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Kishore Kumar Birth Anniversary; Car Buried Story

Kishore Kumar Birth Anniversary; Car Buried Story

1 घंटे पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र

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किशोर कुमार का बचपन का नाम आभास कुमार गांगुली था।

हिंदी सिनेमा के सबसे बहुमुखी कलाकारों में किशोर कुमार का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। उन्होंने अभिनय, संगीत, निर्देशन और फिल्म निर्माण किया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी आवाज बनी। चार दशक तक उन्होंने मोहम्मद रफी, मुकेश और मन्ना डे जैसे दिग्गजों के बीच अपनी अलग जगह बनाई।

जितने शानदार वे गायक थे, उतनी ही रहस्यमयी उनकी निजी जिंदगी थी। कोई उन्हें सनकी कहता था, कोई जीनियस, तो कोई उनकी संवेदनशीलता का कायल था। उनके व्यक्तित्व के कई रंग थे, जिन्हें सिर्फ करीबी लोग ही समझ पाए।

4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में जन्मे किशोर कुमार की 97वीं बर्थ एनिवर्सरी पर पढ़िए उनकी जिंदगी के कुछ दिलचस्प किस्से, जो बताते हैं कि पर्दे पर लोगों को हंसाने वाला यह कलाकार असल जिंदगी में कितना अलग था।

बचपन की एक चोट और उससे जुड़ा उनकी आवाज का सबसे चर्चित किस्सा

किशोर कुमार की आवाज दुनिया की सबसे अलग आवाजों में गिनी जाती है। उनके सुरों के खुरदरेपन, लचक और सहजता से जुड़ा एक पारिवारिक संस्मरण चर्चित है। बड़े भाई अशोक कुमार ने कई इंटरव्यू में बताया था कि बचपन में किशोर के पैर में गहरी चोट लगी थी। दर्द इतना था कि वे घंटों रोते रहे। परिवार का मानना था कि लंबे समय तक रोने से उनकी आवाज का टेक्सचर बदल गया और वही आगे चलकर उनकी पहचान बना।

कॉलेज की कैंटीन का उधार, जिसने ‘पांच रुपैया बारह आना’ को जन्म दिया

इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान किशोर कुमार की शरारतें मशहूर थीं। वे अक्सर कैंटीन में उधार पर पोहा और जलेबी खाते थे। धीरे-धीरे उधार पांच रुपया बारह आना हो गया। कैंटीन मालिक पैसे मांगता, तो किशोर कुमार गाकर उसे टालने की कोशिश करते। वर्षों बाद फिल्म चलती का नाम गाड़ी के ‘पांच रुपैया बारह आना’ गीत ने धूम मचाई। माना जाता है कि इस गाने की प्रेरणा उसी उधार से मिली थी।

मुंबई आए तो अभिनेता नहीं, सिर्फ गायक बनने का सपना था

किशोर कुमार अभिनेता नहीं, गायक बनना चाहते थे। वे मुंबई अपने आदर्श के.एल. सहगल की तरह गायक बनने आए थे। बड़े भाई अशोक कुमार के स्टार होने के कारण उन्हें अभिनय के प्रस्ताव मिलने लगे। शुरुआती दिनों में उन्होंने परिवार और निर्माताओं की इच्छा पर कई फिल्में कीं। बाद में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने उन्हें सफल अभिनेता बनाया, लेकिन उन्होंने माना कि उनका पहला प्यार हमेशा गायकी ही रही।

‘आनंद’ पहले किशोर कुमार को ऑफर हुई थी, लेकिन एक गलतफहमी ने बदल दिया हिंदी सिनेमा का इतिहास

1971 में रिलीज हुई ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म आनंद भारतीय सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती है। टाइटल रोल के लिए राजेश खन्ना पहली पसंद नहीं थे। गीतकार-लेखक गुलजार ने अपनी संस्मरण पुस्तक Actually… I Met Them में लिखा है कि ऋषिकेश मुखर्जी इस फिल्म में किशोर कुमार को लेना चाहते थे। अमित कुमार ने भी एक इंटरव्यू में कहा कि उनके पिता को सबसे पहले इस फिल्म का प्रस्ताव मिला था।

इस किस्से का सबसे चर्चित हिस्सा एक गलतफहमी से जुड़ा है। बताया जाता है कि एक बंगाली आयोजक से भुगतान विवाद के बाद किशोर कुमार ने दरबान से कह रखा था कि वह व्यक्ति दोबारा आए तो उसे अंदर न आने दिया जाए। संयोग से ऋषिकेश मुखर्जी कहानी सुनाने पहुंचे, तो दरबान ने उन्हें भी वही व्यक्ति समझकर लौटा दिया।

इससे ऋषिकेश मुखर्जी आहत हो गए और उन्होंने किशोर कुमार के साथ फिल्म बनाने का विचार छोड़ दिया। बाद में आनंद का रोल राजेश खन्ना को मिला, जो उनके करियर की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल हुई।

हालांकि, इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है। गुलजार ने अपनी किताब में लिखा है कि फिल्म शुरू होने से कुछ दिन पहले किशोर कुमार सिर मुंडवाकर ऋषिकेश मुखर्जी के सामने पहुंचे और मजाक में गाने लगे, “अब क्या करोगे, ऋषि?” इसके बाद फिल्म के लिए नए अभिनेता की तलाश शुरू हुई। इसलिए फिल्म छूटने की असली वजह को लेकर आज भी अलग-अलग दावे किए जाते हैं।

किशोर कुमार, के.एल. सहगल के गानों से प्रभावित थे और उन्हीं की तरह गायक बनना चाहते थे। सहगल से मिलने की चाह में 18 साल की उम्र में मुंबई पहुंचे, लेकिन उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पाई।

किशोर कुमार, के.एल. सहगल के गानों से प्रभावित थे और उन्हीं की तरह गायक बनना चाहते थे। सहगल से मिलने की चाह में 18 साल की उम्र में मुंबई पहुंचे, लेकिन उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पाई।

मुंबई में भी मजाक नहीं छोड़ा, बना लिया अपना रेट कार्ड

संगीत के प्रति जितना जुनून था, हास्यबोध भी उतना ही गजब का था। फिल्म पत्रकारों और संस्मरणों के मुताबिक, शुरुआती दिनों में दोस्तों की महफिल में किशोर कुमार मजाक में अपना रेट कार्ड बताते थे। कहते थे- अगर अशोक कुमार का गाना सुनना है तो 25 पैसे, किसी और का 50 पैसे और के.एल. सहगल का गीत सुनना है तो एक रुपया देना पड़ेगा।

के.एल. सहगल उनके सबसे बड़े आदर्श थे और वे उन्हें अपना गुरु मानते थे। इसलिए एचएमवी ने जब सहगल के गीतों का एल्बम रिकॉर्ड करने का प्रस्ताव दिया, तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि लोग यह न कहें कि उन्होंने अपने गुरु से बेहतर गाया।

शास्त्रीय संगीत नहीं सीखा, फिर भी बने भारतीय सिनेमा की सबसे अलग आवाज

किशोर कुमार ने कभी शास्त्रीय संगीत की औपचारिक शिक्षा नहीं ली। इसके बावजूद उन्होंने सुरों पर ऐसी पकड़ बनाई, जो आज भी संगीत विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय है। सचिन देव बर्मन ने उनकी प्राकृतिक प्रतिभा पहचानी और मौलिक शैली बनाए रखने की सलाह दी।

बाद में आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी और बप्पी लाहिड़ी समेत लगभग हर बड़े संगीतकार ने उनकी नैसर्गिक गायकी का भरपूर इस्तेमाल किया। चार राष्ट्रीय और आठ फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने वाले किशोर कुमार बिना औपचारिक प्रशिक्षण के भी गायकी की परिभाषा बदलने वाले गायक माने जाते हैं।

सचिन देव बर्मन ने पहचानी आवाज, फिर शुरू हुआ सुनहरे दौर का सफर

गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे किशोर कुमार को शुरुआती दौर में पहचान बनाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। उस समय फिल्म इंडस्ट्री पर मोहम्मद रफी, तलत महमूद और मुकेश का दबदबा था। इसी बीच एस.डी. बर्मन ने उनकी नैसर्गिक गायकी पहचानी।

आर.डी. बर्मन और फिल्म इतिहासकारों के मुताबिक, एस.डी. बर्मन उन्हें किसी की नकल न करने और मौलिक शैली में गाने की सलाह देते थे। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। बाद में मुनिमजी, पेइंग गेस्ट, नौ दो ग्यारह, गाइड, आराधना समेत कई फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा का सबसे लोकप्रिय पार्श्व गायक बना दिया।

किशोर दा लता मंगेशकर का बहुत सम्मान करते थे। जब भी वे उनके साथ कोई गाना गाते थे, तो प्रोड्यूसर से कहते थे कि लता दीदी को जितना पैसा दिया गया है, उन्हें उससे एक रुपए कम दिया जाए।

किशोर दा लता मंगेशकर का बहुत सम्मान करते थे। जब भी वे उनके साथ कोई गाना गाते थे, तो प्रोड्यूसर से कहते थे कि लता दीदी को जितना पैसा दिया गया है, उन्हें उससे एक रुपए कम दिया जाए।

लता मंगेशकर के साथ बनाई सबसे सफल जोड़ी, सम्मान ऐसा कि अपनी फीस भी कम कर ली

किशोर कुमार और लता मंगेशकर की जोड़ी ने हिंदी फिल्म संगीत को सैकड़ों यादगार गीत दिए। दोनों के बीच गहरा पेशेवर सम्मान था। फिल्म पत्रकारों और संगीत जगत में प्रचलित एक किस्से के मुताबिक, रिकॉर्डिंग से पहले किशोर कुमार कई बार निर्माताओं से पूछते थे कि लता मंगेशकर को कितना पारिश्रमिक दिया जा रहा है। अगर उनकी फीस ज्यादा होती, तो वे मजाक में कहते थे, “मुझे लता जी से एक रुपया कम दे दीजिए।”

एक रिकॉर्डिंग के दौरान ली गई मोहम्मद रफी और किशोर दा की तस्वीर।

एक रिकॉर्डिंग के दौरान ली गई मोहम्मद रफी और किशोर दा की तस्वीर।

जब पता चला कि रफी से ज्यादा फीस मिली है, तो निर्माता से बोले- पहले उनका भुगतान बढ़ाइए

मोहम्मद रफी और किशोर कुमार को अक्सर प्रतिद्वंद्वी माना गया, लेकिन निजी जीवन में दोनों के बीच गहरा सम्मान था। फिल्म पत्रकार राजू भारतन समेत कई लेखकों के संस्मरणों के मुताबिक, एक डुएट गीत की रिकॉर्डिंग के दौरान किशोर कुमार को पता चला कि उन्हें रफी साहब से ज्यादा भुगतान किया जा रहा है। उन्होंने निर्माता से कहा कि रफी जैसे महान गायक को उनसे कम फीस नहीं मिलनी चाहिए। बताया जाता है कि बाद में निर्माता ने रफी का पारिश्रमिक बढ़ाया।

‘हाफ टिकट’ में लता नहीं पहुंचीं, तो खुद ही गा दी पुरुष और महिला की आवाजें

1962 में रिलीज हुई फिल्म हाफ टिकट का गीत ‘आके सीधी लगी दिल पे’ भारतीय फिल्म संगीत के सबसे अनोखे प्रयोगों में गिना जाता है। शुरुआत में यह गीत लता मंगेशकर और किशोर कुमार की आवाज में रिकॉर्ड होना था, लेकिन रिकॉर्डिंग के समय लता उपलब्ध नहीं हो सकीं।

ऐसे में किशोर कुमार ने पुरुष और महिला दोनों हिस्से खुद गाए। आज भी दोनों आवाजों में फर्क करना आसान नहीं होता। संगीत समीक्षक इसे उनकी वोकल रेंज और अभिनय क्षमता का दुर्लभ उदाहरण मानते हैं। यह उनके करियर की सबसे अनोखी प्रस्तुतियों में गिनी जाती है।

आर.डी. बर्मन से पहली मुलाकात भी किसी फिल्मी सीन से कम नहीं थी

राहुल देव बर्मन (पंचम दा) और किशोर कुमार की जोड़ी ने हिंदी फिल्म संगीत को अनगिनत सुपरहिट गीत दिए। उनकी पहली मुलाकात भी दिलचस्प थी। आर.डी. बर्मन ने बताया था कि पहली बार मिलने पर उन्होंने किशोर कुमार को साधु जैसे वेश में बैठे देखा। किशोर कुमार ने पहले मजाक किया, फिर अलग-अलग लोगों की मिमिक्री सुनाई और आखिर में हंसते हुए अपना परिचय दिया।

पंचम दा कहते थे कि पहली मुलाकात में ही उन्हें एहसास हो गया था कि किशोर कुमार अलग ही दुनिया के इंसान हैं। यही रिश्ता आगे चलकर हिंदी फिल्म संगीत की सबसे सफल संगीतकार-गायक जोड़ियों में बदल गया।

बिना रियाज के नहीं, अपने तरीके से तैयारी करते थे

किशोर कुमार कहते थे कि वे शास्त्रीय रियाज नहीं करते, लेकिन बिना तैयारी के भी नहीं गाते थे। रिकॉर्डिंग से पहले वे घंटों अकेले बैठकर धुन, शब्द और मूड समझते थे। कई संगीतकारों के मुताबिक, वे गाने के भाव को पकड़ने में सबसे ज्यादा समय लगाते थे। जब तक उन्हें लगता कि गाना भीतर से महसूस नहीं हुआ, तब तक रिकॉर्डिंग शुरू नहीं करते थे।

पेड़ों से बातें करते थे, इसलिए लोग उन्हें सनकी कहने लगे

किशोर कुमार के बारे में सबसे मशहूर बातों में एक यह रही कि वे अपने बंगले के पेड़ों से बातें करते थे। वर्षों तक इस किस्से को उनकी ‘सनक’ का प्रतीक बनाकर पेश किया गया। हालांकि, बेटे अमित कुमार और करीबियों के इंटरव्यू एक अलग तस्वीर पेश करते हैं।

अमित कुमार ने कई बातचीत में कहा कि उनके पिता प्रकृति के बेहद करीब थे। उन्हें पेड़ों के बीच समय बिताना अच्छा लगता था। वे हर पेड़ को पहचानते थे और कभी-कभी मजाकिया अंदाज में उनसे बातें कर लेते थे। फिल्म इंडस्ट्री की भागदौड़ और लगातार काम के बीच यही उनका सुकून पाने का तरीका था। बाद में कई फिल्म इतिहासकारों ने भी लिखा कि इस आदत को बढ़ा-चढ़ाकर उनकी सनक के तौर पर पेश किया गया।

इंटरव्यू से बचने के लिए ड्रॉइंग रूम में लगवा दी थीं खोपड़ियां और लाल रोशनी

किशोर कुमार मीडिया से दूरी बनाकर रखते थे। कई वरिष्ठ फिल्म पत्रकारों के संस्मरणों के मुताबिक, उनके घर के ड्रॉइंग रूम में नकली खोपड़ियां, हड्डियां और लाल रंग की लाइटें लगी रहती थीं।

बताया जाता है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि पहली बार आने वाला व्यक्ति थोड़ा असहज महसूस करे। इसके बाद किशोर कुमार अपने अंदाज में बातचीत शुरू करते थे। कुछ पत्रकारों के मुताबिक, इंटरव्यू से पहले वे मजाकिया शर्तें रखते थे- ‘मेरे घर का खाना मत मांगना, पैसे उधार मत मांगना और मेरी हॉरर फिल्मों का कलेक्शन मत मांगना।’

यही वजह थी कि उनके इंटरव्यू दूसरे कलाकारों से अलग अनुभव बन जाते थे।

कार गार्डन में दफनाकर कई दिनों तक शोक मनाया था

किशोर कुमार से जुड़ा सबसे चर्चित किस्सा उनकी पहली कार का है। फिल्म पत्रकार राजू भारतन और कई बायोग्राफी के मुताबिक, जब उनकी पहली कार पूरी तरह खराब हो गई, तो उन्होंने उसे कबाड़ में बेचने से इनकार कर दिया। उन्होंने कार को बंगले के परिसर में दफन करवा दिया और कई दिनों तक उसके लिए शोक मनाया।

भारतीय सेना के जवानों के सामने परफॉर्म करने के लिए सुनील दत्त ने किशोर कुमार को एक साल तक मनाया था।

भारतीय सेना के जवानों के सामने परफॉर्म करने के लिए सुनील दत्त ने किशोर कुमार को एक साल तक मनाया था।

स्टेज पर गाने से डरते थे किशोर कुमार, सुनील दत्त ने ‘एक चतुर नार’ वाला दांव खेलकर दूर किया डर

किशोर कुमार जितने बेहतरीन गायक थे, उतना ही उन्हें लाइव स्टेज पर गाने से डर लगता था। सुनील दत्त करीब एक साल तक उन्हें भारतीय सैनिकों के लिए आयोजित कार्यक्रम में परफॉर्म करने के लिए मनाते रहे। आखिरकार किशोर तैयार हुए, लेकिन बोले- आप माइक के सामने खड़े रहेंगे, मैं पीछे से गाऊंगा, बिल्कुल फिल्म पड़ोसन के गाने ‘एक चतुर नार’ की तरह।

जैसे ही किशोर कुमार ने आंखें बंद कर गाना शुरू किया, सुनील दत्त चुपचाप मंच से हट गए। तालियों की गूंज सुनकर जब किशोर ने आंखें खोलीं, तो वे अकेले मंच पर थे। इसके बाद उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ कई गाने सुनाए और उनका स्टेज फियर हमेशा के लिए खत्म हो गया।

मुंबई में रहते थे, लेकिन दिल हमेशा खंडवा में बसता था

करोड़ों लोगों की आवाज बनने के बावजूद किशोर कुमार मुंबई की चमक-दमक में पूरी तरह नहीं रम पाए। उन्होंने कई इंटरव्यू में अपने पैतृक शहर खंडवा का जिक्र किया। वे अक्सर कहते थे कि एक दिन सब कुछ छोड़कर खंडवा लौट जाएंगे। वहां की गलियां, बचपन की यादें और सादा जीवन उन्हें हमेशा अपनी ओर खींचता था।

उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। 13 अक्टूबर 1987 को उनका निधन मुंबई में हुआ, लेकिन अंतिम इच्छा के अनुसार उनका पार्थिव शरीर खंडवा ले जाया गया, जहां अंतिम संस्कार किया गया। यही वजह है कि आज भी खंडवा सिर्फ उनका जन्मस्थान नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी भावनात्मक पहचान माना जाता है।

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1 घंटे पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र

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किशोर कुमार का बचपन का नाम आभास कुमार गांगुली था।

हिंदी सिनेमा के सबसे बहुमुखी कलाकारों में किशोर कुमार का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। उन्होंने अभिनय, संगीत, निर्देशन और फिल्म निर्माण किया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी आवाज बनी। चार दशक तक उन्होंने मोहम्मद रफी, मुकेश और मन्ना डे जैसे दिग्गजों के बीच अपनी अलग जगह बनाई।

जितने शानदार वे गायक थे, उतनी ही रहस्यमयी उनकी निजी जिंदगी थी। कोई उन्हें सनकी कहता था, कोई जीनियस, तो कोई उनकी संवेदनशीलता का कायल था। उनके व्यक्तित्व के कई रंग थे, जिन्हें सिर्फ करीबी लोग ही समझ पाए।

4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में जन्मे किशोर कुमार की 97वीं बर्थ एनिवर्सरी पर पढ़िए उनकी जिंदगी के कुछ दिलचस्प किस्से, जो बताते हैं कि पर्दे पर लोगों को हंसाने वाला यह कलाकार असल जिंदगी में कितना अलग था।

बचपन की एक चोट और उससे जुड़ा उनकी आवाज का सबसे चर्चित किस्सा

किशोर कुमार की आवाज दुनिया की सबसे अलग आवाजों में गिनी जाती है। उनके सुरों के खुरदरेपन, लचक और सहजता से जुड़ा एक पारिवारिक संस्मरण चर्चित है। बड़े भाई अशोक कुमार ने कई इंटरव्यू में बताया था कि बचपन में किशोर के पैर में गहरी चोट लगी थी। दर्द इतना था कि वे घंटों रोते रहे। परिवार का मानना था कि लंबे समय तक रोने से उनकी आवाज का टेक्सचर बदल गया और वही आगे चलकर उनकी पहचान बना।

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मुंबई आए तो अभिनेता नहीं, सिर्फ गायक बनने का सपना था

किशोर कुमार अभिनेता नहीं, गायक बनना चाहते थे। वे मुंबई अपने आदर्श के.एल. सहगल की तरह गायक बनने आए थे। बड़े भाई अशोक कुमार के स्टार होने के कारण उन्हें अभिनय के प्रस्ताव मिलने लगे। शुरुआती दिनों में उन्होंने परिवार और निर्माताओं की इच्छा पर कई फिल्में कीं। बाद में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने उन्हें सफल अभिनेता बनाया, लेकिन उन्होंने माना कि उनका पहला प्यार हमेशा गायकी ही रही।

‘आनंद’ पहले किशोर कुमार को ऑफर हुई थी, लेकिन एक गलतफहमी ने बदल दिया हिंदी सिनेमा का इतिहास

1971 में रिलीज हुई ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म आनंद भारतीय सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती है। टाइटल रोल के लिए राजेश खन्ना पहली पसंद नहीं थे। गीतकार-लेखक गुलजार ने अपनी संस्मरण पुस्तक Actually… I Met Them में लिखा है कि ऋषिकेश मुखर्जी इस फिल्म में किशोर कुमार को लेना चाहते थे। अमित कुमार ने भी एक इंटरव्यू में कहा कि उनके पिता को सबसे पहले इस फिल्म का प्रस्ताव मिला था।

इस किस्से का सबसे चर्चित हिस्सा एक गलतफहमी से जुड़ा है। बताया जाता है कि एक बंगाली आयोजक से भुगतान विवाद के बाद किशोर कुमार ने दरबान से कह रखा था कि वह व्यक्ति दोबारा आए तो उसे अंदर न आने दिया जाए। संयोग से ऋषिकेश मुखर्जी कहानी सुनाने पहुंचे, तो दरबान ने उन्हें भी वही व्यक्ति समझकर लौटा दिया।

इससे ऋषिकेश मुखर्जी आहत हो गए और उन्होंने किशोर कुमार के साथ फिल्म बनाने का विचार छोड़ दिया। बाद में आनंद का रोल राजेश खन्ना को मिला, जो उनके करियर की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल हुई।

हालांकि, इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है। गुलजार ने अपनी किताब में लिखा है कि फिल्म शुरू होने से कुछ दिन पहले किशोर कुमार सिर मुंडवाकर ऋषिकेश मुखर्जी के सामने पहुंचे और मजाक में गाने लगे, “अब क्या करोगे, ऋषि?” इसके बाद फिल्म के लिए नए अभिनेता की तलाश शुरू हुई। इसलिए फिल्म छूटने की असली वजह को लेकर आज भी अलग-अलग दावे किए जाते हैं।

किशोर कुमार, के.एल. सहगल के गानों से प्रभावित थे और उन्हीं की तरह गायक बनना चाहते थे। सहगल से मिलने की चाह में 18 साल की उम्र में मुंबई पहुंचे, लेकिन उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पाई।

किशोर कुमार, के.एल. सहगल के गानों से प्रभावित थे और उन्हीं की तरह गायक बनना चाहते थे। सहगल से मिलने की चाह में 18 साल की उम्र में मुंबई पहुंचे, लेकिन उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पाई।

मुंबई में भी मजाक नहीं छोड़ा, बना लिया अपना रेट कार्ड

संगीत के प्रति जितना जुनून था, हास्यबोध भी उतना ही गजब का था। फिल्म पत्रकारों और संस्मरणों के मुताबिक, शुरुआती दिनों में दोस्तों की महफिल में किशोर कुमार मजाक में अपना रेट कार्ड बताते थे। कहते थे- अगर अशोक कुमार का गाना सुनना है तो 25 पैसे, किसी और का 50 पैसे और के.एल. सहगल का गीत सुनना है तो एक रुपया देना पड़ेगा।

के.एल. सहगल उनके सबसे बड़े आदर्श थे और वे उन्हें अपना गुरु मानते थे। इसलिए एचएमवी ने जब सहगल के गीतों का एल्बम रिकॉर्ड करने का प्रस्ताव दिया, तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि लोग यह न कहें कि उन्होंने अपने गुरु से बेहतर गाया।

शास्त्रीय संगीत नहीं सीखा, फिर भी बने भारतीय सिनेमा की सबसे अलग आवाज

किशोर कुमार ने कभी शास्त्रीय संगीत की औपचारिक शिक्षा नहीं ली। इसके बावजूद उन्होंने सुरों पर ऐसी पकड़ बनाई, जो आज भी संगीत विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय है। सचिन देव बर्मन ने उनकी प्राकृतिक प्रतिभा पहचानी और मौलिक शैली बनाए रखने की सलाह दी।

बाद में आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी और बप्पी लाहिड़ी समेत लगभग हर बड़े संगीतकार ने उनकी नैसर्गिक गायकी का भरपूर इस्तेमाल किया। चार राष्ट्रीय और आठ फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने वाले किशोर कुमार बिना औपचारिक प्रशिक्षण के भी गायकी की परिभाषा बदलने वाले गायक माने जाते हैं।

सचिन देव बर्मन ने पहचानी आवाज, फिर शुरू हुआ सुनहरे दौर का सफर

गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे किशोर कुमार को शुरुआती दौर में पहचान बनाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। उस समय फिल्म इंडस्ट्री पर मोहम्मद रफी, तलत महमूद और मुकेश का दबदबा था। इसी बीच एस.डी. बर्मन ने उनकी नैसर्गिक गायकी पहचानी।

आर.डी. बर्मन और फिल्म इतिहासकारों के मुताबिक, एस.डी. बर्मन उन्हें किसी की नकल न करने और मौलिक शैली में गाने की सलाह देते थे। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। बाद में मुनिमजी, पेइंग गेस्ट, नौ दो ग्यारह, गाइड, आराधना समेत कई फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा का सबसे लोकप्रिय पार्श्व गायक बना दिया।

किशोर दा लता मंगेशकर का बहुत सम्मान करते थे। जब भी वे उनके साथ कोई गाना गाते थे, तो प्रोड्यूसर से कहते थे कि लता दीदी को जितना पैसा दिया गया है, उन्हें उससे एक रुपए कम दिया जाए।

किशोर दा लता मंगेशकर का बहुत सम्मान करते थे। जब भी वे उनके साथ कोई गाना गाते थे, तो प्रोड्यूसर से कहते थे कि लता दीदी को जितना पैसा दिया गया है, उन्हें उससे एक रुपए कम दिया जाए।

लता मंगेशकर के साथ बनाई सबसे सफल जोड़ी, सम्मान ऐसा कि अपनी फीस भी कम कर ली

किशोर कुमार और लता मंगेशकर की जोड़ी ने हिंदी फिल्म संगीत को सैकड़ों यादगार गीत दिए। दोनों के बीच गहरा पेशेवर सम्मान था। फिल्म पत्रकारों और संगीत जगत में प्रचलित एक किस्से के मुताबिक, रिकॉर्डिंग से पहले किशोर कुमार कई बार निर्माताओं से पूछते थे कि लता मंगेशकर को कितना पारिश्रमिक दिया जा रहा है। अगर उनकी फीस ज्यादा होती, तो वे मजाक में कहते थे, “मुझे लता जी से एक रुपया कम दे दीजिए।”

एक रिकॉर्डिंग के दौरान ली गई मोहम्मद रफी और किशोर दा की तस्वीर।

एक रिकॉर्डिंग के दौरान ली गई मोहम्मद रफी और किशोर दा की तस्वीर।

जब पता चला कि रफी से ज्यादा फीस मिली है, तो निर्माता से बोले- पहले उनका भुगतान बढ़ाइए

मोहम्मद रफी और किशोर कुमार को अक्सर प्रतिद्वंद्वी माना गया, लेकिन निजी जीवन में दोनों के बीच गहरा सम्मान था। फिल्म पत्रकार राजू भारतन समेत कई लेखकों के संस्मरणों के मुताबिक, एक डुएट गीत की रिकॉर्डिंग के दौरान किशोर कुमार को पता चला कि उन्हें रफी साहब से ज्यादा भुगतान किया जा रहा है। उन्होंने निर्माता से कहा कि रफी जैसे महान गायक को उनसे कम फीस नहीं मिलनी चाहिए। बताया जाता है कि बाद में निर्माता ने रफी का पारिश्रमिक बढ़ाया।

‘हाफ टिकट’ में लता नहीं पहुंचीं, तो खुद ही गा दी पुरुष और महिला की आवाजें

1962 में रिलीज हुई फिल्म हाफ टिकट का गीत ‘आके सीधी लगी दिल पे’ भारतीय फिल्म संगीत के सबसे अनोखे प्रयोगों में गिना जाता है। शुरुआत में यह गीत लता मंगेशकर और किशोर कुमार की आवाज में रिकॉर्ड होना था, लेकिन रिकॉर्डिंग के समय लता उपलब्ध नहीं हो सकीं।

ऐसे में किशोर कुमार ने पुरुष और महिला दोनों हिस्से खुद गाए। आज भी दोनों आवाजों में फर्क करना आसान नहीं होता। संगीत समीक्षक इसे उनकी वोकल रेंज और अभिनय क्षमता का दुर्लभ उदाहरण मानते हैं। यह उनके करियर की सबसे अनोखी प्रस्तुतियों में गिनी जाती है।

आर.डी. बर्मन से पहली मुलाकात भी किसी फिल्मी सीन से कम नहीं थी

राहुल देव बर्मन (पंचम दा) और किशोर कुमार की जोड़ी ने हिंदी फिल्म संगीत को अनगिनत सुपरहिट गीत दिए। उनकी पहली मुलाकात भी दिलचस्प थी। आर.डी. बर्मन ने बताया था कि पहली बार मिलने पर उन्होंने किशोर कुमार को साधु जैसे वेश में बैठे देखा। किशोर कुमार ने पहले मजाक किया, फिर अलग-अलग लोगों की मिमिक्री सुनाई और आखिर में हंसते हुए अपना परिचय दिया।

पंचम दा कहते थे कि पहली मुलाकात में ही उन्हें एहसास हो गया था कि किशोर कुमार अलग ही दुनिया के इंसान हैं। यही रिश्ता आगे चलकर हिंदी फिल्म संगीत की सबसे सफल संगीतकार-गायक जोड़ियों में बदल गया।

बिना रियाज के नहीं, अपने तरीके से तैयारी करते थे

किशोर कुमार कहते थे कि वे शास्त्रीय रियाज नहीं करते, लेकिन बिना तैयारी के भी नहीं गाते थे। रिकॉर्डिंग से पहले वे घंटों अकेले बैठकर धुन, शब्द और मूड समझते थे। कई संगीतकारों के मुताबिक, वे गाने के भाव को पकड़ने में सबसे ज्यादा समय लगाते थे। जब तक उन्हें लगता कि गाना भीतर से महसूस नहीं हुआ, तब तक रिकॉर्डिंग शुरू नहीं करते थे।

पेड़ों से बातें करते थे, इसलिए लोग उन्हें सनकी कहने लगे

किशोर कुमार के बारे में सबसे मशहूर बातों में एक यह रही कि वे अपने बंगले के पेड़ों से बातें करते थे। वर्षों तक इस किस्से को उनकी ‘सनक’ का प्रतीक बनाकर पेश किया गया। हालांकि, बेटे अमित कुमार और करीबियों के इंटरव्यू एक अलग तस्वीर पेश करते हैं।

अमित कुमार ने कई बातचीत में कहा कि उनके पिता प्रकृति के बेहद करीब थे। उन्हें पेड़ों के बीच समय बिताना अच्छा लगता था। वे हर पेड़ को पहचानते थे और कभी-कभी मजाकिया अंदाज में उनसे बातें कर लेते थे। फिल्म इंडस्ट्री की भागदौड़ और लगातार काम के बीच यही उनका सुकून पाने का तरीका था। बाद में कई फिल्म इतिहासकारों ने भी लिखा कि इस आदत को बढ़ा-चढ़ाकर उनकी सनक के तौर पर पेश किया गया।

इंटरव्यू से बचने के लिए ड्रॉइंग रूम में लगवा दी थीं खोपड़ियां और लाल रोशनी

किशोर कुमार मीडिया से दूरी बनाकर रखते थे। कई वरिष्ठ फिल्म पत्रकारों के संस्मरणों के मुताबिक, उनके घर के ड्रॉइंग रूम में नकली खोपड़ियां, हड्डियां और लाल रंग की लाइटें लगी रहती थीं।

बताया जाता है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि पहली बार आने वाला व्यक्ति थोड़ा असहज महसूस करे। इसके बाद किशोर कुमार अपने अंदाज में बातचीत शुरू करते थे। कुछ पत्रकारों के मुताबिक, इंटरव्यू से पहले वे मजाकिया शर्तें रखते थे- ‘मेरे घर का खाना मत मांगना, पैसे उधार मत मांगना और मेरी हॉरर फिल्मों का कलेक्शन मत मांगना।’

यही वजह थी कि उनके इंटरव्यू दूसरे कलाकारों से अलग अनुभव बन जाते थे।

कार गार्डन में दफनाकर कई दिनों तक शोक मनाया था

किशोर कुमार से जुड़ा सबसे चर्चित किस्सा उनकी पहली कार का है। फिल्म पत्रकार राजू भारतन और कई बायोग्राफी के मुताबिक, जब उनकी पहली कार पूरी तरह खराब हो गई, तो उन्होंने उसे कबाड़ में बेचने से इनकार कर दिया। उन्होंने कार को बंगले के परिसर में दफन करवा दिया और कई दिनों तक उसके लिए शोक मनाया।

भारतीय सेना के जवानों के सामने परफॉर्म करने के लिए सुनील दत्त ने किशोर कुमार को एक साल तक मनाया था।

भारतीय सेना के जवानों के सामने परफॉर्म करने के लिए सुनील दत्त ने किशोर कुमार को एक साल तक मनाया था।

स्टेज पर गाने से डरते थे किशोर कुमार, सुनील दत्त ने ‘एक चतुर नार’ वाला दांव खेलकर दूर किया डर

किशोर कुमार जितने बेहतरीन गायक थे, उतना ही उन्हें लाइव स्टेज पर गाने से डर लगता था। सुनील दत्त करीब एक साल तक उन्हें भारतीय सैनिकों के लिए आयोजित कार्यक्रम में परफॉर्म करने के लिए मनाते रहे। आखिरकार किशोर तैयार हुए, लेकिन बोले- आप माइक के सामने खड़े रहेंगे, मैं पीछे से गाऊंगा, बिल्कुल फिल्म पड़ोसन के गाने ‘एक चतुर नार’ की तरह।

जैसे ही किशोर कुमार ने आंखें बंद कर गाना शुरू किया, सुनील दत्त चुपचाप मंच से हट गए। तालियों की गूंज सुनकर जब किशोर ने आंखें खोलीं, तो वे अकेले मंच पर थे। इसके बाद उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ कई गाने सुनाए और उनका स्टेज फियर हमेशा के लिए खत्म हो गया।

मुंबई में रहते थे, लेकिन दिल हमेशा खंडवा में बसता था

करोड़ों लोगों की आवाज बनने के बावजूद किशोर कुमार मुंबई की चमक-दमक में पूरी तरह नहीं रम पाए। उन्होंने कई इंटरव्यू में अपने पैतृक शहर खंडवा का जिक्र किया। वे अक्सर कहते थे कि एक दिन सब कुछ छोड़कर खंडवा लौट जाएंगे। वहां की गलियां, बचपन की यादें और सादा जीवन उन्हें हमेशा अपनी ओर खींचता था।

उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। 13 अक्टूबर 1987 को उनका निधन मुंबई में हुआ, लेकिन अंतिम इच्छा के अनुसार उनका पार्थिव शरीर खंडवा ले जाया गया, जहां अंतिम संस्कार किया गया। यही वजह है कि आज भी खंडवा सिर्फ उनका जन्मस्थान नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी भावनात्मक पहचान माना जाता है।

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