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फिल्म ‘हनुमान अंश’ में दिखी जयपुर के चित्रकार की पेंटिंग:की-बोर्ड की कुंजियों से बनाई, तीन महीने में तैयार हुई नीम करोली बाबा की कलाकृति

फिल्म ‘हनुमान अंश’ में दिखी जयपुर के चित्रकार की पेंटिंग:की-बोर्ड की कुंजियों से बनाई, तीन महीने में तैयार हुई नीम करोली बाबा की कलाकृति

जयपुर के कंटेम्परेरी कलाकार मुकेश शर्मा इन दिनों अपनी एक अनोखी कलाकृति को लेकर चर्चा में हैं। नीम करोली बाबा पर बनी उनकी यह पेंटिंग फिल्म ‘हनुमान अंश’ में दिखाई गई है। खास बात यह है कि फिल्म में मुकेश शर्मा के काम और इस पेंटिंग के निर्माण की प्रक्रिया को भी जगह दी गई है और फिल्म के अंत में उन्हें विशेष क्रेडिट दिया गया है। खास बात यह है कि इस पेंटिंग का सफर किसी सामान्य फिल्मी असाइनमेंट की तरह शुरू नहीं हुआ, बल्कि तकनीक और आध्यात्मिकता के बीच संबंध तलाशते हुए फिल्म के निर्माताओं की नजर मुकेश शर्मा की कला पर पड़ी। जयपुर के रहने वाले मुकेश शर्मा इन दिनों दिल्ली में रहकर अपनी कला साधना कर रहे हैं। वेनिस में देखे काम से शुरू हुआ फिल्म से जुड़ाव मुकेश शर्मा ने बताया कि फिल्म के निर्माता तकनीक के साथ काम करने वाले ऐसे कलाकारों की तलाश कर रहे थे, जिनकी कला में टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, चेतना और समकालीन जीवन से जुड़े सवाल दिखाई देते हों। इसी शोध के दौरान उनकी नजर मेरे काम पर पड़ी। निर्माताओं ने उनका विशाल स्कल्प्चरल इंस्टॉलेशन ‘नागराज’ वेनिस, इटली में देखा था। यहां देखें पेंटिंग के फोटोज…
कुछ समय बाद फिल्म की प्रोड्यूसर अनुप्रिया नागर ने उन से संपर्क किया। प्रोड्यूसर्स ने मुकेश शर्मा को बताया कि वह नीम करोली बाब पर फिल्म बना रहे हैं। और बाबा की आध्यात्मिक विचारधारा और तकनीक के बीच संबंध को भी फिल्म में तलाशना चाहते हैं। नीम करोली बाबा का प्रभाव भारत के साथ-साथ दुनिया भर के कई लोगों पर रहा है। तकनीक और समकालीन संस्कृति से जुड़े चर्चित नामों में स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग का उल्लेख भी अक्सर उनके संदर्भ में किया जाता है। निर्माताओं की दिलचस्पी इसी बिंदु में थी कि आध्यात्मिकता, तकनीक, ऊर्जा और मानवीय चेतना किस तरह एक-दूसरे से जोड़ती है। पोस्टर को अपनी कला भाषा में रीक्रिएट किया फिल्म की निर्माता अनुप्रिया नागर ने मुकेश शर्मा के साथ बातचीत के दौरान फिल्म का आधिकारिक पोस्टर शेयर किया, जिसे डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी ने तैयार किया था। मुकेश शर्मा ने इसी पोस्टर की छवि को अपनी विशिष्ट कला-भाषा में देखने और रीक्रिएट करने का प्रयास किया। कलाकार ने बताया कि उन्होंने इसके लिए डिस्कार्डेड कंप्यूटर और लैपटॉप की कुंजियों का इस्तेमाल किया। इन कुंजियों को काटा, घिसा और फिर एक-एक टुकड़े को बेहद बारीकी से जोड़ते हुए महाराज जी के चेहरे, कंबल और पूरी आकृति को आकार दिया गया। छोटे-छोटे हिस्सों को इस तरह संयोजित किया गया कि दूर से देखने पर एक संपूर्ण आकृति उभरती है, जबकि करीब से देखने पर उसमें इस्तेमाल की गई हजारों तकनीकी कुंजियां दिखाई देती हैं। यह पेंटिंग लगभग तीन महीने में बनकर तैयार हुई। ई-वेस्ट को दिया आध्यात्मिक अर्थ मुकेश शर्मा के लिए यह पेंटिंग केवल नीम करोली बाबा की तस्वीर नहीं है। यह तकनीक और आध्यात्मिकता के बीच एक समकालीन संवाद है। उन्होंने कहा कि कंप्यूटर और लैपटॉप की कुंजियां महज ई-कचरा नहीं हैं। वे हमारे समय, हमारी भाषा, हमारी स्मृतियों और तकनीकी जीवन के दस्तावेज भी हैं। जब इन्हीं अलग-अलग हिस्सों को एक साथ जोड़कर एक नई आकृति दी जाती है, तो डिस्कार्डेड तकनीक भी एक नई अर्थपूर्ण और आध्यात्मिक उपस्थिति हासिल कर लेती है। आश्रम की यात्रा ने बदला अनुभव इस कलाकृति के निर्माण के दौरान मुकेश शर्मा ने खुद नीम करोली बाबा के आश्रम की यात्रा भी की। इसी दौरान यह पूरा काम उनके लिए सिर्फ एक पेशेवर कमीशन नहीं रहा। मुकेश शर्मा कहते हैं कि उन्हें महसूस हुआ कि यह सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि किसी तरह का भीतर से आया एक आह्वान था। उन्हें लगा कि शायद यह आध्यात्मिक जुड़ाव सही समय पर उनके सामने आया है और इसी वजह से उन्होंने इस कमीशन को स्वीकार किया।

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जयपुर के कंटेम्परेरी कलाकार मुकेश शर्मा इन दिनों अपनी एक अनोखी कलाकृति को लेकर चर्चा में हैं। नीम करोली बाबा पर बनी उनकी यह पेंटिंग फिल्म ‘हनुमान अंश’ में दिखाई गई है। खास बात यह है कि फिल्म में मुकेश शर्मा के काम और इस पेंटिंग के निर्माण की प्रक्रिया को भी जगह दी गई है और फिल्म के अंत में उन्हें विशेष क्रेडिट दिया गया है। खास बात यह है कि इस पेंटिंग का सफर किसी सामान्य फिल्मी असाइनमेंट की तरह शुरू नहीं हुआ, बल्कि तकनीक और आध्यात्मिकता के बीच संबंध तलाशते हुए फिल्म के निर्माताओं की नजर मुकेश शर्मा की कला पर पड़ी। जयपुर के रहने वाले मुकेश शर्मा इन दिनों दिल्ली में रहकर अपनी कला साधना कर रहे हैं। वेनिस में देखे काम से शुरू हुआ फिल्म से जुड़ाव मुकेश शर्मा ने बताया कि फिल्म के निर्माता तकनीक के साथ काम करने वाले ऐसे कलाकारों की तलाश कर रहे थे, जिनकी कला में टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, चेतना और समकालीन जीवन से जुड़े सवाल दिखाई देते हों। इसी शोध के दौरान उनकी नजर मेरे काम पर पड़ी। निर्माताओं ने उनका विशाल स्कल्प्चरल इंस्टॉलेशन ‘नागराज’ वेनिस, इटली में देखा था। यहां देखें पेंटिंग के फोटोज…
कुछ समय बाद फिल्म की प्रोड्यूसर अनुप्रिया नागर ने उन से संपर्क किया। प्रोड्यूसर्स ने मुकेश शर्मा को बताया कि वह नीम करोली बाब पर फिल्म बना रहे हैं। और बाबा की आध्यात्मिक विचारधारा और तकनीक के बीच संबंध को भी फिल्म में तलाशना चाहते हैं। नीम करोली बाबा का प्रभाव भारत के साथ-साथ दुनिया भर के कई लोगों पर रहा है। तकनीक और समकालीन संस्कृति से जुड़े चर्चित नामों में स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग का उल्लेख भी अक्सर उनके संदर्भ में किया जाता है। निर्माताओं की दिलचस्पी इसी बिंदु में थी कि आध्यात्मिकता, तकनीक, ऊर्जा और मानवीय चेतना किस तरह एक-दूसरे से जोड़ती है। पोस्टर को अपनी कला भाषा में रीक्रिएट किया फिल्म की निर्माता अनुप्रिया नागर ने मुकेश शर्मा के साथ बातचीत के दौरान फिल्म का आधिकारिक पोस्टर शेयर किया, जिसे डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी ने तैयार किया था। मुकेश शर्मा ने इसी पोस्टर की छवि को अपनी विशिष्ट कला-भाषा में देखने और रीक्रिएट करने का प्रयास किया। कलाकार ने बताया कि उन्होंने इसके लिए डिस्कार्डेड कंप्यूटर और लैपटॉप की कुंजियों का इस्तेमाल किया। इन कुंजियों को काटा, घिसा और फिर एक-एक टुकड़े को बेहद बारीकी से जोड़ते हुए महाराज जी के चेहरे, कंबल और पूरी आकृति को आकार दिया गया। छोटे-छोटे हिस्सों को इस तरह संयोजित किया गया कि दूर से देखने पर एक संपूर्ण आकृति उभरती है, जबकि करीब से देखने पर उसमें इस्तेमाल की गई हजारों तकनीकी कुंजियां दिखाई देती हैं। यह पेंटिंग लगभग तीन महीने में बनकर तैयार हुई। ई-वेस्ट को दिया आध्यात्मिक अर्थ मुकेश शर्मा के लिए यह पेंटिंग केवल नीम करोली बाबा की तस्वीर नहीं है। यह तकनीक और आध्यात्मिकता के बीच एक समकालीन संवाद है। उन्होंने कहा कि कंप्यूटर और लैपटॉप की कुंजियां महज ई-कचरा नहीं हैं। वे हमारे समय, हमारी भाषा, हमारी स्मृतियों और तकनीकी जीवन के दस्तावेज भी हैं। जब इन्हीं अलग-अलग हिस्सों को एक साथ जोड़कर एक नई आकृति दी जाती है, तो डिस्कार्डेड तकनीक भी एक नई अर्थपूर्ण और आध्यात्मिक उपस्थिति हासिल कर लेती है। आश्रम की यात्रा ने बदला अनुभव इस कलाकृति के निर्माण के दौरान मुकेश शर्मा ने खुद नीम करोली बाबा के आश्रम की यात्रा भी की। इसी दौरान यह पूरा काम उनके लिए सिर्फ एक पेशेवर कमीशन नहीं रहा। मुकेश शर्मा कहते हैं कि उन्हें महसूस हुआ कि यह सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि किसी तरह का भीतर से आया एक आह्वान था। उन्हें लगा कि शायद यह आध्यात्मिक जुड़ाव सही समय पर उनके सामने आया है और इसी वजह से उन्होंने इस कमीशन को स्वीकार किया।

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