Tuesday, 22 Sep 2026 | 12:52 AM

Trending :

EXCLUSIVE

Aryabhatt Ka Zero Movie Review

Aryabhatt Ka Zero Movie Review

14 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

हर इंसान की जिंदगी में एक वक्त ऐसा आता है, जब लोग उससे पहले हार मान लेते हैं और फिर वह खुद भी अपने आप पर भरोसा खोने लगता है। ‘आर्यभट्ट का जीरो’ ऐसे ही एक आम लड़के की कहानी है, जिसे दुनिया बार बार नाकाम साबित करती है।

निर्देशक कमल चंद्र ने आत्मविश्वास और उम्मीद जैसे मजबूत विषय को हल्के फुल्के अंदाज में पेश करने की कोशिश की है। फिल्म दिल से बनाई गई है और उसका संदेश भी साफ है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले इसकी उड़ान को पूरी ऊंचाई तक नहीं पहुंचने देता। इसकी लेंथ 1 घंटा 54 मिनट है। दैनिक भास्कर ने फिल्म को 5 में से 3 स्टार रेटिंग दी है।

फिल्म की कहानी कैसी है?

फिल्म की कहानी ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव उर्फ बग्गू (हिमांश कोहली) के इर्द गिर्द घूमती है। मध्यम वर्गीय परिवार का यह युवक जिंदगी में अपनी पहचान बनाना चाहता है, लेकिन लगातार मिल रही असफलताएं उसे अंदर से तोड़ देती हैं।

परिवार की उम्मीदें, समाज के ताने और खुद पर से उठता भरोसा उसके संघर्ष को और मुश्किल बना देते हैं। हालात जैसे जैसे बदलते हैं, बग्गू भी खुद को बदलने की कोशिश करता है। आखिर कैसे एक ऐसा लड़का, जिसे हर कोई ‘जीरो’ समझता है, अपनी सबसे बड़ी ताकत खुद बनता है, यही फिल्म की कहानी है। अच्छी बात यह है कि फिल्म अपना संदेश बिना भाषण दिए सहज तरीके से कहती है।

स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है?

पूरी फिल्म हिमांश कोहली के कंधों पर टिकी है और वह इस जिम्मेदारी को अच्छी तरह निभाते हैं। रोमांटिक भूमिकाओं से अलग इस बार उन्होंने छोटे शहर के एक ऐसे युवक का किरदार निभाया है, जो बार बार टूटता है, लेकिन हार नहीं मानता। उनके चेहरे के भाव और भावनात्मक दृश्यों में ईमानदारी साफ दिखाई देती है। यह उनके करियर की बेहतर परफॉर्मेंस में से एक कही जा सकती है।

बग्गू के पिता के किरदार में नीरज सूद शानदार हैं। उनका अभिनय बेहद सहज है और पिता बेटे के कई दृश्य दिल को छू जाते हैं। रवि किशन अपने चिर परिचित अंदाज में मनोरंजन का तड़का लगाते हैं और जहां भी आते हैं, ध्यान खींचते हैं।

सोनाली सहगल और दर्शना बनिक अपने किरदारों के साथ न्याय करती हैं। हालांकि राजेश शर्मा, अलका अमीन और शिल्पा शिंदे जैसे अनुभवी कलाकारों को फिल्म में और बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता था। उनके किरदारों में और गहराई और स्क्रीन स्पेस की गुंजाइश साफ महसूस होती है।

डायरेक्शन, तकनीकी पक्ष और कमियां

निर्देशक कमल चंद्रा ने एक अच्छा विषय चुना है और कई जगह उनकी संवेदनशीलता भी नजर आती है। फिल्म छोटे शहर की दुनिया को विश्वसनीय तरीके से पेश करती है और वास्तविक लोकेशंस इसकी खूबसूरती बढ़ाती हैं। सिनेमेटोग्राफी भी कहानी के मूड के साथ अच्छी तरह चलती है।

लेकिन सबसे बड़ी कमी स्क्रीनप्ले में दिखाई देती है। कहानी कई जगह भटकती है और कुछ दृश्य ऐसे लगते हैं जिन्हें आसानी से हटाया जा सकता था। उनसे न कहानी आगे बढ़ती है और न ही किरदारों में कोई खास बदलाव आता है। एडिटिंग में थोड़ी और कसावट होती तो फिल्म ज्यादा प्रभावशाली बन सकती थी। अच्छे विषय के बावजूद प्रस्तुति कई बार उतनी मजबूत नहीं लगती, जितनी हो सकती थी।

म्यूजिक कैसा है?

फिल्म का संगीत कहानी के साथ चलता है। गाने जब आते हैं तो अलग से बोझ नहीं लगते और कहानी का हिस्सा बनकर सामने आते हैं। हालांकि थिएटर से बाहर निकलने के बाद ऐसा कोई गीत याद नहीं रह जाता जिसे बार बार सुना जाए। बैकग्राउंड स्कोर कई भावनात्मक दृश्यों का असर जरूर बढ़ाता है।

फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं?

‘आर्यभट्ट का जीरो’ एक ईमानदार कोशिश है, जो खुद पर भरोसा रखने का संदेश देती है। हिमांश कोहली का बदला हुआ अंदाज और उनका अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। नीरज सूद और रवि किशन भी अच्छा साथ देते हैं। हालांकि ढीला स्क्रीनप्ले, कुछ अनावश्यक दृश्य और कई जगह धीमी पड़ती रफ्तार फिल्म को एक बेहतर अनुभव बनने से रोक देती है। अगर आपको छोटे शहरों की जमीन से जुड़ी, हल्की फुल्की और प्रेरणादायक कहानियां पसंद हैं, तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
अश्विन बोले-बटलर को आउट करना गलत नहीं:बोले-लोग इसे ईमानदारी से जोड़ते हैं,जबकि यह नियम है

May 3, 2026/
2:11 pm

टीम इंडिया के पूर्व ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने ‘मांकडिंग’ विवाद (नॉन-स्ट्राइकर एंड पर रन आउट) पर खुलकर बात की।...

CBSE 12th results 2026 soon on results.cbse.nic.in, DigiLocker. (File/Representative Image)

May 7, 2026/
11:04 am

आखरी अपडेट:07 मई, 2026, 11:04 IST टीवीके द्वारा विधानसभा चुनाव में 108 सीटें हासिल करने के बाद 4 मई को...

ईरान-इजराइल तनाव से चीन को झटका:मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग; चीन के 8 लाख करोड़ दांव पर, डिसेलिनेशन से लेकर टेक प्रोजेक्ट्स तक सब खतरे में

March 10, 2026/
5:42 pm

मिडिल ईस्ट में चल रहा युद्ध चीन के लिए‎ खतरनाक साबित हो सकता है। दरअसल चीन ने‎ मिडिल ईस्ट में...

फिल्म ‘जय हनुमान’ की हुई शुरुआत:भगवान हनुमान के जन्मस्थान माने जाने वाले स्थल पर मुहूर्त पूजा, ऋषभ शेट्टी निभाएंगे लीड रोल

February 22, 2026/
2:06 pm

फिल्म जय हनुमान की आधिकारिक शुरुआत भव्य मुहूर्त पूजा के साथ हुई। यह कार्यक्रम रविवार को कर्नाटक के कोप्पल जिले...

अमेजन भारत में ₹1.23 लाख करोड़ का निवेश करेगा:PM मोदी से मिले CEO एंडी जेसी; AI-क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार होगा, 38 लाख नौकरी मिलेगी

June 25, 2026/
5:32 pm

अमेजन भारत में 13 बिलियन डॉलर यानी करीब 1.23 लाख करोड़ रुपए का नया निवेश करेगी। इस राशि का इस्तेमाल...

जॉब - शिक्षा

राजनीति

Aryabhatt Ka Zero Movie Review

Aryabhatt Ka Zero Movie Review

14 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

हर इंसान की जिंदगी में एक वक्त ऐसा आता है, जब लोग उससे पहले हार मान लेते हैं और फिर वह खुद भी अपने आप पर भरोसा खोने लगता है। ‘आर्यभट्ट का जीरो’ ऐसे ही एक आम लड़के की कहानी है, जिसे दुनिया बार बार नाकाम साबित करती है।

निर्देशक कमल चंद्र ने आत्मविश्वास और उम्मीद जैसे मजबूत विषय को हल्के फुल्के अंदाज में पेश करने की कोशिश की है। फिल्म दिल से बनाई गई है और उसका संदेश भी साफ है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले इसकी उड़ान को पूरी ऊंचाई तक नहीं पहुंचने देता। इसकी लेंथ 1 घंटा 54 मिनट है। दैनिक भास्कर ने फिल्म को 5 में से 3 स्टार रेटिंग दी है।

फिल्म की कहानी कैसी है?

फिल्म की कहानी ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव उर्फ बग्गू (हिमांश कोहली) के इर्द गिर्द घूमती है। मध्यम वर्गीय परिवार का यह युवक जिंदगी में अपनी पहचान बनाना चाहता है, लेकिन लगातार मिल रही असफलताएं उसे अंदर से तोड़ देती हैं।

परिवार की उम्मीदें, समाज के ताने और खुद पर से उठता भरोसा उसके संघर्ष को और मुश्किल बना देते हैं। हालात जैसे जैसे बदलते हैं, बग्गू भी खुद को बदलने की कोशिश करता है। आखिर कैसे एक ऐसा लड़का, जिसे हर कोई ‘जीरो’ समझता है, अपनी सबसे बड़ी ताकत खुद बनता है, यही फिल्म की कहानी है। अच्छी बात यह है कि फिल्म अपना संदेश बिना भाषण दिए सहज तरीके से कहती है।

स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है?

पूरी फिल्म हिमांश कोहली के कंधों पर टिकी है और वह इस जिम्मेदारी को अच्छी तरह निभाते हैं। रोमांटिक भूमिकाओं से अलग इस बार उन्होंने छोटे शहर के एक ऐसे युवक का किरदार निभाया है, जो बार बार टूटता है, लेकिन हार नहीं मानता। उनके चेहरे के भाव और भावनात्मक दृश्यों में ईमानदारी साफ दिखाई देती है। यह उनके करियर की बेहतर परफॉर्मेंस में से एक कही जा सकती है।

बग्गू के पिता के किरदार में नीरज सूद शानदार हैं। उनका अभिनय बेहद सहज है और पिता बेटे के कई दृश्य दिल को छू जाते हैं। रवि किशन अपने चिर परिचित अंदाज में मनोरंजन का तड़का लगाते हैं और जहां भी आते हैं, ध्यान खींचते हैं।

सोनाली सहगल और दर्शना बनिक अपने किरदारों के साथ न्याय करती हैं। हालांकि राजेश शर्मा, अलका अमीन और शिल्पा शिंदे जैसे अनुभवी कलाकारों को फिल्म में और बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता था। उनके किरदारों में और गहराई और स्क्रीन स्पेस की गुंजाइश साफ महसूस होती है।

डायरेक्शन, तकनीकी पक्ष और कमियां

निर्देशक कमल चंद्रा ने एक अच्छा विषय चुना है और कई जगह उनकी संवेदनशीलता भी नजर आती है। फिल्म छोटे शहर की दुनिया को विश्वसनीय तरीके से पेश करती है और वास्तविक लोकेशंस इसकी खूबसूरती बढ़ाती हैं। सिनेमेटोग्राफी भी कहानी के मूड के साथ अच्छी तरह चलती है।

लेकिन सबसे बड़ी कमी स्क्रीनप्ले में दिखाई देती है। कहानी कई जगह भटकती है और कुछ दृश्य ऐसे लगते हैं जिन्हें आसानी से हटाया जा सकता था। उनसे न कहानी आगे बढ़ती है और न ही किरदारों में कोई खास बदलाव आता है। एडिटिंग में थोड़ी और कसावट होती तो फिल्म ज्यादा प्रभावशाली बन सकती थी। अच्छे विषय के बावजूद प्रस्तुति कई बार उतनी मजबूत नहीं लगती, जितनी हो सकती थी।

म्यूजिक कैसा है?

फिल्म का संगीत कहानी के साथ चलता है। गाने जब आते हैं तो अलग से बोझ नहीं लगते और कहानी का हिस्सा बनकर सामने आते हैं। हालांकि थिएटर से बाहर निकलने के बाद ऐसा कोई गीत याद नहीं रह जाता जिसे बार बार सुना जाए। बैकग्राउंड स्कोर कई भावनात्मक दृश्यों का असर जरूर बढ़ाता है।

फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं?

‘आर्यभट्ट का जीरो’ एक ईमानदार कोशिश है, जो खुद पर भरोसा रखने का संदेश देती है। हिमांश कोहली का बदला हुआ अंदाज और उनका अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। नीरज सूद और रवि किशन भी अच्छा साथ देते हैं। हालांकि ढीला स्क्रीनप्ले, कुछ अनावश्यक दृश्य और कई जगह धीमी पड़ती रफ्तार फिल्म को एक बेहतर अनुभव बनने से रोक देती है। अगर आपको छोटे शहरों की जमीन से जुड़ी, हल्की फुल्की और प्रेरणादायक कहानियां पसंद हैं, तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.