए जा सकें।

सवाल 2: इस रॉकेट का नाम ‘विक्रम-1’ क्यों रखा गया है और इसका क्या महत्व है?

जवाब: इस रॉकेट का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में ‘विक्रम-1’ रखा गया है। डॉ. साराभाई ने ही देश के स्पेस सेक्टर की मजबूत नींव रखी थी। स्काईरूट अपने सभी रॉकेट्स के नाम उनके सम्मान में इसी सीरीज पर रखती है। साल 2022 में लॉन्च किया गया पहला सबऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-एस’ भी इसी सम्मान श्रृंखला का हिस्सा था।

सवाल 3: इस लॉन्चिंग से भारत के स्पेस सेक्टर को क्या फायदे होंगे?

जवाब: यह लॉन्चिंग भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए गेम चेंजर हो सकती है:

  • एकाधिकार खत्म होगा: अब तक सैटेलाइट लॉन्च करने का काम केवल सरकारी एजेंसी ‘इसरो’ ही करती थी, लेकिन अब प्राइवेट कंपनियां भी इसमें हिस्सेदार बन रही हैं।
  • ग्लोबल बिजनेस: स्काईरूट जैसी घरेलू प्राइवेट कंपनियों के आने से विदेशी सैटेलाइट कंपनियों को भारत में बेहद सस्ते, भरोसेमंद और ऑन-डिमांड लॉन्चिंग विकल्प मिलेंगे।
  • आर्थिक विकास: इससे देश की स्पेस इकोनॉमी मजबूत होगी। नए स्टार्टअप्स को बढ़ावा मिलेगा और स्पेस सेक्टर में बड़े पैमाने पर निवेश और रोजगार के मौके पैदा होंगे।

सवाल 4: स्काईरूट के फाउंडर्स कौन हैं और उनका क्या कहना है?

जवाब: स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना पवन कुमार चंदना (फाउंडर और सीईओ) और नागा भरत डाका (को-फाउंडर और सीओओ) ने मिलकर की है।

सीईओ पवन कुमार चंदना ने कहा कि यह हमारी पहली टेस्ट फ्लाइट है और इससे हमें अंतरिक्ष की कक्षा में रॉकेट के व्यवहार का बेहद कीमती डेटा मिलेगा।

सीओओ नागा भरत डाका ने कहा कि हमारा और हमारी पूरी टीम का आठ वर्षों का कठोर प्रयास आज इस ऐतिहासिक मील के पत्थर के रूप में साकार हो रहा है।

सवाल 5: साल 2022 में लॉन्च हुए ‘विक्रम-एस’ और इस नए ‘विक्रम-1’ रॉकेट में क्या अंतर है?

जवाब: इन दोनों रॉकेट्स में तकनीक और क्षमता के स्तर पर बड़ा अंतर है:

  • विक्रम-एस: यह साल 2022 में लॉन्च हुआ देश का पहला प्राइवेट सबऑर्बिटल रॉकेट था। यह केवल 89.5 किमी की ऊंचाई तक गया और वापस आ गया। यह पृथ्वी की कक्षा के चक्कर लगाने के लिए नहीं बना था, केवल टेस्टिंग के लिए था।
  • विक्रम-1: यह एक ‘ऑर्बिटल-क्लास’ रॉकेट है। इसका काम सैटेलाइट्स को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करना है। यह 450 किलोमीटर की ऊंचाई पर जाकर करीब 350 किलोग्राम वजनी पेलोड्स को कक्षा में स्थापित करने की ताकत रखता है।

विक्रम S और विक्रम-1 में अंतर

विशेषता विक्रम-एस (2022) विक्रम-1 (2026)
मिशन का प्रकार सबऑर्बिटल ऑर्बिटल
अधिकतम ऊंचाई/कक्षा 89.5 किलोमीटर 450 किलोमीटर (LEO)
वजन क्षमता (पेलोड) केवल टेस्ट पेलोड 350 किलोग्राम तक
मुख्य संरचना सिंगल-स्टेज 3 सॉलिड स्टेज + लिक्विड मॉड्यूल
मटेरियल सामान्य कंपोजिट पूर्ण कार्बन-कंपोजिट

नॉलेज पार्ट: क्या होता है लो अर्थ ऑर्बिट

यह पृथ्वी की सबसे निचली कक्षा होती है जो जमीन से लगभग 160 से 2,000 किमी की ऊंचाई पर स्थित होती है। ज्यादातर कॉमर्शियल और मौसम संबंधी सैटेलाइट इसी ऑर्बिट में चक्कर लगाते हैं। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन भी इसी ऑर्बिट में 450 किमी की ऊंचाई पर स्थित है।

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